Pracin Bharatiya Veshabhusha c8.s5: दस तरह के ऊनी कपड़े
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8.s5
- Language
- Hindi
दस तरह के ऊनी कपड़े
c8.s5.1
इनमें विशेषकर पशुओं के बिछाने के आस्तरणों का उल्लेख है । कंबल, केचलक, वारवाण भी ऊनी होते थे ।
c8.s5.2
१—कंबल२७—कंबल अथवा और तरह के ऊनी कपड़ों के लिए एक साधारण शब्द ।
c8.s5.3
२—केचलक२८—अर्थशास्त्र की टीका में इसे कुचेलक भी पढ़ा गया है। श्री शामा शास्त्री ने कोचपक पाठ ठीक माना है। उनके अनुसार यह वस्त्र ग्वालों का कंबल था। शायद इसकी घोघी बना कर वे पहनते थे । गणपति शास्त्री की टीका में इसका अर्थ वन्य शिरस्त्राण अर्थात् जंगलियों के सिर ढाकने का वस्त्र किया है ।
c8.s5.4
३—कलमितिका२९—इस शब्द के पाठभेद कुलमितिका और कथमितिका भी हैं। गणपति शास्त्री इसका अर्थ गजास्तरण करते हैं । पर इस अर्थ तक वे कैसे पहुंचे यह कहना कठिन है । शायद कुथं और कुलं या कलं में समानता मान लेने से यह भ्रम हुआ हो । अगर यह अर्थ ठीक है तो क(कु)लमितिका का शुद्ध पाठ कुथं होना चाहिए । इस दृष्टि से शामा शास्त्री का दिया हुआ कथमितिका शुद्ध पाठ के बहुत पास है । शायद ठीक पाठ कुथमितिका था जिसके अर्थ होते हैं ठीक नाप वाला गजास्तरण । लेकिन अगर कलं-कुलं पाठ ही ठीक मान लिया जाय तो इस शब्द की समानता फारसी कुलाह से की जा सकती है जिसके अर्थ टोपी होते हैं और इसी अर्थ में शामा शास्त्री द्वारा उल्लिखित टीकाकार ने इस शब्द के अर्थ किये हैं ।
c8.s5.5
२९ ग० शा०, १, पृ० १६३; शा० शा० पृ० ८५, फु० नो० ५
c8.s5.6
४—सोमितिका३०—शामा शास्त्री वाली टीका ने इसे बैल की पीठ पर बिछाने वाला एक आस्तरण माना है, लेकिन गणपति शास्त्री की टीका में इसका अर्थ दिया है 'कृष्णवर्णा गजपर्याणोपर्यास्तरणम्' अर्थात् हाथी के हौदे पर बिछाने वाला आस्तरण ।
c8.s5.7
३० शा० शा०, पृ० ८६, फु० नो० ६; ग० शा०, १, पृ० १६३
c8.s5.8
५—तुरगास्तरण३१—घोड़े की जीन पर बिछाने वाला आस्तरण ।
c8.s5.9
३१ वही, फु० नो० ७
c8.s5.10
६—वर्णक३२—शामा शास्त्री की टीका में इस शब्द का अर्थ रंगीन कंबल दिया हुआ है ।
c8.s5.11
२७-२८ गणपति शास्त्री, वही, १, पृ० १६३
c8.s5.12
३२ वही, फु० नो० ८
c8.s5.13
७—तलिच्छक३३—शामा शास्त्री की टीका में इसका अर्थ कंबल या पलंगपोश दिया हुआ है।
c8.s5.14
३३ वही, फु० नो० ६
c8.s5.15
८—वारवाण३४—शामा शास्त्री की टीका में इसका अर्थ कोट दिया हुआ है।
c8.s5.16
३४ वही, फु० नो० १०
c8.s5.17
९—परिस्तोम३५—शामा शास्त्री की टीका में इसका अर्थ एक बड़ा कंबल है। गणपति शास्त्री की टीका में इस शब्द का विस्तारपूर्वक अर्थ दिया हुआ है। 'कंबलभेदो विस्तारचित्रः यो विस्तृतवदवभासस्ते निर्माणवैचित्र्याद् स इति व्याचक्षते, कुथ इति त्वेके' 'नक्काशीदार बड़ा कंबल, निर्माण वैचित्र्य से बड़ा लगने वाला कंबल, कोई इसे कुथ भी कहता है।' लगता है कि परिस्तोम का व्यवहार झूल के लिए होता था।
c8.s5.18
३५ वही, फु० नो० ११
c8.s5.19
(१०) समंतभद्रक३६—शामा शास्त्री की टीका के अनुसार यह हाथी के पीठ पर डाले जाने वाला कोई आस्तरण विशेष था। गणपति शास्त्री अपनी टीका में इस शब्द का अर्थ करते हैं समंतभद्रकं सन्नाहपट्ट, गजादिघनत्राणं इत्यपरे—'समंतभद्र रुईदार वस्त्र है, दूसरों के अनुसार हाथी की जांघों की रक्षा के लिए एक विशेष वस्त्र'।
c8.s5.20
३६ वही, फु० नो० १२
c8.s5.21
उपरोक्त दस तरह के आस्तरणों को आविक कहा गया है जिससे पता चलता है कि वे भेड़ के ऊन से बनते थे। कौटिल्य के अनुसार अच्छे कंबल चिकने सूक्ष्म और मुलायम होते थे३७।
c8.s5.22
३७ ग० शा०, १, पृ० १६३
Linked texts (1)
- Kauṭilīya Arthaśāstra — Kauṭilya, Sanskrit