Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s3: वेश-भूषा के इतिहास के साधन
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s3
- Language
- Hindi
वेश-भूषा के इतिहास के साधन
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पुनः इतिहास की कड़ी पकड़ते हुए हमें पता लगता है कि गुप्तों के समसामयिक दक्खिन के शासक वाकाटक थे। पांचवीं शताब्दी के पहले भाग में गुप्त-साम्राज्य ओर सुदूर दक्खिन के राज्यों के बीच में वाकाटक साम्राज्य दक्खिन में सब से मजबूत राज्य थे। अपने समय में वाकाटक साम्राज्य दक्खिनी ओर उत्तरी भारत के सांस्कृतिक आदान-प्रदान का साधन था। इस वंश का छठवीं शताब्दी के मध्य में अंत हो गया। अजंटा से मिले वाकाटक लेख भारतीय कला के इतिहास के काल क्रम को ठीक करने में अपना एक विशेष स्थान रखते हैं। दक्षिण में वेश-भूषा का इतिहास भी हमें अजंटा के भित्तिचित्रों से मिलता है। जब हम दक्षिण की वेश-भूषा की तुलना गुप्तयुग की वेश-भूषा से करते हैं तो हमें पता चलता है कि गुप्तकालीन पहिरावा दक्षिण तक चला गया था ओर थोड़े से स्थानिक भेदों को छोड़ कर सारे भारत में एक ही सा था।
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उत्तर भारत में हूणों के पतन और गुप्तों के पुनः अपनी शक्ति को प्राप्त करने में असफल होने से बहुत से राज्यों का उदय हुआ जिनमें वलभी, चालुक्य, मौखरी, बाद के गुप्त तथा थानेश्वर के वर्धन जिन्होंने बाद के इतिहास में काफी स्थान पाया मुख्य थे। सातवीं शताब्दी के उत्कर्ष का युग श्री हर्ष का राज्यकाल (६०५-६४० ई०) था। श्री हर्ष एक कुशल शासक, कलाप्रेमी और साहित्यिक थे, इनके दरबार में इनके जीवनी लेखक बाण भट्ट हुए। हर्ष के समसामयिक दक्षिण के चालुक्य राजा पुलिकेशिन् हुए जिनके समय में
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शायद अजंटा की १ और २ नंबर की लेणें बनीं । शायद इन्हीं के काल में अथवा इनके कुछ पहले बाघ के भित्तिचित्र बने जो तात्कालिक आचार विचार के जानने के साधन हैं ।
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युवानच्वांग और इत्सिंग की भारत-यात्राएं इसी युग की संस्कृति धर्म और सामाजिक परिस्थिति पर अच्छा प्रकाश डालती हैं। इन चीनी यात्रियों के विवरणों और बाणभट्ट के ग्रंथों में आये संस्कृति अवतरणों के आधार पर हम सातवीं सदी की भारतीय वेश-भूषा का सुंदर चित्र खड़ा कर सके हैं । जैन छेदसूत्रों और चूर्णिकों में भी, जिनमें बृहद् कल्पसूत्रभाष्य और निशीथ चूर्णी मुख्य हैं, हम इस युग अथवा इसके पहले के युग का बहुत सा सांस्कृतिक मसाला पाते हैं । वस्त्रों और पहरावों का तो इनमें विशेष रूप से वर्णन है। इनमें दी हुई वस्त्र की तालिकाओं से यह बताना तो मुश्किल है कि कौन कौन से वस्त्र खास कर गुप्तयुग में ही होते थे, क्योंकि इनमें कुछ बहुत पुराने वस्त्रों के भी नाम आ गए हैं, पर साधारणतः तो यह कहा ही जा सकता है कि ये सब वस्त्र चाहे कितने ही पुराने क्यों न हों गुप्तकाल तक बनते थे । गुप्तयुग के बाद इनमें से बहुत से वस्त्रों की चलन कम हो गयी थी, इसीलिए दसवीं सदी के जैन टीकाकार उनके ठीक ठीक अर्थ नहीं कर पाये ।
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सभ्य समाज का एक नियम सा है कि उसके अंतर्गत रहने वाले अच्छे कपड़े पहनें और इसके लिए इस बात की आवश्यकता होती है कि तरह तरह के रंगीन और नक्काशीदार कपड़े बनें। बढ़िया कपड़ों की इस देश में और बाहर काफी मांग थी। भारतीय समाज के स्त्री और पुरुष दोनों कपड़े के शौकीन थे । इस युग में छपाई की भी काफी उन्नति हुई और तत्कालीन नक्काशियां जैसे चारखाने, डोरिया, हंस मिथुन इत्यादि कालांतर में छीपियों के रूढ़िगत अलंकार बन गये ।
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अभाग्यवश हमें इस युग के संस्कृत साहित्य में इतनी सामग्री नहीं मिलती जिसके द्वारा हम उस युग के रहन-सहन आमोद-प्रमोद और वेश-भूषा का पूरा पूरा चित्र खींच सकें । कालिदास के काव्यों में वस्त्रों के छिटपुट उल्लेख हुए हैं पर सातवीं सदी की वेश-भूषा पर बाणभट्ट की 'कादंबरी' और 'हर्षचरित' से काफी प्रकाश पड़ता है । बाण भट्ट की सजग आंखों से उस युग की छोटी से छोटी बात नहीं छिपी है । जैन छेद सूत्रों के रचयिता कवि या साहित्यिक नहीं थे और इसीलिए उनके वर्णनों में रस की मात्रा कम है। फिर भी उनके रूखे वर्णनों और तालिकाओं में ऐसी सामग्री सुरक्षित है जो अन्यत्र नहीं मिल सकती ।