भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c28: २२—भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c28
- Language
- Hindi
Contents
- c28.s1 नागरी लिपि की उत्पत्ति — 49 parts
- c28.s2 शारदा (कश्मीरी) लिपि की उत्पत्ति — 24 parts
- c28.s3 बंगला लिपि की उत्पत्ति — 21 parts
- c28.s4 कनड़ी लिपि की उत्पत्ति — 19 parts
- c28.s5 ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति — 34 parts
- c28.s6 तामिळ लिपि की उत्पत्ति — 22 parts
२२—भारतवर्ष की मुख्य मुख्य वर्तमान लिपियों की उत्पत्ति
c28.1
(लिपिपत्र ८२ से ८४ के उत्तरार्ध के प्रथम खंड तक).
c28.2
भारतवर्ष की नागरी, शारदा, बंगला, तेलुगु, कनड़ी, ग्रंथ, तामिळ आदि समस्त वर्तमान (उर्दू को छोड़ कर) लिपियों का मूल ‘ब्राह्मी’ लिपि है, परंतु ये लिपियां अपनी मूल लिपि से इतनी भिन्न हो गई हैं कि जिनको प्राचीन लिपियों से परिचय नहीं हैं वे सहसा यह स्वीकार भी न करेंगे कि ये सब लिपियां एक ही मूल लिपि से निकली हैं. लेखनप्रवाह सदा एक ही स्रोत में नहीं बहता किंतु लेखकों की लेखनरुचि के अनुसार समय के साथ भिन्न भिन्न मार्ग ग्रहण करता रहता है; इसीसे सब देशों की प्राचीन लिपियां पलटती रही हैं. हमारे यहां की भिन्न भिन्न लिपियां एक ही मूल स्रोत की शाखा प्रशाखाएं हैं जिनके विकास के मुख्य कारण ये हैं—
c28.3
(अ) अक्षरों को भिन्न भिन्न प्रकार से सुंदर बनाने का यत्न करना.
c28.4
(आ) अक्षरों पर सिर की आड़ी लकीर लगाना. (इ) कलम को उठाये बिना अक्षर को पूरा लिखना. (ई) त्वरा से लिखना.
c28.5
लिपिपत्र ८२ से ८४ के उत्तरार्ध के प्रथम खंड तक में भारतवर्ष की ६ मुख्य लिपियों का विकासक्रम बतलाया गया है जिसमें प्रत्येक अक्षर के जो रूपांतर दिये हैं उनमें से अधिकतर लिपिपत्र १ से ६४ तक से ही लिये गये हैं.
c28.6
लिपिपत्र ८२ वां.
c28.7
इस लिपिपत्र में वर्तमान नागरी और शारदा ( कश्मीरी ) लिपियों की उत्पत्ति बतलाई गई है.
नागरी लिपि की उत्पत्ति
c28.s1.1
नागरी आदि जितनी लिपियों की उत्पत्ति लिपिपत्र ८२ से ८४ में दी है उनमें पहिले वर्तमान लिपि का प्रत्येक अक्षर दे कर उसके बाद = चिह्न दिया है. उसके पीछे अशोक के समय से लगा कर वर्तमान रूप बनने तक के सब रूपांतर दिये हैं. प्रत्येक रूप अनेक लेखादि में मिलता है और प्रत्येक लेखादि का पता देने से विस्तार बहुत बढ़ जाता है अतएव केवल एक स्थल का पता दिया जायगा.
c28.s1.2
**अ**—इसका पहिला रूप अशोक के गिरनार के पास के चट्टान के लेख (लिपिपत्र १) से लिया गया है (बहुधा प्रत्येक लिपि के प्रत्येक अक्षर का पहिला रूप उसी लेख से लिया गया है इस लिये आगे पहिले रूप का विवेचन केवल वहीं किया जायगा जहां वह रूप किसी दूसरे स्थल से लिया गया है). दूसरा रूप मथुरा के लेखों (लिपिपत्र ६) से लिया है जिसमें ‘**अ**’ की बाईं ओर के नीचे के अंश में दो बार कोण बनाये हैं. तीसरा रूप कोटा के लेख (लिपि पत्र २१) से है जिसमें ‘**अ**’ की बाईं ओर के नीचे के अंश को अर्द्धवृत्त का सा रूप देकर मूल अक्षर से उसे विलग कर दिया है. चौथा रूप देवल के लेख (लिपिपत्र ३५) से और पांचवां चीरवा के लेख (लिपिपत्र २७) से लिया गया है. छठा रूप वर्तमान नागरी है. (लिपिपत्र ८२ से ८४ तक में प्रत्येक अक्षर की उत्पत्ति में अंतिम रूप वर्तमान अक्षर ही है इसलिये उसका भी आगे विवेचन न किया जायगा).
c28.s1.3
इस प्रकार प्रत्येक अक्षर की उत्पत्ति का विवेचन करने से विस्तार बढ़ जाता है इस लिये आगे ‘पहिला रूप’, ‘दूसरा रूप’ आदि के लिये केवल उनकी संख्या के पहिले अक्षर ‘**प**’, ‘**दू**’ आदि लिखे जायंगे और उनके आगे जिस लिपिपत्र या लेख से वह रूप लिया है उसका अंक या नाम मात्र दिया जायगा और जहां बहुत ही आवश्यकता होगी वहीं विवेचन किया जायगा. प्रत्येक रूप में क्या अंतर पड़ा यह उक्त रूपों को परस्पर मिला कर देखने से पाठकों को मालूम हो जायगा.
c28.s1.4
**आ**—‘**अ**’ का यह रूप दक्षिण में लिखा जाता है. इसके पहिले तीन रूप पूर्व के ‘**अ**’ के समान हैं; चौ. १८ (इसमें बाईं ओर का नीचे का अर्धवृत्त सा अंश मूल अक्षर से मिल गया है); पां. चौथे का रूपांतर ही है.
c28.s1.5
**इ**—दू. १७ (जयनाथ का दानपत्र—इसमें ऊपर की बिंदी के स्थान में सिर की आड़ी लकीर, और नीचे की दोनों बिंदियों को भीतर से खाली बनाया है); ती. २६; चौ. २७; पां. चौथे के समान.
c28.s1.6
उ—दू. ६; ती. में नीचे के अंत को अधिक मोड़ा है; चौ. १८.
c28.s1.7
ए—दू. १६ (उष्णीषविजयधारणी); ती. १६ (महानामन् का लेख); चौ. १७ (करंडांडा का लेख); पां. २५ (कूर्मशतक).
c28.s1.8
क—दू. कुशनवंशियों के लेखों से; ती. ८; चौ. १६; पां. २३.
c28.s1.9
ख—प. २ (खालसी); दू. ६; ती. २१ (दुर्गगण का लेख); चौ. २६ (जाजल्लदेव का लेख).
c28.s1.10
ग—दू. और ती. ६; चौ. १६.
c28.s1.11
घ—दू. ८; ती. २३ (जोधपुर का लेख); चौ. २५ (उदेपुर का लेख); पां. २५ (उज्जैन का लेख).
c28.s1.12
ङ—प. बुद्धगया के स्तंभ से; दू. १८ (‘ङ्शो’ में); ती. २५ (उज्जैन का लेख).
c28.s1.13
च—दू. ६; ती. २५ (उज्जैन का लेख)
c28.s1.14
छ—दू. ६; ती. २५ (उज्जैन का लेख); चौ. तीसरे से बना.
c28.s1.15
ज—दू. ७; ती. २१ (झालरापाटन का लेख); चौ. २५ (उज्जैन का लेख.)
c28.s1.16
झ—'झ' का यह रूप जैन शैली की नागरी लिपि में प्रचलित है. दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र का लेख); ती. २१ (कोटा का लेख).
c28.s1.17
झ—'झ' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी में प्रचलित है. इसके पहिले तीन रूप पूर्व के 'झ' के समान हैं. चौ. २६ (हस्तलिखित पुस्तकों से); पां. चौथे से बना.
c28.s1.18
ञ—दू. ८; ती. १६ (‘ञ्ज’ में)
c28.s1.19
ट—दू. १६; ती. २१ (झालरापाटन का लेख).
c28.s1.20
ठ—प. २ (अशोक का देहली का लेख); दू. ती. २५ (उज्जैन का लेख).
c28.s1.21
ड—'ड' का यह रूप जैन शैली की नागरी में प्रचलित है. दू. ८; ती. १६; चौ. १८; पां. चौथे से बना; छ. २७ (सूधा के लेख की पंक्ति के अंत में).
c28.s1.22
ड—पहिले तीन रूप पूर्व के 'ड' के समान; चौ. २७.
c28.s1.23
ढ—नागरी लिपि की वर्णमाला में केवल यही अक्षर ऐसा है जो अपने मूल रूप में बना रहा है. केवल सिर की आड़ी लकीर बढ़ी है.
c28.s1.24
ण—दू. ६; ती. दूसरे से बना (देखो, लिपिपत्र ६ में 'ण' का चौथा रूप); चौ. १८; पां. १६ (उष्णीषविजयधारणी).
c28.s1.25
ण—'ण' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी में प्रचलित है और नागरी के 'ण' के 'ए' जैसे अंश को चलती कलम से मिलवां लिखने से बना है.
c28.s1.26
त—दू. पहिले का रूपांतर (देखो, लिपिपत्र ४); ती. २७.
c28.s1.27
थ—दू. ती. १८; चौ. २५ (उज्जैन का लेख).
c28.s1.28
द—दू. ५ (पभोसा का लेख); ती. ५ (शोडास का मथुरा का लेख); चौ. ६; पां. १८; छ. १६ (उष्णीषविजयधारणी).
c28.s1.29
ध—दू. २०; ती. २५ (उज्जैन का लेख); चौ. २७ (ओरिआ का लेख).
c28.s1.30
न—दू. ६; ती. २०.
c28.s1.31
प—दू. ५ (शोडास का लेख); ती. १६.
c28.s1.32
फ—दू. १८; ती. १७ (पाली का दानपत्र); चौ. सीयदौनी के लेख से.
c28.s1.33
ब—दू. २०; ती. २३ (जोधपुर का लेख); चौ. १६; पां. चौलुक्य भीमदेव के दानपत्र से. 'व' और 'ब' में भेद न रहने से 'ब' को स्पष्ट बतलाने के लिये 'व' के भीतर बिंदी लगाई जाने लगी जो पीछे से कुछ तिरछी लकीर के रूप में परिणत हो गई.
c28.s1.34
भ—दू. ३ (नानाघाट का लेख); ती. ५ (शोडास का लेख); चौ. १६; पां. २६ (जाजल्लदेव का लेख).
c28.s1.35
भ—'भ' का यह रूप दक्षिणी शैली की नागरी लिपि में प्रचलित है. पूर्व के 'भ' के पांचवें रूप में बाईं ओर के अंश में ऊपर की तरफ़ ग्रंथि लगाने से यह बना है.
c28.s1.36
म—दू. ५ (शोडास का लेख); ती. १६; चौ. १८ ('म्' में).
c28.s1.37
य—दू. १; ती. दूसरे रूप को चलती कलम से पूरा लिखने से बना (देखो, लिपिपत्र ६ में मथुरा के लेखों के 'र्य्य' और 'श्य' में); चौ. १६ (बुद्धगया का लेख).
c28.s1.38
र—दू. १८; ती. २०; चौ. २३ (जोधपुर का लेख).
c28.s1.39
ल—दू. ६; ती २१ (दुर्गगण का लेख); चौ. २१ (ओसियां का लेख).
c28.s1.40
व—दू. ती. ५ (मथुरा के चार जैन लेख); चौ. २३; पां. २४.
c28.s1.41
श—प. २ (अशोक का खालसी का लेख); दू. ६; ती. १८; चौ. १६ (उष्णीषविजयधारणी); पां. २०.
c28.s1.42
ष—प. ३ (घोसुंडी के लेख के 'र्षे' में); दू. ६; ती. १८; चौ. तोरमाण के लेख से.
c28.s1.43
स—दू. ५ (मथुरा के जैन लेख); ती. १७ (करंडांडा का लेख); चौ. बिलसद के लेख से; पां. १६ (उष्णीषविजयधारणी).
c28.s1.44
ह—दू. ५ (शोडास का लेख); ती. ८; चौ. अप्सद के लेख से; पां. २५ (उज्जैन का लेख).
c28.s1.45
ळ—प. दू. ७; ती. दूसरे का रूपांतर (देखो लिपिपत्र ५० में चेब्रोलू के लेख का 'ळ').
c28.s1.46
क्ष—प. ७; दू. ८; ती. १६; चौ. १६ (उष्णीषविजयधारणी); पां. २७ (चीरवा का लेख).
c28.s1.47
ज्ञ—प. ८; दू. पहिले का रूपांतर; ती. २१ (ओसियां का लेख).
c28.s1.48
वर्तमान नागरी लिपि के ई, ऌ, ओ और औ ये चार अक्षर उनके मूल अक्षरों के रूपांतर नहीं हैं. 'ई', 'इ' के ऊपर रेफ का सा चिह्न लगा कर१; 'ऌ', ल् के साथ ऋ की मात्रा जोड़ कर; 'ओ' और 'औ', 'अ' के साथ क्रमशः उक्त स्वरों की मात्राएं लगा कर, बनाये जाते हैं. 'ऊ' और 'ऐ' प्राचीन अक्षरों के रूपांतर ही हैं. 'ऋ' प्राचीन 'ऋ' के स्थानापन्न हो ऐसा पाया जाता है (देखो, लिपिपत्र १६ में दी हुई 'उष्णीषविजयधारणी' के अंत की वर्णमाला का 'ऋ'). वर्तमान 'ओं' में जो 'ओ' का रूप ॐ लिखा जाता है वह प्राचीन 'औ' का रूपांतर है (देखो, लिपिपत्र १८, १६, २१ और ३५ में दिया हुआ 'औ'), परंतु उज्जैन के लेख के अंत की पूरी वर्णमाला (लिपिपत्र २५) में 'ओ' का रूप वैसा ही दिया है जिससे अनुमान होता है कि ई. स. की ११ वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में नागरी के लेखक 'ओ' के स्थान में 'औ' के प्राचीन रूप का व्यवहार करने और 'औ' के लिये नया चिह्न लिखने लग गये थे. 'झ' का वर्तमान नागरी रूप किसी प्राचीन रूप से नहीं बना, नवीन कल्पित है.
c28.s1.49
१ नागरी में इस प्रकार के 'ई' की कल्पना का कुछ कुछ पता ई. स. की ६ ठी शताब्दी से लगता है. 'उष्णीषविजयधारणी' के अंत की वर्णमाला में 'इ' पर बिंदी (लिपिपत्र १६) और राजा भोज के 'कूर्मशतक' में रेफ सा चिह्न मिलता है (लिपिपत्र २५).
शारदा (कश्मीरी) लिपि की उत्पत्ति
c28.s2.1
शारदा लिपि नागरी की बहिन होने से उसके उत्पत्तिक्रम में दिये हुए प्रत्येक अक्षर के रूपों में से कुछ ठीक वे ही हैं जो नागरी की उत्पत्ति में दिये हैं. इसलिये उन रूपों का वर्णन
c28.s2.2
न कर बाकी का ही किया जायगा.
c28.s2.3
अ—चौ. तीसरे से बना (बाईं ओर का अर्धवृत्त सा अंश मूल अक्षर से मिल जाने से).
c28.s2.4
इ—दू. १८; ती. २४; चौ. तीसरे से बना (ऊपर की दोनों बिंदियों को चलती कलम से लिखने से); पांच ३१ (अथर्ववेद).
c28.s2.5
ई—प. १० (‘ई’ से मिलता हुआ); दू १६ (आसीरगढ़ की मुद्रा); ती. ३० (बैजनाथ की प्रशस्ति).
c28.s2.6
उ—नागरी के समान.
c28.s2.7
ए—ती. २८; चौ. ३१ (अथर्ववेद).
c28.s2.8
ओ—प. १; दू. ६; ती. दूसरे का रूपांतर; चौ. १७ (देखो, ‘औ’ में); पांच चौथे का नीचे का अंश ऊपर की ओर अधिक बढ़ जाने से बना.
c28.s2.9
क—पांच २९. ख—चौ. २८. ग—नागरी के समान.
c28.s2.10
घ—ती. दूसरे से बना. ङ—दू. पहिले से बना. च—ती. चौ. २६.
c28.s2.11
छ—दू. ६. ज—ती. २८; चौ. २६. झ—चौ. तीसरे से बना; पांच ३१ (शकुंतल).
c28.s2.12
ञ—ती. दूसरे से बना; चौ. तीसरे को चलती कलम से लिखने से नीचे गांठ बन गई.
c28.s2.13
ट—ती. २१ (दुर्गगण का लेख). ठ—मूल रूप में बना रहा.
c28.s2.14
ड—जैन शैली की नागरी के ‘ड’ के समान.
c28.s2.15
ढ—दू १६ (उष्णीषविजयधारणी); ती. ३० (सोमवर्मन् का दानपत्र).
c28.s2.16
ण—चौ. २६. त—दू. ती. ८, चौ. २८. थ—चौ. ३१. द—पांच १८.
c28.s2.17
ध—दू. ती. १६. न—नागरी के समान (प्रारंभ की ग्रंथि को छोड़ कर).
c28.s2.18
प—नागरी के समान. फ—दू. ३१ (शकुंतल). ब—नागरी के समान.
c28.s2.19
भ—चौ. १८. म—नागरी के समान (शिररहित).
c28.s2.20
य, र, ल, व—चारों नागरी के समान. श—चौ. तीसरे से बना.
c28.s2.21
ष—नागरी के समान. स—चौ. तीसरे से बना. ह—ती. दूसरे से बना.
c28.s2.22
वर्तमान शारदा लिपि के अक्षर अपने प्राचीन रूपों से नागरी की अपेक्षा अधिक मिलते हुए हैं और उनमें पूरे स्वर वर्ण उनके प्राचीन चिह्नों से ही बने हैं.
c28.s2.23
लिपिपत्र ८३ वां.
c28.s2.24
इस लिपिपत्र में बंगला और कनड़ी लिपियों की उत्पत्ति बतलाई गई है.
बंगला लिपि की उत्पत्ति
c28.s3.1
बंगला लिपि प्राचीन नागरी की पुत्री है इस लिये उसकी उत्पत्ति में दिये हुए प्रत्येक अक्षर के भिन्न भिन्न रूपों में से कितने एक नागरी के उक्त रूपों से मिलते हैं अत एव उनको छोड़ कर बाकी का ही विवेचन किया जायगा और जो अक्षर नागरी के समान हैं वा जिनके वर्तमान रूप के पूर्व के सब रूप नागरी की उत्पत्ति में बतलाये हुए रूपों के सदृश हैं उनको भी नागरी के समान कहेंगे.
c28.s3.2
अ—दक्षिणी शैली की नागरी के समान (मध्य की आड़ी लकीर निरछी).
c28.s3.3
इ—पांच जैन शैली से. उ—नागरी के समान.
c28.s3.4
ए—चौ. ३२ (देवपारा का लेख). ओ—चौ. १८.
c28.s3.5
क—पांच चौथे से बना.
c28.s3.6
**ख**—ती. २१ (दुर्गगण का लेख); चौ. राष्ट्रकूट गोविंद (तीसरे) के दानपत्र से; पां. ३२ (देवपारा का लेख).
c28.s3.7
**ग**—ती. ६; चौ. ३२. **घ**—नागरी के समान. **ङ**—ती. १६ (उष्णीषविजयधारणी); चौ. ३५ (इस्त्राकोल का लेख).
c28.s3.8
**च**—ती. ३४. **छ**—ती. १६ (उष्णीषविजयधारणी). **ज**—नागरी के समान.
c28.s3.9
**झ**—ती. १६ (उष्णीषविजयधारणी); चौ. तीसरे का रूपांतर; पां. ३४ (वल्लभेंद्र का दानपत्र).
c28.s3.10
**ञ**—ती. ३५ (इस्त्राकोल का लेख). **ट**—ती. २३ (जोधपुर का लेख).
c28.s3.11
**ठ**—दू. १६ (उज्जैन का लेख). **ड**—नागरी के समान.
c28.s3.12
**ढ**—नागरी के समान. **ण**—पां. कन्हेरी के लेख से; छु. ३४ (वल्लभेंद्र का दानपत्र).
c28.s3.13
**त**—चौ. ३३ (तर्पंडिघी का दानपत्र); पां. ३४ (हस्तलिखित पुस्तकें).
c28.s3.14
**थ**—चौ. ३२. **द**—चौ. ३२. **ध**—नागरी के समान.
c28.s3.15
**न**—नागरी के समान. **प**—चौ. तीसरे से बना. **फ**—नागरी के समान.
c28.s3.16
**ब**—नागरी के समान. **भ**—ती. १८, चौ. २३ (जोधपुर के लेख के ‘भू’ में).
c28.s3.17
**म**—नागरी के समान. **य**—नागरी के समान.
c28.s3.18
**र**—ती. ३२ (देवपारा का लेख); चौ. ३४ (वल्लभेंद्र का दानपत्र). **ल**—नागरी के समान.
c28.s3.19
**व**—नागरी के समान. **श**—चौ. २५ (देवल का लेख); पां. ३२ (देवपारा का लेख).
c28.s3.20
**ष**—नागरी के समान. **स**—चौ. ३२ (देवपारा का लेख). **ह**—नागरी के समान.
c28.s3.21
वर्तमान बंगला लिपि के स्वर मूल स्वरों से बने हैं; केवल ‘**ई**’ नागरी की नांई ‘**इ**’ से बना है.
कनड़ी लिपि की उत्पत्ति
c28.s4.1
**अ**—दू. ४५; ती. ४७; चौ. ४६; पां. ५० (चेब्रोलू का लेख).
c28.s4.2
**इ**—दू. ४० (कर्कराज का दानपत्र); ती. ४५ (पुलुकेशिन का दानपत्र); चौ. ४५. (चेंडलूर का दानपत्र).
c28.s4.3
**ई**—प. ३६ (मंदसौर का लेख); दू. पहिले से बना; ती. ४७; चौ. ५० (अनंौंडा का लेख).
c28.s4.4
**ए**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. १५; चौ. ४५ (चेंडलूर का दानपत्र); पां. ४८ (राजा अम्म का दानपत्र).
c28.s4.5
**ओ**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ५०.
c28.s4.6
**क**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४४ (देवगिरि का दानपत्र); चौ. ४७; पां. ५० (चेब्रोलू का लेख).
c28.s4.7
**ख**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. १३; चौ. ४७
c28.s4.8
**ग**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४३ (उरुवुपल्लि का दानपत्र).
c28.s4.9
**घ**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४४ (देवगिरि का दानपत्र); चौ. ४५ (चेंडलूर का दानपत्र); पां. ५० (अनंौंडा का लेख).
c28.s4.10
**ङ**—दू. ४४ (काकुत्स्थवर्मन् के दानपत्र के ‘उङ्घो’ में); ती. दूसरे से बना.
c28.s4.11
**च**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख), ती. ४६; चौ. ४८; पां. ५० (चेब्रोलू का लेख).
c28.s4.12
**छ**—दू. ८; ती. ४०; चौ. ५० (चेब्रोलू का लेख).
c28.s4.13
**ज**—दू. ४३; ती. ४७; चौ. ४८ (राजा भीम का दानपत्र).
c28.s4.14
**झ**—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. दूसरे से बना; चौ. तीसरे से बना; पां. ५०.
c28.s4.15
ञ—दू. ७; ती. ४४ (‘ज्ञा’ में ); चौ. ४८ (‘ज्ञा’ में).
ट—दू. ४५ (बादामी का लेख); ती. दूसरे से बना; चौ. ४८; पां. ५१ (दोनेपुंडी का दानपत्र).
ठ—दू. ५१. ड—प. २ (खालसी); दू. ७; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ५०.
ढ—दू. ती. ४७; चौ. ५०.
ण—दू. १२; ती. ४५; चौ. ४८; पां. ४६.
त—दू. ६; ती. ४७; चौ. ४८.
थ—दू. ४४ (काकुस्थवर्मन् का दानपत्र); ती. ४७.
द—प. २ (जौगड़); दू. ७; ती. ४३ (पिकिर का दानपत्र); चौ. ४८; पां. ५०.
ध—दू. ६ (गौतमीपुत्र शातकर्णी के लेख); ती. १३; चौ. ४६; पां. ५०.
न—दू. ४३ (उरुवुपल्लि का दानपत्र); ती. ४५ (चेंडलुर का दानपत्र); चौ. ५०.
प—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र के लेख); ती. ४५; चौ. ५०; पां. ५१ (राजा गणदेव का दानपत्र).
फ—दू. ८; ती. ४३; चौ. ४७; पां. ५०.
ब—दू. ४३ (विष्णुगोपवर्मन् का दानपत्र); ती. ४३ (सिंहवर्मन् का दानपत्र); चौ. ४७.
भ—दू. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); ती. ४८; चौ. ४६; पां. ५०.
म—दू. ६; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ४६; पां. ५०.
य—दू. ७; ती. ४३; चौ. ४५; पां. ४८. र—दू. ७; ती. ४३; चौ. ४७; पां. ४८.
ल—दू. ८; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ. ४८. व—दू. ६; ती. १३; चौ ४६; पां. ५०.
श—प. २ (खालसी); दू. ७; ती. ४४ (मृगेशवर्मन् का दानपत्र); चौ ४५; पां. ५०.
ष—प. ३ (घोसुंडी के ‘र्ष’ में); दू. ४४; ती. ४५; चौ. ५०; पां. ५१.
स—दू. ४७; ती. ४८. ह—दू. ७; ती. ४३; चौ. ५०; पां. ५१.
ळ—प. ७; दू. ४७; ती. ५०; चौ. ५१ (वनपल्ली का दानपत्र).
c28.s4.16
वर्तमान कन्नड़ी लिपि का ‘उ’ प्राचीन ‘उ’ से नहीं बना किंतु ‘अ’ के साथ ‘उ’ की मात्रा जोड़ने से बना है. उसी ‘उ’ से ‘ऊ’ बना है. ‘ऋ’ का कोई प्राचीन रूप नहीं मिलता. संभव है कि उष्णी-षविजयधारणी के अंत की वर्णमाला के ‘ऋ’ जैसे ही अक्षर में विकार हो कर वह बना हो. ‘ए’ और ‘ओ’ उनके प्राचीन रूपों से ही बने हैं. ‘ऐ’ लिपिपत्र ३८ के ‘ऐ’ से, और ‘औ’ लिपिपत्र ४३ और ५० में मिलनेवाले ‘औ’ से बना है१.
c28.s4.17
१ वर्तमान तेलुगु लिपि कन्नड़ी से बहुत मिलती हुई है. जिन अक्षरों में विशेष अंतर है वे ड, ॠ, क, त, श और ह हैं. इनमें से ‘उ’ उसके प्राचीन रूप से बना है (विकासक्रम के लिये देखो, क्रमशः लिपिपत्र ४४, ४७ और ५० में मिलनेवाले उक्त अक्षर के रूप). ‘क’ कन्नड़ी की उत्पत्ति में दिये हुए उक्त अक्षर के पांचवें रूप की आड़ी लकीर और नीचे के वृत्त को चलती कलम से कुछ अंतर के साथ लिखने से बना है. ‘त’ के बाईं ओर के अंत में ग्रंथि और लग दी है. ‘श’ और ‘ह’ भी कन्नड़ी की उत्पत्ति में दिये हुए उक्त अक्षरों के उपांत्य रूपों के विकार मात्र हैं.
c28.s4.18
लिपिपत्र ८४ वां.
c28.s4.19
इस लिपिपत्र में ग्रंथ और तामिळ लिपियों की उत्पत्ति दी गई है.
ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति
c28.s5.1
ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति में बहुधा प्रत्येक अक्षर के प्रारंभ के कुछ रूप वे ही हैं जो कन्नड़ी लिपि की उत्पत्ति में दिये गये हैं, इस लिये ऐसे रूपों को छोड़ कर बाकी के रूपों ही का विवेचन किया जायगा.
c28.s5.2
अ—ती. ५२ (मामल्लपुरम् के लेख); चौ. ५४ (उदयेंदिरम् का दानपत्र); पां. ५६.
इ—पां. ५३ (नंदिवर्मन् का दानपत्र).
c28.s5.3
ई—ती. दूसरे से बना. उ—दू. ती. ११ (जूसर) ; चौ. तीसरे से बना; पां. ५६.
c28.s5.4
ए—ती. ५२ (कांचीपुरम् का लेख); चौ. ५३ (नंदिवर्मन् का दानपत्र ); पां. ५२ (परमे-श्वरवर्मन् का दानपत्न); छ. ५४.
c28.s5.5
ओ—दू. ६; ती. ४३ (देखो, सिंहवर्मन् के दानपत्र का ‘औ’); चौ. ५६.
c28.s5.6
क—ती. ५४ (उदयेंदिरम् का दानपत्र); चौ. ५६ (श्रीरंगम् का लेख); पां. ५६ (गिरिभृपाल का दानपत्र).
c28.s5.7
ख—दू. ७; ती. ५३; चौ. ५४ (उदयेंदिरम् का दानपत्र).
c28.s5.8
ग—ती. ४५ (बांदामी का लेख); चौ. ५६; पां. ५३ (नंदिवर्मन् का दानपत्र).
c28.s5.9
घ—ती. ५४. ङ—ती. ५२ (‘ङ्क’ में); चौ ५३ (‘ङ्ग’ में).
c28.s5.10
च—ती. ५२ (कूरम् का दानपत्र); चौ. ५३ (नारसिंगम् का लेख); पां. ५४ (पृथ्वीपति का दानपत्र).
c28.s5.11
छ—दू. ६ ती. ४५ (सर्वलोकाश्रय का दानपत्र); चौ. ५३; पां. चौथे से बना.
c28.s5.12
ज—ती. ४३; चां. ५२ (कांचीपुरम् का लेख); पां. चौथे से बना (चलती कलम से लिखने से); छ. ५४.
c28.s5.13
झ—ती. दूसरे से बना; चौ. तीसरे से बना.
c28.s5.14
ञ—ती. ५२ (कांचीपुरम् के लेख के ‘ज्ञा’ में); चौ. ५२ (कूरम् के दानपत्र के ‘ज्झ’ में); पां. ५३ (नंदिवर्मन् के दानपत्र के ‘ज्ञा’ में)
c28.s5.15
ट—दू. ५४ (नंदिवर्मन् का दानपत्र). ठ—मूल ब्राह्मी के समान.
c28.s5.16
ड—ती. ५३; चौ. ५४; पां. ५५ (शेविल्लिमेडु का लेख). ढ—दू. ४१; ती. ५४.
c28.s5.17
ण—ती. ५२ (मामल्लपुरम् के लेख); चौ. ५३ (मावलीपुरम् का लेख); पां. चौथे से बना.
c28.s5.18
त—ती. ५२; चौ. ५६.
c28.s5.19
थ—दू. ११ (कार्ला के लेख); ती. ५२ (कांचीपुरम् का लेख); चौ. ५२ (कूरम् का दानपत्र): पां. चौथे से बना.
c28.s5.20
द—दू. ५२ (मामल्लपुरम् के लेख); ती. ५३; चौ. ५६.
c28.s5.21
ध—ती. ४३ (पिकिर का दानपत्र); चौ. ५२ (कांचीपुरम् का लेख).
c28.s5.22
न—दू. १२ (जग्गयपेटा के लेख); ती. ५२ (कूरम् का दानपत्र); चौ. ५४ (पृथ्वीपति का दानपत्र); पां. ५६.
c28.s5.23
प—ती. ५४. फ—ती. ५३; चौ. ५६ (श्रीरंगम् का लेख).
c28.s5.24
ब—दू. १३; ती. १५; चौ. ५२ (कांचीपुरम् का लेख); पां. ५२ (कूरम् का दानपत्र).
c28.s5.25
भ—दू. ५२ (मामल्लपुरम् के लेख); ती. ५२ (कांचीपुरम् का लेख); चौ. ५२ (कूरम् का दानपत्र); पां ५६ (श्रीरंगं का लेख).
c28.s5.26
म—ती. ५२ (कूरम् का दानपत्र); चौ. ५४ (पृथ्वीपति का दानपत्र).
c28.s5.27
य—दू. ६ (वासिष्ठीपुत्र का लेख). र—चौ. ५५ (चिदंबरं का लेख).
c28.s5.28
ल—दू. ६; ती. ५२ (कांचीपुरम् का लेख); चौ. ५२ (कूरम् का दानपत्र).
c28.s5.29
व—ती. ५२ (कूरम् का दानपत्र); चौ. ५४ (पृथ्वीपति का दानपत्र).
c28.s5.30
श—ती. ५२ (कांचीपुरम् के लेख के ‘शू’ में); चां. ५३; पां. ५४ (पृथ्वीपति का दानपत्र).
c28.s5.31
ष—'ती.’५३ (नंदिवर्मन् का दानपत्र); चौ. ५५; पां. ५६.
c28.s5.32
स—दू. १२; ती. ५३ (नंदिवर्मन् का दानपत्र); चौ. ५३ (नारसिंगम् का लेख); पां. ५४ (पृथ्वीपति का दानपत्र).
c28.s5.33
ह—ती. ५२ (कूरम् का दानपत्र); चौ. तीसरे से बना.
c28.s5.34
ळ—दू. ५२; ती ५३; चौ. ५४ (नंदिवर्मन् का दानपत्र); पां. ५५ (उदयेंदिरम् का दानपत्र).
तामिळ लिपि की उत्पत्ति
c28.s6.1
तामिळ लिपि की उत्पत्ति में बहुधा प्रत्येक अक्षर के प्रारंभ के कुछ रूप वे ही हैं जो ग्रंथ लिपि की उत्पत्ति में दिये गये हैं; इस लिये उनको छोड़ कर बाकी के रूपों ही का विवेचन किया जायगा.
c28.s6.2
**अ**—चौ. ६१ (तिरुवेळ्ळरे का लेख); पां. ६० (कूरम् का दानपत्र).
c28.s6.3
**इ**—दू. ६; ती. १२ (जग्गय्यपेट के लेख); चौ. ६० (कूरम् का दानपत्र; दूसरे की तीनों वक्र रेखाओं को चलती कलम से मिला कर लिखने से).
c28.s6.4
**ई**—प. ६२; दू. पहिले से बना.
c28.s6.5
**उ**—ग्रंथ लिपि के समान.
c28.s6.6
**ए**—ती. १४; चौ. ६० (कशाक्कूडि का दानपत्र).
c28.s6.7
**ऐ**—दू. ३ (हाथीगुंफा का लेख); ती. ४५ (‘ए’ के साथ ‘ऐ’ की मात्रा जोड़ने से, लिपि-पत्र ३८ के ‘ऐ’ की नांई).
c28.s6.8
**ओ**—ती. ६० (उदयेंदिरम् का दानपत्र); चौ. ६२ (तिरुमलै के चट्टान का लेख).
c28.s6.9
**क**—दू. ६० (कूरम् का दानपत्र); ती. ६१ (वेल्लूर का लेख); चौ. ६२ (जंबुकेश्वर का लेख).
c28.s6.10
**ङ**—दू. पहिले से बना; ती. दूसरे से बना; चौ. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र).
c28.s6.11
**च**—दू. ६० (कूरम् का दानपत्र); ती. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र).
c28.s6.12
**ञ**—ती. ३८ (सिंहादित्य के दानपत्र के ‘झा’ में); चौ. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र).
c28.s6.13
**ट**—दू. ६० (उदयेंदिरम् का दानपत्र).
c28.s6.14
**ण**—ग्रंथ लिपि के समान.
c28.s6.15
**त**—ग्रंथ लिपि के समान.
c28.s6.16
**न**—चौ. ६२ (विरूपाक्ष का दानपत्र).
c28.s6.17
**प**—दू. ७.
c28.s6.18
**म**—दू. ६; ती. ५८ (देवेंद्रवर्मन् का दानपत्र); चौ. तीसरे से बना.
c28.s6.19
**य**—ग्रंथ लिपि के समान.
c28.s6.20
**र**—चौ. ५६ (श्रीरंगम् का लेख).
c28.s6.21
**ल**—दू. ६० (कूरम् का दानपत्र); ती. ६१ (तिरुवेळ्ळरे का लेख).
c28.s6.22
**व**—ग्रंथ लिपि के समान.
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