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Pracin Bharatiya Veshabhusha c8: चौथा अध्याय : मौर्य, शुंग और शक-सातवाहन काल के वस्त्र (ई० पू० तीसरी सदी से पहली सदी तक)

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8

Language
Hindi

Contents

चौथा अध्याय : मौर्य, शुंग और शक-सातवाहन काल के वस्त्र (ई० पू० तीसरी सदी से पहली सदी तक)

c8.1

मौर्य, शुंग और शक-सातवाहन काल के वस्त्र

c8.2

(ई० पू० तीसरी सदी से पहली सदी तक)

c8.3

चन्द्रगुप्त मौर्य ने ३२० ई० पू० नंदवंश का उन्मीलन कर के मगध साम्राज्य की शासनडोर संभाली। इस युग की राज्यव्यवस्था और सामाजिक दशा का सुन्दर चित्रण चन्द्रगुप्त के मंत्री कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में किया है। चन्द्रगुप्त के पौत्र अशोक (ई० पू० २७२-२३२) भारतवर्ष के महान् शासकों में अपना ऊंचा स्थान रखते हैं। अशोक बौद्ध थे और बौद्धधर्म के प्रचारार्थ उन्होंने बौद्ध भिक्षुओं को इस देश के बाहर भेजा। उनके शिलालेख प्रजा को धर्मपालन की शिक्षा देते हैं। अशोक ने अपने साम्राज्य में बहुत से बौद्ध स्तूप भी बनवाये। अशोककालीन मौर्य साम्राज्य का विस्तार तमाम उत्तर भारत, पूर्वी अफगानिस्तान, कश्मीर तथा दक्षिण तक फैला हुआ था। मौर्यों का शासन काल ई० पू० १८४ तक रहा। इसके बाद शुंगों ने और बाद में कण्वों ने राज्य किया। इस युग में सातवाहनों ने जिनके पास कृष्णा गोदावरी के घाटियों में बहुत से किले थे अपना विस्तार पूना से उज्जैन तक बढ़ाया और उनके वंशवाले करीब ४५० वर्ष तक राज्य करते रहे। ई० पू० ७०-२० के बीच में पंजाब और मथुरा में शक राज्य करते थे।

c8.4

इस काल की वेश-भूषा के अध्ययन के लिए जो सामग्री उपलब्ध है उसमें अधिकतर शुंगकाल और बाद के अर्धचित्र हैं। इसीलिए मौर्यकाल की वेश-भूषा के इतिहास के लिए हमें साहित्य का ही सहारा लेना पड़ता है। इस युग के वस्त्रों के इतिहास के लिए हमें अर्थ-शास्त्र, मेगस्थनीज की इंडिका और महाभारत के सभापर्व के कुछ अंशों से काफी सहायता मिलती है। उपरोक्त ग्रंथों के अध्ययन से पता चलता है कि जातक कथाओं और विनय-पिटक में वर्णित भारतीय वेश-भूषा इस युग में भी चालू रही। लेकिन इस युग की वेश-भूषा में हम कुछ बाहरी पहरावों को भी देखते हैं जिनसे पता चलता है कि भारतीयों का इस युग में विदेशियों से काफी संपर्क रहा। इस युग में ऐसे वस्त्रों के भी उल्लेख आये हैं जो बलख, ताजिकिस्तान और चीन से आते थे। इन सब से यह पता चलता है कि भारतीयों का विदेशियों से राजनैतिक और व्यापारिक दोनों संबंध था और इस युग में भारतीय अपने देश की चहारदीवारी से बाहर निकल कर अपनी सभ्यता और व्यापार का प्रसार कर रहे थे।

समूर और चमड़े

c8.s1.1

कौटिल्य अर्थशास्त्र में तरह तरह के चमड़ों और समूरों का विशद वर्णन दिया हुआ है। ये समूर और चमड़े हिमालय से आते थे और इतने कीमती समझे जाते थे कि राजभंडार में रत्नों तथा और सुगंधित द्रव्यों के साथ रखे जाते थे। निम्नलिखित समूरों और चमड़ों की परिभाषाएं श्री गणपति शास्त्री द्वारा संपादित अर्थशास्त्र से ली गयी हैं। श्री शामा शास्त्री के अंग्रेजी अनुवाद का भी संकेत इसलिए कर दिया गया है कि उनके अनुवाद और श्री गणपति शास्त्री की टीका में काफी अंतर है।

c8.s1.2

(१) कान्तानावक१—इस समूर का रंग मोर की गरदन की तरह हरा होता था और यह कान्तानावक प्रदेश से आता था। इस देश की स्थिति का पता नहीं है।

c8.s1.3

(२) प्रेयक२—यह समूर सफेद और नीले रंग का होता था और इस पर बूंदकियां और धारियां (लेखा बिंदुचित्र) पड़ी होती थीं। न० १-२ के चमड़ों की लंबाई आठ अंगुल होती थी।

c8.s1.4

इन समूरों के नाप से पता चलता है कि शायद वे छोटे जानवरों के समूर रहे हों अथवा एक बड़े चमड़े के आठ अंगुल के बराबर टुकड़े रहे हों।

c8.s1.5

द्वादशग्राम में तैयार किये हुए चमड़े

c8.s1.6

(३) बिसी३—इसका कोई खास रंग नहीं होता था और यह बालदार और चित्तीदार होता था। गणपति शास्त्री की टीका के अनुसार इस समूर में बहुत से रंगों के मेल होते थे और इसलिए यह कहना कठिन है कि उसका खास रंग क्या होता था। इस पर रोएं (दुहिल्लिका या दुहिलितिका) और चित्तियां होती थीं।

c8.s1.7

(४) महाबिसी४—यह समूर खुरखुरा और प्रायः सफेद होता था ३-४ नं० के चमड़े १२ अंगुल लंबे होते थे और हिमालय पर्वत पर बसे म्लेच्छों के द्वादशग्राम से आते थे।

c8.s1.8

१ गणपति शास्त्री, अर्थशास्त्र, १, पृ० १६१; शामा शास्त्री, अ० शा० पृ० ६८ आगे हम गणपति शास्त्री द्वारा संपादित अर्थशास्त्र के लए ग० शा० और शामा शास्त्री के अर्थशास्त्र के अनुवाद के लिए शा० शा० का लघप्रयोग करेंगे।

c8.s1.9

२ वही

c8.s1.10

३ वही

c8.s1.11

४ वही; शा० शा० पृ० ८८, फु० नं० ५

c8.s1.12

निम्नलिखि समूर आरोह से आते थे जो टीका के अनुसार हिमालय प्रदेश में स्थित था५। (५) श्यामिका६—यह भूरे रंग का बूंदीदार बिंदुचित्रा समूर था।

c8.s1.13

५ शा० शा०, पृ० ८८, फु० नं० ६

c8.s1.14

(६) कालिका७—यह भूरे और फाख्ताई रंग का समूर था।

c8.s1.15

नं० ५-६ के चमड़े ८ अंगुल लंबे होते थे।

c8.s1.16

(७) कदली८—यह खुराखुरा समूर दो हाथ चौड़ा और २४ अंगुल लंबा होता था। महाभारत के अनुसार९ कदली मृग के समूर, काले, भूरे और लाल रंग के होते थे। कम्बोज (आधुनिक ताजिकिस्तान) के निवासी राजसूय यज्ञ के अवसर पर कदली मृगचर्म युधिष्ठिर को भेंट देने लाये थे।

c8.s1.17

७ वही

c8.s1.18

(८) चन्द्रोत्तरा१०—इस समूर पर गोल चित्तियां पड़ती थीं और इसका नाप कदली जैसा ही होता था।

c8.s1.19

८ ग० शा०, १, पृ० १६१-६२

c8.s1.20

(९) शाकुला११—इस पर गोल चित्तियां (कोष्ठमंडल-चित्रा) पड़ती थी और इसमें कर्णिकाएं (कृतकर्णिकाजिनचित्रा) भी रहती थीं। गणपति शास्त्री की टीका के अनुसार इसकी चौड़ाई तीन हाथ अथवा आठ अंगुल होती थी।

c8.s1.21

९ महाभारत, २, ४५, १६

वाल्हीक देश (आधुनिक बलख) के समूर

c8.s2.1

(१०) सामूर१२—इसका रंग काला (अञ्जनवर्ण) होता था और यह ३६ अंगुल चौड़ा होता था। लगता है यह कोई रोएंदार समूर रहा होगा, क्योंकि आजदिन भी ऐसे चमड़े को हिंदी में समूर कहते हैं।

c8.s2.2

६ ग० शा० १, पृ० १६१; शा० शा०, पृ० ८८

c8.s2.3

१० ग० शा०, १, पृ० १६२

c8.s2.4

१२ वही

c8.s2.5

(११) चीनासि१३—चीन देश से आया हुआ समूर, यह लाली लिये हुए काले अथवा सफेदी मायल काले रंग का होता था। (१२) सामूर्ली१४—इसका समूर गेहूं के रंग का होता था और इसकी लंबाई ३६ अंगुल होती थी।

c8.s2.6

११ वही

c8.s2.7

१३ वही, प्रोफेसर नीलकंठ शास्त्री ने चीन और भारत के प्राचीनतम संबंध के उद्धरणों को इसलिए भली भांति जांचा है क्योंकि इस जांच पड़ताल से अर्थशास्त्र के, जिसमें चीन का उल्लेख है, समय पर काफी प्रकाश पड़ता है, नीलकंठ शास्त्री, आई० एच० क्यू (१४), १६३८ (पृ० ३८० इत्यादि)। प्रो पलियो प्राचीन चीनी सबूतों के आधार पर (बी० ई० एफ० ई० ओ०, ४, पृ० १४६) इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि चीन नाम प्रथम त्सिन राजवंश से (ई० पू० २४६-२०७) निकला। अर्थशास्त्र के छपने पर विद्वानों में काफी बहस चली और जो विद्वान अर्थशास्त्र को मौर्य काल के बाद रखने के पक्ष में थे उन्होंने अपने मत के पक्ष में चीनपट्ट का उल्लेख किया है। याकोबी और लाउफर इस सिद्धान्त को नहीं मानते। प्रो० शास्त्री ने कुछ चीनी प्रमाण दे कर यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि कम से कम ई० पू० दूसरी शताब्दी में चीन और भारत में संबंध था।

ऊदबिलाव के चमड़े

c8.s3.1

(१३) सातीना१५—यह काले रंग का होता था।

c8.s3.2

(१४) नलतूला१६—इसका रंग नल नाम की घास के रेशों की तरह होता था।

c8.s3.3

१६ ग० शा० १, पृ० २४८; शा० शा० पृ० ११९

c8.s3.4

(१५) वृत्तपुच्छ१७—चमड़ा भूरे रंग का होता था और उसमें ऊदबिलाव की गोल पूंछ भी रहती थी।

c8.s3.5

समूरों के चुनाव में कौटिल्य की राय है कि मुलायम चिकने और गञ्झिन समूर ही सब से अच्छे होते हैं१८।

c8.s3.6

बनों के प्रकरण में१९ और तरह के साधारण चमड़ों का उल्लेख अर्थशास्त्र में आया है। इनमें गोह, सेरक (एक विशेष प्रकार की गोह), चीता, सूस, सिंह, व्याघ्र, हाथी, भैंसा, सुरा गाय और गयाल के चमड़े मुख्य थे। इन चमड़ों का बहुत से कामों में उपयोग होता था।

कंबल और शाल

c8.s4.1

इस प्रकरण के आरंभ में भेड़ के ऊन से बने कंबल और शालों का वर्णन दिया गया है। भेड़ के ऊन से बने शाल (आविकं) सफेद, गहरे लाल (शुद्धरक्त) या मिश्रित लाल (पद्मरक्त) रंग के होते थे२०।

c8.s4.2

२० ग० शा० १, पृ० १६३, शा० शा० पृ० ८१

c8.s4.3

अलंकार और कारीगरी के हिसाब से अर्थशास्त्र में शालों का अच्छा वर्णन आया है। शालों पर सुईकारी और अमलकारी रीति से अलंकार बनाने के निम्न लिखित तरीके दिये गये हैं--

c8.s4.4

(१) खचित२१—टीका में इस कारीगरी का अर्थ दिया हुआ है-- सूचिवाप कर्म निष्पादितम्—सुईकारी और बुनाई से बना हुआ। इस संबंध में मैं पाठकों का ध्यान, कश्मीर की पुरानी शाल बीनने की पद्धति की ओर आकर्षित करना चाहता हूं क्योंकि अर्थशास्त्र में शाल बिनने की पद्धति और आधुनिक कश्मीर में शाल बिनने की पद्धति प्रायः एक सी है । कश्मीर में शाल बुनने के दो तरीके हैं तिल्ली या कनीकार और अम्लीकार । तीलीकार में नक्काशियां करघे पर बुन ली जाती हैं । सुईकारी में बेल बूटियां सुई से काढ़ी जाती हैं । तात्पर्य यह है कि एक में बेल बूटियां बुनी जाती हैं और दूसरी में काढ़ी जाती हैं । लेकिन वास्तव में करघे पर फूल पत्तियां केवल बहुत ही महंगे जामेवारों पर बनती हैं, और उनमें भी थोड़ी बहुत कढ़ाई सुई की करनी ही पड़ती है। सत्य तो यह है कि कश्मीरी शाल कनीकार और अम्लीकार के संयोग से बनते हैं, केवल एक ही पद्धति से बने शाल बहुत कम मिलते हैं२२। अर्थशास्त्र में वर्णित खचित शाल में फूल पत्तियां या और अलंकार बुने अथवा काढ़े भी जाते थे । इसलिए प्राचीन खचित पद्धति आधुनिक कनीकार और अम्लीकार के मेल की द्योतक थी ।

c8.s4.5

१४-१८ ग० शा० १, पृ० १६२

c8.s4.6

२१ वही

c8.s4.7

२२ जार्ज वाट, इंडियन आर्ट एट देहली, १६०३, पृ० ३४४, कलकत्ता, १६०२

c8.s4.8

(२) वानचित्र२३—टीका में इसका अर्थ दिया हुआ है, ‘वान कर्मणाकृत वैचित्र्यम् ‘करघे पर ही अलंकार बुनना’ । इसमें कोई संदेह नहीं कि वानचित्र आधुनिक तिली या कनीकार पद्धति का ही प्राचीन संस्कृत नाम है ।

c8.s4.9

२३ गणपति शास्त्री, वही, १, पृ० १६३; शा० शा० पृ० ८६

c8.s4.10

(३) खंडसंघात्य२४—जुड़े हुए टुकड़ों पर बना शाल । टीका में दूसरी व्याख्या इस प्रकार की गयी है—खचितानां उतानां वा बहूनां खंडानां संघातेन निष्पादितम्—‘बिने हुए अथवा काढ़े हुए टुकड़ों को जोड़ कर बना हुआ शाल, खंडसंघात्य का यह वर्णन कश्मीरी पट्टीदार रूमालों के वर्णन से बहुत मिलता है । इस पद्धति में जब अलंकार करघे पर बिनने होते हैं तब कई १२ से १८ इंच चौड़े टुकड़े ले लिए जाते हैं और उन पर फूल पत्तियों की नक्काशियां बुन दी जाती हैं । इन पट्टियों को मनचाहे नाप में काट लेते हैं और फिर जोड़ कर एक पूरी नक्काशी का रूप दे देते हैं और रूमाल के बीच में इसे साट देते हैं। किनारे की पट्टियां रेशमी होती हैं जिनमें बहुधा एक ताना पश्मीने का होता है । ये पट्टियां भारी और मजबूत होती हैं। शाल की रफल बहुत बढ़िया पश्मीने की होती है। ये शाल अम्लीकार भी होते हैं। इसके लिए बढ़िया पश्मीने के टुकड़े नकशे के मुताबिक काट लिये जाते हैं और फिर इन पर बेल बूटे काढ़ दिये जाते हैं। अम्लीकार और तीलीकार शालों में इतनी समानता होती है कि इनमें से एक दूसरे को अलग करना कठिन होता है२५ ।

c8.s4.11

२४ गणपति शास्त्री, वही, १, पृ० १६३; शा० शा० पृ० ८६

c8.s4.12

२५ जार्ज वाट, वही, पृ० ३४४-४५

c8.s4.13

(४) तंतुरिच्छिन्न२६—टीकाकार ने इसकी परिभाषा दी है—अनुतविसृष्टैः तंतुभिः

c8.s4.14

मध्ये कृतविच्छेद्यं जालकोपयोगि च—‘बिना बुने किनारे को बांध कर जाली बनाना।' लगता है यहां शाल के जालीदार झालर की ओर संकेत है । जाली अनबुने किनारे को बांध कर बनायी जाती है ।

दस तरह के ऊनी कपड़े

c8.s5.1

इनमें विशेषकर पशुओं के बिछाने के आस्तरणों का उल्लेख है । कंबल, केचलक, वारवाण भी ऊनी होते थे ।

c8.s5.2

१—कंबल२७—कंबल अथवा और तरह के ऊनी कपड़ों के लिए एक साधारण शब्द ।

c8.s5.3

२—केचलक२८—अर्थशास्त्र की टीका में इसे कुचेलक भी पढ़ा गया है। श्री शामा शास्त्री ने कोचपक पाठ ठीक माना है। उनके अनुसार यह वस्त्र ग्वालों का कंबल था। शायद इसकी घोघी बना कर वे पहनते थे । गणपति शास्त्री की टीका में इसका अर्थ वन्य शिरस्त्राण अर्थात् जंगलियों के सिर ढाकने का वस्त्र किया है ।

c8.s5.4

३—कलमितिका२९—इस शब्द के पाठभेद कुलमितिका और कथमितिका भी हैं। गणपति शास्त्री इसका अर्थ गजास्तरण करते हैं । पर इस अर्थ तक वे कैसे पहुंचे यह कहना कठिन है । शायद कुथं और कुलं या कलं में समानता मान लेने से यह भ्रम हुआ हो । अगर यह अर्थ ठीक है तो क(कु)लमितिका का शुद्ध पाठ कुथं होना चाहिए । इस दृष्टि से शामा शास्त्री का दिया हुआ कथमितिका शुद्ध पाठ के बहुत पास है । शायद ठीक पाठ कुथमितिका था जिसके अर्थ होते हैं ठीक नाप वाला गजास्तरण । लेकिन अगर कलं-कुलं पाठ ही ठीक मान लिया जाय तो इस शब्द की समानता फारसी कुलाह से की जा सकती है जिसके अर्थ टोपी होते हैं और इसी अर्थ में शामा शास्त्री द्वारा उल्लिखित टीकाकार ने इस शब्द के अर्थ किये हैं ।

c8.s5.5

२९ ग० शा०, १, पृ० १६३; शा० शा० पृ० ८५, फु० नो० ५

c8.s5.6

४—सोमितिका३०—शामा शास्त्री वाली टीका ने इसे बैल की पीठ पर बिछाने वाला एक आस्तरण माना है, लेकिन गणपति शास्त्री की टीका में इसका अर्थ दिया है 'कृष्णवर्णा गजपर्याणोपर्यास्तरणम्' अर्थात् हाथी के हौदे पर बिछाने वाला आस्तरण ।

c8.s5.7

३० शा० शा०, पृ० ८६, फु० नो० ६; ग० शा०, १, पृ० १६३

c8.s5.8

५—तुरगास्तरण३१—घोड़े की जीन पर बिछाने वाला आस्तरण ।

c8.s5.9

३१ वही, फु० नो० ७

c8.s5.10

६—वर्णक३२—शामा शास्त्री की टीका में इस शब्द का अर्थ रंगीन कंबल दिया हुआ है ।

c8.s5.11

२७-२८ गणपति शास्त्री, वही, १, पृ० १६३

c8.s5.12

३२ वही, फु० नो० ८

c8.s5.13

७—तलिच्छक३३—शामा शास्त्री की टीका में इसका अर्थ कंबल या पलंगपोश दिया हुआ है।

c8.s5.14

३३ वही, फु० नो० ६

c8.s5.15

८—वारवाण३४—शामा शास्त्री की टीका में इसका अर्थ कोट दिया हुआ है।

c8.s5.16

३४ वही, फु० नो० १०

c8.s5.17

९—परिस्तोम३५—शामा शास्त्री की टीका में इसका अर्थ एक बड़ा कंबल है। गणपति शास्त्री की टीका में इस शब्द का विस्तारपूर्वक अर्थ दिया हुआ है। 'कंबलभेदो विस्तारचित्रः यो विस्तृतवदवभासस्ते निर्माणवैचित्र्याद् स इति व्याचक्षते, कुथ इति त्वेके' 'नक्काशीदार बड़ा कंबल, निर्माण वैचित्र्य से बड़ा लगने वाला कंबल, कोई इसे कुथ भी कहता है।' लगता है कि परिस्तोम का व्यवहार झूल के लिए होता था।

c8.s5.18

३५ वही, फु० नो० ११

c8.s5.19

(१०) समंतभद्रक३६—शामा शास्त्री की टीका के अनुसार यह हाथी के पीठ पर डाले जाने वाला कोई आस्तरण विशेष था। गणपति शास्त्री अपनी टीका में इस शब्द का अर्थ करते हैं समंतभद्रकं सन्नाहपट्ट, गजादिघनत्राणं इत्यपरे—'समंतभद्र रुईदार वस्त्र है, दूसरों के अनुसार हाथी की जांघों की रक्षा के लिए एक विशेष वस्त्र'।

c8.s5.20

३६ वही, फु० नो० १२

c8.s5.21

उपरोक्त दस तरह के आस्तरणों को आविक कहा गया है जिससे पता चलता है कि वे भेड़ के ऊन से बनते थे। कौटिल्य के अनुसार अच्छे कंबल चिकने सूक्ष्म और मुलायम होते थे३७।

c8.s5.22

३७ ग० शा०, १, पृ० १६३

नेपाल देश में बने ऊनी कपड़े

c8.s6.1

३८ शा० शा० पृ० ६०; ग० शा० १, पृ० १६३

c8.s6.2

(१) भिंगिसी—यह कंबल आठ टुकड़ों को मिलाकर बनता था (अष्टप्लोति संघात्या)। इसका रंग काला होता था और यह बरसाती (वर्षवारणं) की तरह काम देता था।

c8.s6.3

(२) अपसारक—गणपति शास्त्री की टीका में इसे काण्डपट कहा गया है जिससे पता चलता है कि आधुनिक पट्टी की तरह यह कोई ऊनी कपड़ा रहा हो।

c8.s6.4

जंगली जानवरों के बालों से बने हुए कपड़े३९—यहां पर मृग शब्द से ठीक ठीक क्या तात्पर्य है यह नहीं कहा जा सकता। क्या इसका तात्पर्य हरिन के बालों अथवा ऐसे ही

c8.s6.5

३९ शा० शा० पृ० ६०; ग० शा० १, पृ० १६४

c8.s6.6

और किसी जंगली जानवरों के बालों से हैं? जो भी हो इतना तो निश्चित सा है कि जंगली पशुओं के बाल से अब ऊनी कपड़े नहीं बनते।

पाजामा, चादर गद्दे इत्यादि

c8.s7.1

(१) संपुटिका४०—गणपति शास्त्री की टीका के अनुसार इसके अर्थ होते हैं:—संपुटि-का जंघत्राणं सुत्थणाभिधानमिति क्वचिट्टीकादर्शं लिखितं, सन्थनमित्यन्यत्र लिखितं दृश्यते—'संपुटक जंघों की रक्षा के लिए एक वस्त्र विशेष होता था, कोई कोई टीकाकार इसे सुथना या संथन मानते हैं।' यह ध्यान देने योग्य बात है कि पाजामे के लिए आज दिन भी सुथना (संस्कृत, सूत्रनद्ध) शब्द का प्रयोग होता है।

c8.s7.2

४० —ग० शा०, १, पृ० १६४

c8.s7.3

(२) चतुरशिका४१—गणपति शास्त्री की टीका इसका अर्थ देती है—चतुरश्रिका दशारहिता नवांगुलचिह्नित कोणा—बिना किनारे वाली चादर जिसमें नौ अंगुल नाप के कोनों पर काम किया होता था।

c8.s7.4

(३) लंबरा४२—एक विशेष प्रकार की चादर (प्रच्छदपट विशेष:) ।

c8.s7.5

(४) कटवानक४३—गणपति शास्त्री की टीका के अनुसार इसकी व्याख्या है—कट-वानकं स एवं स्थूलसूत्रो भाव्यक तद्देशीयानां प्रसिद्ध इति स्वामी—कटवानक मोटे सूत से बनी एक चादर है जिसे देशी भाषा में भाव्यक कहते हैं, ऐसा स्वामी नाम के टीकाकार का कथन है'।

c8.s7.6

(५) प्रावरक४४—गणपति शास्त्री की टीका में इस शब्द की व्याख्या है—पूर्वोक्त एवान्यतरतो दशो रोमातंकइति तद्देश प्रसिद्ध इति स्वामी, 'पूर्वोक्त तरह की शायद किनारे वाली चादर, 'स्वामी का कथन है कि देशी में इसे रोमावर्तक कहते थे।'

c8.s7.7

(६) सत्तलिका४५—शामा शास्त्री इसका अर्थ कालीन करते हैं। गणपति शास्त्री के अनुसार इसका अर्थ—तूलिकाख्य आस्तरण विशेषश्च—अर्थात् रूईदार गद्दा है।

दुकूल, क्षौम, पत्रोर्ण, कौशेय तथा सूती कपड़े

c8.s8.1

दुकूल वस्त्र—दुकूल एकजगह वंग देश में पैदा हुई रुई के लिए व्यवहार में आया है४६ गो कि और जगह इसका अर्थ दुकूल वृक्ष की छालों के रेशे से बना वस्त्र है। अर्थशास्त्र से हमें दुकूल के बारे में निम्नलिखित बातों का पता चलता है४७ ।

c8.s8.2

४१-४५ —ग० शा०, १, पृ० १६४

c8.s8.3

४६ —आचारांग सूत्र, १, ७, ५, १—टीकाकार कहता है गौडविषय विशिष्टकार्पासिक

c8.s8.4

४७ —ग० शा०, १, पृ० १६४ ४८—आधुनिक महास्थान से प्राचीन पौण्ड्रवर्धन की समानता मानी जाती है एपि० इंडि० २१, पृ० ८८ ४६—सुवर्णकुड्या की पहचान सिल्वां लेव' चीनी किन-लिन से करते हैं जो कंबुज में दो हजार ली दूरी पर एक खाड़ी पर स्थित था । इस तरह यह देश मलयद्व.प पुंज में पड़ता है, एतूद आशियातीक, भा० २, पृ० ३६ । ५०-५२—अ० शा०, १, पृ० १६५

c8.s8.5

दुकूल से कपड़ा बंगाल में बनता था (वाङ्गक॑) । यह वस्त्र सफेद और मुलायम होता था । पौण्ड्रदेश४८ में बने दुकूल वस्त्र नीले और चिकने होते थे और सुवर्णकुड्य। ४९ में बने दुकूल ललाई लिए होते थे । निम्नलिखित तरीकों से दुकूल बिना जाता था—

c8.s8.6

१. मणिस्रिग्धोदकवान—पहले सूत में (साधनद्रव्यं) नमी देकर फिर उसपर घोंटे (?) से पालिश करते थे और इसके बाद बुनते थे ।

c8.s8.7

२. चतुरस्रकवान—इसकी बुनावट बराबर होती और कपड़ा बिना किसी रंग के होता था ।

c8.s8.8

३. व्यामिश्रवान—सूत और रेशम मिलाकर बुना दुकूल । इस शब्द की दूसरी व्याख्या के अनुसार यह कपड़ा रंग बिरंगे सूत से बुना जाता था (वर्णान्तरासंसृष्ट) ।

c8.s8.9

बुनावट के अनुसार कपड़ों के निम्नलिखित भेद होते थे—

c8.s8.10

(१) एकांशुक—गणपति शास्त्री के अनुसार इसके ताने बाने में एक तार लगता था ।

c8.s8.11

(२) अध्यर्धाशुक—इसमें ताना एक तार का होता था और बाना दो तारों का । बिनावट उलटी भी जा सकती थी ।

c8.s8.12

(३) द्वयंशुक—इसमें ताना बाना दो तार के होते थे (द्विगुणतन्यते द्विगुणमूयते) ।

c8.s8.13

(४) त्र्यंशुक—ताने बाने में तीन तार लगते थे ।

c8.s8.14

क्षोम५०—काशी और पुंडू क्षोम के लिए प्रसिद्ध थे। गणपति शास्त्री की टीका के अनुसार दुकूल की तरह क्षौम की किस्में होती थीं पर टीकाकार की यह बात ठीक नहीं है कि क्षौम दुकूल का ही एक बहुत घटिया रूप था ।

c8.s8.15

पत्रोर्ण५१—पत्रोर्ण से बने वस्त्रों के नाम भिन्न भिन्न देशों के नाम पर जहां वे बनते थे अवलंबित हैं। मगध में बना कपड़ा मागधिका पुंडु में बना पौंड्रर्क और सुवर्णकुड्या में बना सौवर्णकुड्यका कहलाता था । पत्रोर्ण नाग, लिकुच, बकुल और वट वृक्षों की छालों से निकले रेशे से बनता था । नाग वृक्ष से बने पत्रोर्ण का कपड़ा पीला होता था, लकुच का गेहुएं रंग का, बकुल का सफेद रंग का तथा दूसरे वृक्षों के रेशों से बना कपड़ा मक्खन के रंग का होता था। इन सब में सुवर्णकुड्या में बना पत्रोर्ण सब से अधिक अच्छा होता था ।

c8.s8.16

रेशमी कपड़े५२—अर्थशास्त्र में दो तरह के रेशमी कपड़ों का वर्णन है यथा—

c8.s8.17

१—कौशेय—टीका के अनुसार कोशकार देश में पैदा हुए रेशम से बना वस्त्र।

c8.s8.18

२—चीनपट्ट—चीन देश में बना रेशमी कपड़ा। टीका के अनुसार रेशमी कपड़ों के रंग पत्रोर्ण से बने कपड़ों के रंग जैसे होते थे।

c8.s8.19

सूती वस्त्र५३—अर्थशास्त्र में निम्नलिखित प्रकार के सूती वस्त्रों का उल्लेख है। इन सूती कपड़ों के नाम भिन्न भिन्न देशों के नाम पर जहां वे बुने जाते थे पड़े।

c8.s8.20

५३ —वही

c8.s8.21

(१) माधुर—टीका का कहना है कि यह कपड़ा पांड्यों की राजधानी मधुरा (आधुनिक मदुरा) में बनता था।

c8.s8.22

(२) आपरांतक—आधुनिक कोंकण का बना कपड़ा।

c8.s8.23

(३) कलिंगक—कलिंग देश में बना कपड़ा। तामिल साहित्य से भी पता चलता है कि कलिंग के नाग बुनकर बहुत अच्छा कपड़ा बनाते थे ।

c8.s8.24

(४) काशिक—काशि जनपद में बना सूती कपड़ा। जातकों और बौद्ध साहित्य में काशिकवस्त्र के बहुत से उल्लेख आये हैं लेकिन प्रायः सब अनुवादकों ने इसे रेशमी वस्त्र माना है । अर्थशास्त्र से यह बात निश्चित हो जाती है कि काशी अपने क्षोम और सूती वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध थी न कि रेशमी वस्त्रों के लिए ।

c8.s8.25

(५) वांगक—पूर्वी बंगाल में बना सूती कपड़ा। अर्थशास्त्र से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि पूर्वी बंगाल में दुकूल और कपास दोनों से कपड़े बनते थे ।

c8.s8.26

(६) वात्सक—वत्सदेश (इलाहाबाद के आसपास) का बना सूती कपड़ा।

c8.s8.27

(७) माहिषक५४—महिषदेश का बना सूती कपड़ा। टीकाकार के अनुसार माहिषक कुंतल देश की राजधानी थी ।

c8.s8.28

५४ —वही, नर्मदा के किनारे महेसर से माहिषक की पहचान की जाती है।

वस्त्रों के संबंध में कोषाध्यक्ष के कर्तव्य तथा राजकीय कारखाने

c8.s9.1

सब तरह के नमदों, समूरों, ऊनी, सूती, रेशमी और रेशों से बने कपड़ों के वर्णन के बाद कौटिल्य कोषाध्यक्ष के, जिसके अधिकार में कपड़े रहते थे, कर्तव्यों पर प्रकाश डालता हूं। कौटिल्य के अनुसार कोषाध्यक्ष को भिन्न भिन्न ऋतुओं और अवसरों पर पहने जाने वाले (देशकालपरिभोग) कपड़ों का तथा कीड़े मकोड़ों और चूहों से उनकी रक्षा का ज्ञान होना आवश्यक था ।५५

c8.s9.2

५५ —म० शा०, १, पृ० १६६

c8.s9.3

हम ऊपर देख आये हैं कि इस देश के भिन्न भिन्न भागों में कौन कौन से कपड़े मौर्य काल में बनते थे । इन कपड़ों के सिवाय राज्य का निज का बुनने का कारखाना सूत्राध्यक्ष के जिम्मे होता था । वह कारखाने में अच्छे सूत कातने वाले, वर्म बनाने वाले, कपड़े और रस्सियां बनाने वाले कारीगर रखता था । विधवाएं, अपाहिज, लड़कियां, भिखमंगिनें, वृद्धा वेश्याएं, जुर्माना अदा करने के लिए काम करती हुई स्त्रियां, वृद्धा राजपरिचारिकाएं, तथा देवदासियां ऊन, वल्क, कपास, तूल, सन और क्षोम कातने के लिए रक्खी जाती थीं५६।

c8.s9.4

५६ ग० शा०, १, पृ० २७६; शा० शा० पृ० १३६

c8.s9.5

कातने वालों का पारिश्रमिक उनके सूत की अच्छाई पर निर्भर होता था । जो कारीगर महीन सूत अच्छी तायदाद में कात सकते थे उन्हें तेल, हर्रें की टिकियां और अंजन आंख और दिमाग को तर रखने के लिए तथा दूसरों में काम करने के उत्साह को बढ़ाने के लिए दी जाती थीं । छुट्टी के दिनों में काम करने वाले कतकों को विशेष पारिश्रमिक मिलता था साथ ही साथ अच्छे साधन होते हुए भी उपयुक्त परिमाण में सूत न कातने वाले को पारिश्रमिक काट कर दंड भी दिया जाता था५७।

c8.s9.6

५७ ग० शा०, १, पृ० २७९; शा० शा० पृ० १३६

c8.s9.7

राज्य के कारखाने बुनकरों के अलावा कपड़ा बुनने का काम और दूसरे बुनकरों को भी ठीके पर (कृतकर्मप्रमाण) नियत पारिश्रमिक (कालवेतन) और कारीगरी के अनुसार (फलनिष्पत्तिभिः) दिया जाता था । कारीगरों के हस्तलाघव से अवगत होने के लिए अर्थशास्त्र में उनसे मित्रता बढ़ाने का भी आदेश है५८।

c8.s9.8

५८ वही

c8.s9.9

सुगंधित द्रव्य, मालाएं तथा और बहुत से उपहार उत्साह बढ़ाने के लिए क्षौम, दुकूल, रेशम (कृमितान) पश्मीना (रांकवः) और सूती कपड़े बिनने वालों को दे दिये जाते थे५९ ।

c8.s9.10

५९ ग० शा०, १,पृ० २८०, शा० शा०, पृ० १३५

c8.s9.11

बुनाई के कारखाने में कपड़े, आस्तरण तथा परदे (प्रावरण) भी बनते थे६० ।

c8.s9.12

६० वही

c8.s9.13

सूती जिरह बस्तर (कंकट) बनाने का काम चतुर कारीगरों के सुपुर्द किया जाता था६१। जो जन घर से बाहर निकलने में असमर्थ होते थे यथा प्रोषित विधवा (जिस स्त्री का

c8.s9.14

६१ वही

c8.s9.15

पति विदेश गया हो), अपाहिज तथा वे लड़कियां जिन्हें स्वयं अपनी जीविका उपार्जित करनी पड़ती थी उन्हें कताई का काम उनके घर पर ही देने का प्रबंध था६२।

c8.s9.16

६२ वही

c8.s9.17

जो स्त्रियां प्रातःकाल सूत्रशाला में सूत लेकर हाजिर होती थीं उन्हें कताई की मजदूरी मिल जाती थी। इस आदान-प्रदान को भांडवेतनविनिमय कहते थे। सूत्रशाला में, उस समय केवल इतनी ही रोशनी होती थी जिससे सूत्राध्यक्ष सूत देख सके। स्त्रियों के देखने या बात करने पर सूत्राध्यक्ष दंड का अधिकारी होता था। काम की मजदूरी न देने पर अथवा अघबने काम की मजदूरी देने पर भी सूत्राध्यक्ष दंड का भागी होता था।६३ कारखाने म काम न करने वालों को गहरा दंड दिया जाता था। जो स्त्रियां मजदूरी लेकर भी काम नहीं करती थीं उनके अंगूठे काट दिये जाते थे। माल-मसाला लेकर भाग जाने वालों को भी यही दंड मिलता था६४। अपराध के छुटाई बड़ाई के अनुपात में बुनकरों की मजदूरो जुर्माने के रूप में काट ली जाती थी६५।

c8.s9.18

६३ शा० शा० १, पृ० २८०-८१

c8.s9.19

शुल्काध्यक्ष के कर्तव्यों के वर्णन के प्रसंग में हमें उन वस्त्रों का उल्लेख मिलता है जिन पर मौर्ययुग में चुंगी लगती थी। ये वस्त्र क्षौम, दुकूल और रेशम के बने होते थे। इनके सिवाय दुकूल, क्षौम, आस्तरण, प्रावरण, रेशम (कृमिजात), ऊनी कंबल और परमीना बनाने के साधनों पर भी उनके मूल्य की १/१० से लेकर १/१५ तक चुंगी लगती थी६६।

c8.s9.20

वस्त्र, सूत, बल्कल, चमड़ा और कपास पर चुंगी उनके मूल्य की १/२० से १/२५ तक होती थी६७।

c8.s9.21

कपड़े रंगने के लिए रंग किंशुक, कुसुंभ और कुंकुम से बनते थे। गणपति शास्त्री की टीका में इन पुष्पों को वस्त्रादिरंजनसाधन कहा है।६८

c8.s9.22

६८ ग० शा० १, पृ० २४७

विदेशों से आने वाले कपड़े

c8.s10.1

हम ऊपर कह आए हैं कि मौर्य काल में भारतवर्ष में वस्त्रों के नाम उनके प्राप्ति स्थान पर भी पड़ जाते थे। पर कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इस बात का कम उल्लेख है कि भारतवर्ष की आधुनिक सीमा के बाहर से यहाँ कौन से कपड़े आते थे। महाभारत के सभा पर्व से इस प्रश्न पर काफी प्रकाश पड़ता है। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के अवसर पर

c8.s10.2

६४-६५ ग० शा० १, पृ० २८१; शा० शा०, पृ० १३६

c8.s10.3

६६-६७ ग० शा० १, पृ० २७६-२७७, शा० शा० पृ० १३५

c8.s10.4

भारतवर्ष के अनेक गणतंत्र और राजे तथा उसके सीमा पर बसने वाली जातियां उपहार लेकर आयीं। इन उपायनों में उन प्रदेशों के बने वस्त्र भी थे जिनसे पता चलता है कि ई० पू० भारत में विदेशों से अच्छे से अच्छे कपड़े आते थे और भारत, चीन और अफगानिस्तान का व्यापारिक संबंध बहुत प्राचीन काल से चला आ रहा है। अब हमें देखना चाहिए कि किन किन देशों से यहां वस्त्र आते थे।

कंबोज देश के कपड़े

c8.s11.1

प्राचीन कंबोज की पहचान सोवियट रूस में स्थित ताजिकिस्तान से की जाती है। यहां से भेड़ के ऊन और लोमड़ी के रोएं से बने और सुनहले काम किये हुए वस्त्र (ऐडांश्चैलान् वाय्र्पदंशानूजातारूपपरिष्कृतान्) ६९, ऊनी चादरें और चमड़े (प्रावाराजिनमुख्यांश्च) ७० बेशकीमती दुशाले (पराध्यनपिंकंबलान्) ७१ और कदलीभृग की खालें ७२ (कदली मृगमोकानि), राजसूय यज्ञ में आयीं। कदलीमृग का उल्लेख कौटिल्य ने किया है।

c8.s11.2

परिसिंधु देश के कपड़े—बलूचिस्तान के बाशिंदे राजसूय में अपने देश से कंबल और बकरे और भेड़ों की खालें लाये ७३ ।

c8.s11.3

७३ सभापर्व, ४७, ११

वाह्लीक और चीन के बने वस्त्र

c8.s12.1

७४ सभापर्व, ४७, २२

c8.s12.2

ये वस्त्र ठीक नाप के, खुशनुमा रंग वाले और स्पर्श करने में मुलायम होते थे (प्रमाण रागस्पर्शाढ्यं)। उपरोक्त देशों से भेड़ के ऊन, पश्म (रांकव), रेशम (कीटज) और पट्ट (पट्टज) के बने कपड़े भी आये। यहां रांकव शब्द की व्याख्या आवश्यक है। कोशों में ७५ रंकु का अर्थ एक पशु विशेष मिलता है। लेकिन यह पशु कहां होता था इस संबंध की जानकारी कोशकारों को नहीं थी। खोज करने से पता चलता है 'रंकु' पामीर पर रहने वाले रंग नामके बकरे का संस्कृत रूप है। इसके पश्म से बहुत ही अच्छी चादरें बनती हैं ७६। महाभारत ७७ के एक और उल्लेख से पता चलता है रंकु के पश्म से नमदे भी (रांकवकट) बनते थे।

c8.s12.3

७५ अमरकोश, २, ६, १११

c8.s12.4

७६ वुड, ए जर्नी टुदी सोर्स ऑफ आक्सस, इंट्रोडक्शन, पृ० ५७, न्यू एडिशन १८७२

c8.s12.5

७७ महाभारत, ३, २२५, ६

चीन के बने रेशमी कपड़े

c8.s13.1

इस काल में भारतीय चीनी रेशम के वस्त्र से भी अवगत हो चुके थे। इतने प्राचीन

c8.s13.2

६९-७० सभापर्व, ४७, ३

c8.s13.3

७१-७२ सभापर्व, ४५, १६

c8.s13.4

काल में चीन के रेशमी कपड़े भारत में आने से हमें आश्चर्य न होना चाहिए। मध्य एशिया के प्राचीन पथ पर बने हुए एक चीनी रक्षागृह से मिला हुआ एक रेशमी थान जिस पर ई० पू० पहली शताब्दी की ब्राह्मी में एक पुरजा लगा हुआ था इस बात का द्योतक है कि चीनी रेशमी कपड़े की खोज में भारतीय व्यापारी चीन की सीमा तक इतने प्राचीन काल में पहुंच चुके थे७८।

c8.s13.5

७८ —सर ऑरल स्टाइन, एशिया मेजर, हर्ष एनिवर्सरी वांलुम १६२३, पृ० ३६७-३७२

मध्य एशिया और अफगानिस्तान के दूसरे कपड़े

c8.s14.1

उपरोक्त देशों से उपायानरूप में नमदे (कुट्टीकृत)७९, कमल के रंग के हजारो ऊनी कपड़े, मुलायम रेशमी कपड़े तथा मेमनों की खालें भी आयीं। आज दिन भी पूर्वी अफगानिस्तान की मेमनों की खालें मशहूर हैं। चीनी चमड़े और समूरों की ख्याति ईसा की पहिली शताब्दी तक थी। पेरिप्लस८० के अनुसार सिंध नदीपर बार्बरिकन नाम के बंदरगाह से चीनी चमड़े और समूर बाहर भेजे जाते थे। प्लिनी८१ के अनुसार चीन के रंगीन चमड़े काफी कीमती होते थे ओर आराइश के काम में इनका काफी उपयोग होता था। कंबलों का रंग कमल जैसा कहने से प्रतीत होता है कि लेखक का संकेत शायद ऊपरी स्वात के बने कंबलों से है। महावणिज-जातक में८२ उड्डीयान के बने कंबल काफी कीमती माने गये है। आज दिन भी तोरवाल में ठोक कर बिने चटक रंग कंबल सीमाप्रान्त और पंजाब में स्वाती कंबल नाम से मशहूर हैं८३

c8.s14.2

७९ —सभापर्व, ४७, २३

c8.s14.3

८० —शोफ, दि पेरिप्लस ऑफ दि एरीथ्रियन सी, ३६, ६

c8.s14.4

८१ —प्लिनी, नेचुरल हिस्ट्री, १२, ३१; ३४, १४५

c8.s14.5

८२ —जातक (४६३), ४, पृ० ३५२

c8.s14.6

८३ —स्टाइन, ऑन अलक्जेंडर्स ट्रैक ट इंडस, पृ० ८६

वंग, कलिंग, ताम्रलिप्ति और पुंड्र

c8.s15.1

दुकूल८४—शायद रोमन लेखकों का बाइसस ही दुकूल था८५।

c8.s15.2

८४ —महाभारत, २।४८।१७

c8.s15.3

८५ —वार्मिगटन, कामर्स बिटवीन इंडिया एंड रोमन एंपायर, पृ० २१२

c8.s15.4

कौशिक८६—ऐसा पता चलता है कि बहुत प्राचीन काल में भी बंगाल में रेशम पैदा होने लग गया था। रामायण८७ (कश्मीरी पाठ) में कोशकार देश का उल्लेख है। टीकाकार

c8.s15.5

८६ —महाभारत, २।४८।१७

c8.s15.6

८७ —सिल्वं लेवी, जून लि असिआतीक, जनवरी-फरवरी, १६१८, पृ० २१२

c8.s15.7

राम के मत से इस देश का नाम इसलिए पड़ा कि वहां रेशम के कोश काफी तादाद में पैदा होते थे। किष्किंधाकांड के बंगाली पाठ के अनुसार कोशकार देश लौहित्य नदी (ब्रह्मपुत्र) के बाद पड़ता है और इसलिए इस बात की पूरी संभावना है कि कोशकार देश कहीं पूर्वी बंगाल या आसाम में था।

c8.s15.8

पत्रोर्ण८८—कोश में इस शब्द का अर्थ रेशमी या सूती कपड़ा दिया हुआ है। अगर पत्रोर्ण का अर्थ सूती कपड़ा ठीक है तो पेरिप्लस का यह कथन ठीक है कि पहली सदी में गंजेटिक नाम की सब से अच्छी मलमल ढाका के आसपास बनती थी८९। पर इसमें शक है कि पत्रोर्ण सूती कपड़ा था।

c8.s15.9

८८ वही,

c8.s15.10

८९ शोफ, वही, पृ० ४६

c8.s15.11

कलिंग देश के नाग बुनकर अपने बढ़िया कपड़ों के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी ख्याति इतनी बढ़ी हुई थी कि तामिल में कलिंग शब्द कपड़े का पर्यायवाची बन गया९०।

c8.s15.12

९० कनकसभाई, दि तामिल्स एट्टीन हंड्रेड इयर्स एगो, पृ० ४५

c8.s15.13

प्रावर९१—इस शब्द का प्रयोग दुपट्टे अथवा चादर के अर्थ में होता था। सांची के एक लेख९२ से ऐसा पता चलता है कि दुपट्टे बेचने वालों का (पारिवारिक) अपना स्वतंत्र व्यवसाय होता था।

c8.s15.14

९१ महाभारत, २।४८।१७

c8.s15.15

९२ मार्शल, सांची, १, पृ० ३१३

यूनानी लेखकों के अनुसार भारतीय वेश-भूषा

c8.s16.1

हम अनेक प्रकार के वस्त्रों का वर्णन अर्थशास्त्र के आधार पर कर आये हैं, पर उस समय की वेश-भूषा क्या थी इसका उल्लेख हमें यूनानी ऐतिहासिकों से मिलता है। एरियन९३ का कहना है कि भारतवासी सूती कपड़े पहनते थे और उनकी धोती आधे पैर तक पहुंचती थी। उनके सिर पर पड़ी चादर उनके कंधों को ढकती थी। स्ट्राबो९४ के अनुसार भारतीय क्षोम और कपास के बने सफेद कपड़े पहनते थे। भारतीयों के वस्त्र हमेशा सादे नहीं होते थे इसका पता स्ट्राबो के एक दूसरे उल्लेख से, जिसमें कहा गया है कि भारतीयों के वस्त्र सुनहरे काम वाले और रत्नजटित भी होते थे, लगता है।

c8.s16.2

९३ इंडिका, १६

c8.s16.3

९४ जियोम्राफ़ी, १५।१।७१

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