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Pracin Bharatiya Veshabhusha c12: आठवाँ अध्याय : गांधार, मथुरा और दक्षिण की कला में भारतीय वेश-भूषा

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c12

Language
Hindi

Contents

आठवाँ अध्याय : गांधार, मथुरा और दक्षिण की कला में भारतीय वेश-भूषा

c12.1

गांधार, मथुरा और दक्षिण की कला में भारतीय वेश-भूषा

c12.2

गांधार-कला में आयी उत्तर-पश्चिम भारत की वेश-भूषा मिश्रित है । धोती, दुपट्टा, चादर और पगड़ी जैसे शुद्ध भारतीय पहरावे के साथ साथ हम गांधार-कला में पायजामा, अंगरखा, कंचुक और कुलाह भी देखते हैं जो उत्तरापथ के निवासियों के पहरावे के खास अंग हैं । गांधार के पहरावे में यूनानी पहरावे का भी स्पष्ट प्रभाव है जो यूनानियों के साथ साथ इस देश में पश्चिमी एशिया से आया मालूम पड़ता है ।

राज पुरुषों का पहनावा

c12.s1.1

गांधार की मूर्तिकला में राजे और सामंत एड़ियों तक लटकती सिलवटदार धोती तथा कंधों को ढकती तथा बायीं बाहु पर होती पीछे फेंकी हुई चादर पहनते थे । चादर की सिलवटों को कड़ा बनाये रखने के लिए एक भारी वजन चादर में पीछे बंधा रहता था (आ० १२५)१ । चादर पहनने के इस तरीके में कलात्मक रेखाएं और सिलवटें पड़ती थी (आ० १२६)२ । कभी कभी चादर छाती नहीं ढकती थी (आ० १२७-१२८)३ । और कभी कभी वह पूरी छाती ढकती हुई केवल दाहिना कंधा खुला छोड़ देती थी (आ० १२९)४ । बैठने में चादर दाहिने कंधे और छाती को नहीं ढकती पर गोद में उसकी सुंदर सिलवटें देख पड़ती हैं (आ० १३०)५ । डोरी या गोंट के बने कमरबंद के दोनों झब्बेदार सिरे कमर से धोती को खिसकने से रोकने के लिए आगे लटकते रहते थे६ । गांधार में उच्चवर्ण के लोग चप्पियां अथवा खड़ाऊं पहनते थे । राजाओं के जूते रत्नजटित होते थे । कटियस के अनुसार राजा सुभूति ऐसे ही जूते पहनते थे७

c12.s1.2

२ फूशे, वही, आ० ४१६

c12.s1.3

४ फूशे, वही, आ० ३६२

c12.s1.4

५ ए० एस० आई० एन० रि०, १६११-१६१२, प्ले० ४०, ११

c12.s1.5

७ हिस्टो० अले०, ६।१।५

c12.s1.6

९ फूशे, वही, आ० ३६४, ३६६, ३६७

पगड़ियां

c12.s2.1

कभी कभी खुले सिर पर जूड़े मोती की लड़ों और रत्नों से सजे होते थे ८, लेकिन बहुधा लोग जूड़े के ऊपर पगड़ी पहनते थे (आ० १३१-१३३)६ । पगड़ियों के संबंध में एक उल्लेख- नीय बात यह है कि वे सिर पर टोपी की तरह पहनी जाती थीं१०। एक दृश्य में जहां सिद्धार्थ हामिनिष्क्रमण के लिए उद्यत हैं सारथि छंदक उनकी बंधी पगड़ी हाथ में लिए है११। यह पगड़ी किसी फूले कपड़ी की बनी है और उसका एक छोर पंखे के आकार में है। पगड़ी के फेंटों के अस्त व्यस्त न होने देने के लिए उस पर एक शीर्षपट्ट भी लगा हुआ है। आज दिन भी पंजाब और अफगानिस्तान में इस तरह की पगड़ी बांधी जाती है।

c12.s2.2

१ फूशे, ल' आर्त ग्रेकोबुधीक दु गंधार, भा० २, आ० ३६३, ४१७

c12.s2.3

३ फूशे, वही, आ० ४१५-१७

c12.s2.4

६ फूशे, वही, आ० ४१५

c12.s2.5

८ फूशे, वही, आ० ३६२, ३६५, ४१८ इत्यादि

c12.s2.6

१० फूशे, वही, भा० २, पृ० १८६

c12.s2.7

११ फूशे, वही, भा० १, आ० १७८ ए०, १८० बी; भा० २, आ० ४४७

c12.s2.8

शीर्षपट्ट बहुधा अलंकृत होते थे। कलकत्ता म्यूजियम में जलालाबाद के पास से मिले एक शीर्षपट्ट पर चूमते हुए मिथुन का चित्र है (आ० १३४)१२। शीर्षपट्ट कभी कभी सुपर्ण द्वारा अपहृत नाग के चित्र से भी अलंकृत होता था (आ० १३५)१३। कभी कभी इस पर बुद्ध मूर्ति भी खचित होती है (आ० १३६)१४। कभी कभी गोल शीर्षपट्ट सिंहमुख से अलंकृत होता है१५। कभी कभी इसके आकार से मोर के फैली पूंछ का बोध होता है। मोर की छाती और पीठ के उतार चढ़ाव का उपयोग सुनार सुंदर अलंकार बनाने के लिए करते थे (आ० १३३)१६। पंखे ऐसे फैले ऊपरी छोर के नीचे पगड़ी की फेंटें सजायी जाती थीं। कभी कभी इसके तीन फेंटें होते थे१७ और इसकी सजावट फेंटों के अंदर से बीचो-बीच जाते हुए एक सिकुड़े कपड़े से और अधिक बढ़ जाती थी। शीर्षपट्ट का मिथुन से सुसज्जित आधार पगड़ी के बीचोबीच लगा हुआ है। रत्नों और गरुड़ मूर्तियों से खचित एक पट्टी ललाट के चारों ओर है। ये पट्टियां और अलंकार दो बंधनों से जिनके छोर पीछे हवा में फड़फड़ा रहे हैं बंधे हैं (आ० १३१)१८।

c12.s2.9

१२ फूशे, वही, भा० १, पृ० १८१, नो० ३

c12.s2.10

१४ फूशे, वही, आ० ३६६, ४२६

c12.s2.11

१५ फूशे, वही, आ० ३०६, ४६५

c12.s2.12

१६ फूशे, वही, आ० ३६७

c12.s2.13

१७ फूशे, वही, भा० १, प्ले० १

c12.s2.14

१८ फूशे, वही, भा० २, आ० ३६३-६४

गंधार की मूर्ति कला में पगड़ियां

c12.s3.1

१—चक्करदार लट्टू वाली पगड़ी (आ० १३७)१९। २—हलकी पगड़ी जिनके दोनों छोर सिर पर आड़े बल होते हुए पीछे खोंस दिये गए हैं (आ० १३८)२०।

c12.s3.2

१३ फूशे, वही, भा० २, आ० ३२०, ३६८, ४१५

c12.s3.3

१९ ए० एस० आ० इ०, एन० रि०, १६१२-१३, प्ले० ६ ए

c12.s3.4

२० वही, १६१५-१६, प्ले० २० ई०

c12.s3.5

१३२

c12.s3.6

१३३

c12.s3.7

१३४

c12.s3.8

१३५

c12.s3.9

१३६

c12.s3.10

१३७

c12.s3.11

१३८

c12.s3.12

१३९

c12.s3.13

१४०

c12.s3.14

१४१

c12.s3.15

१४२

c12.s3.16

३—एक हल्की पगड़ी जिस पर एक तिकोना अलंकार लगा है (आ० १३९)२१ ४—एक हल्की मोटे फेंटों वाली पगड़ी जिसका सिर के ऊपर वाला सिरा पंखाकार है (आ० १४०)२२ ५—शीर्षपट्ट के साथ एक भारी पगड़ी जिसके लट्टू स एक एक मोती की लड़ दोनों ओर बंधी है (आ० १४१)२३।

c12.s3.17

२१ वही, प्ले० जे

c12.s3.18

२२ वही, १६११-१२, प्ले० ४२, १७

c12.s3.19

२३ वही, प्ले० ४०, १२

c12.s3.20

गंधार की मूर्तिकला में सेठ दाताओं को धोती, दुपट्टा और चादर पहने दिखाया गया है (आ० १४२)२४। यही पोशाक व्यापारियों२५ और गृहपतियों की भी थी२६। सरदी में वे कंचुक पहनते थे जिसके दाहिने२७ या बायें ओर२८ घुटनों के ऊपर एक कटाव होता था। एक चुस्त बाहों वाले लंबे कोट में गले से ले कर छाती के मध्य तक अथवा नाभि तक एक खड़ी पट्टी का मतलब शायद तुकमा-धुंडी की कतार से है२९। सहरी बहलोल से मिली एक दाता की मूर्ति एक चुस्त बाहों वाला कंचुक पहने है। चादर का एक कोना दाहिने कांख से निकाल कर बायें कंधे पर डाल दिया गया है जिससे छाती ढंक जाती है। वह एक चपकी टोपी भी पहने है (आ० १४३)३०। पुरुष शलवार भी पहनते थे जो इत्सिंग के अनुसार ईरान, तिब्बत, काशगर और तमाम तुर्किस्तान के पहरावे का एक अंग था। समूरी अस्तर वाला चोगा कभी कभी कंचुक के ऊपर पहन लिया जाता था (आ० १४४)३१

c12.s3.21

२४ फूर्शे, वही, आ० ३५०

c12.s3.22

२५ फूर्शे, वही, आ० ४४०

c12.s3.23

२६ फूर्शे, वही, आ० ३४५, ३४६

c12.s3.24

२७ फूर्शे, वही, आ० ३४६

c12.s3.25

२८ फूर्शे, वही, आ० ३५१, ३५३

c12.s3.26

२९ वही, भा० २, आ० ३७०

c12.s3.27

३० ए० एस० ई०, एन० रि०, १६११-१२, प्ले० ४१, १४

c12.s3.28

३१ फूर्शे, वही, आ० ३५२

सिपाहियों की वेश-भूषा

c12.s4.1

गंधार की मूर्तियों में दो तरह के सिपाही मिलते हैं जिनकी पोशाकें भिन्न भिन्न होती हैं (आ० १४५-१५०)३२। एक तरह के सिपाही तो लगता है किसी जंगली जाति के थे। धोती, पेटी, रस्सी का बना कमरबंद और दाहिने कंधे से छाती पर होते हुए कमरबंद से खुंसा दुपट्टा पहनते हैं (आ० १४५-१५०)। उनके बाल खुले अथवा पगड़ी से ढंके होते हैं। एक

c12.s4.2

३२ फूर्शे, वही, भा० १, आ० ३१, २०१, २०४, २६२

c12.s4.3

दूसरी तरह के सिपाही (आ० १४६-१४९)३३ शीर्ष कटाह या खोद और असीरिय ढंग का जिरह बस्तर पहने हैं३४। फूशे का विचार है ये भाड़े के सिपाही पश्चिम से आते थे३५। यह अधबहियां जिरह बस्तर घुटनों तक पहुंचता है। कड़ीदार जिरह बस्तर छाती पर बाहुओं पर कस कर बैठता था और उसकी कड़ियां सेहरे के आकार की (आ० १४९)३६ अथवा नग के आकार की (आ० १४८) होती थीं३७। ये कड़ियां तिब्बती अथवा जापानी जिरह बस्तरों की तरह एक दूसरे से पतली डोरियों से बंधी होती थीं। बहोलियों (आस्तीनों) के किनारे मजबूती के लिए रस्सियों से बंधे होते थे। घघरियाँ चौकोर चिप्पियों की समानांतर पंक्तियों से बनी होती थीं और इनके किनारे रस्सियों से मजबूती के लिए बंधे होते थे। सिपाही कमरबंद और परतले भी पहनते थे। वस्त्र का गला समभुज कोण (आ० १४९), अथवा अर्धवृत्ताकार होता था (आ० १४७)। इन बख्तरबंद सिपाहियों में हम दो प्रकार देख सकते हैं। इनमें एक तो पगड़ी कंचुक और धोती पहनता था (आ० १४९) और दूसरा यूनानी खोद और जूते। सिपाही कभी कभी जांघिया भी पहनते थे३८। पर जांघिया केवल सिपाहियों के पहरावे तक ही सीमित न था। समय आने पर सामंत और राजे भी उसे पहन सकते थे।

c12.s4.4

३३ वही, आ० २०२

c12.s4.5

३४ असीरिय जिरह बस्तर से तुलना के लिए देखो स्टाइन, एंशंट खोतान, पृ० २५२, प्ले० १६; रुइंस आफ डेसर्ट केथे, भा० १, पृ० ४४३, आ० १३८

c12.s4.6

३५ फूशे, वही, भा० २, पृ० ४०२

c12.s4.7

३६ फूशे, वही, भा० १, आ० २०२

c12.s4.8

३७ वही, भा० १, आ० २०४

c12.s4.9

३८ वही, भा० १, आ० २७०

शिकारियों इत्यादि की वेश-भूषा

c12.s5.1

गंधार की मूर्तिकला में हमें शिकारी के दो बार दर्शन होते हैं (आ० १५१)३९। वह केवल धोती पहरे दिखाया गया है। खेतिहर (आ० १५२)४० अथवा मजदूर (आ० १५३)४१ केवल एक छोटी धोती अथवा लंगोटी पहनते थे। पहलवान भी लंगोट ही पहनते थे४२। दंगल के वक्त शाक्य पुरुष जांघिया पहनते थे (आ० १५४)४३। ब्राह्मण और ब्रह्मचारी धोती और बाएं कंधे से लटकती चादर पहनते थे। उनके बाल पीछे लटकते थे पर सिर पर बद्ध शिखा होती थी (आ० १५५)४४।

c12.s5.2

३९ वही, भा० १, आ० १३८, १८७ बी

c12.s5.3

४० वही, भा० १, आ० १७५-७६

c12.s5.4

४१ वही, भा० १, आ० २६६; भा० २, आ० ३०२

c12.s5.5

४२ वही, भा० २, आ० ३०३

c12.s5.6

४३ वही, भा० १, आ० १७२

c12.s5.7

४४ वही, भा० २, आ० ४३१

टोपियाँ

c12.s6.1

विदेशी टोपियां पहनते थे। एक कुलाहनुमा टोपी जिसके पेंदे में चारों ओर गोट लगी रहती थी कभी कभी सिर पर पुलखे तौर से पड़ी रहती थी (आ० १५६)४५। कभी कभी टोपी की चोटी पर फुदने होते थे और वह अर्धचंद्र से भूषित होती थी। यह टोपी एक रूमाल से जिसके दोनों सिरे पीठ पर लहराते थे, सिर के साथ बंधी होती थी (आ० १५७)४६। एक गुंबद के आकार की टोपी जिसके सिरे पर सकरमुद्दीनूमा गांठ (सरकने वाली डेढ़ गांठ) पड़ी होती थी और जिसका किनारा मोतियों से सजा रहता था, पहनी जाती थी (आ० १५८)४७। कटावदार किनारे और गुम्मददार सिरे वाली टोपियां या खोद बहुधा विदेशी सिपाही पहना करते थे (आ० १५९)४८।

c12.s6.2

४५ वही, भा० २, आ० ३५४

c12.s6.3

४६ वही, भा० २, आ० ३५३

c12.s6.4

४७ ए० एस० आई० एन० रि०, १६११-१२, प्ले० ४०-५०

c12.s6.5

४८ ए० एस० आई० एन० रि०, १६१०-११, प्ले० ३२ सी०

स्त्रियों की वेश-भूषा

c12.s7.1

गंधार की कला में स्त्रियों की वेश-भूषा के तीन कपड़े स्पष्ट हैं—यथा आस्तीन वाले कंचुक, साड़ी जो सारे शरीर को ढंक लेती थी, और एक चादर अथवा दुपट्टा जो कंधों को ढांकता हुआ बाहुओं पर गिरता था (आ० १६०-१६१ ए० बी०)४९। कभी कभी चादर का एक छोर कमर में खोंस लिया जाता था (आ० १६२-१६३)५०। झुल्ला प्रायः घुटनों तक पहुँचता था (आ० १६४-१६५)५१ और अपवाद स्वरूप कभी कभी वह आगे खुला भी रहता था (आ० १६६)५२। इस पूरी बाहों वाले और कमर के जरा नीचे पहुंचते हुए खुले कोट की काट ऐसी होती थी जिससे नाभि खुली रह जाय। ऐसा लगता है कि यह कोट बीच में लगे एक बटन से बंद होता था । कभी कभी यह कोट एक चौथाई बांहों वाला होता था और नाभि तक पहुँचता था५३। एक दूसरी तरह का पूरी बाहों वाला कोट नाभि को ढक लेता था (आ० १६६)५४। कंचुक साड़ी के ऊपर या नीचे पहना जाता था५५। कभी कभी साड़ी पहनने के दोनों तरीके साथ साथ देख पड़ते हैं (आ० १६७-१६८)५६। स्त्रियों के कंचुक लंबे और कसे होते

c12.s7.2

४९ फूशे, भा० २, आ० ३३५, ३७८

c12.s7.3

५० फूशे, वही, भा० २, आ० ३१८, ३१६

c12.s7.4

५१ फूशे, वही, भा० १, आ० १०६; भा० २, आ० ३१६, ३३६

c12.s7.5

५२ फूशे, वही, भा० २, आ० ३३५

c12.s7.6

५३ ए० एस० आई०, एन० रि०, १६१६-२०, प्ले० ६

c12.s7.7

५४ वही, १६२५-२६, प्ले० ६६

c12.s7.8

५५ फूशे, भा० १, आ० १३६-१४०, २४४-४५; भा०, २, आ० ३१८-१६

c12.s7.9

५६ वही, भा० १, आ० १३३ बी

c12.s7.13

थे और उन पर सिलवटें पड़ती हैं (आ० १६९)५७। कभी कभी स्त्रियां स्तनपट्ट भी पहनती थीं५८।

c12.s7.14

५७ वही, भा० २, आ० ३१८, ३७४

c12.s7.15

५८ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३१६

c12.s7.16

गंधार की मूर्तियों और अर्धचित्रों से पता चलता है कि उस युग की स्त्रियां साड़ियां दो तरह से पहनती थीं। प्रायः साड़ी का एक भाग कमर में लपेट लिया जाता था और दूसरा हिस्सा चुन कर पीछे खोंस लिया जाता था (आ० १६३)५९। साड़ी पहनने की दूसरी रीति में साड़ी का एक सिरा कमर में लपेट लिया जाता था और दूसरा सिरा बायें कंधे पर डाल दिया जाता था (आ० १६२)६०। कभी कभी साड़ी इतनी बड़ी होती थी कि वह पैरों और शरीर को ढक लेती थी और उसका खाली हिस्सा आगे (आ० १७०)६१ या पीछे (आ० १७१)६२ लटका रहता था। साड़ी पहनने की एक तीसरी रीति में (आ० १६१ ए० बी०)६३ साड़ी का छूटा भाग स्तन पर होता हुआ बायें कंधे पर कांटे से लगा दिया जाता था। साड़ी का छूटा छोर कभी कभी साड़ी पर तिरछा डाल दिया जाता था जिससे दाहिना स्तन खुला रह जाता था (आ० १७२)६४। साड़ी ढीली तरह से भी पहनी जाती थी। ऐसी साड़ी का एक छोर जांघों में ऐसे लपेट लिया जाता था कि कमर खुली रह जाती थी। साड़ी का दूसरा छोर बायें हाथ से लिपटा हुआ उसी ओर लटका रहता था। साड़ी पहनने की इस रीति में बायीं छाती और पीठ खुली रह जाती थी (आ० १६६)। इस बात के भी उदाहरण हैं जब साड़ी चादर की तरह बायां कंधा ढाकते हुए पहनी जाती थी (आ० १७३)६५। दुपट्टा अथवा चादर अक्सर कंधों पर डाल दिये जाते थे और उसका एक छोर कमर के पास फेंटे में खोंस लिया जाता था। एक विचित्र ध्यान देने योग्य बात यह है कि गंधार की स्त्रियां आधुनिक दक्षिणी स्त्रियों की तरह सकच्छ साड़ी पहनती थीं। स्त्रियां अक्सर अपने बाल शेखरक से सजाती थीं, पर यदा कदा वे भारी काम के मुकुट भी पहनती थ (आ० १७४)६६।

c12.s7.17

५९ वही, आ० ३१८-३१६

c12.s7.18

६० फूर्शे, वही, भा० १, आ० १५२

c12.s7.19

६१ फूर्शे, वही, भा० १, आ० २६१

c12.s7.20

६२ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३७८

c12.s7.21

६३ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३७५

c12.s7.22

६४ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३७७

c12.s7.23

६६ ए० एस० आई०, एन० रि० १६११-१२, प्ले० ४१, १६

c12.s7.24

१५७

c12.s7.25

१५८

c12.s7.26

१५९

c12.s7.27

१६०

c12.s7.28

१६१ ए

c12.s7.29

१६१ बी

c12.s7.30

१६२

c12.s7.33

यवनी अथवा विदेशी स्त्रियाँ राजा के अंगरक्षिका का काम करती थीं६७। गंधार की कला में उनका चित्रण हुआ है। इनकी वेश-भूषा दो तरह की होती है यथा यूनानी अथवा भारतीय। यूनानी पोशाक में यवनियाँ घुटनों के कुछ ऊपर तक पहुँचता कंचुक तथा कमरबंद युक्त चुन्नटदार घाघरा पहनती हैं। कंधों पर पड़े दुपट्टे के दोनों सिरे कंचुक में लगी कड़ियों से निकलते हैं और स्तनों को ढाकते हुए कमरबंद में खुंस जाते हैं। वे कुलाहदार टोपियां भी पहनती हैं (आ० १७५)६८। दूसरी तरह की अंगरक्षिकाएं साड़ी पहनती है जिसका एक हिस्सा तो कमर से और दूसरा छुट्टा हिस्सा तिरछे बल छाती पर होता हुआ बायें स्तन को ढाकता है। वे शिखाकार बँधा हुआ एक ढीला कमरबंद और एक भारी चादर अथवा दुपट्टा भी पहनती हैं (आ० १७६)६९।

c12.s7.34

६७ मेगस्थनीज, फे० २३; स्त्राबो, १५।१।५५, सिलवांलेवी, ल थियेत्र आंदियां, २६, १२६, २४६; अर्थशास्त्र, १, २१; जातकमाला, पृ० १८५

c12.s7.35

६८ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३४२

c12.s7.36

६९ फूर्शे, वही, भा० २, आ० ३४३

कुषाणयुग की मथुरा की मूर्तिकला में प्रदर्शित वेश-भूषा

पुरुषों की वेश-भूषा

c12.s8.t1.1

मथुरा के कुषाणयुग की मूर्तिकला में तत्कालीन भारतीयों और विदेशियों की वेश-भूषा संबंधी प्रचुर सामग्री है। भारतीय प्रायः सकच्छ धोती, जिसका अधिक हिस्सा कमर में लिपटा होता था और बायीं ओर फंदेदार हो जाता था, पहनते थे७०। वे कंधों पर होता तथा केहुनियों पर गिरता दुपट्टा और नाभि के पास खुंसा और घुटनों के बीच लटकता पटका भी पहनते थे (आ० १७७)। कभी कभी उच्च वर्ग के नागरिक अपनी धोती खिसकने से बचाने के लिए शिखाकार मुट्ठीवाला कमरबंद जिसका एक झब्बेदार छोर पैरों के बीच में लटका करता था, पहनते थे। वे एक तरह का दुपट्टा भी पहनते थे जिसका एक सिरा बायें कंधे से पीठ पीछे होता हुआ तथा दाहिने घुटने को ढाकता हुआ फंदे के आकार का हो कर बायीं कलाई पर स्थिर हो जाता है (आ० १७८)७१। कभी कभी रस्सी की तरह बटा कमरबंद ढीली तरह से पहना जाता था (आ० १७९)७२। दुपट्टे और कमरबंदों के पहनने के और बहुत से तरीके दिखाये गये है (आ० १८०-१८३)७३। कमरबंद के कई फंटों से बंधी लुंगी घुड़सवार, सईस इत्यादि पहनते थे (आ० १८४)७४।

c12.s8.t1.2

७० फोगेल, ला स्कल्पत्यूर द मथुरा, प्ले० ७, सी० डी०

c12.s8.t1.3

७१ वही, प्ले०, ३५ बी०

c12.s8.t1.4

७२ वही, प्ले० २१ बी०

c12.s8.t1.5

७३ ए० एस० आई० एन० रि० १६११-१२, प्ले० ५७, आ० १२-१५

c12.s8.t1.6

७४ फोगेल, वही, प्ले० ८ बी०

c12.s8.t1.8

१७७

c12.s8.t1.9

१७८

c12.s8.t1.10

१७९

c12.s8.t1.11

१८०

c12.s8.t1.12

१८१

c12.s8.t1.13

१८२

c12.s8.t1.14

१७३

पगड़ियां

c12.s8.t2.1

पुरुष प्रायः पगड़ी अथवा उष्णीष पहनते थे। यह पगड़ी प्रायः सादे कपड़े की लंबी छीर या पट्टी से बनी होती थी और मस्तक पर जूड़े के चारों ओर लपेट ली जाती थी (आ० १८५)७५। पर रईस लोग प्रायः कामदार पगड़ी जिन पर सोने के वृत्ताकार शीर्षपट्ट लगे होते थे पहनते थे (आ० १८६)७६। कभी कभी शीर्षपट्टे चपकनदार और बदामा आकार के होते थे (आ० १८७)७७। कभी कभी फूलों से सजी एक धातु की पट्टी से लगा शीर्षपट्ट पगड़ी पर पहन लिया जाता था (आ० १८८)७८। कभी कभी बदामा शीर्षपट्ट कलंगी जैसे आभूषण से सज्जित होता था (आ० १८९)७९।

c12.s8.t2.2

७५ स्मिथ, जैन स्तूप ऑफ मथुरा, प्ले० १६, २

c12.s8.t2.3

७६ वही, प्ले० १०१, १

c12.s8.t2.4

७७ वही, प्ले० ६४

c12.s8.t2.5

७८ फोगेल, वही, प्ले० ३६ बी०

c12.s8.t2.6

७९ अग्रवाल, हेडबुक ऑफ दि कर्जन म्यूजियम ऑफ ऑर्कियोलोजी, मथुरा, प्ले० १६, ३३

c12.s8.t2.7

एक दूसरे तरह के पहिरावे में जो शक राजाओं और सिपाहियों को प्रिय था कंचुक, शलवार, टोपी और पूरे पैर के जूते होते थे। शकों की प्रतीक वेश-भूषा का चित्र हमें मथुरा के पास माट से मिली कनिष्क की बे सिर वाली मूर्ति से मिलता है। मूर्ति का दाहिना हाथ गदा पर और बायां तलवार की मूठ पर है। घुटने के नीचे तक पहुंचता कंचुक एक कमरपेटी से जिसके दो चौकोर टिकरे सामने देख पड़ते हैं बंधा है। कमरपेटी का बाकी हिस्सा एक चोगे से जो कंचुक से बड़ा है और घुटनों के नीचे तक पहुंचता है ढका हुआ है। कंचुक और चुगा सादे कपड़े के बने मालूम पड़ते हैं। मूर्ति के तस्मेदार भारी बूट हमारा ध्यान खींचते हैं (आ० १९०)८०। ऐसे जूतों को बृहद् कल्पसूत्रभाष्य में कफुस्स कहा गया है जो ईरानी कफ्स का अपभ्रंश मात्र है।

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८० ए० एस० आई०, एन० रि०, १६११-१२, पृ० १२२; प्ले० ५३, ३

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मथुरा में मिली एक दूसरे शक राजा की मूर्ति एक कंचुक पहने हैं जिसमें छाती के नीचे तीन इंच चौड़ी दोहरी कामदार गोट घुटनों से होती हुई नीचे चली गयी है। दाहिनी मोहरी में भी ऐसी ही गोट लगी है। पूरे कंचुक में जामदानी मलमल की तरह फुल्ले और दाहिनी मोहरी के सिरे पर तीन इंच व्यास का एक उभरा वृत्त हैं। आधुनिक कोट की तरह कंचुक के दोनों भाग गले के ठीक नीचे जुट कर कुछ नीचे जुटते हैं, पर इस कंचुक और आधुनिक कोट में यह अंतर है कि कंचुक में न तो गला है न लौटन (लेपल्स)। ऐसी अवस्था में गले के स्थान पर एक त्रिभुजाकार कटाव पड़ जाता है जिसमें से हम गले के चारों ओर पतली सिलाई वाला नीचे का वस्त्र देख सकते हैं। बूट आगे ऊपर तक तीन इंच चौड़ी पट्टियों से

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८१ बृहद् कल्पसूत्र भाष्य

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१८४

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१८५

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१८६

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१८६

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१९०

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सजे हैं। एड़ी से जरा हट कर एक तस्मा है। जूतों के साथ रकाब जैसी वस्तु भी लगी है (आ० १९१)८२।

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८२ ए० एस० इ० रि, १६११-१२, पृ० १२४, प्ले० ५४, ४-६

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मथुरा की मूर्तिकला में एक और तरह का कंचुक आया है जो घुटने तक पहुँचता है (आ० १९२ ए० बी०)८३। यह कंचुक कारचोबी गोट से सजा है। कमरपेटी गोल और चौखूंटे टिकरों से बनी है । टिकरे अलंकारिक मत्स्य और कुलाह पहने अश्वारोहियों की आकृति से सजे हैं। ये दोनों अलंकार कुषाणयुग में साधारणतः व्यवहार में आते थे८४।

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८३ वही, प्ले० ५५, ७-८

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८४ वही, पृ० १२५

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मथुरा से मिली सूर्य की एक बैठी प्रतिमा एक छोटी बहोलियों वाला तथा शरीर और बाहुओं पर चुस्ती से बैठने वाला कंचुक पहने है (आ० १९३)८५। इसका गला गोल है तथा मोहरियों पर किनारेदार गोट है। कंचुक के बीच में भी ऊपर से नीचे तक गोट लगी है । दोहरे फेंटे वाले कमरबंद में एक छुरा खुंसा है। टोपी पर गया हुआ काम है ।

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८५ वोगेल, वही, प्ले० ३३ बी०

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एक दूसरी मूर्ति जो दाढ़ी और घुंघराले बाल से एक शक अथवा ईरानी की मूर्ति प्रतीत होती है एक गहरा काम किया हुआ कंचुक पहने है । कारचोबी के अलंकार मेहराबदार खानों में बने हैं। बुंदकीदार (Beading) अथवा डोरीदार काम एक बिचले खाने को जिसके चारों ओर सीधी और खड़ी रेखाओं और बिंदुओं से छोटे खाने भरे हुए हैं, घेरे हुए हैं। रुमाल पीठ पर गिरता हुआ दिखलाया गया है, और इसके दोनों सिरे छाती पर बायीं ओर पहने हुए एक दूसरे छेद से निकाल दिये गए हैं । कुलाहनुमा टोपी के किनारे पर काम किया हुआ है उसके दाहिनी ओर चंद्रमा और सूर्य की प्रतिकृतियां बनी हुई हैं (आ० १९४)८६।

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८६ वासुदेवशरण अग्रवाल, वही, प्ले० २१, आ० ४१

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विदेशी ईरानी अथवा शक प्रायः टोपियां पहनते थे । मथुरा से मिला हुआ एक मूर्ति का सिर एक कुलाहनुमा टोपी, जो सिरा जरा आगे झुकने से पीछे की ओर टेढ़ी पड़ जाती है पहने है। (आ० १९५)८७। टोपी के बायें हिस्से पर संकेत नाम (मोनोग्राम) जैसा कसीदा किया हुआ है । टोपी नमदे अथवा कपड़े के दो टुकड़ों को सी कर बनी है । टोपी में यह सिलाई सिरे से लेकर नीचे तक साफ साफ दिखलायी देती है । टोपी का किनारा एक गोट से जिसमें छोटे छोटे टुकड़ों की तीन पंक्तियां है सजा है । शायद इन टुकड़ों से रत्नों का मतलब हो (आ० १९६)८८। एक कुलाहनुमा टोपी जिसका सिरा पीछे की ओर झुकने से

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८७ फोगेल, वही, प्ले० ४ ए०

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८८ वही, प्ले० ४ बी०

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१२२ ए०

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१२२ बी०

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उसमें कुछ बल आ गया है अक्सर पहनी जाती थी (आ० १९७)८९। टोपी के दाहिने ओर एक अर्धचन्द्र बना है और बायीं ओर एक अलंकार है जो मोनोग्राम सा लगता है (आ० १९८)६०। इस टोपी का आधुनिक मिस्र और भारत में पहने जाने वाली तुर्की टोपी से काफी साम्य है।

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८९ वही, प्ले० ४ सी०

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६० वही, प्ले० ४ डी०

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एक दिल्लीवाल पगड़ीनुमा टोपी भी पहनी जाती थी। इस टोपी की छत तो अर्धवृत्ताकार है और छज्जा उलटा हुआ है (आ० १९९)६१। इस टोपी की बनावट अजंटा में ईरानियों की टोपी की बनावट से बहुत मिलती है। आज दिन भी भारत का पारसी समाज ऐसी ही टोपी पहनता है। दिल्लीवाल पगड़ी भी लगता है इसी टोपी से निकली है। सूर्य की मूर्ति एक विचित्र टोपी पहने है (आ० २००)६२। टोपी की छत गोल और चपटी है। और पूरी टोपी ज्यामितिक आकृतियों और पुष्पालंकारों से सजी है।

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६१ अग्रवाल, वही, प्ले० १३, आ० २६

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६२ फोगेल, वही, प्ले० ३३ बी०

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मथुरा की मूर्तिकला में स्त्रियां प्रायः एड़ी तक पहुंचती साड़ियां जिनके ऊपर स्थान-च्युत होने से बचाने के लिए अनेक लड़ों वाली करधनियां होती हैं, और तहदार दोनों कंधों को ढकते हुए नीचे लटकने वाले दुपट्टे पहिनती थीं (आ० २०१-०४)६३। लेकिन अक्सर दुपट्टा नहीं भी पहना जाता था। उसे उमेठे हुए कमरबंद से कमर के दोनों ओर फंदे पड़ते हुए बांधा जाता था। साड़ी की खूबसूरती इससे बढ़ जाती थी (आ० २०५)६४। कभी कभी कमरबंद का लंबा सिरा कमर से बांध लिया जाता था और झब्बेदार छोटा सिरा सामने लटकता हुआ छोड़ दिया जाता (आ० २०६)६५ था। कभी कभी कमरबंद दोहरा कर के उसका निचला भाग कमर में नाभि के पास खोंस लिया जाता था और उसमें दोनों सिरे खाली छोड़ दिए जाते थे (आ० २०७)६६। दूसरी जगहों में कमरबंद के झब्बेदार सिरे मोड़ कर दायीं ओर खोंस लिए जाते थे और तब कमरबंद के कुछ भाग को मोड़ कर नाभि के पास साड़ी में खोंस लिया जाता था। कमरबंद का छुट्टा सिरा बायें हाथ में जान बूझ कर पकड़ लिया जाता था (आ०२०८)६७। पटका पहनने की भी बहुत सी रीतियां थीं (आ० २०९-२१२)६८।

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६३ फोगेल, वही, प्ले० ७ ए० और बी०

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६४ वही, प्ले० १६ बी०

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६५ वही, प्ले० ५० ए० बी०

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६६ वही, प्ले० १७ ए०

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६७ वही, प्ले० १८

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६८ वही

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मध्यकालीन उत्तर और पश्चिम भारत में स्त्रियां प्रायः लहंगा पहनती थीं और आज दिन भी पश्चिमी युक्त प्रान्त, राजपूताना, मालवा तथा गुजरात में यह प्रथा जारी है। जहां तक हमें पता चलता है सब से पहले लहंगा कुषाणयुग की मूर्तिकला में दीख पड़ता है। इस युग की मूर्तियों में आये वेश-विन्यास से यह प्रायः निश्चित हो जाता है कि लहंगा पहनने की प्रथा साधारण न हो कर अपवाद स्वरूप थी। ऐसा लगता है कि इस युग में ग्वालिनें और उन्हीं की श्रेणी की स्त्रियां लहंगा पहनती थीं। मथुरा में जमालपुर के पास से मिली एक स्त्री मूर्ति शायद ग्वालिन की है (आ० २१३)। वह दाहिने हाथ से बेंत की बनी गेंडुरी पर स्थिर सिर पर घड़ा पकड़े है। नाभि के जरा नीचे तक उसका शरीर अनावृत्त है पर उसके बाद लहंगा शुरू होता है यह लहंगा वैसा भारी भरकम नहीं है जैसा आज दिन भी मथुरा के आसपास पहना जाता है। इसमें उतनी कलियां भी नहीं हैं। लहंगा कमर पर सीधा है और निचले भाग में केवल एक घेर पड़ता है। लहंगे का बड़ा जोड़ ओर से छोर तक ठीक बीचोबीच हो कर जाता है।

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मथुरा की स्त्रियां, कम से कम जैसा उनका मथुरा की मूर्तिकला में प्रदर्शन हुआ है, कंचुक या चोली नहीं पहनतीं। लेकिन इसके अपवाद स्वरूप आपानक दृश्यों में स्त्रियां सिले कपड़े पहने दिखलायी गयी हैं। ये स्त्रियां कमर तक कसा कंचुक जिनका घेर चूनतदार होता है (आ० २१४-२१५)६६ पहनती हैं। मथुरा से मिले एक मूर्ति के पादपीठ पर जिस पर कुषाण संवत् का उन्यासीवां वर्ष है, अंकित कुछ स्त्री मूर्तियां कंचुक पहनती हैं। कंचुक के ऊपर वे साड़ी भी पहनती हैं। इस साड़ी का एक भाग तो वह कमर में लपेट लेती थीं और उसका दूसरा भाग बायें स्तन को ढांकते हुए बायें कंधे पर डाल लेती थीं (आ० २१६)१००। साड़ी पहनने का यह ढंग गंधार में साड़ी पहनने के ढंग से मिलता जुलता है। हो सकता है ये स्त्रियां गंधार की ही हों।

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६६ वही, प्ले० ४७, आ० ए०

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१०० वही, प्ले० ६० बी०

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खूब कामदार कंचुक शक अथवा ईरानी स्त्रियां कभी कभी पहनती थीं। मथुरा के पास जमालपुर के टीले से मिले हुए एक वेदिकास्तंभ पर, जो अब लखनऊ म्युजियम में है, धूपदानी लिए हुए दाहिनी ओर जाती हुई एक स्त्री का चित्र है (आ० २१७)१०१। वह लोटे हुए छज्जों वाली एक टोपी और पैर तक पहुंचता एक कंचुक पहने है। कंचुक के बीच में गले से लेकर अंत तक एक पट्टी या गोट है। लेकिन इस कंचुक की सब से खास बात तो उस पर कसीदा किये अथवा बुने हुए अलंकार हैं। पूरा कंचुक का कपड़ा बारह पड़ी पट्टियों में बंधा हुआ है जिनमें शाखें और फुल्ले बने हुए हैं। कोई भी प्रतिकृति इस अलंकार

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१०१ स्टेला कामरिश, ग्रुंडत्सुगे डर इंडिशेन कुंस्ट प्ले० १६

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२१२

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२१३

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२१४

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२१५

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२१६

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२१७

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की खूबसूरती नहीं दिखला सकती। लगता है कंचुक का कपड़ा वही पुष्पपट्ट है जिसका उल्लेख इस काल के साहित्य में आता है ।

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जैसा कि मथुरा की मूर्ति कला से पता चलता है स्त्रियां अपने सिर इसलिए नहीं ढांकती थीं कि लोग उनकी सुंदर केश रचना देख सकें । लेकिन कुछ स्त्रियां पीछे लहराती ओढ़नी भी ओढ़ती थीं[^१०२ ।] एक जगह एक परिचारिका लट्टूदार पगड़ी१०३ जिसका सिरा पीछे लटक रहा है पहरे देख पड़ती है । एक दूसरी स्त्री पाग पहने है (आ० २०७)

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१०२ स्मिथ, वही, प्ले० ३४-३५

c12.s8.t2.74

१०३ वही, प्ले० १४

दक्षिण भारत की वेश-भूषा

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जैसा हम देख आये हैं इस युग में दक्षिण भारत की वेश-भूषा का आनुषंगिक रूप से उल्लेख हम दक्षिण के संगम युग के साहित्य में पाते हैं। यह हमारा भाग्य है कि अमरावती नागार्जुनी कोंडा, ओर गोल्ली से मिले हुए अर्धचित्र तत्कालीन आचार विचार ओर वेश-भूषा को अक्षुण्ण बनाये रखते हैं । इन अर्धचित्रों से हम तत्कालीन वेश-भूषा का जीता जागता चित्र खींच सकते हैं । अर्धचित्रों में अंकित दक्षिण भारत के लोग उत्तर भारत के लोगों की तरह एड़ी के जरा ऊपर तक पहुंचती धोती पहनते हैं। एक चुना हुआ अंश नाभि के पास कमर में खोंस लिया जाता है ओर लांग पीछे खोंस ली जाती है (आ० २१८)[^१०५ ।] धोती पहिरने के दूसरे ढंग में धोती घुटनों तक पहुंचती है (आ० २१९)[^१०६ ।] तीसरी रीति में चुना हुआ धोती का अंश जांघों के बीच से होकर पीछे खोंस लिया जाता था(आ० २२०-२२१)[^१०७ ।] कमरबंद बांधने की अनेक कलात्मक रीतियां थीं। एक रीति में कमरबंद का एक फेंटा दोनों सिरों को छोड़ कर बांध लिया जाता था, दूसरा फेंटा मोड़ कर कमर पर खोंस लिया जाता था (आ० २२०) । एक दूसरी रीति में कमरबंद का एक फेंटा बांध लिया जाता था ओर छुट्टा हिस्सा मोड़ लिया जाता था, दूसरा हिस्सा पहले फेंटे से तीन फेरे निकाल कर लटका दिया जाता था (आ० २२२)[^१०८ ।] तीसरी रीति में कमरबंद एक फेंटे का होता है और इसके छूट्टे सिरे मोड़ कर कमर के अगल बगल खोंस लिये जाते हैं (आ० २१८) । चौथी रीति में कमरबंद के एक सिरे की दाहिनी ओर सकरमुद्धी बना ली जाती है इसका एक सिरा तो

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१०४ फोगेल, वही, प्ले० १७ ए०

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१०५ फर्गूसन, वही, प्ले० १५, आ० ३

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१०६ वही

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१०७ वही, प्ले० ७४; ६३, २

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१०८ वही, प्ले० ६१-३

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२१८

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२१९

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२२०

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२२८

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२२९

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२३०

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२३१

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लटका करता है और दूसरा बायें हाथ में होता है१०६। एक पांचवें तरह का कमरबंद रस्सियों का बना होता है जिसके दोनों सिरों पर झब्बे होते हैं (आ० २२३)११०। नाचने की मुद्रा में कमरबंद के इन मोड़ों से नर्तक की सादी वेश-भूषा में एक गति आ जाती थी (आ० २२४)१११।

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१०६ शिवराम मूर्ति, अमरावती स्कल्पचर्स इन दि मद्रास गवर्नमेंट म्यूजियम, प्ले० ८, २५

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११० शिवराम मूर्ति, वही, प्ले० ८, ३१

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१११ लांगहर्स्ट, दी बुद्धिस्ट एंटीक्वीटीज फ्रॉम नागार्जुनीकोंड, प्ले० २२ ए०

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दुपट्टे या चादर पहनने की रीति कम थी। छाती पर तिरछा जाता हुआ और बायें कंधे पर पड़ा हुआ दुपट्टा कभी कभी देख पड़ता है (आ० २२५-२६)११२। कभी कभी कटा हुआ दुपट्टा परतले की तरह छाती पर पहरा जाता था (आ० २२७)११३। दुपट्टा कभी कभी गले और कंधों पर भी डाल लिया जाता था (आ० २२८)११४।

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