Viyahapannatti 9.32: Uddeśaka 32: gāṃgeya
Viyāhapannatti: Hindi translation (Dīparatnasāgara, 2019) 9.32
- Language
- Hindi
Uddeśaka 32: gāṃgeya
9.32.451
उस काल, उस समय में वाणिज्यग्राम नामक नगर था। वहाँ द्युतिपलाश नाम का चैत्य था। महावीर स्वामी पधारे, समवसरण लगा। परिषद् निकली। (भगवान ने) धर्मोपदेश दिया। परिषद् वापिस लौट गई। उस काल उस समय में पार्श्वापत्य गांगेय नामक अनगार थे। जहाँ श्रमण भगवान् महावीर थे, वहाँ वे आए और श्रमण भगवान् महावीर के न अतिनिकट और न अतिदूर खड़े रह कर उन्होंने, श्रमण भगवान् महावीर से इस प्रकार पूछा –
भगवन् ! नैरयिक सान्तर उत्पन्न होते हैं, या निरन्तर ? हे गांगेय ! सान्तर भी उत्पन्न होते हैं और निरन्तर भी। भगवन् ! असुरकुमार सान्तर उत्पन्न होते हैं या निरन्तर ? सान्तर भी उत्पन्न होते हैं और निरन्तर भी है। इसी प्रकार स्तनितकुमारों तक जानना।
भगवन् ! पृथ्वीकायिक जीव सान्तर उत्पन्न होते हैं या निरन्तर ? गांगेय ! पृथ्वीकायिक जीव सान्तर उत्पन्न नहीं होते किन्तु निरन्तर उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार वनस्पतिकायिक जीवों तक जानना चाहिए। द्वीन्द्रिय जीवों से लेकर वैमानिक देवों तक की उत्पत्ति के विषय में नैरयिकों के समान जानना चाहिए।
9.32.452
भगवन् ! नैरयिक जीव सान्तर उद्वर्त्तित होते हैं या निरन्तर ? गांगेय ! सान्तर भी उद्वर्त्तित होते हैं और निरन्तर भी। इसी प्रकार स्तनितकुमारों तक जानना।
भगवन् ! पृथ्वीकायिका जीव सान्तर उद्वर्त्तित होते हैं या निरन्तर ? गांगेय ! पृथ्वीकायिका जीवो का उद्वर्तन सान्तर नही होता, निरन्तर होता है। इसी प्रकार वनस्पतिकायिका जीवो तक जानना। ये सान्तर नहीं, निरन्तर उद्वर्तित होते है। भगवन् ! द्वीन्द्रिय जीवों का उद्वर्त्तन सान्तर होता है या निरन्तर ? गांगेय ! द्विन्द्रिय जीवों का उद्वर्त्तन सान्तर भी होता है और निरन्तर भी होता है। इसी प्रकार वाणव्यन्तरो तक जानना।
भगवन ! ज्योतिष्क देवों का च्यवन सान्तर होता है या निरन्तर ? गांगेय ! उनका च्यवन सान्तर भी और निरन्तर भी। इसी प्रकाश के वैमानिकों के जानना।
9.32.453
भगवन् ! प्रवेशनक कितने प्रकार का है ? गांगेय ! चार प्रकार का – नैरयिक प्रवेशनक, तिर्यग्योनिक – प्रवेशनक, मनुष्य – प्रवेशनक और देव – प्रवेशनक।
भगवन् ! नैरयिक – प्रवेशनक कितने प्रकार का है ? गांगेय ! सात प्रकार का – रत्नप्रभा यावत् अधःसप्तमपत्रथ्वीनैरयिक – प्रवेशनक। भंते ! क्या एक नैरयिक जीव नैरयिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करता हुआ रत्नप्रभापृथ्वी में होता है, अथवा यावत् अधःसप्तपृथ्वी में होता है। गांगेय ! वह नैरयिक रत्नप्रभा, या यावत अधःसप्तमपृथ्वी होता है।
भगवन् ! नैरयिक जीव, नैरयिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या रत्नप्रभापृथ्वी में उत्पन्न होते हैं, अथवा यावत् अधःसप्तपृथ्वी में उत्पन्न होते है ? गांगेय ! वे दोनो रत्नप्रभापृथ्वी में उत्पन्न होता है, अथवा यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में उत्पन्न होतै है। अथवा एक रत्नप्रभापृथ्वी में उत्पन्न होता है और एक शर्कराप्रभापृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभापृथ्वी में उत्पन्न होता है और एक बालुकाप्रभापृथ्वी में। अथवा यावत् एक रत्नप्रभापृथ्वी में उत्पन्न होता है और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक शर्कराप्रभा पृथ्वी में उत्पन्न होता है और एक बालुकाप्रभा में, अथवा यावत् एक शर्करापृथ्वी में उत्पन्न होता है और एक अधःसप्तपृथ्वी में। अथवा एक बालुकाप्रभा में और एक पंकप्रभा में, अथवा इसी प्रकार यावत् एक बालुकाप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में उत्पन्न होता है। इसी प्रकार एक – एक पृथ्वीछोड़ देना; यावत् एक तमःप्रभा में और एक तमस्तमःप्रभा में उत्पन्न होता है।
भगवन् ! तीन नैरयिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या रत्नप्रभा में उत्पन्न होते है ? अथवा यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में उत्पन्न होता है ? गांगेय ! वे तीन नैरयिक (एक साथ) रत्नप्रभा में उत्पन्न होते है, अथवा यावत् अधःसप्तम में उत्पन्न होते है। अथवा एक रत्नप्रभा में और दो शर्कराप्रभा मे; अथवा यावत् एक रत्नप्रभा में और दो अधःसप्तम पृथ्वी में। अथवा दो नैरयिक रत्नप्रभा में और एक शर्कराप्रभा में। अथवा यावत् दो जीव रत्नप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक शर्कराप्रभा में और दो बालुकाप्रभा में, अथवा यावत् एक शर्कराप्रभा में और दो अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा दो शर्कराप्रभा में और एक बालुकाप्रभा में, अथवा यावत् दो शर्कराप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में शर्कराप्रभा की वक्तव्यता समान सातों नरकों की वक्तव्यता, यावत् दो तमःप्रभा में और एक तमस्तमःप्रभा में होता है, तक जानना।
अथवा (१) एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और एक बालुकाप्रभा में, अथवा एक रत्नप्रभा में एक शर्कराप्रभा में और एक पंकप्रभा में होता है। अथवा यावत् एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा (६) एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक पंकप्रभा में होता है। अथवा एकरत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक धूमप्रभा में होता है। इसी प्रकार यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
अथवा एक रत्नप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक धूमप्रभा में होता है; यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है; अथवा एक रत्नप्रभा में एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वीमें होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक पंकप्रभा में होता है; अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक धूमप्रभा में होता है; यावत् अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में और धूमप्रभा में होता है; यावत् अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है। अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अध – सप्तमपृथ्वी में होता है।
अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक धूमप्रभा में होता है। अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है; अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है। अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है। (३३) अथवा एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक धूमप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
भगवन् ! नैरयिकप्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए चार नैरयिक जीव क्या रत्नप्रभा में उत्पन्न होता है ? इत्यादि प्रश्न। ‘गांगेय ! वे चार नैरयिक जीव रत्नप्रभा में होता है, अथवा यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में होते हैं।
(द्विकसंयोगी तिरसेठ भंग) – अथवा एक रत्नप्रभा में और तीन शर्कराप्रभा में होते है; अथवा एक रत्नप्रभा में और तीन बालुकाप्रभा में होते है; इसी प्रकार यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में और तीन अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा दो रत्नप्रभा में और दो शर्कराप्रभा में होते है; इसी प्रकार यावत् अथवा दो रत्नप्रभा में और दो अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा तीन रत्नप्रभा में और एक शर्कराप्रभा में होता है; इसी प्रकार यावत् अथवा तीन रत्नप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक शर्कराप्रभा में और तीन बालुकाप्रभा में होते है। जिस प्रकार रत्नप्रभा का आगे की नरकपृथ्वीयो के साथ संचार किया, उसी प्रकार शर्कराप्रभा का भी उसके आगे की नरको के साथ संचार करना चाहिए। इसी प्रकार आगे की एक – एक नरकपृथ्वीयों के साथ योग करना चाहिए।
(त्रिकसंयोगी १०५ भंग) – अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और दो बालुकाप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और दो पंकप्रभा में होते है। इसी प्रकार यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में एक शर्कराप्रभा में और दो अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में दो शर्कराप्रभा में और एक बालुकाप्रभा में, इसी प्रकार यावत् अथवा रत्नप्रभा में दो शर्कराप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा दो रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और एक बालुकाप्रभा में। इसी प्रकार यावत् अथवा दो रत्नप्रभा में एक शर्कराप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और दो पंकप्रभा में। इस प्रकार यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और दो पंकप्रभा में। इस प्रकार यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और दो अधःसप्तमपृथ्वी में। इसी प्रकार के अभिलाप द्वारा जैसे तीन नैरयिको के त्रिकसंयोगी भंग कहे, उसी प्रकार चार नैरयिको के भी त्रिकसंयोगी भंग जानना, यावत् दो धूमप्रभामें, एक तमःप्रभामें और एक तमस्तमःप्रभामें होता है
(चतुःसंयोगी ३५ भंग – ) अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक पंकप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्करप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक धूमप्रभा में होता है, अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक अधःसप्तम पृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक धूमप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक अधःसप्तम पृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में एक धूमप्रभा में और तमःप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में एक शर्कराप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक धूमप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में एक पंकप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नाप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
अथवा एक रत्नप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक धूमप्रभा में एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक शर्कराप्रभा में एक बालुकाप्रभा में एक पंकप्रभा में और एक धूमप्रभा में होता है। जिस प्रकार रत्नप्रभा का उससे आगे की पृथ्वीयों के साथ संचार किया उसी प्रकार शर्कराप्रभा का उससे आगे की पृथ्वीयों के साथ योग करना चाहिए यावत् अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक धूमप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक तमःप्रभा में होता है। अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक धुमप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वीमें होता है अथवा एक पंकप्रभामें एक धूमप्रभामें, एक तमःप्रभामें, एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है
भगवन् ! पांच नैरयिक जीव, नैरयिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या रत्नप्रभा में उत्पन्न होते है ? इत्यादि पृच्छा। गांगेय ! रत्नप्रभा में होते है, यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में उत्पन्न होते है।
(द्विकसंयोगी ८४ भंग – ) अथवा एक रत्नप्रभा में और चार शर्कराप्रभा में होते है; यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में और चार अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा दो रत्नप्रभा में और तीन शर्कराप्रभा में, इसी प्रकार यावत् अथवा दो रत्नप्रभा में और तीन अधःसप्तमपृथ्वी में अथवा तीन रत्नप्रभा में और दो शर्कराप्रभा में। २ – ६ इसी प्रकार यावत् अथवा तीन रत्नप्रभा में और दो अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा चार रत्नप्रभा में और शर्कराप्रभा में यावत् अथवा चार रत्नप्रभामें और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक शर्कराप्रभामें, और बालुकाप्रभा में होते हे। जिस प्रकार रत्नप्रभा के साथ आगे की पृथ्वीयों का संयोग किया, उसी प्रकार शर्कराप्रभा के साथ संयोग करने पर बीस भंग होते है। यावत् अथवा चार शर्कराप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। इसी प्रकार बालुकाप्रभा आदि एक – एक पृथ्वी के साथ आगे की पृथ्वीयों का योग करना; यावत् चार तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
(त्रिकसंयोगी २१० भंग – ) अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और तीन बालुकाप्रभा में होते है। इसी प्रकार यावत् – अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और तीन अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, दो शर्कराप्रभा में और दो बालुकाप्रभा में होते है; इसी प्रकार यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, दो शर्कराप्रभा में और दो अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा दो रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और दो बालुकाप्रभा में होते है। इस प्रकार यावत् अथवा दो रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और दो अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। इसी प्रकार यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, तीन शर्कराप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा दो रत्नप्रभा में, दो शर्कराप्रभा में और एक बालुकाप्रभा में होता है। इसी प्रकार यावत् दो रत्नप्रभा में, दो शर्कराप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा तीन रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और एक बालुकाप्रभा में होता है। इस प्रकार यावत् तीन रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा मे, एक बालुकाप्रभा में और दो पंकप्रभा में होते है, इसी प्रकार यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और दो अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा मे, एक शर्कराप्रभा में, दो बालुकाप्रभा में और एक पंकप्रभा में। इसी प्रकार यावत् एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, दो बालुकाप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्व में। अथवा एक रत्नप्रभा में, दो शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक पंकप्रभा में। इस प्रकार यावत् एक रत्नप्रभा में, दो शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा दो रत्नप्रभ में, एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और एक पंकप्रभा में। इसी प्रकार यावत् अथवा दो रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा मे, और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में और दो धूमप्रभा में। जिस प्रकार चार नैरयिक जीवो के चतुःसंयोगी भंग कहे है, उसी प्रकार पांच नैरयिक जीवो के चतुःसंयोगी भंग कहना चाहिए, किन्तु यहाँ एक अधिक का संचार करना। इस प्रकार यावत् दो पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है, यहाँ तक कहना। (ये चतुःसंयोगी १४० भंग होते है )।
अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभ में और एक धूमप्रभा में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा मे और एक तमःप्रभा में, अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक धूमप्रभा में, और एक तमःप्रभा में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में एक शर्कराप्रभा में एक बालुकाप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक तमःप्रभा में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक धूमप्रभा में, और तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक तमःप्रभा में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में एक पंकप्रभा में एधक तमः प्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक धूमप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक पंकप्रभा में, यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में और एक तमःप्रभा में। अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, एक धूमप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक बालुकाप्रभा में, एक पंकप्रभा में, एक धूमप्रभा में एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
भगवन् ! छह नैरयिक जीव, नैरयिक प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या रत्नप्रभा में उत्नपन्न होता है ? इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! ये रत्नप्रभा यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में होते है।
(द्विकसंयोगी १०५ भंग – ) – अथवा एक रत्नप्रभा में और पांच शर्कराप्रभा में होते है। अथवा एक रत्नप्रभा में और पांच बालुकाप्रभा में। अथवा यावत् एक रत्नप्रभा में और पांच अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा दो रत्नप्रभा में और चार शर्कराप्रभा में, अथवा यावत् दो रत्नप्रभा में और चार अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा तीन रत्नप्रभा में और तीन शर्कराप्रभा में। इस क्रम द्वारा पांच नैरयिक जीवो के द्विकसंयोगी भंग के समान छह नैरयिको के भी रहना। विशेष यह है की यहाँ एक अधिक का संचार करना, यावत् अथवा पांच तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
(त्रिकसंयोगी ३५० भंग) – एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभ में और चार बालुकाप्रभा में होते है। अथवा एक रत्नप्रभा में एक शर्कराप्रभा में और चार पंकप्रभा में। इस प्रकार यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, और चार अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, दो शर्कराप्रभा में और तीन बालुकाप्रभा में। इस क्रम से पांच नैरयिक जीवों के त्रिकसंयोगी भंग समान छह नैरयिक जीवो के भी त्रिकसंयोगी भंग कहना। विशेष यहाँ एक का संचार अधिक करना। शेष सब पूर्ववत्
(चतुष्कसंयोगी ३५० भंग) – जिस प्रकार पांच नैरयिको के चतुष्कसंयोगी भंग कहे गए, उसी प्रकार छह नैरयिको के चतुःसंयोगी भंग जान लेने चाहिए।
(पंचसंयोगी १०५ भंग) – पांच नैरयिको के जिस प्रकार पंचसंयोगी भंग कहे गए, उसी प्रकार छह नैरयिको के पंचसंयोगी भंग जान लेना, परन्तु इसमे एक नैरयिक का अधिक संचार करना चाहिए। यावत् अन्तिम भंग (इस प्रकार है – ) जो बालुकाप्रभामें, एक पंकप्रभामें, एक धूमप्रभामें, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है
(षट्संयोगी ७ भंग) – अथवा एक रत्नप्रभा में एक शर्कराप्राभ में, यावत् एक तमःप्रभा में होता है, अथवा एक रत्नप्रभा में, यावत् एक धूमप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, यावत् एक पंकप्रभा में, एक तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा मे, यावत् एक बालुकाप्रभा में, एक धूमप्रभा में, यावत् एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में, एक पंकप्रभा में, यावत् एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में यावत् एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, यावत् एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता।
भगवन् ! सात नैरयिक जीव, नैरयिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या रन्तप्रभापृथ्वी में उत्पन्न होते है ? इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! वे सातों नैरयिक रत्नप्रभा में होते है, यावत् अथवा अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
(द्विकसंयोगी १२६ भंग) – अथवा एक रत्नप्रभा में और छह शर्कराप्रभा में होते है। इस क्रम से छह नैरयिकजीवो के द्विकसंयोगी भंग समान सात नैरयिक जीवो के भी द्विकसंयोगी भंग कहना। विशेष यहाँ एक नैरयिक का अधिक संचार करना। शेष सभी पूर्ववत्। जिस प्रकार छह नैरयिको के त्रिकसंयोगी, चतुःसंयोगी, पंचसंयोगी और षट्संयोगी भंग कहे, उसी प्रकार सात नैरयिको के त्रिकसंयोगी आदि भंगो के विषय में कहना। विशेषता इतनी है कि यहाँ एक – एक नैरयिक जीव का अधिक संचार करना। यावत् – षट्संयोगी का अन्तिम भंग इस प्रकार कहना – अथवा दो शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में, यावत् एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
भगवन् ! आठ नैरयिक जीव, नैरयिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या रत्नप्रभा में उत्पन्न होते है ? इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! रत्नप्रभा में होते है, यावत् अथवा अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में और सात शर्कराप्रभा में होते है, इत्यादि; जिस प्रकार सात नैरयिको के द्विकसंयोगी त्रिकसंयोगी, चतुःसंयोगी, पंचसंयोगी और षट्संयोगी भंग कहे गए है, उसी प्रकार आठ नैरयिको के भी द्विकसंयोगी आदि भंग कहने चाहिए; किन्तु इतना विशेष है कि एक – एक नैरयिक का अधिक संचार करना चाहिए। शेष सभी षट्संयोगी तक पूर्वोक्त प्रकार से कहना चाहिए। अन्तिम भंग यह है – अथवा तीन शर्कराप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में यावत् एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, यावत् एक तमःप्रभा में और दो अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में यावत् दो तमःप्रभा में और एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। इसी प्रकार सभी स्थानो में संचार करना चाहिए। यावत् – अथवा दो रत्नप्रभा में एक शर्कराप्रभा में यावत् एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
भगवन् ! नौ नैरयिक जीव, नैरयिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या रत्नप्रभा में उत्पन्न होते है ? इत्यादि प्रश्न। हे गांगेय ! वे नौ नैरयिक जीव रत्नप्रभा में होते है, अथवा यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा एक रत्नप्रभा में और आठ शर्कराप्रभा में होते है, इत्यादि जिस प्रकार आठ नैरयिको के द्विकसंयोगी, त्रिकसंयोगी, चतुष्कसंयोगी, पंचसंयोगी, षट्संयोगी और सप्तसंयोगी भंग कहे है, उसी प्रकार नौ नैरयिको के विषय में भी कहना। विशेष यह है कि एक – एक नैरयिक का अधिक संचार करना चाहिए। शेष सभी पूर्वोक्त प्रकार से जानना चाहिए। अन्तिम भंग इस प्रकार है – अथवा तीन रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में एक बालुकाप्रभा में, यावत् एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
भगवन् ! दस नैरयिकजीव, नैरयिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या रत्नप्रभा में होते है ? इत्यादि पश्न। गांगेय ! वे दस नैरयिक जीव, रत्नप्रभा में होते है , अथवा यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में और नौ शर्कराप्रभा में होते है; इत्यादि नौ नैरयिक जीवो के द्विकसंयोगी, त्रिकसंयोगी, यावत् एवं सप्तसंयोगी भंग समान दस नैरयिक जीवो के भी भंग कहना। विशेष यह है कि यहाँ एक – एक नैरयिक का अधिक संचार करना, शेष सभी भंग पूर्ववत्। उनका अंतिम आलापक है – अथवा चार रत्नप्रभा में, एक शर्करप्रभा में यावत् एक अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
भगवन् ! संख्यात नैरयिक जीव, नैरयिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या रत्नप्रभा में उत्पन्न होते है ? इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! संख्यात नैरयिक रत्नप्रभा में होते है, यावत् अथवा अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा एक रत्नप्रभा में होता है, और संख्यात शर्कराप्रभा में होते है, इसी प्रकार यावत् एक रत्नप्रभा में और संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा दो रत्नप्रभा में और सख्यात शर्कराप्रभा में होते है इसी प्रकार यावत् दो रत्नप्रभा में, और सख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
अथवा तीन रत्नप्रभा में और शर्कराप्रभा में होते है। इसी प्रकार इसी क्रम से एक – एक नारक का संचार करना चाहिए। यावत् दस रत्नप्रभा में और संख्यात शर्कराप्रभा में होते है। इस प्रकार यावत् अथवा दस रत्नप्रभा में और संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा सख्यात में और संख्यात शर्कराप्रभा में होते है। इस प्रकार यावत् संख्यात रत्नप्रभा में और संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक शर्कराप्रभा में और संख्यात बालुकाप्रभा में होते है। जिस प्रकार रत्नप्रभापृथ्वी का शेष नरकपृथ्वीयों के साथ संयोग किया, उसी प्रकार शर्कराप्रभापृथ्वी का भी आगे की सभी नरक – पृथ्वीयों के साथ संयोग करना चाहिए। इसी प्रकार एक – एक पृथ्वी का आगे की नरक – पृथ्वीयों के साथ संयोग करना चाहिए; यावत् अथवा संख्यात तमःप्रभा में और संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होता है।
अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और संख्यात बालुकाप्रभा में होते है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और संख्यात पंकप्रभा में होते है। इसी प्रकार यावत् एक रत्नप्रभा में, एक शर्कराप्रभा में और संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा एक रत्नप्रभा में, दो शर्कराप्रभा में और संख्यात बालुकाप्रभा में, यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, दो शर्कराप्रभा में और संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में। अथवा एक रत्नप्रभा में, तीन शर्कराप्रभा में, और संख्यात बालुकाप्रभा में होते है। इस प्रकार इसी क्रम से एक – एक नारक का अधिक संचार करना। अथवा एक रत्नप्रभा में, सख्यात शर्कराप्रभा और संख्यात बालुकाप्रभा में होते है; यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, संख्यात बालुकाप्रभा में और संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा दो रत्नप्रभा में, संख्यात शर्कराप्रभा में और संख्यात बालुकाप्रभा में होते है; यावत् अथवा दो रत्नप्रभा में, संख्यात शर्कराप्रभा में और संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होता है। अथवा तीन रत्नप्रभा में, संख्यात शर्कराप्रभा में और संख्यात बालुकाप्रभा में होते है। इस प्रकार इस क्रम में रत्नप्रभा में एक – एक नैरयिक का संचार करना, यावत् अथवा संख्यात रत्नप्रभा में, संख्यात शर्कराप्रभा में और संख्यात बालुकाप्रभा में होते है, यावत् अथवा संख्यात रत्नप्रभा मे, संख्यात शर्कराप्रभा में और संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और संख्यात पंकप्रभा में होते है, यावत् अथवा एक रत्नप्रभा में, एक बालुकाप्रभा में और संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा एक रत्नप्रभा में, दो बालुकाप्रथा में और संख्यात पंकप्रभा में होते है। इसी प्रकार इसी क्रम से त्रिकसंयोगी, यावत् सप्तसंयोगी भंगो के कथन, दस नैरयिकसम्बन्धी भंगो के समान करना। अन्तिम भंग जो सप्तसंयोगी है, यह है – अथवा संख्यात रत्नप्रभा में, संख्यात शर्कराप्रभा में यावत् संख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होते है।
भगवन् ! असंख्यात नैरयिक, नैरयिक, नैरयिक – प्रवेशक द्वारा प्रवेश करते है ? इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! वे रत्नप्रभा अथवा यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में होते है, अथवा एक रत्नप्रभा में और असंख्यात शर्कराप्रभा में होते है। संख्यात नैरयिको के द्विकसंयोगी यावत् सप्तसंयोगी भंग समान असंख्यात के भी कहना। विशेष यह कि यहाँ ‘असंख्यात’ यह पद कहना चाहिए। शेष पूर्ववत्। यावत् – अन्तिम आलापक यह है – अथवा असंख्यात रत्नप्रभा में, असंख्यात शर्कराप्रभा में यावत् असंख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होते है।
भगवन् ! असंख्यात नैरयिक, नैरयिक – प्रवेशक द्वारा प्रवेश करते है ? इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! वे रत्नप्रभा अथवा यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में होते है, अथवा एक रत्नप्रभा में ओर असंख्यात शर्कराप्रभा में होते है। संख्यात नैरयिको के द्विकसंयोगी यावत् सप्तसंयोगी भंग समान असंख्यात के भी कहना। विशेष यह कि यहाँ ‘असंख्यात’ यह पद कहना चाहिए। शेष पूर्ववत्। यावत् – अन्तिम आलापक यह है – अथवा असंख्यात रत्नप्रभा में, असंख्यात शर्कराप्रभा में यावत् असंख्यात अधःसप्तमपृथ्वी में होते है।
भगवन ! नैरयिक जीव नैरयिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए उत्कृष्ट पद में क्या रत्नाप्रभा में उत्पन्न होते है? इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! सभी नैरयिक रत्नप्रभा में होते है।
(द्विकसंयोगी ६ भंग) – अथवा रत्नप्रभा और शर्कराप्रभा में होते है। अथवा रत्नप्रभा और बालुकाप्रभा में होते है। इस प्रकार यावत् रत्नप्रभा और अधःसप्तमपृथ्वी में होते है।
(त्रिकसंयोगी १५ भंग) – अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा और बालुकाप्रभा में होते है। इस प्रकार यावत् रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा और अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा रत्नप्रभा बालुकाप्रभा ओर पंकप्रभा में होते है। यावत् अथवा रत्नप्रभा, बालुकाप्रभा और अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा रत्नप्रभा, पंकप्रभा और धूमप्रभा में होते है। जिस प्रकार रत्नप्रभा को न छोड़ते हुए तीन नैरयिक जीवो के त्रिकसंयोगी भंग कहे हे, उसी प्रकार यहाँ भी कहना चाहिए यावत् अथवा रत्नप्रभा, तमःप्रभा और अधःसप्तमपृथ्वी में होते है।
(चतुसंयोगी २० भंग) – अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा और पंकप्रभा में होते है। अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा और धूमप्रभा में होते है। यावत् अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा और अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा पंकप्रभा और धूमप्रभा में होते है। रत्नप्रभा को न छोड़ते हुए जिस प्रकार चार नैरयिक जीवो के चतुःसंयोगी भंग कहे है, उसी प्रकार यहाँ भी कहना चाहिए, यावत् अथवा रत्नप्रभा, धूमप्रभा, तमःप्रभा और अधःसप्तमपृथ्वी में होते है।
(पंचसंयोगी १५ भंग) – अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा और धूमप्रभा में होते है। अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा और तमःप्रभा में होते है। अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभ, बालुकाप्रभा, पंकप्रभा और अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, धूमप्रभा ओर तमःपृथ्वी में होते है। रत्नप्रभा को न छोड़ते हुए जिस प्रकार ५ नैरयिक जीवो के पंचसंयोग भंग कहे है, उसी प्रकार यहाँ भी कहना चाहिए, अथवा यावत् रत्नप्रभा, पंकप्रभा यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में होते है।
(ष्टसंयोगी ६ भंग) – अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा यावत् धूमप्रभा और तमःप्रभा में होते है। अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा यावत् धूमप्रभा और अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा यावत् पंकप्रभा, तमःप्रभा और अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, बालुकाप्रभा, धूमप्रभा, तमःप्रभा और अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, पंकप्रभा, यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में होते है। अथवा रत्नप्रभा, बालुकाप्रभा यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में होते है।
(सप्तसंयोगी १ भंग) – अथवा रत्नप्रभा, यावत् अधःसप्तमपृथ्वी में होते है।
भगवन् ! रत्नप्रभापृथ्वी के नैरयिकप्रवेशनक, शर्कराप्रभापृथ्वी के नैरयिकप्रवेशनक, यावत् अधःसप्तपृथ्वी के नैरयिक – प्रवेशनक में से कौन प्रवेशनक किस प्रवेशनक से अल्प यावत् विशेषाधिक है ? गांगेय ! सबसे अल्प अधःसप्तमपृथ्वी के नैरयिक – प्रवेशनक है, उनसे तमःप्रभापृथ्वी नैरयिकप्रवेशनक असंख्यातगुण है। इस प्रकार उलटे क्रम से, यावत् रत्नप्रभापृथ्वी के नैरयिकप्रवेशनक असंख्यातगुण है।
9.32.454
भगवन् ! तिर्यञ्चयोनिक प्रवेशनक कितने प्रकार का है ? पांच प्रकार का – एकेन्द्रियतिर्यञ्चयो – निकप्रवेशनक यावत् पंचेन्द्रियतिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक।
भगवन् ! एक तिर्यञ्चयोनिक जीव, तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करता हुआ क्या एकेन्द्रिय जीवों में उत्पन्न होता है, अथवा यावत् पंचेन्द्रिय जीवो में उत्पन्न होता है ? भगवन ! दो तिर्यञ्चयोनिक जीव, तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या एकेन्द्रियो में उत्पन्न होते है ? इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! एकेन्द्रियो में होते है, अथवा यावत् पंचेन्द्रियों में होते है। अथवा एक एकेन्द्रिय में और एकद्वीन्द्रिय में होता है। नैरयिक जीवों में समान तिर्यञ्चयोनिक प्रवेशनक के विषय में भी असंख्य तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक तक कहना।
भगवन् ! उत्कृष्ट तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक के विषय में पृच्छा। गांगेय ! ये सभी एकेन्द्रियों में होते है। अथवा एकेन्द्रिय और द्वीन्द्रियो में होते है। नैरयिक जीवोनो समान तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक के विषय में भी संचार करना चाहिए। एकेन्द्रिय जीवों को न छोड़ते हुए द्विकसंयोगी, त्रिकसंयोगी, चतुःसंयोगी और पंचसंयोगी भंग उपयोगपूर्वक कहने चाहिए; यावत् अथवा एकेन्द्रिय जीवों में द्वीन्द्रियो में, यावत् पंचेन्द्रियो में होते है।
भगवन् ! एकेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक से लेकर यावत् पंचेन्द्रियतिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक तक में से कौन किससे अल्प – अल्प विशेषाधिक है ? गांगेय ! सबसे अल्प पंचेन्द्रियतिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक है, उनसे चतुरिन्द्रिय – तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक विशेषाधिक है, उनसे त्रीन्द्रिय – तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक विशेषाधिक है, उनसे द्वीन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक विशेषीधक है और उनसे एकेन्द्रिय तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक विशेषाधिक है।
9.32.455
भगवन् ! मनुष्यप्रवेशनक कितने प्रकार का कहा गया है ? गांगेय ! दो प्रकार का है, सम्मूर्च्छिममनुष्य – प्रवेशनक ओर गर्भजमनुष्य – प्रवेशनक। भगवन् ! दो मनुष्य, मनुष्य – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या सम्मूर्च्छिम मनुष्यो में उत्पन्न होते है ? इत्यादि (पूर्ववत) प्रश्न। गांगेय ! दो मनुष्य या तो सम्मूर्च्छिममनुष्य में उत्पन्न होते है, अथवा गर्भजमनुष्यो में होते है। अथवा एक सम्मूर्च्छिममनुष्यो में और एक गर्भज मनुष्यों मे होता है। इस क्रम से जिस प्रकार नैरयिक – प्रवेशनक कहा, उसी प्रकार मनुष्य – प्रवेशनक भी यावत् दस मनुष्यों तक कहना चाहिए।
भगवन् ! संख्यात मनुष्य, मनुष्य – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए सम्मूर्च्छिममनुष्यों में होते है ? इत्यादि प्रश्न गांगेय ! वे सम्मूर्च्छिममनुष्य में होते है, अथवा गर्भजमनुष्यों में होते है। अथवा एक सम्मूर्च्छिममनुष्यो में होता है और संख्यात गर्भजमनुष्यों में। अथवा दो सम्मूर्च्छिममनुष्यो में होते है और संख्यात गर्भजमनुष्यों मे होते है। इस प्रकार उत्तरोत्तर एक – एक बढ़ाते हुए यावत् संख्यात सम्मूर्च्छिममनुष्यो में और संख्यात गर्भजमनुष्यों में होते है। भगवन् ! असंख्यात मनुष्य, मनुष्यप्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए, इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! वे सभी सम्मूर्च्छिममनुष्यो में होते है। अथवा असंख्यात सम्मूर्च्छिममनुष्यों में होते है और एक गर्भजमनुष्यों मे होता है। अथवा असंख्यात सम्मूर्च्छिममनुष्यों मे होते है और दो गर्भजमनुष्यों में होते है। अथवा इसी प्रकार यावत् असंख्यात सम्मूर्च्छिममनुष्यो में होते है और संख्यात गर्भजमनुष्यो में होते है।
भगवन् ! मनुष्य उत्कृष्टरूप से किस प्रवेशनक में होते है ? इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! वे सभी सम्मूर्च्छिममनुष्यों में अथवा सम्मूर्च्छिममनुष्यों मे और गर्भज मनुष्यों में होते है।
भगवन् ! सम्मूर्च्छिममनुष्य – प्रवेशनक और गर्भजमनुष्यप्रवेशनक, इन से कौन किस से अल्प, यावत् विशेषाधिक है ? गांगेय ! सबसे थोड़े गर्भमनुष्य – प्रवेशनक है, उनसे सम्मूर्च्छिममनुष्य – प्रवेशनक असंख्यातगुण है।
9.32.456
भगवन् ! देव – प्रवेशनक कितने प्रकार का है ? गांगेय ! चार प्रकार का – भावनवासीदेव – प्रवेशनक, वाणव्यन्तरदेव – प्रवेशनक, ज्योतिष्कदेव – प्रवेशनक और वैमानिकदेव – प्रवेशनक। भगवन् ! एक देव, देव – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करता हुआ क्या भवनवासी देवों में, वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क अथवा वैमानिक देवों में होता है ? गांगेय ! एक देव, देव – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करता हुआ भवनवासी, या वणव्यन्तर या ज्योतिष्क या वैमानिक देवों में होता है। भगवन् ! दो देव, देव – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए क्या भवनवासी देवो में, इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! वे भवनवासी देवो में, अथवा वाणव्यन्तर देवों में, या ज्योतिष्क देवों में होते है, या वैमानिक देवों मे होते है। अथवा एक भवनवासी देवों मे होता है, और एक वाणव्यन्तर देवो में होता है। और एक वाणव्यन्तर देवों में होता है। तिर्यञ्चोनिक – प्रवेशनक समान देव – प्रवेशनक भी असंख्यात देव – प्रवेशनक तक कहना चाहिए।
भगवन् ! उत्कृष्टरूप से देव, देव – प्रवेशनक द्वारा प्रवेश करते हुए किन देवो मे होते है ? इत्यादि प्रश्न। गांगेय ! वे सभी ज्योतिष्क देवों मे होते है। अथवा ज्योतिष्क और भवनवासी देवों में, अथवा ज्योतिष्क और वाण्व्यन्तर देवो में, अथवा ज्योतिष्क और वैमानिक देवो में। अथवा ज्योतिष्क, भवनवासी और वाणव्यन्तर देवो में, अथवा ज्योतिष्क, भवनवासी और वैमानिक देवो में, अगवा ज्योतिष्क, वाणव्यन्तर और वैमानिक देवो में। अथवा ज्योतिष्क, भवनवासी, वाणव्यन्तर और वैमानिक देवों मे होते है।
9.32.457
भगवन् ! भवनवासी, वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिकदेव – प्रवेशनक, इन चारों से कौन प्रवेशनक किस प्रवेशनक से अल्प, यावत् विशेषाधिक है ? गांगेय ! सबसे थोड़े वैमानिकदेव – प्रवेशनक है, उनसे भवनवासीदेव – प्रवेशनक असंख्यातगुणे है, उनसे वाणव्यन्तरदेव – प्रवेशनक असंख्यातगुणे है, और उनसे ज्योतिष्कदेव – प्रवेशनक संख्यतागुणे हैं।
भगवन् ! इन नैरयिक, तिर्यञ्चयोनिक, मनुष्य और देव – प्रवेशनक, इन चारो में से कौन किससे अल्प, यावत विशेषाधिक है। गांगेय ! सबसे। अल्प मनुष्य – प्रवेशनक है, उससे नैरयिक – प्रवेशनक असंख्यतागुणा है, और उससे देव – प्रवेशनक असंख्यतागुणा है, और उससे तिर्यञ्चयोनिक – प्रवेशनक असंख्यातगुणा है।
9.32.458
भगवन् ! नैरयिक सान्तर उत्पन्न होते है या निरन्तर उत्पन्न होते है ? असुरकुमार सान्तर उत्पन्न होते है अथवा निरन्तर ? यावत् वैमानिक देव सान्तर उत्पन्न होते है या निरन्तर उत्पन्न होते है ? (इसी तरह) नैरयिक का उद्वर्तन सान्तर होता है अथवा निरन्तर ? यावत् वाणव्यन्तर देवो का उद्वर्त्तन सान्तर होता है या निरन्तर ? ज्योतिष्क देवो का सान्तर च्यवन होता है या निरन्तर ? वैमानिक देवों का सान्तर च्यवन होता है या निरन्तर होता है ?
हे गांगेय ! नैरयिक सान्तर भी उत्पन्न होते हैं और निरन्तर भी, यावत् स्तनितकुमार सान्तर भी उत्पन्न होते हैं और निरन्तर भी। पृथ्वीकायिकजीव सान्तर उत्पन्न नही होते, किन्तु निरन्तर ही उत्पन्न होते है। इसी प्रकार यावत् वनस्पतिकायिक जीव सान्तर उत्पन्न नही होते, किन्तु निरन्तर उत्पन्न होते है। शेष सभी जीव नैरयिक जीवों के समान सान्तर भी उत्पन्न होते है, निरन्तर भी, यावत् वैमानिक देव सान्तर भी उत्पन्न होते है, और निरन्तर भी। नैरयिक जीव सान्तर भी उद्वर्तन करते है, निरन्तर भी। इसी प्रकार स्तनितकुमारों तक कहना। पृथ्वीकायिकजीव सान्तर नहीं उद्ववर्तते, निरन्तर उद्ववर्तित होते है। इसी प्रकार वनस्पतिकायिको तक कहना। शेष सभी जीवों का कथन नैरयिको के समान जानना। इतना विशेष है कि ज्योतिष्क देव और वैमानिक देव च्यवते, ऐसा पाठ कहना चाहिए चावत् वैमानिक देव सान्तर भी च्यवते है और निरन्तर भी।
भगवन् ! सत् नैरयिक जीव उत्पन्न होते है या असत् ? गांगेय ! सत् नैरयिक उत्पन्न होते है, असत् नैरयिक उत्पन्न नही होते। इसी प्रकार वैमानिकों तक जानना। भगवन् ! सत् नैरयिक उद्वर्तते है या असत् ? गांगेय ! सत् नैरयिक उद्वर्तते है किन्तु असत् नैरयिक उद्वर्तित नही होते। इसी प्रकार वैमानिकों पर्यन्त जानना। विशेष इतना है कि ज्योतिष्क और वैमानिक देवो के लिए ‘च्यवते है’, ऐसा कहना। भगवन् ! नैरयिक जीव सत् नैरयिको में उत्पन्न होते हे या असत् नैरयिको में ? असुरकुमार देव, सत असुरकुमार देवों में उत्पन्न होते है या असत् असुरकुमार देवो में ? इसी प्रकार यावत् सत् वैमानिकों मे उत्पन्न होते है या असत् वैमानिको में ? तथा सत् नैरयिकों में से उद्वर्तते है या असत् नैरयिको में से ? सत् असुरकुमारो में से उद्वर्तते है यावत् सत् वैमानिक में से च्यवते है या असत् वैमानिक में से ? गांगेय ! नैरयिक जीव सत् नैरयिको में उत्पन्न होते है, किन्तु असत् नैरयिको में उत्पन्न नही होते। सत् असुरकुमारों में उत्पन्न होते है, असत् असुरकुमारों मे नही। इसी प्रकार यावत् सत् वैमानिको में उत्पन्न होते है, असत् वैमानिको में नही। सत् नैरयिको में से उद्वर्तते है, असत् नैरयिकों में से नहीं। यावत् सत् वैमानिकों मे से च्यवते है असत् वैमानिको में से नहीं। भगवन् ! ऐसा किस कारण से कहा जाता है कि नैरयिक सत् नारयिकों में उत्पन्न होते है, असत् नैरयिको में नहीं। इसी प्रकार यावत् सत् वैमानिकों में से च्यवते है, असत् वैमानिकों में से नही ? गांगेय ! निश्चित ही पुरुषादानीय अर्हत् श्रीपार्श्वनाथ ने लोक को शाश्वत, अनादि और अनन्त कहा है इत्यादि, पंचम शतक के नौवे उद्देशक में कहे अनुसार जानना, यावत् – जो अवलोकन किया जाए, उसे लोक कहते है। इस कारण हे गांगेय ! ऐसा कहा जाता है कि यावत् असत् वैमानिकों में से नहीं।
भगवन् ! आप स्वयं इसे प्रकार जानते है, अथवा अस्वयं जानते है ? तथा बिना सुने ही इसे इस प्रकार जानते है, अथवा सुनकर जानते है कि ‘सत् नैरयिक उत्पन्न होते है, असत् नैरयिक नहीं। यावत् सत् वैमानिकों मे से च्यवन होता है, असत् वैमानिको से नही ?’ गांगेय ! यह सब इस रूप में मै स्वयं जानता हूं, अस्वयं नहीं तथा बिना सुने ही मै इसे इस प्रकार जानता हूं, सुनकर ऐसा नही जानता कि सत् नैरयिक उत्पन्न होते है, असत नैरयिक नही, यावत् सत् वैमानिकों में से च्यवते है, असत् वैमानिकों में से नहीं। भगवन् ! ऐसा किस कारण से कहा जाता है, कि मैं स्वयं जानता हूं, इत्यादि, गांगेय ! केवलज्ञानी पूर्व में मित भी जानते है अमित भी जानते है। इसी प्रकार दक्षिण दिशा में भी जानते है। इस प्रकार शब्द – उद्देशक में कहे अनुसार कहना। यावत् केवली का ज्ञान निरावरण होता है, इसलिए हे गांगेय ! इस कारण से ऐसा कहा जाता है कि मैं स्वयं जानता हूं, इत्यादि, यावत् असत् वैमानिकों में से नही च्यवते।
हे भगवन् ! नैरयिक, नैरयिको में स्वयं उत्पन्न होते है या अस्वयं उत्पन्न होते है ? गांगेय ! नैरयिक, नैरयिको में स्वयं उत्पन्न होते है, अस्वयं उत्पन्न नहीं होते। भगवन् ! ऐसा क्यों कहते है कि यावत् अस्वयं उत्पन्न नहीं होते ? गांगेय! कर्म के उदय से, कर्मो की गुरुता के कारण, कर्मो के भारीपन से, कर्मो के अत्यन्त गुरुत्व और भारीपन से, अशुभ कर्मो के उदय से, अशुभ कर्मो के विपाक से तथा अशुभ कर्मो के फलपरिपाक से नैरयिक, नैरयिकों में स्वयं उत्पन्न होते है, अस्वयं उत्पन्न नहीं होते। भंते ! असुरकुमार, असुरकुमारो में स्वयं उत्पन्न होते है या अस्वयं ? इत्यादि पृच्छा। गांगेय ! असुरकुमार असुरकुमारों में स्वयं उत्पन्न होते है, अस्वयं उत्पन्न नही होते। भगवन् ! ऐसा कहने का क्या कारण है कि यावत् अस्वयं उत्पन्न नही होते ? हे गांगेय ! कर्म के उदय, से, कर्म के अभाव से, कर्म की विशोधि से, कर्मो की विशुद्धि से, शुभ कर्मो के उदय से, शुभ कर्मो के विपाक से, शुभ कर्मो के फलविपाक से असुरकुमार, असुरकुमारों में स्वयं उत्पन्न होते है, अस्वयं उत्पन्न नहीं होते। इसी प्रकार स्तनितकुमारों तक जानना चाहिए। भगवन् ! क्या पृथ्वीकायिक, पृथ्वीकायिकों मे स्वयं उत्पन्न होते है, या अस्वयं उत्पन्न होते है ? गांगेय ! पृथ्वीकायिक, पृथ्वीकायिको में सव्यं यावत् उत्पन्न होते है, अस्वयं उत्पन्न नही होते है। भगवन् ! ऐसा किस कारण से कहते है कि पृथ्वीकायिक स्वयं उत्पन्न होते है, इत्यादि ? गांगेय ! कर्म के उदय से, कर्मो की गुरुता से, कर्म के भारीपन से, कर्म के अत्यन्त गुरुत्व और भारीपन से, शुभाशुभ कर्मो के उदय से, शुभाशुभ कर्मो के विपाक से, शुभाशुभ कर्मो से फल – विपाक से पृथ्वीकायिका, पृथ्वीकायिकों में उत्पन्न होते है, अस्वयं उत्पन्न नही होते। इसी प्रकार यावत् मनुष्य तक जानना चाहिए। असुरकुमारो के वाणव्यन्तर, ज्योतिष्क और वैमानिकों के विषय में भी जानना। इसी कारण हे गांगेय ! में ऐसा कहता हूं कि यावत् वैमानिक, वैमानिकों मे स्वयं उत्पन्न होते है, अस्वयं उत्पन्न नही होते।
9.32.459
तब से गांगेय अनगार ने श्रमण भगवान् महावीर को सर्वज्ञ और सर्वदर्शी के रूप में पहचाना। गांगेय अनगार ने श्रमण भगवान् महावीर को तीन बार आदक्षिण प्रदक्षिणा की, वन्दन नमस्कार किया। उसके बाद कहा – भगवन् ! मैं आपके पास चातुर्यामरूप धर्म के बदले पंचमहाव्रतरूप धर्म को अंगीकार करना चाहता हूं। इस प्रकार सारा वर्णन प्रथम शतक के नौवे उद्देशक में कथित कालस्यवेषिकपुत्र अनगार के समान जानना चाहिए, यावत् सर्वदुःखों से रहित बने। हे भगवन् यह इसी प्रकार है।
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- Viyāhapannatti: ṭīkānusārī vivecana — Muni Dīparatnasāgara 2000, Gujarati
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- Viyāhapannatti — Sudharman, Ardhamāgadhī Prakrit