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Pracin Bharatiya Veshabhusha c8.s9: वस्त्रों के संबंध में कोषाध्यक्ष के कर्तव्य तथा राजकीय कारखाने

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c8.s9

Language
Hindi

वस्त्रों के संबंध में कोषाध्यक्ष के कर्तव्य तथा राजकीय कारखाने

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सब तरह के नमदों, समूरों, ऊनी, सूती, रेशमी और रेशों से बने कपड़ों के वर्णन के बाद कौटिल्य कोषाध्यक्ष के, जिसके अधिकार में कपड़े रहते थे, कर्तव्यों पर प्रकाश डालता हूं। कौटिल्य के अनुसार कोषाध्यक्ष को भिन्न भिन्न ऋतुओं और अवसरों पर पहने जाने वाले (देशकालपरिभोग) कपड़ों का तथा कीड़े मकोड़ों और चूहों से उनकी रक्षा का ज्ञान होना आवश्यक था ।५५

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५५ —म० शा०, १, पृ० १६६

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हम ऊपर देख आये हैं कि इस देश के भिन्न भिन्न भागों में कौन कौन से कपड़े मौर्य काल में बनते थे । इन कपड़ों के सिवाय राज्य का निज का बुनने का कारखाना सूत्राध्यक्ष के जिम्मे होता था । वह कारखाने में अच्छे सूत कातने वाले, वर्म बनाने वाले, कपड़े और रस्सियां बनाने वाले कारीगर रखता था । विधवाएं, अपाहिज, लड़कियां, भिखमंगिनें, वृद्धा वेश्याएं, जुर्माना अदा करने के लिए काम करती हुई स्त्रियां, वृद्धा राजपरिचारिकाएं, तथा देवदासियां ऊन, वल्क, कपास, तूल, सन और क्षोम कातने के लिए रक्खी जाती थीं५६।

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५६ ग० शा०, १, पृ० २७६; शा० शा० पृ० १३६

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कातने वालों का पारिश्रमिक उनके सूत की अच्छाई पर निर्भर होता था । जो कारीगर महीन सूत अच्छी तायदाद में कात सकते थे उन्हें तेल, हर्रें की टिकियां और अंजन आंख और दिमाग को तर रखने के लिए तथा दूसरों में काम करने के उत्साह को बढ़ाने के लिए दी जाती थीं । छुट्टी के दिनों में काम करने वाले कतकों को विशेष पारिश्रमिक मिलता था साथ ही साथ अच्छे साधन होते हुए भी उपयुक्त परिमाण में सूत न कातने वाले को पारिश्रमिक काट कर दंड भी दिया जाता था५७।

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५७ ग० शा०, १, पृ० २७९; शा० शा० पृ० १३६

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राज्य के कारखाने बुनकरों के अलावा कपड़ा बुनने का काम और दूसरे बुनकरों को भी ठीके पर (कृतकर्मप्रमाण) नियत पारिश्रमिक (कालवेतन) और कारीगरी के अनुसार (फलनिष्पत्तिभिः) दिया जाता था । कारीगरों के हस्तलाघव से अवगत होने के लिए अर्थशास्त्र में उनसे मित्रता बढ़ाने का भी आदेश है५८।

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५८ वही

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सुगंधित द्रव्य, मालाएं तथा और बहुत से उपहार उत्साह बढ़ाने के लिए क्षौम, दुकूल, रेशम (कृमितान) पश्मीना (रांकवः) और सूती कपड़े बिनने वालों को दे दिये जाते थे५९ ।

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५९ ग० शा०, १,पृ० २८०, शा० शा०, पृ० १३५

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बुनाई के कारखाने में कपड़े, आस्तरण तथा परदे (प्रावरण) भी बनते थे६० ।

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६० वही

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सूती जिरह बस्तर (कंकट) बनाने का काम चतुर कारीगरों के सुपुर्द किया जाता था६१। जो जन घर से बाहर निकलने में असमर्थ होते थे यथा प्रोषित विधवा (जिस स्त्री का

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६१ वही

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पति विदेश गया हो), अपाहिज तथा वे लड़कियां जिन्हें स्वयं अपनी जीविका उपार्जित करनी पड़ती थी उन्हें कताई का काम उनके घर पर ही देने का प्रबंध था६२।

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६२ वही

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जो स्त्रियां प्रातःकाल सूत्रशाला में सूत लेकर हाजिर होती थीं उन्हें कताई की मजदूरी मिल जाती थी। इस आदान-प्रदान को भांडवेतनविनिमय कहते थे। सूत्रशाला में, उस समय केवल इतनी ही रोशनी होती थी जिससे सूत्राध्यक्ष सूत देख सके। स्त्रियों के देखने या बात करने पर सूत्राध्यक्ष दंड का अधिकारी होता था। काम की मजदूरी न देने पर अथवा अघबने काम की मजदूरी देने पर भी सूत्राध्यक्ष दंड का भागी होता था।६३ कारखाने म काम न करने वालों को गहरा दंड दिया जाता था। जो स्त्रियां मजदूरी लेकर भी काम नहीं करती थीं उनके अंगूठे काट दिये जाते थे। माल-मसाला लेकर भाग जाने वालों को भी यही दंड मिलता था६४। अपराध के छुटाई बड़ाई के अनुपात में बुनकरों की मजदूरो जुर्माने के रूप में काट ली जाती थी६५।

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६३ शा० शा० १, पृ० २८०-८१

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शुल्काध्यक्ष के कर्तव्यों के वर्णन के प्रसंग में हमें उन वस्त्रों का उल्लेख मिलता है जिन पर मौर्ययुग में चुंगी लगती थी। ये वस्त्र क्षौम, दुकूल और रेशम के बने होते थे। इनके सिवाय दुकूल, क्षौम, आस्तरण, प्रावरण, रेशम (कृमिजात), ऊनी कंबल और परमीना बनाने के साधनों पर भी उनके मूल्य की १/१० से लेकर १/१५ तक चुंगी लगती थी६६।

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वस्त्र, सूत, बल्कल, चमड़ा और कपास पर चुंगी उनके मूल्य की १/२० से १/२५ तक होती थी६७।

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कपड़े रंगने के लिए रंग किंशुक, कुसुंभ और कुंकुम से बनते थे। गणपति शास्त्री की टीका में इन पुष्पों को वस्त्रादिरंजनसाधन कहा है।६८

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६८ ग० शा० १, पृ० २४७

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