Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.6
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.6
- Language
- Hindi
c4.6
इस पुस्तक का उद्देश्य प्राचीन भारत के सांस्कृतिक जीवन का एक पहलू अर्थात् वेश-भूषा का इतिहास लोगों के सामने रखना है। अभी तक विद्वानों ने भारतीय संस्कृति के इस पहलू पर ध्यान तक नहीं दिया है, क्योंकि उनकी राय में भारतीय वेश-भूषा में विकास क्रम नहीं है। आज धोती, चादर और पगड़ी पहनी जाती है, वही दो हजार बरस पहले भी पहनी जाती थी, फिर ऐसी रूढ़िगत वेश-भूषा का इतिहास ही क्या ? भारतीय वेश-भूषा के इतिहास की ओर विद्वानों का ध्यान न देने का एक कारण यह भी था कि लोगों का यह विश्वास था और अब भी है कि सिले कपड़े इस देश में १६ वीं शताब्दी में मुसलमान लाए। विद्वानों के भारतीय वेश भूषा के संबंध में दोनों विचार भ्रामक हैं। यह सही है कि अब तक भारतीय धोती, चादर, दुपट्टे और पगड़ी जो हमारे पहरावे में दो हजार बरस पहले प्रचलित थीं, पहनते हैं, लेकिन प्राचीन और आधुनिक वेश-भूषाओं की समानता यहीं खतम हो जाती है। कौन कह सकता है कि आज की धोती और दो हजार बरस पहले की धोती एक ही तरह से पहनी जाती थी अथवा आज की पगड़ी और तब की पगड़ी एक सी है? अब की साड़ी और तब की साड़ी में भी बहुत बड़ा अंतर है। ठीक बात तो यह है कि भारतीय इतिहास के प्रत्येक युग में कपड़े पहनने का ढंग बदल जाता है। सिले कपड़ों का भी यही हाल है। कम से कम वैदिक युग से लेकर ७ वीं सदी तक सिले कपड़ों के उल्लेख साहित्य में मिलते हैं और उनका अंकन भी बहुधा अर्धचित्रों और चित्रों में हुआ है। बात यह है कि इस उष्णता-प्रधान देश में धोती चादर ही आरामदेह और स्वास्थ्य वर्धक पहरावा था और उसे लोग चाव से पहनते थे, पर इसके यह माने नहीं कि सिले वस्त्र कभी पहने ही नहीं जाते थे। स्त्रियां तो अक्सर कंचुक या चोली पहनती थीं। विदेशी संपर्क से सिले कपड़ों का इस देश में और अधिक प्रचार बढ़ा, पर जन-साधारण अपनी धोती चादर को कभी न छोड़ सका। इस बात को मानने का भी पर्याप्त कारण है कि बहुत प्राचीन काल से गंधार और पंजाब में लोग ठंडक की वजह से सिले वस्त्र पहनते थे और इन सिले वस्त्रों में हम यूनानी, ईरानी और मध्य एशिया का काफी प्रभाव देखते हैं क्योंकि इन प्रान्तों उपरोक्त जातियों से बहुत प्राचीन काल से घनिष्ट संबंध रहा और ऐसी अवस्था में दोनों में सांस्कृतिक आदान-प्रदान का होना स्वाभाविक था।