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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25.s2.22

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25.s2.22

Language
Hindi

c25.s2.22

भारतीय अंकों से अरबों के और उनसे यूरोप के अंकों की सर्वमान्य उत्पत्ति के विरुद्ध मि. के ने उपर्युक्त लेख के प्रारंभ में ही लिखा है कि 'यह कहा जाता है कि हमारे अंकगणित के अंकों की उत्पत्ति भारतीय है. पीकॉक, चैसिल्स, वोप्के, केंटोर, बेले, बूलर, मेकडोनेल और दूसरे लेखक प्रायः निश्चय के साथ यही कहते हैं और विश्वकोशों तथा कोशों का यही कथन है. तो भी इस समय जो सामग्री उपलब्ध है उसकी सावधानी के साथ परीक्षा करने से यह पाया जाता है कि उन(अंकों)की भारतीय उत्पत्ति की कल्पना उचित प्रमाण से रहित है. वैसी परीक्षा यही बतलाती है कि उन कथनों में से बहुत से निस्सार हैं' (बंगा.ए.सो.ज.; ई. स. १६०७, पृ. ४७५). अरबी में अंकों को 'हिंदसे' कहते हैं जिसका अबतक के विद्वान् हिंद (हिंदुस्तान) से लिये जाने के कारण ऐसा कहलाना मानते हैं, परंतु मि. के का कथन है कि 'शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र का बड़ा ज्ञाता फ़ीरोज़ आबादी (ई. स. १३२६-१४२४) 'हिंदसह' शब्द की उत्पत्ति 'अंदाज़ह' से होना बतलाता है, जिसका अर्थ परिमाण है. हरेक आदमी विचार सकता है कि यह काफ़ी अच्छा प्रमाण है परंतु भारतवर्ष के विषय में लिखनेवालों में से अधिकतर ने इसे स्वीकार नहीं किया' (पृ. ४८६). इसी तरह इब्न सिना के वर्गसंख्या-विषयक नियम में लिखे हुए 'फी अल्तरीक अल्हिंदसे' और उसीके घनसंख्याविषयक नियम में दिये हुए 'अल्हिसाब अल्हिंदसे' में 'हिंदसे' शब्दों का हिंद (हिंदुस्तान) से कोई संबंध न बतलाने का यत्न किया है (पृ. ४६०). मि. के का यह कथन भी स्वीकार करने योग्य नहीं है और वैसा ही है जैसा कि उपर्युक्त यह कथन कि 'हिंदुओं के गणितशास्त्र भर में ई. स. की दसवीं शताब्दी के पूर्व नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के व्यवहार की कल्पना का तनिक भी चिह्न नहीं मिलता' (देखो, ऊपर पृ. ११६, टिप्पण ६). ऐसे कथनों का प्रतिवाद कर लेख को बढ़ाने की हम आवश्यकता नहीं समझते. प्रसिद्ध विद्वान् अल्बेरुनी ने, अपनी भारतवर्ष संबंधी तहकीकात की अरबी पुस्तक में, जो ई. स. १०३० के आस पास लिखी गई थी, लिखा