Pracin Bharatiya Veshabhusha c9: पाँचवाँ अध्याय : शुंगयुग की वेश-भूषा (ई० पू० दूसरी सदी)
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c9
- Language
- Hindi
Contents
- c9.s1 शुंगयुग में पुरुषों की वेश-भूषा — 10 parts
- c9.s2 दक्षिण भारत में पुरुषों की वेश-भूषा — 5 parts
- c9.s3 शुंगयुग की पगड़ियां — 43 parts
- c9.s4 शुंगयुग के सिले वस्त्र — 8 parts
- c9.s5 स्त्रियों की वेश-भूषा — 4 parts
- c9.s6 साधुओं की वेश-भूषा — 3 parts
- c9.s7 स्त्रियों के शिरोवस्त्र — 2 parts
- c9.s8 शुंगयुग में दक्षिणी स्त्रियों की वेश-भूषा — 2 parts
पाँचवाँ अध्याय : शुंगयुग की वेश-भूषा (ई० पू० दूसरी सदी)
c9.1
शुंगयुग की वेश-भूषा
c9.2
( ई० पू० दूसरी सदी )
c9.3
मौर्ययुग के अंत और शुंगयुग के आरंभिक वेश-विन्यास पर परखम और बरोदा (मथुरा म्यूजियम) से मिली यक्षमूतियों और दीदारगंज की यक्षिणी मूर्ति से काफी प्रकाश पड़ता है । इन मूर्तियों का समय विवादास्पद है पर ऐसा माना जाता है कि शायद ये मूर्तियां मौर्य युग के अंतिम चरण अथवा शुंग युग के आरंभ में बनी हों। ई० पू० पहली दूसरी शताब्दियों की वेश-भूषा पर पूरा प्रकाश भरहुत और सांची के अर्धचित्रों से पड़ता है।
c9.4
परखम की यक्षमूर्ति (आ० १३) १ एक धोती पहने है जो आगे चुन्नटदार है। धोती कमरबंद से बंधी है जिसके दोनों छोर घुटनों पर लटकते दिखलाये गये हैं। एक दुपट्टा छाती पर बंधा है जिसका फंदेदार छोर पेट पर लटक रहा है। बड़ोदे की यक्ष मूर्ति भी ऐसा ही दुपट्टा पहने दिखलायी गयी है२ ।
c9.5
इंडियन म्यूजियम की यक्षमूतियां जिन्हें श्री मजूमदार ने३ मौर्यकाल की ठहराया है परखम यक्ष जैसा ही कपड़ा पहने हैं। धोती फंदेदार कमरबंद से बंधी है जिसके दो फूंदनेदार छोर सामने लटक रहे हैं। पिछली ओर धोती जमीन तक पहुंचती है लेकिन अगली ओर नंगे पैर दिखलाने के लिए वह जरा उठी हुई दिखलायी गयी है। एक चौड़ा दुपट्टा (वैकक्ष्य) बांएं कंधे से हो कर दाहिने चूतर तक पहुंचता है। कंकण के पास यह फंदेदार है और पीछे लहराता हुआ है (आ० १४) ।
c9.6
३ मजूमदार, ए गाइड टु दि स्कल्पचर्स इन इंडियन म्यूजियम, पृ० ६
c9.7
उपरोक्त यक्ष मूर्तियां पगड़ी नहीं पहने हैं लेकिन इसी काल का सारनाथ से मिला एक शिर मुगलों जैसी अटपटी पगड़ी पहने है (आ० १५)४ ।
c9.8
४ कुमारस्वामी, वही, प्ले० ६, चि० १८
c9.9
मौर्य युग के अंतिम युग में स्त्रियों की वेश-भूषा का पता बेसनगर और दीदारगंज से मिली यक्षिणियों की मूर्तियों से लगता है। दीदारगंज की यक्षी एड़ियों तक पहुंचती एक
c9.10
१-२ कुमारस्वामी, हिस्ट्री ऑफ इंडियन एंड इंडोनेशियन आर्ट, प्ले० ५, १५
c9.11
साड़ी, जिस पर एक पंचलड़ी करधनी है पहने है। साड़ी से खोंसे हुए पटके का जिसे बौद्ध साहित्य में फासुका कहा गया है, एक छोर फंदेदार है। एक बटा हुआ दुपट्टा लटक रहा है (आ० १६)। बेसनगर५ की यक्षिणीमूर्ति घुटने के जरा नीचे पहुंचती हुई साड़ी और उसके ऊपर एक पंचलड़ी करधनी और फंदेदार कमरबंद जिसका एक फंदा नीचे लटक रहा है, पहने हुए है। साड़ी में खुंसे हुए पटके में चूंदन पड़ी हुई है६ (आ० १७)।
c9.12
६ वही, प्ले० ३, २
शुंगयुग में पुरुषों की वेश-भूषा
c9.s1.1
भरहुत (ई० पू० १३५-१५०) के अर्ध चित्रों में हमें तत्कालीन भारतीय वेश-भूषा का एक अच्छा चित्र मिलता है। आदमी धोती पहनते थे जिसका एक छोर कमर में लपेट लिया जाता था और लांग पीछे खोंस ली जाती थी। भरहुत के अर्धचित्रों में धोती, घुटनों के जरा नीचे और पैरों के मध्य भाग तक पहुंचती दिखलायी गयी है। धोती बिना किसी अलंकार के सादी होती थी। धोती के साथ लोग दुपट्टे, कमरबंद, पटके और पगड़ियां भी पहनते थे। नीचे के विवरणों से ई० पू० दूसरी शताब्दी में भारतीयों की वेश-भूषा स्पष्ट हो जायगी—
c9.s1.2
५ वही, प्ले० ५, १७
c9.s1.3
१—कामदार साफा, घुटने के नीचे लटकती हुई चपकी धोती, बटी हुई रस्सियों से बना कमरबंद जिसके दोनों छोर लटक रहे हैं (चुल्लवग में ऐसे कमरबंद को कलावुक कहा गया है); पटका जो पट्टियों पर सिली गुरियों से बना मालूम पड़ता है; बदन का ऊपरी भाग नंगा है; बांयें कन्धे पर पड़े हुए दुपट्टे का एक छोर पीछे लटक रहा है७ (आ० १८)।
c9.s1.4
७ कनिघम, भरहुत, प्ले० २२
c9.s1.5
२—घुटने की नीचे तक लटकती धोती, सकरमुद्दीदार कमरबंद जिसके दोनों छोरों में छीरें हैं; चूननदार एड़ियों तक लटकता हुआ पटका; दुपट्टा खिसक कर कमर पर आ गया है८ (आ० १९)।
c9.s1.6
८ वही, प्ले० २१
c9.s1.7
३—कामदार पगड़ी, दुपट्टा, पट्टी का बना कमरबंद, पटका (आ० २०)९।
c9.s1.8
९ वही, प्ले० १४
c9.s1.9
४—पगड़ी, गले में ढीला दुपट्टा जिसके लटकते हुए छोर तिकोने कटे हैं, कमरबंद के दोनों छोर एक बकसुए से निकलते दिखाये गये १० (आ० २१)।
c9.s1.10
१० वही, प्ले० २२, २
दक्षिण भारत में पुरुषों की वेश-भूषा
c9.s2.1
ई० पू० दूसरी सदी में दक्षिण भारत के लोगों की वेश-भूषा मध्यभारत वालों जैसी ही थी केवल उसमें कुछ स्थानिक भिन्नताएं अवश्य थीं। नीचे लिखे विवरणों से दक्षिणी पोशाक का पता चल जायगा—
c9.s2.2
१—अटपटी, पेंचोदार पगड़ी, घुटने तक पहुंचती चूननदार धोती, कमर फेंटे से लिपटा हुआ पटके का कुछ भाग (आ० २२)११।
c9.s2.3
११ बर्जेस, बुद्धिस्ट स्तूप ऑफ अमरावती एंड जग्गयपेट, प्ले० ५३
c9.s2.4
२—यक्ष (अमरावती), धोती, रस्सी का बना कमरबन्द जिसके दोनों छोरों पर फुंदने हैं कमरपेटी से लिपटा है१२।
c9.s2.5
१२ शिवराममूर्ति, अमरावती स्कल्पचर्स इन मद्रास म्यूजियम, प्ले० १८, १
शुंगयुग की पगड़ियां
c9.s3.1
शुंग युग में पगड़ियां दो तरह से बांधी जाती थीं। एक में१३ (आ० २३) बाल का सिर पर जूड़ा बांध दिया जाता था और पगड़ी के दो फेंटे मस्तक के ठीक बीच से ले जाकर जूड़ा ढक दिया जाता था और उसके दोनों छोर खोंस दिये जाते थे । भारी पगड़ी में पूरा सिर ढक दिया जाता था।
c9.s3.2
१३ कनिंघम्, भरहुत, प्ले० १५
c9.s3.3
भरहुत के अर्ध चित्रों में हम निम्न लिखित तरह की पगड़ियां देख सकते हैं
c9.s3.4
१—लट्टूदार साफा, बुंदकी और पत्तियों का काम, लट्टू में बेल बनी है (आ० २४)१४। २—भरभरा साफा जिसमें पेंची और झालर है (आ० २५)१५। ३—लट्टूदार भारी साफा जिसमें शायद झालर लगी थी (आ० २६)१६। ४—लट्टू के ऊपर चुनट, पीछे की ओर उभार (आ० २७)१७। ५—अटपटा साफा, ऊपर उठती झालर (आ० २८)१८। ६—हलका साफा, बायीं ओर की तहें कान तक आ गयी है (आ० २९)१९। ७—झालरदार सादा साफा२०।
c9.s3.5
१४ वही, प्ले० ३३, ३
c9.s3.6
१५ वही, प्ले० ३३, ४
c9.s3.7
१६ वही, प्ले० २४
c9.s3.8
१७ वही, प्ले० २१
c9.s3.9
१८ वही, प्ले० ५७
c9.s3.10
१९-२० वही
c9.s3.15
८—अटपटी लट्टूदार पाग जिसपर चौफुलिया बनी हैं२१।
c9.s3.16
९—छोटा झालरदार साफा, बायीं कनपटी के ऊपर तीन पेंच (आ० ३०)२२।
c9.s3.17
१०—अटपटी लट्टूदार पगड़ी (आ० ३१)२३।
c9.s3.18
११—अटपटी पगड़ी, छोर ऊपर निकला हुआ (आ० ३२)२४।
c9.s3.19
२४ वही, प्ले० ३४
c9.s3.20
१२—पगड़ी की झालर कान ढक रही है (आ० ३३)२५।
c9.s3.21
२५ वही, प्ले० २५, ३
c9.s3.22
१३—पेंची से सजी चूनरदार पगड़ी (आ० ३४)२६।
c9.s3.23
२६ वही
c9.s3.24
१४—कामदार साफा, जिसपर फूल पत्तियां बनी हैं (आ० ३५)२७।
c9.s3.25
२७ वही, २५, १
c9.s3.26
१५—कामदार साफे की दूसरी तरह (आ० ३६)२८।
c9.s3.27
२८ वही, प्ले० २४, २
c9.s3.28
१६—आभूषणयुक्त पगड़ी (आ० ३७)२९।
c9.s3.29
२९ वही, प्ले० २१
c9.s3.30
१७—झालरदार पगड़ी, एक छोर पंखानूमा है (आ० ३८)३०।
c9.s3.31
३० वही, प्ले० २०
c9.s3.32
१८—लंबोतरा साफा पीछे गरारीदार अलंकार (आ० ३९)३१।
c9.s3.33
३१ वही, प्ले० १४
c9.s3.34
१९—सादे साफे पर वृत्ताकार और पुष्पअलंकार (आ० ४०)३२।
c9.s3.35
३२ वही, प्ले० १७
c9.s3.36
२०—पगड़ी जिसका ऊपरी भाग पान के आकार का है (आ० ४१)३३।
c9.s3.37
३३ वही, प्ले० ३०
c9.s3.38
२१—साफा जिसके किनारे पर बेल बनी है (आ० ४२)३४।
c9.s3.39
२१ वही, प्ले० ४८
c9.s3.40
३४ वही, प्ले० ६२, ४
c9.s3.41
२२—भारी कामदार साफा (आ० ४३)३५।
c9.s3.42
२२-२३ वही, प्ले० ४४
c9.s3.43
३५ वही, प्ले० २२
c9.s3.44
२३—एक तरफ उभरा कामदार साफा (आ० ४४)३६।
c9.s3.45
३६ वही, प्ले० २२
c9.s3.46
२४—चौखूटा साफा जिसके दोनों कोर कान पर आ गये हैं (आ० ४५)३७।
c9.s3.47
३७ वही, प्ले० २०
शुंगयुग के सिले वस्त्र
c9.s4.1
यह तो निश्चित है कि शुंगयुग में सिले कपड़े पहने जाते थे, लेकिन सिले कपड़े इस युग के अर्ध चित्रों में कम दिखलाये गये हैं। इसका यह कारण भी हो सकता है कि सिले कपड़ों से अंग ढक देने से उसकी गठन खूबी से नहीं दिखलायी जा सकती थी। भरहुत के अर्ध चित्रों में कोटनुमा वस्त्र दो जगह दिखलाया गया है। एक जगह वटवृक्ष की पूजा करते हुए राजा का अनुचर कोट पहने दिखाया गया है३८। कोट का छोर गुलाई लिये है और उसका गला, बांहें, मोरियां और किनारे किसी फीते से अलंकृत हैं। कोट के साथ अनुचर धोती और साफा भी पहने है। एक द्वारपाल जिसकी तुलना डा० बरुआ उत्तरापथ के देवता पिहिर से करते हैं३९ (आ० ४६) आधी जंघा तक पहुंचता एक पूरी बांह का कोट पहने हैं। कोट में दो जगह बंद लगे हैं। गले के बंद में एकहरी सकरमुद्धी और पेट के बंद पर दोहरी सकरमुद्धी लगी है। इसका बाल ललाट पर एक चौड़ी पट्टी से बंधा है। धोती से पटका नीचे लटक रहा है। पैरों में पूरे बूट हैं। बायीं ओर परतले से एक कटार लटक रही है। कम से कम पोशाक से तो यह द्वारपाल गंधार का निवासी लगता है।
c9.s4.2
३८ बरुआ, भरहुत, २, प्ले० २०
c9.s4.3
३९ वही, प्ले० ६२, ७१
c9.s4.4
कुछ शुंग कालीन मिट्टी के खिलौनों से यह भी पता चलता है कि उस युग में कोट जैसे कपड़े पहनने की चलन किसी न किसी रूप में थी। भीटा से मिली एक मिट्टी की मनुष्य मूर्ति (आ० ४७)४० चुगे की तरह पूरे बांह का एक कोट पहरे है जो सामने से खुला है और जिसमें बांधने के लिए सकरमुद्धी लगी है।
c9.s4.5
४० ए० एस० आर०, १६११-१२, पृ० १-७४, प्ले० २३, १६
c9.s4.6
शुंग युग में कंचुक पहनने की भी प्रथा थी। सांची के स्तूप नं० २ पर एक सिंह से लड़ते हुए सिपाही की आकृति है। यह सिपाही आधे बांह का घुटनों तक लटकता कंचुक पहने है जो कमरबंद से बंधा है। इसके सिर पर फुलनेदार टोपी और पैरों में बूट हैं (आ० ४८)४१। इसी स्तूप के आलंबनवाह पर एक मनुष्य चूननदार कंचुक पहने दिखाया गया है४२।
c9.s4.7
४१ कुमारस्वामी, वही, प्ले० १४, ५१
c9.s4.8
४२ मार्शल, सांची, भा० ३, प्ले० ७८, १३ बी
स्त्रियों की वेश-भूषा
c9.s5.1
भरहुत के अर्धचित्रों में स्त्रियाँ पुरुषों की तरह धोती अथवा साड़ी पहने दिखलायी गयी हैं। आधुनिक साड़ी तो एड़ी तक पहुँचती है पर भरहुत के अर्धचित्रों में शायद ही कभी वह घुटनों के नीचे पहुँचती है; इसमें चूनन भी होती है। साड़ी भारी भरकम करधनी और कमरबंद से बंधी होती है । इस कमरबंद के फुदनेदार किनारे एक ओर लटकते हैं। कमरबंद से खुंसे दोनों पैरों के बीच में लटकते पटके पहनने की भी प्रथा थी। पटका साधारणतः लहरियादार होता, पर भारी पटका मनके पिरो कर भी बनता था। स्त्रियों के शरीर का ऊपरी भाग खुला हुआ दिखलाया गया है पर यक्षिणी चंदा के दाहिने स्तन के नीचे एक मलमली चद्दर की तह के निशान हैं। उनके सिर कामदार ओढ़नी से ढंके होते थे जो कामदार होती थी। स्त्रियाँ कभी कभी लीलावश पगड़ी भी पहन लेती थीं।
यक्षिणी चंदा की वेश-भूषा
c9.s5.t1.1
४३ — कनिंघम, वही
c9.s5.t1.2
चंदा की वेश-भूषा से शुंग युग की एक संभ्रांत नारी की वेश-भूषा का पता चलता है। उसकी धोती कमर तक पहुंचती है। इस पर खरबूजिया मनकों और चौखूटी तख्तियों से बनी एक सतलड़ी करधनी है। कमरबंद फुल्लों और पंजकों से सजा है और इसके किनारों पर दानेदार बेल बनी है। पटका लहरियादार है। उसके शरीर का ऊपरी भाग अनावृत है पर दाहिने स्तन के नीचे की रेघारियां शायद पतले चादर की द्योतक हैं, बाएं कंधे से मोती की बद्धी छाती पर जनेऊ की तरह पड़ी है। गले में छलड़ी तोक है जिसकी पहली लड़ में पत्र, अंकुश और श्रीवत्स के आकार के टिकरे हैं। दूसरी लड़ गोल मनकों की है। और लड़ें गोल तथा लंबोतरे मनकों से बनी हैं। गले में स्तनों के बीच लटकती हुई टिकरेदार मोहनमाला है। कानों में वप्रकुंडल (घुमावदार) हैं तथा मांग में सीसमांग। सिर एक झीनी ओढ़नी से, जिसके दोनों पल्ले एक दूसरे को पार करते हैं, ढका है। इस ओढ़नी में चौड़े किनारे हैं जिन पर चौफुलिया और सहरेसा की बेलें बनी हैं। हाथों में कड़े और चूड़ियां हैं। चोटी बेलदार फीते से गुथी है ।
c9.s5.t1.3
यक्षी (आ० ५०)४४। इस यक्षी के आकार की कल्पना भी शुंग कालीन नारी मूर्ति को लेकर हुई है। यक्षी के कमर में एक पतली साड़ी है जिसपर मुद्धीदार कमरबंद, करधनी और योगपट्ट हैं। कमरबंद फुल्ले और पंजकों से सजा है और उसके किनारे बुंदकीदार हैं। इसके छोर पर चौड़ी छींट है। चौलड़ी करधनी की प्रत्येक लड़ियां भिन्न हैं। एक चौखूटी तख्तियों से बनी है, दूसरी मौलसरी के फूल के आकार वाले दानों से, तीसरी खरबूजेदार मनकों से
c9.s5.t1.4
४४ — कनिंघम, भरहुत, प्ले० ५२
c9.s5.t1.12
और चौथी गोल मनकों से। कमर पर कमनीयता के लिए एक बटा हुआ तिरछा दुपट्टा बांध लिया गया है। पैर में चूड़ियां पड़ी हैं। दाहिने कंधे से होती हुई बद्धी की लड़ें छाती के आर-पार जाती हैं। बद्धी खड़े और पड़े मनकों से बनी मालूम पड़ती है। गले में चौलड़ा कंठा है। एक दूसरे माला की लटकन खारदार मणियों और त्रिरत्न से बनी है। कानों में तख्तीदार दोहरे कुंडल हैं। हाथ में कंगन और अंगुलियों में अंगूठियां हैं। ललाट पर फुल्ले के आकार की टिकुली है। गालों पर पत्रभंग बना है । चोटी सहरेसा और मौलसरी के फूलों के अलंकारों से सुसज्जित पतले फीते से गूथी है ।
c9.s5.t1.13
यक्षी चूलकोका (आ० ५१)४५—इसकी साड़ी घुटने तक की है। कमर पर गोल तख्तियों की बनी करधनी और मुट्ठीदार कमरबंद है, जिसके दोनों सिरों पर झीरे हैं। पटका कड़े खानेदार कपड़े का बना मालूम पड़ता है। सिर ओढ़नी से ढका है।
c9.s5.t1.14
४५ कनिंघम, वही, प्ले० २३
c9.s5.t1.15
सुदर्शना यक्षी—सिर पर ओढ़नी, घुटने के नीचे तक पहुंचती धोती, फूलदार पेटी, चुननदार पटका (आ० ५२)४६।
c9.s5.t1.16
४६ वही, प्ले० २३
c9.s5.t1.17
यक्षी—सिर पर ओढ़नी, हाथों पर सरकता दुपट्टा, बटा कमरबंद, मनकों से बना पटका (आ० ५३)४७।
c9.s5.t1.18
४७ वही, बटनमारा का खंभा
c9.s5.t1.19
सिरिमा देवता—पंजक से सजा कमरबंद, सतलड़ी करधनी, चुननदार करीने से पहनी गयी साड़ी (आ० ५४)४८।
c9.s5.t1.20
४८ कनिंघम, वही, प्ले० ५१, २
नर्तकी की वेश-भूषा
c9.s5.t2.1
सिर पर साफा, साड़ी मुट्ठीदार कमरबंद से बंधी है (आ० ५५)४९।
c9.s5.t2.2
४९ वही, प्ले० १५
एक साधारण स्त्री की पोशाक
c9.s5.t3.1
सादी साड़ी पर कमरबंद और करधनी (आ० ५६)५०।
c9.s5.t3.2
५० वही, प्ले० ८
c9.s5.t3.3
क्षुद्रघंटिका—कभी कभी स्त्रियां साड़ी पर घंटियों से बनी मेखलाएं पहनती थीं (आ० ५७)५१।
c9.s5.t3.4
५१ वही, प्ले० ५१
साधुओं की वेश-भूषा
c9.s6.1
साधु चादर और कोपीन पहनते थे (आ० ५८)५२। उनकी स्त्रियां चादर, साड़ी और एक शिरोवस्त्र पहनती थीं (आ० ५९)५३।
c9.s6.2
५२ वही, प्ले० ५१, १
c9.s6.3
५३ वही, प्ले० ५१, ५
स्त्रियों के शिरोवस्त्र
c9.s7.1
भरहुत के एक अर्धचित्र में दो स्त्रियां रूमालों से अपने सिर ढके हैं (आ० ६०-६१) एक तीसरी स्त्री पगड़ी पहरे है (आ० ६२)५४।
c9.s7.2
५४ वही, प्ले० १५
शुंगयुग में दक्षिणी स्त्रियों की वेश-भूषा
c9.s8.1
दक्षिण भारत में एक उच्च कुलीन नारी की ई० पू० दूसरी सदी की वेश-भूषा का पता हमें जगय्यपेट (गुंटूर जिला) से मिली एक यक्षी की मूर्ति से मिलता है५५। साड़ी केवल घुटने तक पहुंचती है। पैरों में भारी पाजेब है। करधनी लंबोतरे और चिपटे मनकों के दो लड़ों से बनी है। कमरबंद दो बक्सुओं के बीच से ऐसे निकाला गया है जिससे एक ओर तो फंदेदार छोर लटक रहा है और दूसरी ओर कमरबंद के दोनों छूट्टे सिरे जिनमें लंबी छीरें पड़ी हुई हैं। गले में केवल तौक है और कानों में कुंडल। चारखानेदार ओढ़नी से सिर ढका है। इसके किनारे पर खानों में फुल्ले बने हैं जो एक दूसरे से बेड़ी धारियों से अलग होते हैं (आ० ६३)।
c9.s8.2
५५ बर्जेस, दि बुद्धिस्ट स्तूप्स ऑफ अमरावती एंड जगय्यपेट, प्ले० ५
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