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Viyahapannatti 12.2: Uddeśaka 2: jayaṃti

Viyāhapannatti: Hindi translation (Dīparatnasāgara, 2019) 12.2

Language
Hindi

Uddeśaka 2: jayaṃti

12.2.534

उस काल और उस समय में कौशाम्बी नगरी थी। चन्द्रवतरण उद्यान था। उस कौशाम्बी नगरी में सहस्त्रा – नीक राजा का पौत्र, शतानीक राजा का पुत्र, चेटक राजा का दौहित्र, मृगावती देवी का आत्मज और जयन्ती श्रमणोपासिका का भतीजा ‘उदयन’ नामक राजा था। उसी कौशाम्बी नगरी में सहस्रानीक राजा की पुत्रवधू, शतानीक राजा की पत्नी, चेटक राजा की पुत्री, उदयन राजा की माता, जयन्ती श्रमणोपासिका की भौजाई, मृगावती नामक देवी (रानी) थी। वह सुकुमाल हाथ – पैर वाली, यावत्‌ सुरूपा, श्रमणोपासिका यावत्‌ विचरण करती थी। उसी कौशाम्बी नगरी में सहस्त्रानीक राजा की पुत्री, शतानीक राजा की भगिनी, उदयन राजा की बूआ, मृगावती देवी की ननद और वैशालिक के श्रावक आर्हतों की पूर्व शय्यातरा ‘जयन्ती’ नाम की श्रमणोपासिका थी। वह सुकुमाल यावत्‌ सुरूपा और जीवाजीवादि तत्त्वों की ज्ञाता यावत्‌ विचरती थी।

12.2.535

उस काल उस समय में महावीर स्वामी (कौशाम्बी) पधारे, यावत्‌ परीषद्‌ पर्युपासना करने लगी। उस समय उदायन राजा को जब यह पता लगा तो वह हर्षित और सन्तुष्ट हुआ। उसने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया और उनसे इस प्रकार कहा – ‘देवानुप्रियो ! कौशाम्बी नगरी को भीतर और बाहर से शीघ्र ही साफ करवाओ; इत्यादि सब वर्णन कोणिक राजा के समान यावत्‌ पर्युपासना करने लगा।
तदनन्तर वह जयन्ती श्रमणोपासिका भी इस समाचार को सूनकर हर्षित एवं सन्तुष्ट हुई और मृगावती के पास आकर इस प्रकार बोली – (इत्यादि आगे का सब कथन), नौवें शतक में ऋषभदत्त ब्राह्मण के प्रकरण के समान, यावत्‌ – (हमारे लिए इह भव, परभव और दोनों भवों के लिए कल्याणप्रद और श्रेयस्कर) होगा; तक जानना चाहिए। तत्पश्चात्‌ उस मृगावती देवी ने भी जयन्ती श्रमणोपासिका के वचन उसी प्रकार स्वीकार किए, जिस प्रकार देवानन्दा ने (ऋषभदत्त के वचन) यावत्‌ स्वीकार किये थे। तत्पश्चात्‌ उस मृगावती देवी ने कौटुम्बिक पुरुषों को बुलाया और उनसे इस प्रकार कहा – देवानुप्रियो ! जिसमें वेगवान घोड़े जुते हुए हों, ऐसा यावत्‌ श्रेष्ठ धार्मिक रथ जोतकर शीघ्र ही उपस्थित करो। कौटुम्बिक पुरुषों ने यावत्‌ रथ लाकर उपस्थित किया और यावत्‌ उनकी आज्ञा वापिस सौंपी।
इसके बाद उस मृगावती देवी और जयन्ती श्रमणोपासिका ने स्नानादि किया यावत्‌ शरीर को अलंकृत किया फिर कुब्जा दासियों के साथ वे दोनों अन्तःपुर से नीकलीं। फिर वे दोनों बाहरी उपस्थानशाला में आई और जहाँ धार्मिक श्रेष्ठ यान था, उसके पास आकर यावत्‌ रथारूढ़ हुई। तब जयन्ती श्रमणोपासिका के साथ श्रेष्ठ धार्मिक यान पर आरूढ़ मृगावती देवी अपने परिवार सहित, यावत्‌ धार्मिक श्रेष्ठ यान से नीचे ऊतरी, तक कहना चाहिए। तत्पश्चात्‌ जयन्ती श्रमणोपासिका एवं बहुत – सी कुब्जा दासियों सहित मृगावती देवी श्रमण भगवान महावीर की सेवा में देवानन्दा के समान पहुँची, यावत्‌ भगवान को वन्दना – नमस्कार किया और उदयन राजा को आगे करके समवसरण में बैठी और उसके पीछे स्थित होकर पर्युपासना करने लगी।
तदनन्तर श्रमण भगवान महावीर ने उदयन राजा, मृगावती देवी, जयन्ती श्रमणोपासिका और उस महत्ती महापरीषद्‌ को यावत्‌ धर्मोपदेश दिया, यावत्‌ परीषद्‌ लौट गई, उदयन राजा और मृगावती रानी भी चले गए।

12.2.536

वह जयन्ती श्रमणोपासिका श्रमण भगवान महावीर से धर्मोपदेश श्रवण कर एवं अवधारण करके हर्षित एवं सन्तुष्ट हुई। फिर भगवान महावीर को वन्दन – नमस्कार करके पूछा – भगवन्‌ ! जीव किस कारण से शीघ्र गुरुत्व को प्राप्त होते हैं ? जयन्ती ! जीव प्राणातिपात से लेकर मिथ्यादर्शनशल्य तक अठारह पापस्थानों के सेवन से शीघ्र गुरुत्व को प्राप्त होते हैं, (इत्यादि) प्रथम शतक अनुसार, यावत्‌ संसारसमुद्र से पार हो जाते हैं।
भगवन्‌ ! जीवों का भवसिद्धिकत्व स्वाभाविक है या पारिणामिक है ? जयन्ती ! वह स्वाभाविक है, पारिणामिक नहीं। भगवन्‌ ! क्या सभी भवसिद्धिक जीव सिद्ध हो जाएंगे ? हाँ, जयन्ती ! हो जाएंगे। भगवन्‌ ! यदि भवसिद्धिक जीव सिद्ध हो जाएंगे, तो क्या लोक भवसिद्धिक जीवों से रहित हो जाएगा ? जयन्ती ! यह अर्थ शक्य नहीं है। भगवन्‌ ! किस कारण से ऐसा कहा जाता है ? जयन्ती ! जिस प्रकार कोई सर्वाकाश श्रेणी हो, जो अनादि, अनन्त हो, परित्त और परिवृत हो, उसमें से प्रतिसमय एक – एक परमाणु – पुद्‌गल जितना खण्ड निकालते – निकालते अनन्त उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी तक निकाला जाए तो भी वह श्रेणी खाली नहीं होती। इसी प्रकार, हे जयन्ती ! ऐसा कहा जाता है कि सब भवसिद्धिक जीव सिद्ध होंगे, किन्तु लोक भवसिद्धिक जीवों से रहित नहीं होगा।
भगवन्‌ ! जीवों का सुप्त रहना अच्छा है या जागृत रहना अच्छा ? जयन्ती ! कुछ जीवों का सुप्त रहना अच्छा है और कुछ जीवों का जागृत रहना अच्छा है। भगवन्‌ ! ऐसा किस कारण कहते हैं ? जयन्ती ! जो ये अधार्मिक, अधर्मानुसरणकर्ता, अधर्मिष्ठ, अधर्म का कथन करने वाले, अधर्मावलोकनकर्ता, अधर्म में आसक्त, अधर्माचरणकर्ता और अधर्म से ही आजीविका करने वाले जीव हैं, उन जीवों का सुप्त रहना अच्छा है, क्योंकि वे जीव सुप्त रहते हैं, तो अनेक प्राणों, भूतों, जीवों और सत्त्वों को दुःख, शोक और परिताप देने में प्रवृत्त नहीं होते। ये जीव सोये रहते हैं तो अपने को, दूसरे को और स्व – पर को अनेक अधार्मिक संयोजनाओं में नहीं फँसाते। ‘जयन्ती ! जो ये धार्मिक हैं, धर्मानुसारी, धर्मप्रिय, धर्म का कथन करने वाले, धर्म के अवलोकनकर्ता, धर्मासक्त, धर्माचरणी, और धर्म से ही अपनी आजीविका करने वाले जीव हैं, उन जीवों का जाग्रत रहना अच्छा है, क्योंकि ये जीव जाग्रत हों तो बहुत से प्राणों, भूतों, जीवों और सत्त्वों को दुःख, शोक और परिताप देने में प्रवृत्त नहीं होते। ऐसे (धर्मिष्ठ) जीव जागृत रहते हुए स्वयं को, दूसरे को और स्व – पर को अनेक धार्मिक संयोजनाओं में संयोजित करते रहते हैं। इसलिए इन जीवों का जागृत रहना अच्छा है। इसी कारण से, हे जयन्ती ! ऐसा कहा जाता है कि कईं जीवों का सुप्त रहना अच्छा है और कईं जीवों का जागृत रहना अच्छा है।
भगवन्‌ ! जीवों की सबलता अच्छी है या दुर्बलता ? जयन्ती ! कईं जीवों की सबलता अच्छी है और कईं जीवों की दुर्बलता अच्छी है। भगवन्‌ ! जयन्ती ! जो जीव अधार्मिक यावत्‌ अधर्म से ही आजीविका करते हैं, उन जीवों की दुर्बलता अच्छी है। क्योंकि ये जीव दुर्बल होने से किसी प्राण, भूत, जीव और सत्त्व को दुःख आदि नहीं पहुँचा सकते, इत्यादि सुप्त के समान दुर्बलता का भी कथन करना। और ‘जाग्रत’ के समान सबलता का कथन करना चाहिए। यावत्‌ धार्मिक संयोजनाओं में संयोजित करते हैं, इसलिए इन जीवों की सबलता अच्छी है। हे जयन्ती ! इसी कारण से ऐसा कहा जाता है कि कईं जीवों की सबलता अच्छी है और कईं जीवों की निर्बलता।
भगवन्‌ ! जीवों का दक्षत्व (उद्यमीपन) अच्छा है, या आलसीपन ? जयन्ती ! कुछ जीवों का दक्षत्व अच्छा है और कुछ जीवों का आलसीपन अच्छा है। भगवन्‌ ! ऐसा किस कारण से कहा जाता है ? जयन्ती ! जो जीव अधार्मिक यावत्‌ अधर्म द्वारा आजीविका करते हैं, उन जीवों का आलसीपन अच्छा है। यदि वे आलसी होंगे तो प्राणों, भूतों, जीवों और सत्त्वों को दुःख, शोक और परिताप उत्पन्न करने में प्रवृत्त नहीं होंगे, इत्यादि सब सुप्त के समान कहना तथा दक्षता का कथन जाग्रत के समान कहना, यावत्‌ वे स्व, पर और उभय को धर्म के साथ संयोजित करने वाले होते हैं। ये जीव दक्ष हों तो आचार्य की वैयावृत्य, उपाध्याय की वैयावृत्य, स्थविरों की वैया – वृत्य, तपस्वीयों की वैयावृत्य, ग्लान की वैयावृत्य, शैक्ष की वैयावृत्य, कुलवैयावृत्य, गणवैयावृत्य, संघवैयावृत्य और साधर्मिकवैयावृत्य से अपने आपको संयोजित करने वाले होते हैं। हे जयन्ती ! इसी कारण से ऐसा कहा जाता है कि कुछ जीवों का दक्षत्व अच्छा है और कुछ जीवों का आलसीपन अच्छा है।
भगवन्‌ ! श्रोत्रेन्द्रिय के वश – आर्त्त बना हुआ जीव क्या बाँधता है ? इत्यादि प्रश्न। जयन्ती ! जिस प्रकार क्रोध के वश – आर्त्त बने हुए जीव के विषय में कहा गया है, उसी प्रकार यावत्‌ वह संसार में बार – बार पर्यटन करता है, (यहाँ तक कहना)। इसी प्रकार चक्षुरिन्द्रिय – वशार्त्त बने हुए जीव के विषय में भी कहना। इसी प्रकार यावत्‌ स्पर्शेन्द्रिय – वशार्त्त बने हुए जीव के विषय में कहना। तदनन्तर वह जयन्ती श्रमणोपासिका, श्रमण भगवान महावीर से यह अर्थ सूनकर एवं हृदय में अवधारण करके हर्षित और सन्तुष्ट हुई, इत्यादि शेष समस्त वर्णन देवानन्दा के समान है, यावत्‌ जयन्ती श्रमणोपासिका प्रव्रजित हुई यावत्‌ सर्व दुःखों से रहित हुई। हे भगवन्‌ ! यह इसी प्रकार है, यह इसी प्रकार है

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