भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31.s8: ८-शक संवत्
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31.s8
- Language
- Hindi
८-शक संवत्
c31.s8.1
शक संवत् के प्रारंभ के विषय में ऐसी प्रसिद्धि है कि दक्षिण के प्रतिष्ठानपुर (पैठण) के राजा शालिवाहन (सातवाहन, हाल) ने यह संवत् चलाया. कोई इसका प्रारंभ शालिवाहन के जन्म से२ मानते हैं. जिनप्रभसूरि अपने 'कल्पप्रदीप'३ नामक पुस्तक में लिखता है कि प्रतिष्ठानपुर (पैठण) में रहनेवाले एक विदेशी ब्राह्मण की विधवा बहिन से सातवाहन (शालिवाहन) नामक पुत्र उत्पन्न हुआ. उसने उज्जैन के राजा विक्रम को परास्त किया. जिसके पीछे उसने प्रतिष्ठानपुर का राजा बन कर तापी नदी तक का देश अपने अधीन किया और वहां पर अपना संवत् प्रचलित किया४.
c31.s8.2
२ त्र्यंकेन्द्र (१४६३) प्रमिते वर्षे शालिवाहनजन्मतः । क्लस्तस्तपसि मार्त्तंडोऽधमलं जयतुद्रुतः (मुहूर्त्तमार्तंड, अलंकार, श्लोक ३).
c31.s8.3
३ यह पुस्तक ई. स. १३०० के आस पास बना था.
c31.s8.4
४ ज. ए. सो. बंब; जि. १०, पृ. १३२-३३.
* गगन पाणि पुनि द्वीप ससि (१७२०) हिम रुत मंगसर मास । शुक्ल पक्ष तेरस दिने बुध वासर दिन जाम ॥ २६६ ॥ मरदानो अरु महा बली अवरंग शाह नरिंद । तासु राज महिं हरखसूं रच्यो शास्त्र आनंद ॥ २६७ ॥ (पद्मराग के शिष्य रामचंद्र रचित 'रामविनोद' नामक पुस्तक).
c31.s8.5
अलवेरूनी लिखता है कि ‘विक्रमादित्य ने शक राजा को परास्त कर यह संवत् चलाया’१. इस प्रकार इसके प्रचलित किये जाने के विषय में भिन्न भिन्न मत हैं.
c31.s8.6
पहिले पहिल यह संवत् काठियावाड़ तथा कच्छ से मिले हुए पश्चिमी क्षत्रपों के [शक] संवत् ५२ से १४३ तक के शिलालेखों२ में तथा उन्हीं के सिक्कों में, जो [शक] संवत १०० (ई. स. १७८) के आसपास से लगा कर ३१० (ई. स. ३८८) से कुछ पीछे तक के हैं, मिलता है. उक्त शिलालेखों में केवल ‘वर्षे’ (=संवत्सरे) लिखा मिलता है, ‘शक’ आदि कोई नाम ‘वर्षे’ (संवत्) के साथ जुड़ा हुआ नहीं है, और सिक्कों में तो अंक ही मिलते हैं (‘वर्षे’ भी नहीं.)
c31.s8.7
संस्कृत साहित्य में इस संवत् के साथ ‘शक’ नाम जुड़ा हुआ (=शककाल) पहिले पहिल३ वराहमिहिर की ‘पंचसिद्धांतिका’ में शक संवत् ४२७४ (ई. स. ५०५) के संबंध में मिलता है; और शक संवत ५०० (ई. स. ५७८) से लगा कर १२६२ (ई. स. १३४०) तक के शिलालेखों और दानपत्रों में ‘शकनृपतिराज्याभिषेकसंवत्सर’५, ‘शकनृपतिसंवत्सर’६, ‘शकनृपसंवत्सर’७, शकनृपकाल’८, शकसंवत्’९, ‘शकवर्ष’१०, ‘शककाल’११, ‘शककालसंवत्सर’१२, ‘शक’१३ और ‘शाक’१४ शब्दों का प्रयोग इस संवत् के वास्ते किया हुआ मिलता है जिससे पाया जाता है कि ई. स. ५०० के आसपास से लगा कर शक संवत् १२६२ (ई. स. १३४०) तक तो यह संवत् किसी शक राजा के राज्याभिषेक से चला हुआ या किसी शक राजा अथवा शकों का चलाया हुआ माना जाता था और उस समय तक शालिवाहन का नाम इसके साथ नहीं जुड़ा था.
c31.s8.8
१ सा; अ. इं; जि. २, पृ. ६.
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२ राज्ञो चष्टनस घ्समोतिकपुत्रस राज्ञो रुद्रदामस जयदामपुत्रस वर्षे द्विपंचाशे ५२ २ फागुणवहुलस द्वितीयं वी २ मदनेन सिंहलपुत्रेण० कच्छराज्य के अँधौ गांव से मिले हुए क्षत्रपों के लेखों की स्वर्गीय आचार्य वल्लभजी हरिदत्त की तय्यार की हुई छापों पर से. राज्ञो महाक्षत्रपस्य गुरुभिरभ्यस्तनाम्नो वर्षे द्विसप्ततितमे ७० २ (महाक्षत्रप रुद्रदामन् के गिरनार के पास के अशोक के लेखवाले चट्टान पर के लेख से. ऐं. इं; जि. ८, पृ. ४२).
c31.s8.10
३ सिंहसूरिरचित ‘लोकविभाग’ नामक संस्कृत जैन ग्रंथ में उक्त पुस्तक का शकाब्द (शक संवत्) ३८० में बनना लिखा है (संवत्सरे तु द्वाविंशे कांचीशसिंहवर्मणः । अशीत्यग्रे शकाब्दानां सिद्धमेतच्छतत्रये ॥ (लोकविभाग नामक ११ वें प्रकरण के अंत की प्रशस्ति, श्लोक ४) परंतु यह मूल ग्रंथ नहीं किंतु सर्वंनंदि नामक मुनि के बनाये हुए प्राकृत ग्रंथ का परिवर्द्धित संस्कृत अनुवाद है और ई. स. की ग्यारहवीं शताब्दी के पीछे का बना हुआ है क्योंकि इसमें यतिवृषभग्रचित ‘त्रिलोक्यविज्ञप्ति,’ राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष के समय के अर्थात् ई. स. की ६ वीं शताब्दी के बने हुए ‘उत्तरपुराण’ तथा ई. स. की ११वीं शताब्दी के आस पास के बने हुए नेमिचंद्ररचित ‘त्रिलोकसार’ से भी श्लोक उद्धृत किये हुए मिलते हैं. संभव है कि सर्वंनंदि का मूल प्राकृत ग्रंथ शक संवत् ३८० में बना हो, परंतु उसमें इस संवत् के साथ ‘शक’ नाम जुड़ा हुआ था या नहीं इसका जब तक मूल ग्रंथ न मिल आवे तब तक निश्चय नहीं हो सकता. ऐसी दशा में ११ वीं शताब्दी के पीछे के बने हुए ‘लोकविभाग’ के ‘शकाब्द’ को शक संवत् का सब से प्राचीन उल्लेख नहीं कह सकते.
c31.s8.11
४ सप्ताश्विवेदसंख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ (पंचसिद्धांतिका १।८. देखो, ऊपर पृ. ११६, टिप्पण *.
c31.s8.12
५ शकनृपतिराज्याभिषेकसंवत्सरेष्वतिक्रांतेषु पंचसु शतेषु (इं. पँ; जि. १०, पृ. ५८ के पास का सेट).
c31.s8.13
६ शकनृपतिसंवत्सरेषु चतुस्त्रिंशाधिकेषु पंचस्वतीतेषु भाद्रपदग्रामावास्यायां सूर्यग्रहणनिमित्तं (इं. पँ; जि. ६, पृ ७३).
c31.s8.14
७ शकनृपसंवत्सरेषु शरशिखिमुनिषु व्यतीतेषु ज्येष्ठमासशुक्लपञ्चदश्यां पुष्यनक्षत्रे चंद्रवारे (इं. पँ; जि. १२, पृ. १६).
c31.s8.15
८ शकनृपकालातीतसंवत्सरसु(श)तेषु सप्तसु(सु) जे(ष्ठे)शरोत्तरेषु वैशाखव(ब)हुलामावास्यामादित्यग्रहणपर्व्वणि (पँ. इं; जि. ३, पृ १०६).
c31.s8.16
९ शकसंवत् ८३२ वैशाखशुद्धपौरर्णमास्यां महावैशाख्यां (पँ. इं; जि. १, पृ. ५६).
c31.s8.17
१० एकादशोत्तरषट्छतेषु शकवर्षेष्वतीतेषु....कार्तिकपौर्णमास्यां (इं. पँ; जि. ६, पृ. ८६).
c31.s8.18
११ सप्तस(श)त्या नवत्या च समायुक्तेसु(षु) सप्तसु [।] स(श)ककाले(ले) श्व(ष्व)तीतेषु मन्मथाह्वयवत्सरे (ज. ए. सो. बंब. जि. १०, पृ. १६५).
c31.s8.19
१२ पंचसप्तत्यधिकशककालसंवत्सरशतषट्के व्यतीते संवत्(त्) ६७५....माघमासरथसप्तम्यां (इं. पँ; जि. ११, पृ. ११२).
c31.s8.20
१३ शक ११५७ मन्मथसंवत्सरे श्रावणवहुल ३० गुरौ (की; लि. इं. स. इं; पृ. ६३, लेखसंख्या ३४८).
c31.s8.21
१४ शाके ११२८ प्रभवसंवत्सरे श्रावणमासे पौर्णमास्यां (पँ. इं; जि. १, पृ. ३४३).
c31.s8.22
इस संवत् के साथ जुड़ा हुआ शालिवाहन (सातवाहन) का नाम संस्कृत साहित्य में ई. स. की १४वीं शताब्दी के प्रारंभ१ के आस पास से और शिलालेखादि में पहिले पहिल हरिहर गांव से मिले हुए विजयनगर के यादव राजा बुक्कराय (प्रथम) के शक संवत् १२७६ (ई. स. १३५४) के दानपत्र२ में मिलता है; जिसके पीछे शालिवाहन का नाम लिखने का प्रचार बढ़ता गया. विद्वान् राजा सातवाहन (शालिवाहन) का नाम 'गाथासप्तशती' और 'बृहत्कथा' से साक्षरवर्ग में प्रचलित था अत एव संभव है कि ई. स. की १४वीं शताब्दी के आस पास दक्षिण के विद्वानों ने उत्तरी हिंदुस्तान में चलनेवाले संवत् के साथ जुड़े हुए राजा विक्रम के नाम का अनुकरण कर अपने यहां चलनेवाले 'शक' (शक संवत्) के साथ दक्षिण के राजा शालिवाहन (सातवाहन, हाल) का नाम जोड़ कर 'नृपशालिवाहनशक',३ 'शालिवाहनशक',४ 'शालिवाहनशकवर्ष',५ 'शालिवाहनशकाब्द'६ आदि से इस संवत् का परिचय देना प्रारंभ किया हो.
c31.s8.23
३ देखो, इसी पृष्ठ का टि. २.
c31.s8.24
४ शालिवाहनशक १४७६ (इं. पँ; जि. १०, पृ. ६४).
c31.s8.25
६ शकाब्दे शालिवाहस्य सहस्रेण चतुःशतैः। चतुस्त्रिंशत्समेतैर्यक्ते संख्याते गणिनक्रमात् ॥ श्रीमुखवत्सरे श्राध्ये माघे चासितपञ्चके। शिवरात्रा महातिथ्यां पुं(पु)ण्यकाले शुभे दिने (ज. ब. ब्रा. जि. १२, पृ. ३८४).
c31.s8.26
शालिवाहन, सातवाहन नाम का रूपांतर७ मात्र है और सातवाहन (पुराणों के 'आंध्रभृत्य') वंश के राजाओं का राज्य दक्षिण पर ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी से ई. स. २२५ के आस पास तक रहा था, उनकी राजधानियों में से एक प्रतिष्ठान नगर (पैठण, गोदावरी पर) भी थी और उनमें सातवाहन (शातकर्णि, हाल) राजा बहुत प्रसिद्ध भी था अतएव संभव है कि दक्षिण के विद्वानों ने उसीका नाम इस संवत् के साथ जोड़ा हो, परंतु यह निश्चित है कि सातवाहनवंशियों में से किसीने यह संवत् नहीं चलाया क्यों कि उनके शिलालेखों में यह संवत् नहीं मिलता किंतु भिन्न भिन्न राजाओं के राज्यवर्ष (सन् जुलूस) ही मिलते हैं और सातवाहन वंश का राज्य अस्त होने के पीछे अनुमान ११०० वर्ष तक शालिवाहन का नाम इस संवत् के साथ नहीं जुड़ा था. इस लिये यही मानना उचित होगा कि यह संवत् शक जाति के किसी विदेशी राजा या शक जाति का चलाया हुआ है.
c31.s8.27
१ देखो, ऊपर पृ. १७० और टिप्पण ३, ४.
c31.s8.28
२ नृपशालिवाहनशक १२७६ (की; लि. इं. स. इं; पृ. ७८, लेखसंख्या ४५५). इससे पूर्व के थाणा से मिले हुए देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र के समय के शक संवत् १२१२ (ई. स. १२९०) के दानपत्र की छपी हुई प्रति में (की; लि. इं. स. इं; पृ. ६७, लेखसंख्या ३७६) में 'शालिवाहनशके १२१२' छपा है परंतु डॉ. फ्लीट का कथन है कि उक्त ताम्रपत्र का अब पता नहीं है और नउसकी कोई प्रतिकृति प्रसिद्धि में आई और जैसे थाना से मिले हुए ई. स. १२७२ के दानपत्र में शालिवाहन का नाम न होने पर भी नक़ल में जोड़ दिया गया वैसा ही इसमें भी हुआ होगा (ज. रॉ ए. सो; ई. स. १६१६, पृ. ८१३). ऐसी दशा में उक्त ताम्रपत्र को शालिवाहन के नामवाला सब से पहिला लेख मान नहीं सकते.
c31.s8.29
५ शालिवाहनशकवर्ष १४३०........माघशु १४ (पँ. इं; जि. १, ३६६).
c31.s8.30
७ सातवाहन=सालवाहन=शालिवाहन. 'शालो हाले मत्स्यभेदे'; हालः सातवाहनपार्थिवे (हैम अनेकार्थकोश). सालाहगाम्मि हालो (देशीनाममाला वर्ग ८, श्लोक ६६). शालिवाहन, शालवाहन, सालवाहण, सालवाहन, सालाहण, सातवाहन, हालेत्येकस्य नामानि (प्रबंधचिन्तामणि, पृ. २८ का टिप्पण). गाथासप्तशती के अंत के गद्यभाग में सातवाहन राजा को शातकर्ण (शातकर्णि) भी कहा है (डॉ. पीटर्सन की ई. स. १८८३-८६ की रिपोर्ट, पृ. ३४६). पुराणों में मिलनेवाली आंध्रभृत्य (सातवाहन) वंश के राजाओं की नामावली में शातकर्णि, शातकर्ण, यज्ञश्रीशातकर्णि, कुंतलशातकर्णी आदि नाम मिलते हैं. वात्स्यायन के 'कामसूत्र' में शातकर्णि सातवाहन का कर्तरी (कैंची) से महादेवी मलयवती को मारना लिखा है-कर्तर्या कुंतलः शातकर्णिः सातवाहनो महादेवीं मलयवतीं [जघान] (निर्णयसागर प्रेस का छपा हुआ 'कामसूत्र', पृ. १४५). नासिक से मिले हुए वासिष्ठीपुत्र पुलुमायि के लेख में उसके पिता गौतमीपुत्र शातकर्णि का शक, यवन और पल्लवों को नष्ट करना तथा खखरात वंश (अर्थात् क्षत्रप नहपान के वंश) को निरवशेष करना लिखा है (पॅ. इं; जि. ८, पृ. ६०). उसी लेख से यह भी पाया जाता है कि उसके अधीन दूर दूर के देश थे. गौतमीपुत्र शातकर्णि सातवाहन वंश में प्रबल राजा हुआ था अतएव संभव है कि शक संवत् के साथ जो शालिवाहन (सातवाहन) का नाम जुड़ा है वह उसीका सूचक हो और 'गाथासप्तशती', 'बृहत्कथा', तथा 'कामसूत्र' का सातवाहन भी वही हो.
c31.s8.31
यह संवत् किस विदेशी राजा ने चलाया इस विषय में भिन्न भिन्न विद्वानों ने भिन्न भिन्न अटकलें लगाई हैं. कोई तुरुष्क (तुर्क, कुशन) वंश के राजा कनिष्क को, कोई क्षत्रप नहपान को, कोई शक राजा वोननस को और कोई शक राजा अय (अज़=Azes) को इसका प्रवर्तक मानते हैं परंतु ये सब अनुमान ही हैं, निश्चित रूप से इसके प्रचारक का नाम अब तक ज्ञात नहीं हुआ.
c31.s8.32
गत शक संवत् में ३१७६ जोड़ने से कलियुग संवत्, १३५ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम संवत् और ७८ (अंत के करीव तीन महीनों में ७६) जोड़ने से ई. स. आता है. यह संवत् बहुधा सारे दक्षिण में (तिन्नेवेल्लि और मलबार प्रदेशों को छोड़ कर) प्रचलित है. उत्तरी हिंदुस्तान में पंचांग, जन्मपत्र और वर्षफल आदि में विक्रम संवत के साथ यह भी लिखा जाता है और वहां के शिलालेखादि में भी कभी कभी इसके वर्ष लिखे मिलते हैं. इसका प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से होता है. इसके महीने उत्तरी हिंदुस्तान में पूर्णिमांत, और दक्षिण में अमांत माने जाते हैं. दक्षिण के जिन हिस्सों में सौर मान का प्रचार है वहां इसका प्रारंभ मेष संक्रांति से होता है. करण ग्रंथों के आधार पर पंचांग बनानेवाले सारे भारतवर्ष के ज्योतिषी इसी संवत् का आश्रय लेते हैं. पंचांगों में इसके वर्ष गत ही लिखे रहते हैं. शिलालेख और दानपत्रों में भी विशेष कर गत वर्ष ही लिखे मिलते हैं वर्तमान वर्ष कम.
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