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Pracin Bharatiya Veshabhusha c8.s5.3

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8.s5.3

Language
Hindi

c8.s5.3

२—केचलक२८—अर्थशास्त्र की टीका में इसे कुचेलक भी पढ़ा गया है। श्री शामा शास्त्री ने कोचपक पाठ ठीक माना है। उनके अनुसार यह वस्त्र ग्वालों का कंबल था। शायद इसकी घोघी बना कर वे पहनते थे । गणपति शास्त्री की टीका में इसका अर्थ वन्य शिरस्त्राण अर्थात् जंगलियों के सिर ढाकने का वस्त्र किया है ।