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Viyahapannatti 12.1.533

Viyāhapannatti: Hindi translation (Dīparatnasāgara, 2019) 12.1.533

Language
Hindi

12.1.533

इसके बाद उस शंख श्रमणोपासक ने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार किया और पूछा – ‘भगवन्‌! क्रोध के वश – आर्त्त बना हुआ जीव कौन – से कर्म बाँधता है ? क्या करता है ? किसका चय करता है और किसका उपचय करता है ? शंख ! क्रोधवश – आर्त्त बना हुआ जीव आयुष्यकर्म को छोड़कर शेष सात कर्मों की शिथिल बन्धन से बंधी हुई प्रकृतियों को गाढ़ बन्धन वाली करता है, इत्यादि प्रथम शतक में असंवृत अनगार के वर्णन के समान यावत्‌ वह संसार में परिभ्रमण करता है, यहाँ तक जान लेना। भगवन्‌ ! मान – वश – आर्त्त बना हुआ जीव क्या बाँधता है ? इत्यादि पूर्ववत्‌ प्रश्न। क्रोधवशार्त्त जीवविषयक कथन के अनुसार जान लेना। इसी प्रकार माया – वशार्त्त जीव, तथा लोभावशार्त्त जीव के विषय में भी, यावत्‌ – संसार में परिभ्रमण करता है, यहाँ तक जानना। श्रमण भगवान महावीर से यह फल सूनकर और अवधारण करके वे श्रमणोपासक उसी समय भयभीत, त्रस्त, दुःखित एवं संसारभय से उद्विग्न हुए। उन्होंने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार किया और जहाँ शंख श्रमणोपासक था, वहाँ उसके पास आए। शंख श्रमणोपासक को उन्होंने वन्दन – नमस्कार किया और फिर अपने उस अविनयरूप अपराध के लिए विनयपूर्वक बार – बार क्षमायाचना करने लगे। इसके पश्चात्‌ उन सभी श्रमणो – पासकों ने भगवान से कईं प्रश्न पूछे, इत्यादि सब वर्णन आलभिका के (श्रमणोपासकों के) समान जानना चाहिए, यावत्‌ वे अपने – अपने स्थान पर लौट गए
भगवान गौतम ने श्रमण भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार करके पूछा – भगवन्‌ ! क्या शंख श्रमणो – पासक आप देवानुप्रिय के पास प्रव्रजित होने में समर्थ है? गौतम ! यह अर्थ समर्थ नहीं है; इत्यादि समस्त वर्णन ऋषिभद्रपुत्र श्रमणोपासक के समान कहना, यावत्‌ सर्व दुःखों का अन्त करेगा। ‘हे भगवन्‌ ! यह इसी प्रकार है। यह इसी प्रकार है।’

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