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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c10.29

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c10.29

Language
Hindi

c10.29

पादरी जेम्स स्टिवन्सन ने भी प्रिन्सेप की नांई इसी शोध में लग कर ‘क,’ ‘ज,’ ‘प’ और ‘व’ अक्षरों१ को पहिचाना और इन अक्षरों की सहायता से लेखों को पढ़ कर उनका अनुवाद करने का उद्योग किया गया परंतु कुछ तो अक्षरों के पहिचानने में भूल हो जाने, कुछ वर्णमाला पूरी ज्ञात न होने२ और कुछ उन लेखों की भाषा को संस्कृत मान कर उसी भाषा के नियमानुसार पढ़ने से वह उद्योग निष्फल हुआ. इससे भी प्रिन्सेप को निराशा न हुई. ई. स. १८३६ में प्रसिद्ध विद्वान् लासन ने एक बाक्‌ट्रियन ग्रीक सिक्के पर इन्हीं अक्षरों में अँगॅथॉक्लीस का नाम पढ़ा. ई. स. १८३७ में मि. प्रिन्सेप ने सांची के स्तूपों से संबंध रखने वाले स्तंभों आदि पर खुदे हुए कई एक छोटे छोटे लेखों की छापें एकत्र कर उन्हें देखा तो उनके अंत के दो अक्षर एकसे दिखाई दिये और उनके पहिले प्राय: ‘स’ अक्षर पाया गया जिसको प्राकृत भाषा के संबंध कारक के एक वचन का प्रत्यय (संस्कृत ‘स्य’ से) मान कर यह अनुमान किया कि ये सब लेख अलग अलग पुरुषों के दान प्रकट करते होंगे और अंत के दोनों अक्षर, जो पढ़े नहीं जाते और जिनमें से पहिले के साथ ‘आ’ की मात्रा और दूसरे के साथ अनुस्वार लगा है उनमें से पहिला अक्षर ‘दा’ और दूसरा ‘नं’ (दानं) ही होगा. इस अनुमान के अनुसार ‘द’ और ‘न’ के पहिचाने जाने पर वर्णमाला संपूर्ण हो गई और देहली, अलाहाबाद, सांची, मथिया, राधिया, गिरनार, धौली आदि के लेख सुगमता पूर्वक पढ़ लिये गये. इससे यह भी निश्चय हो गया कि उनकी भाषा जो पहिले संस्कृत मान ली गई थी वह अनुमान ठीक न था, वरन उनकी भाषा उक्त स्थानों की प्रचलित देशी (प्राकृत) भाषा थी. इस प्रकार प्रिन्सेप् आदि विद्वानों के उद्योग से ब्राह्मी अक्षरों के पढ़े जाने से पिछले समय के सब लेखों का पढ़ना सुगम हो गया क्योंकि भारतवर्ष की समस्त प्राचीन लिपियों का मूल यही ब्राह्मी लिपि है.