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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c4.21

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c4.21

Language
Hindi

c4.21

ई. स. १८६३ तक कोई ऐसा पुस्तक नहीं बना था कि केवल उस एक ही पुस्तक की सहायता से हिमालय से कन्याकुमारी तक और द्वारिका से उड़ीसे तक की समस्त प्राचीन लिपियों का पढ़ना कोई भी विद्वान् आसानी के साथ सीख सके. इस अभाव को मिटाने के लिये मैंने ई. स. १८६४ में 'प्राचीन लिपिमाला' नामक छोटासा पुस्तक प्रकट किया, जिसको यहां के और यूरोप के विद्वानों ने उपयोगी बतलाया इतना ही नहीं किंतु उसको इस विषय का प्रथम पुस्तक प्रकट कर उसका आदर किया. उस समय तक इस विषय का कोई पाठ्य पुस्तक न होने के कारण विश्वविद्यालयों की परीक्षाओं में प्राचीन लिपियों को स्थान नहीं मिला था परंतु उक्त पुस्तक के प्रसिद्ध होने के पीछे प्राचीन लिपियों का विषय विश्वविद्यालयों की एम. ए. की पढ़ाई में रक्खा गया और कलकत्ता युनिवर्सिटी ने इस पुस्तक को उक्त विषय का पाठ्य पुस्तक स्थिर किया. ऐसे ही अन्य युनिवर्सिटियों के विद्यार्थी लोग भी अपनी पढ़ाई में उक्त पुस्तक का सहारा लेने लगे. कई देशी एवं यूरोपियन् विद्वानों ने उससे भारतीय प्राचीन लिपियों का पढ़ना सुगमता के साथ सीखा. थोड़े ही बरसों में उसकी सब प्रतियां उठ गई इतना ही नहीं, किंतु उसकी मांग यहां तक बढ़ी कि बीस गुना मूल्य देने पर भी उसका मिलना कठिन हो गया. इसपर मेरे कई एक विद्वान् मित्रों ने उसका नवीन संस्करण छपवाने का आग्रह किया; परंतु गत २५ वर्षों में प्राचीन शोध में बहुत कुछ उन्नति हुई जिससे उसी को दुबारा छपवाना ठीक न समझ कर मैंने अब तक के शोध के साथ यह विस्तृत नवीन संस्करण तय्यार किया है जो प्रथम संस्करण से करीब तिगुने से भी अधिक बढ़ गया है. इसमें पहिले संस्करण से बहुत अधिक शिलालेखों, दानपत्रों और सिक्कों से वर्णमालाएं बनाई गई हैं और वे लिपियों के विकासक्रम के अनुसार जमाई गई हैं जिससे गुप्त, कुटिल, नागरी, शारदा (कश्मीरी), बंगला, पश्चिमी, मध्यप्रदेशी, तेलुगु-कनड़ी, ग्रंथ, कलिंग, तामिळ आदि लिपियों का एक ही सामान्य लिपि ब्राह्मी से क्रमशः विकास कैसे हुआ एवं भारतवर्ष की सब वर्तमान आर्य लिपियों की उत्पत्ति कैसे हुई यह आसानी से मालूम हो सकता है.