Pracin Bharatiya Veshabhusha c10.s3: स्त्रियों की वेश-भूषा
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c10.s3
- Language
- Hindi
स्त्रियों की वेश-भूषा
c10.s3.1
सांची के अर्धचित्रों में स्त्रियां दो तरह की साड़ियां पहने दिखलायी गयी हैं। एक में साड़ी घुटनों तक पहुंचती थी और चूनन की लांग पीछे खोस ली जाती थी, फीतेदार पर्यस्तक दोलड़ी करधनी में खोंस दिया जाता था (आ० ९०)३०। दूसरी तरह की साड़ी में एक भाग तो कमर में लपेट लिया जाता था और चूनन की लांग पीछे खोंस ली जाती थी (आ० ९१)३१। साड़ी पहनने की यह रीति आधुनिक सकच्छ साड़ी पहनने की रीति से मिलती है और इसकी चलन मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में है। एक तीसरी जगह चूनन बगल में खोंसी दिखलायी गयी है (आ० ९२)३२।
c10.s3.2
३० वही, प्ले० ८, ४०
c10.s3.3
३१ वही, प्ले० ८, ४२
c10.s3.4
३२ वही, प्ले० ६, ४३
c10.s3.5
स्त्रियों के सिर किनारदार ओढ़नियों से ढंके रहते थे। ओढ़नियों में निम्नलिखित प्रकार देख पड़ते हैं:—
c10.s3.6
(१) सिर को ढकती दोहरे किनारे वाली ओढ़नी (आ० ९३)३३।
c10.s3.7
३३ वही, प्ले० ६, ४४
c10.s3.8
(२) सिर और चोटी को ढकती हुई घोघी के आकार की ओढ़नी (आ० ९४)३४।
c10.s3.9
३४ वही, प्ले० १, ४५
c10.s3.10
(३) बालों की सजावट को ढकती हुई दो तहों वाली ओढ़नी (आ० ९५)३५।
c10.s3.11
३५ वही, प्ले० ६, ४६
c10.s3.12
(४) सिर पर ओढ़नी दोलड़ी पेंची से बंधी है (आ० ९६)३६। (५) सिर पर पड़ी नुकीली ओढ़नी चोलड़ी पेंची से बंधी है (आ० ९७)३७। (६) कभी कभी ओढ़नी की चोटी पंखे के आकार की होती थी (आ० ९८)३८। (७) ओढ़नी में पंखे का आकार चोटी के पीछे दिखाया गया है (आ० ९९)३९। (८) पेशानी के चारों ओर टिकरेदार बद्धी है, बद्धी को ढकती हुई किनारेदार ओढ़नी है। ओढ़नी के ऊपर एक बोर अथवा चूडामणि है जिसमें पंखे के आकार में पर लगे हुए हैं (आ० १००)४०।
c10.s3.13
३६ वही, प्ले १०, ४७
c10.s3.14
३७ वही, प्ले० १०, ४८
c10.s3.15
३८ वही, प्ले० १०, ५०
c10.s3.16
३९ वही, प्ले० १०, ५१
c10.s3.17
४० वही, प्ले० १०, ५२
c10.s3.18
स्त्रियां विशेषकर साधुनियां कभी कभी पगड़ी भी पहनती थीं। एक जगह यह पगड़ी अटपटी पगड़ी का रूप ग्रहण करती है (आ० १०१)४१ और दूसरी जगह साफे का (आ० १०२)४२।
c10.s3.19
४१ वही, प्ले० ११, ५३
c10.s3.20
४२ वही, प्ले० ११, ५४
c10.s3.21
स्त्रियां कभी सिर से सटी गोल टोपी पहनती थीं (आ० १०३)४३। एक जगह इस टोपी में लटकनदार झालर लगी हुई है (आ० १०४)४४। एक जगह जुलूस में घोड़े पर सवार राजा के पीछे एक स्त्री शिरस्त्राण पहने हुए है (आ० १०५)४५। क्या यह यवनी है जो प्राचीन भारत में राजा के अंगरक्षक का काम करती थी ?
c10.s3.22
४३ वही, प्ले० ११, ५५
c10.s3.23
४४ वही, प्ले० ११, ५६
c10.s3.24
४५ वही, प्ले० ११, ५७
c10.s3.25
हम ऊपर कह आये हैं कि ई० पू० पहली शताब्दी में कुछ ऐसी मिट्टी की स्त्री मूर्तियां कौशांबी, मथुरा इत्यादि से मिली हैं जिनकी वेश-भूषा में कंचुक, भारी भरकम शिरोवस्त्र और भारी गहने हैं। स्त्रियों की यह पोशाक भरहुत और सांची के अर्धचित्रों में नहीं मिलती। ये मिट्टी की मूर्तियां शुंगकाल की कही जाती हैं पर ध्यान देने से पता चलता है कि यह ई० पू० पहली शताब्दी की है। लगता है इनके वेश पर शक प्रभाव पड़ा है पर गहने भारतीय हैं। कौशांबी से मिली हुई एक ऐसी ही अखंडित मूर्ति का जो अब इंडियन इंस्टिट्यूट म्यूजियम आक्सफर्ड४६ में है वर्णन नीचे दिया जाता है। श्री जांस्टम की राय में इस मूर्ति का
c10.s3.26
४६ ई० एच० जांस्टन, ए टेराकोटा फिगर एट आक्सफोर्ड, जे० आई० एस० ओ० ए०, १६४२, प्ठ० ६, पृ० ६४-१०२
c10.s3.27
समय ई० पू० २०० का है४७ और शायद मूर्ति मायादेवी की है४८। लेकिन डा० गॉर्डन का मत है कि ऐसी मूर्तियां ई० पू० दूसरी शताब्दी के अंत की और अधिकतर ई० पू० पहली शताब्दी की हैं४९।
c10.s3.28
४७ वही, पृ० ६२
c10.s3.29
४८ वही, पृ० १०१
c10.s3.30
४९ डी० एच० गॉर्डन, अर्ली इंडियन टेराकोटाज्, जे० आई० एस० ओ० ए०, १६४३, पृ० १५७
c10.s3.31
मूर्ति की (आ० १०६) पृष्ठिका जो खाली बच गयी है फुल्लों से सजी है। मूर्ति का शिरोवस्त्र खूब सजा हुआ है । बाल दो लट्टूदार जूड़ों में सिर के अगल बगल में हैं। बालों को हटने बढ़ने न देने के लिए ललाट पर चौलड़ी मोती की बढ़ी है; जिसके दोनों अंत के फूँदने साफ दिखलायी देते हैं। ललाट के दोनों कोनों में समानान्तर रेखाओं में पत्र भंग हैं और ललाट के बीचोबीच तिलक, दाहिनी ओर लट्टूदार जूड़े पर कामदार पतली पट्टी बँधी हुई है। बायीं ओर का जूड़ा एक चार टिकरों वाले शिखाजाल से बँधा है। और जूड़ा एक सिरे से दूसरे सिरे तक, निम्नलिखित आकार के टीकरों से सजा है यथा—सब से निचला अंकुश है, उसके बाद वाला त्रिरत्न, जिस पर कोई आवरण है, उसके बाद परशु है, उसके बाद फिर त्रिरत्न है जिसपर कुलाहनुमा कोई आवरण है और फिर है गंडासा । इन सब के सिरों से मोती की लड़ें लगी हुई हैं। जूड़ों के बीच फुल्लों से सुसज्जित ढालनुमा गोल टिकरा है जिसका मतलब शायद चूड़ामणि से हो । कानों में गोल तकियां हैं जिन पर सितारों और फुल्लों का काम बना हुआ है, इनके नीचे मनकों या मोती की कई लड़ें लटक रही हैं। शरीर एक बिना बांह वाले और पैर तक लटकते हुए कंचुक से ढका है । यह कंचुक कमर पर पेटी से बंधा हुआ है । गले के नीचे किनारेदार गोल कालर है। कंचुक में एक विशेषता यह है कि दाहिना कंधा तो खुला है और कंचुक का किनारा बायें स्तन के मध्य से होकर जाता है। कंचुक की चूननें समानान्तर रेखाओं द्वारा दिखायी गयी हैं। कमर से जरा नीचे खिसकी हुई एक तीन लड़वाली करधनी है । लड़ें खारदार और गोल मनकों से बनी हैं। निचली लड़ से दो फुंदनेदार झुमके लटक रहे हैं। इन झुमकों के ऊपरी लड़ों में दोनों ओर दो कुंभांडों की बैठी हुई मूर्तियां हैं। छाती पर दाहिने कंधे से लेकर कटि तक एक पट्टी है जिसमें चार जंतर यथा दो मछलियां, एक चिड़िया जिसका सिर टूट गया है, एक सोती हिरनी और मकर हैं। इन जंतरों से मनकों की लड़ें लटक रही हैं। मूर्ति एक या उससे अधिक दुपट्टे पहने है जो दायें और बायें बाहुओं और बायें कन्धे और स्तन पर होते हुए घुटनों पर खतम होते हैं। उनके ठीक ठीक घुमावों का पता नहीं चलता। हर कलाइयों पर चार चार कंकण हैं।