भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c11.36
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c11.36
- Language
- Hindi
c11.36
२ ‘क’ और ‘ख’ के पूर्व विसर्ग का उच्चारण विलक्षण होता था और जिह्वामूलीय कहलाता था. इसी तरह ‘प’ और ‘फ’ के पहिले विसर्ग का उच्चारण भी भिन्न था और उपध्मानीय कहलाता था. जिह्वामूलीय और उपध्मानीय के न्यारे न्यारे चिह्न थे, जो कभी कभी प्राचीन पुस्तकों, शिलालेखों और ताम्रपत्रों में मिल आते हैं, जो अक्षरों के ऊपर, बहुधा उनसे जुड़े हुए, होते हैं, और उनमें भी अक्षरों की नांई समय के साथ परिवर्तन होना पाया जाता है (देखो लिपिपत्र १७, २१, २२, २३, २८, २६ आदि). बोपदेव ने अपने व्याकरण में अनुस्वार को ‘बिंदु’, विसर्ग को ‘द्विबिंदु’, जिह्वामूलीय को ‘वज्राकृति’ और उपध्मानीय को ‘गजकुंभाकृति’ कह कर उनका स्वरूप बतलाया है.।