Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.43
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.43
- Language
- Hindi
c4.43
इस युग में सिलाई की कला बहुत उन्नत हो चुकी थी और सिलाई संबंधी बहुत से शब्द बौद्ध साहित्य में मिलते हैं। तेज सूइयां सूची नालिका में रक्खी जाती थीं और उनको पार बचाने के लिए नालिकाओं में जौ का आटा, बालू, मोम इत्यादि भर दिये जाते थे। कुछ लोहारों के गांव अच्छी से अच्छी सूई बनाते थे और इस व्यवसाय में उनकी इतनी ख्याति थी कि लोग उन्हीं से सूइयां लेते थे। कपड़े काटने के लिए तरह तरह की मूठों वाली कैंचियां (सत्थक) भी होती थीं। सिलाई के समय सूई की नोक से अंगुलियां बचाने के लिए अंगुस्ताने (प्रतिग्रह) भी पहने जाते थे। एक तख्ते को जिस पर कपड़े बांध कर सिये जाते थे, कठिन कहते थे। कठिन के और भागों के भी नाम दिये हुए हैं। कपड़े ब्योंतने के लिए उनपर ताड़पत्र के अंक बना दिये जाते थे तथा सिलाई और कटाई के पहले लंगर (मोघ सुत्तक) डाल दिये जाते थे। दरजी की दूकान में जालमारियां (आवेसन वित्थक), और कठिन अर्थात् सीने के फ्रेम होते थे। इसमें खूंटियां और टाड़ें भी लगी होती थीं।