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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c7.161

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c7.161

Language
Hindi

c7.161

यदि हम यह चेष्टा करें कि लिखना न जानने वाले दो पुरुषों को बिठला कर एक से कहें कि 'तुम कोई एक लंबा गीत गाओ' और दूसरे से कहें कि 'यह जो गीत गाता है उसके तुम अक्षर गिन कर बतलाओ कि वे कितने हुए और फिर छत्तीस छत्तीस अक्षरों से एक छंद बनाया जावे तो उन अक्षरों से ऐसे कितने छंद होंगे?' यदि वह गीत एक या दो पृष्ठों में लिखा जावे इतना छोटा भी हो तो भी वह न तो अक्षरों की और न छंदों की संख्या ठीक ठीक बतला सकेगा, तो ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद जैसे पुस्तकों के, जो १००० पृष्ठ में भी लिख कर पूरे नहीं होते और जिनके सुनने में कई दिन लग सकते हैं, अक्षरों की तथा उनसे बन सकने वाले छंदों की गिनती बिना लिखित पुस्तक की तथा गणित की सहायता के करना मनुष्य की शक्ति के बाहर है. अत एव यह मानना पड़ेगा कि जिसने तीनों वेदों के अक्षरों की संख्या और उनसे बनने वाले बृहती और पंक्ति छंदों की संख्या बतलाई है उसके पास उक्त तीनों वेदों के लिखित पुस्तक अवश्य होंगे, वह छंदःशास्त्र से परिचित होगा और कम से कम भाग तक का गणित भी जानता होगा. ऐसे ही ऊपर लिखे हुए यज्ञ की दक्षिणा तथा समयविभाग आदि के विषयों से अंक-विद्या की उन्नत दशा का होना मानना ही पड़ता है.