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Pracin Bharatiya Veshabhusha c8.4

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8.4

Language
Hindi

c8.4

इस काल की वेश-भूषा के अध्ययन के लिए जो सामग्री उपलब्ध है उसमें अधिकतर शुंगकाल और बाद के अर्धचित्र हैं। इसीलिए मौर्यकाल की वेश-भूषा के इतिहास के लिए हमें साहित्य का ही सहारा लेना पड़ता है। इस युग के वस्त्रों के इतिहास के लिए हमें अर्थ-शास्त्र, मेगस्थनीज की इंडिका और महाभारत के सभापर्व के कुछ अंशों से काफी सहायता मिलती है। उपरोक्त ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि जातक कथाओं और विनय-पिटक में वर्णित भारतीय वेश-भूषा इस युग में भी चालू रही। लेकिन इस युग की वेश-भूषा में हम कुछ बाहरी पहरावों को भी देखते हैं जिनसे पता चलता है कि भारतीयों का इस युग में विदेशियों से काफी संपर्क रहा। इस युग में ऐसे वस्त्रों के भी उल्लेख आये हैं जो बलख, ताजिकिस्तान और चीन से आते थे। इन सब से यह पता चलता है कि भारतीयों का विदेशियों से राजनैतिक और व्यापारिक दोनों संबंध था और इस युग में भारतीय अपने देश की चहारदीवारी से बाहर निकल कर अपनी सभ्यता और व्यापार का प्रसार कर रहे थे।

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