Pramāṇa · Search · About · API

Pracin Bharatiya Veshabhusha c13.s7: कीमती कपड़े

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c13.s7

Language
Hindi

कीमती कपड़े

c13.s7.1

६—आइणगाणि—चमड़े से बने वस्त्र१९। निशीथ में२० इसकी व्याख्या है 'अजिनं चम्मं तम्मि जे किरंति', अर्थात् अजिन मृगचर्म से बने वस्त्र होते थे। गुप्तकाल में लगता है शीतप्रधान प्रान्तों में पोस्तीन जैसा कोई कपड़ा पहना जाता था।

c13.s7.2

१९ आचारांग, २, ५, १, ३

c13.s7.3

२० निशीथ, ७, पृ० ४६७

c13.s7.4

७—सहिणगाणि—महीन सूत के बने वस्त्र२१। निशीथ२२ में यह वस्त्र सूक्ष्म कहा गया है।

c13.s7.5

२१ आचारांग, २, ५, १, ३

c13.s7.6

२२ निशीथ, ७, पृ० ४६७

c13.s7.7

८—सहिणकल्लण—आचारांग की टीका में इस वस्त्र की व्याख्या 'वर्णछद्यादिभिश्च कल्याणानि, शोभनानि वा' अर्थात् रंग और अलंकारों से युक्त वस्त्र किया गया है२३। निशीथ२४ में इसकी व्याख्या इस तरह से है, 'कल्लाणं स्निग्धं लक्षणयुक्तं वा किञ्चि सहिणं कल्लणं चोभयो' अर्थात् कल्याण का अर्थ चिकना अथवा नकाशीदार कपड़ा होता है, कहीं कहीं वस्त्र में चिकनाई और नकाशी दोनों होती है।

c13.s7.8

२३ आचारांग, २, ५, १, ३

c13.s7.9

२४ निशीथ, ७, पृ० ४६७

c13.s7.10

९—आयाणि—बकरे के रोएं से बने वस्त्र। आचारांग२५ में इस कपड़े की व्याख्या है—'क्वचिद्देश विशेषेऽजाः सूक्ष्म रोमवत्यो भवन्ति, तत् पक्ष्मनिष्पन्नानि आजकानि भवन्ति' अर्थात् किसी देश विशेष में बकरियां कोमल रोएं वाली होती हैं, उनके पश्म से बने कपड़े आजक कहलाते हैं। यहां आजक से पश्मीने का मतलब है और लगता है कि रांकव और आजक एक ही वस्त्र के पर्यायवाची हैं। निशीथ२६ में इस वस्त्र की अजीब व्याख्या है—'आयें णाम तोसलि विसये सीयतलाए अयाणं खुरेस सेवालतरीया लग्गंति तथा

c13.s7.11

२५ आचारांग, २, ५, १, ३

c13.s7.12

२६ निशीथ, ७, पृ० ४६७

c13.s7.13

वत्थं कीरंति' अर्थात् तोसलिविषय में ऋषितडाग के पास बकरियों के खुरों में एक तरह की सेवार फंस जाती है उसी से आजक बनता है । मतलब यह है कि ओड़ीसा में एक ऐसी सेवार होती थी जिससे आजक बनता था । वास्तव में चूर्णिकार को आजक के ठीक अर्थ का पता नहीं था, पर अर्थ करना जरूरी था और इसीलिए उसने कोरी कल्पना कर दी ।

c13.s7.14

१०—कायाणि—नीली रुई के सूत से बना कपड़ा । आचारांग की टीका२७ में इसकी व्याख्या है—'तथा क्वचिद्देशे इन्द्रनीलवर्णः कर्पासो भवति तेन निष्पन्नानि' अर्थात् किसी देश में इंद्रनील वर्ण की कपास होती है, उससे बना वस्त्र । यहां कोकटी जैसी किसी कपास से मतलब है । निशीथ२८ में इसकी व्याख्या है 'काकविसए काकजंघस्स जही मणी पडितो तटागे तत्थ रत्तानि जाणि ताणि कार्य भणंति, द्रुते वा काए रत्तं ।' काक विषय में काकजंघ की मणि जिस तालाब में मिलती है उससे रंगा वस्त्र अथवा रक्त की द्रुति से रंगा वस्त्र । इस व्याख्या का ठीक ठीक अर्थ समझ में नहीं आता ।

c13.s7.15

२७ आचारांग, २, ५, १, ३

c13.s7.16

२८ आचारांग, २, ५, १, ३

c13.s7.17

११—दुगुल्लाणि—दुकूल की व्याख्या आचारांग की टीका२९ में है 'गौड विषय विशिष्ट कार्पासिकं', अर्थात् गौड देश (बंगाल) में उत्पन्न एक विशेष तरह की कपास से बना वस्त्र । लेकिन निशीथ३० में दुकूल की कुछ और ही व्याख्या है—'दुगुल्लो रुक्खो तस्स वागो घेत्तूं उदूखले कुट्टइञ्जति पाणिएण ताव जाव भूसी भूतो ताहे कंप्पति दुगुल्लो' अर्थात् दुकूल वृक्ष की छाल ले कर पानी के साथ तब तक ओखली में कूटते हैं जब तक उसके रेशे अलग नहीं हो जाते । बाद में वे रेशे कात लिए जाते हैं । निशीथ की यह व्याख्या ठीक मालूम पड़ती है । अमरकोश में दुकूल क्षोम का पर्यायवाची है३१ और उसके आवरणों को निवीत और प्रावृत कहते थे । ऐसा लगता है कि लोग जब दुकूल के अर्थ भूल गए तब सभी महीन घुले वस्त्रों को दुकूल कहा जाने लगा३२।

c13.s7.18

३० निशीथ, ७, पृ० ४६७

c13.s7.19

३१ अ० को०, २, ६, ११२

c13.s7.20

३२ देखिए रघुवंश पर मल्लिनाथ की टीका, १, ६५

c13.s7.21

हंस दुकूल गुप्तयुग के वस्त्र निर्माण कला का एक उत्कृष्ट नमूना था । आचारांग३३ में एक जगह कहा गया है कि शक्र ने महावीर को जो हंस दुकूल का जोड़ा पहनाया था वह इतना हलका था कि हवा का मामूली झटका उसे उड़ा ले जा सकता था । इसकी बनावट की तारीफ कारीगर भी करते थे । वह कलाबत्तू के तार से मिला कर बना था और उसमें हंस के अलंकार थे । नायाधम्म कहाओ३४ के अनुसार वह जोड़ा वर्ण स्पर्श से युक्त, स्फटिक के समान निर्मल और बहुत ही कोमल होता था । दहेज में और कीमती कपड़ों के साथ दुकूल के जोड़े भी दिये जाते थे३५ ।

c13.s7.22

३३ आचारांग, २, १५, ९०

c13.s7.23

३४ नायाधम्म, १, १३

c13.s7.24

३५ अंतगडदसाओ, पृ० ३२

c13.s7.25

१२—पट्ट—रेशमी कपड़ा—आचारांग की टीका३६ में इसकी व्याख्या है 'पट्टसूत्र निष्पन्नानि' अर्थात् पट्टसूत्र से बने वस्त्र । बृहद् कल्पसूत्र भाष्य की टीका में भी इसकी यही व्याख्या है ।

c13.s7.26

३६ आचारांग, २, ५, १, ३

c13.s7.27

कपड़ों के भेद में जैसा हम ऊपर देख आये हैं अनुयोग द्वार३७ में कौडय भी आया है। इसके निम्नलिखित भेद गिनाये गए हैं, (क) मलय, (ख) अंशुक, (ग) चीनांशुक, और (घ) कृमिराग । बृहत् कल्पसूत्र भाष्य३८ में उपरोक्त रेशमी कपड़ों के अतिरिक्त पट्ट और सुवर्ण नामक रेशमी वस्त्रों के और उल्लेख हैं।

c13.s7.28

३७ अनुयोगद्वार, सू० ३७

c13.s7.29

३८ बृ० क० भा० ३, ३६६१

c13.s7.30

क—मलय—आचारांग३९ में इसकी टीका 'मलयज सूत्रो निष्पन्नानि' अर्थात् मलय सूत्र से बना वस्त्र किया गया है, लेकिन बृहत् कल्पसूत्रभाष्य के अनुसार यह रेशमी कपड़ा था । हो सकता है इस रेशम का नाम दक्षिण बिहार में जिसे मलय भी कहते थे पैदा होने से पड़ा ।

c13.s7.31

३९ आचारांग, ३, ५, १, ३

c13.s7.32

ख—अंशुक—बृहत् कल्पसूत्र भाष्य४० की टीका में इसे कोमल और चमकीला रेशमी कपड़ा कहा गया है । निशीथ४१ में इस शब्द की लंबी चौड़ी व्याख्या है—'अंसुयाणि कणगकंतानि, कणगखसियानि, कणगचित्ताणि, कणग विचित्ताणि' अर्थात् अंशुक में तारबाने का काम होता था, अलंकारों में जरदोजी (खचितानि) का काम तथा उसमें सोने के तार से चित्र विचित्र नकाशियां बनी होती थीं । उपरोक्त वर्णन से पता चलता है कि अंशुक किमखाव अथवा पोत जैसा कोई कपड़ा था । आचारांग में भी इसका उल्लेख है४२ ।

c13.s7.33

४० बृ० क० भा०, ४, ३६६१

c13.s7.34

४१ निशीथ, ४, पृ० ४६७

c13.s7.35

४२ आचारांग सूत्र, २, ५, १, ३

c13.s7.36

ग—चीनांशुक—बृहद् कल्पसूत्र भाष्य४३ में इसकी व्याख्या 'कोशिकाराख्यः कृमिः तस्माज्जातं' अथवा 'चीनानामजनपदः तत्र यः श्लक्ष्णतरपटः तस्माज्जातं'—अर्थात् कोशकार नामक कीड़े के रेशम से बना वस्त्र अथवा चीन जनपद के बहुत चिकने रेशम से बना कपड़ा है। निशीथ४४ में इसकी व्याख्या है 'सुहुमतरं चीर्णसुयं चीण विसए वा जातं

c13.s7.37

४३ बृहत् कल्पसूत्र, ४, ३६६१

c13.s7.38

४४ निशीथ, ७, पृ० ४६७

c13.s7.39

चीणांसुयम' अर्थात् बहुत पतले रेशमी कपड़े अथवा चीन के बने रेशमी कपड़े को चीनांशुक कहते हैं । उपरोक्त व्याख्याओं से पता चलता है कि बहुत पतले रेशमी कपड़े और चीन के रेशमी कपड़े दोनों को ही चीनांशुक कहते थे ।

c13.s7.40

घ—कृमिराग—किरिम दाना से बने गुलाबी रंग में रंगा हुआ रेशमी कपड़ा ।

c13.s7.41

ङ—सुवर्ण—बृहत्कल्पसूत्र भाष्य४५ की टीका में इसे सुनहरे रंग वाला रेशमी वस्त्र कहा गया है । यह रेशम के खास तरह के कीड़ों से बनाये कोशों से निकलता था । लगता है यहां आसाम के मूंगा रेशम से जिसका रंग सुनहला होता है तात्पर्य है ।

c13.s7.42

४५ —बृहत् क० सू० ४, ३६६१

c13.s7.43

१३—पत्रोर्ण—इसे आचारांग सूत्र४६ में पन्नुभ कहा गया है और यह छाल के रेशे से बना एक विशेष प्रकार का वस्त्र था । अमरकोश४७ में पत्रोर्ण एक तरह का रेशम कहा गया है । शायद यह किसी किस्म का जंगली रेशम रहा हो। अमरकोश के टीकाकार क्षीरस्वामी का कहना है इस रेशम को बड़ और लकुच की पत्तियां खाने वाले कीड़े पैदा करते थे ;

c13.s7.44

४६ —आचारांग, २, ५, १, ३

c13.s7.45

४७ —अमरकोश, डा० हरदत्त शर्मा द्वारा संपादित, पृ० १५७

c13.s7.46

उपरोक्त रेशमी कपड़ों में जो बेशकीमती होते थे उन्हें अमरकोश४८ ने महाधन की संज्ञा दी है ।

c13.s7.47

४८ —अमरकोश, २, ६, ११३

c13.s7.48

१४—देसराग—आचारांगसूत्र४९ में इसे केवल रंगीन कपड़ा कहा गया है पर निशीथ चूर्णि५० में इसका निम्नलिखित वर्णन है —'जत्थविसए या रंग विधितार देसा रत्ता देसराग', जरत् विषय में जो रंग विधि है उसके अनुसार रंगा हुआ वस्त्र। इससे यह पता लगता है कि जाटों के देश अर्थात् पूर्वी पंजाब तथा पश्चिमी युक्त प्रदेश में कपड़े रंगने की कोई ऐसी विशेष प्रथा थी जो सारे देश में मशहूर थी। हो सकता है देशराग का चुनरी रंगने से संबंध हो ।

c13.s7.49

४९ —आचारांग सूत्र, २, ५, १, ३

c13.s7.50

५० —निशीथ, ७, ४६७

c13.s7.51

१५—अमिला—आचारांगसूत्र५१ में तो इसे बकरे के चमड़े से बना कपड़ा कहा गया है पर यह अर्थ कोई संगत नहीं मालूम पड़ता। निशीथ चूर्णि५२ में इसका निम्नलिखित अर्थ दिया है, 'रोमेसुकता अमिला अथवा णिम्मला अमिला पट्टिणी सुघट्टिता ते परिभुज्ज माणा कडे कर्डेति', रोम से बना वस्त्र अमिला कहलाता है अथवा अमिला वह निर्मल वस्त्र

c13.s7.52

५१ —आचारांग, २, ५, १, ३—८

c13.s7.53

५२ —निशीथ, ७, ४६७

c13.s7.54

है जिस पर घोटे की कुंदी से कलफ आ गया है। उपरोक्त अर्थों को देखने से तो यही पता चलता है कि कुंदी किए हुए किसी विशेष तरह के वस्त्र से अमिल का तात्पर्य है ।

c13.s7.55

१६—गज्जफल—आचारांग५३ में इसे फड़फड़ाता कपड़ा कहा गया है । निशीथ चूर्णि में५४ इसी तरह का अर्थ है—‘समणं सद्दवं करेंति ते गज्जला’—सुनने में जो शब्द करे। लगता है कि वह लंकिलाट की तरह कोई कड़ा कपड़ा रहा होगा ।

c13.s7.56

५३ —आचारांग, २, ५, १, ३—८

c13.s7.57

५४ —निशीथ, ७, ४६७

c13.s7.58

१७—फालिय—आचारांग के५५ अनुसार यह स्फटिक के समान साफ और पारदर्शी कपड़ा था। निशीथ चूर्णि५६ में भी इसका यही अर्थ है और इसे फाडिग कहा है, ‘फडिगपहाणनिमा फडिंगा अच्छा’ इत्यर्थः’ स्फटिकशिलाके समान स्वच्छ । लगता है यह कोई बहुत ही महीन मलमल, जिसके लिए यह देश प्रसिद्ध था, रही होगी।

c13.s7.59

५५ —आचारांग, २, ५, १, ३—८

c13.s7.60

५६ —निशीथ, ७, ४६७

c13.s7.61

१८—काय—इस शब्द के अर्थ का पता नहीं है पर शायद यह काक विषय (पूर्वी मालवा) में बना कपड़ा हो५७ ।

c13.s7.62

५७ —आचारांग, २, ५, १, ३—८

c13.s7.63

१९—कोयवाणि—रोएंदार कंबल अथवा ऊनी वस्त्र५८ । निशीथ चूर्णि५९ इसे कोतव कहा गया है । आधुनिक थुल्मे की तरह यह कोई वस्त्र था ।

c13.s7.64

५८ —वही

c13.s7.65

५९ —निशीथ, ७, ४६७

c13.s7.66

१९—कंबलगानि—इसमें सभी तरह के ऊनी वस्त्रों, चादरों इत्यादि का समावेश हो जाता है६० ।

c13.s7.67

६० —आचारांग, २, ५, १, ३—८

c13.s7.68

२०—पावराणि६१—चादरें । यहां ओढ़ने और विछाने दोनों तरह की चादरों से मतलब है, पर निशीथ के अनुसार६२ यहां पांवर के अर्थ नील गाय के चमड़े से बनी चादर है ।

c13.s7.69

६१ —वही

c13.s7.70

६२ —निशीथ, ७, ४६७

c13.s7.71

उपरोक्त कपड़े कीमती होते थे इसीलिए जैन छेद सूत्रों में साधुओं के लिए इन्हें वर्ज्य माना है । जैन साधु निम्नलिखित खालें ओर लोइयां (आइण्णे पावराणि) भी बेशकीमत होने से नहीं खरीद सकते थे ।

Linked texts (6)