Pracin Bharatiya Veshabhusha c6.4
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c6.4
- Language
- Hindi
c6.4
वैदिक साहित्य के काल क्रम की यह गड़बड़ी जब हम वैदिक सभ्यता का इतिहास लिखने बैठते हैं तो बड़ी खलती है, क्योंकि हम दृढ़तापूर्वक यह नहीं कह सकते कि सभ्यता के प्रतीक अमुक अंग का आरंभ और विकास समय के पैमाने में कब से कब तक हुआ । साधारणतः हम ऋग्वेद को वैदिक आर्यों का आदि ग्रंथ मान कर उसी के आधार पर आरंभिक आर्य सभ्यता का रूप खड़ा करते हैं, लेकिन अथर्ववेद और कहीं कहीं ब्राम्हणों में भी आर्य और अनार्य सभ्यताओं के कुछ ऐसे प्रारंभिक रूप आये हैं जो ऋग्वेद के समकालीन हो सकते हैं। बात यह है कि ऋग्वेद कोई इतिहास का ग्रंथ तो है नहीं जिसमें तत्कालीन सभ्यता के सब रूप आने ज़रूरी थे। वह तो दान तथा देव स्तुतियों और दार्शनिक विचारों का एक संग्रह मात्र है। जिसमें वैदिकसभ्यता के भिन्न भिन्न पहलुओं के संकेत आनुषंगिक रूप से हो गये हैं। वैदिक युग की भारतीयसभ्यता के अनेक प्रतीक श्रुत वा दृश्य अथर्ववेद और कहीं कहीं ब्राह्मणों में बाद में आये लेकिन केवल बाद में आने ही से तो यह कहा नहीं जा सकता कि उनका विकास बाद में हुआ । बहुधा वैदिक साहित्य के अध्ययन में ऐसी अड़चनों का हमें सामना करना पड़ता है और तब हमें बुद्धि और वैज्ञानिक