Pracin Bharatiya Veshabhusha c4.82
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c4.82
- Language
- Hindi
c4.82
कलिंग देश के नाग बुनकर बहुत अच्छी मलमल बिनते थे, जिसकी खपत यहां और विदेश दोनों में ही होती थी। रोम साम्राज्य में भारतीय मलमल की गहरी खपत थी। पेरिप्लस के अनुसार बढ़िया मलमल को मोनाचे और घटिया रुई के कपड़े को सगमतोघेने कहते थे । गुजरात के घटिया तरह के कपड़े को मोलोचीन कहते थे । यहां से कपड़े पूर्वी अफ्रिका के बंदरगाहों को, तथा अरब, मिस्र और सोकोतरा को भेजे जाते थे । त्रिचनापल्ली और तंजोर की मलमल को अर्गंरतिक कहते थे । मसलीपटम में भी मलमल बनती थी । पूर्वी भारत की मलमल को गेंजटिक कहते थे और यह शायद काशी और ढाका के पास बनती थी।