भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c25: १९—ब्राह्मी और उससे निकली हुई लिपियों के अंक
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c25
- Language
- Hindi
Contents
- c25.s1 प्राचीन शैली के अंक — 86 parts
- c25.s2 नवीन शैली के अंक — 25 parts
- c25.s3 शब्दों से अंक बतलाने की भारतीय शैली — 15 parts
- c25.s4 अक्षरों से अंक बतलाने की भारतीय शैली — 114 parts
१९—ब्राह्मी और उससे निकली हुई लिपियों के अंक
c25.1
(लिपिपत्र ७१ से ७६ के उत्तरार्द्ध के प्रथम खंड तक).
c25.2
प्राचीन शिलालेखों, दानपत्रों, सिक्कों तथा हस्तलिखित पुस्तकों के देखने से पाया जाता है कि लिपियों की तरह प्राचीन और अर्वाचीन अंकों में भी अंतर है. यह अंतर केवल उनकी आकृति में ही नहीं किंतु अंकों के लिखने की रीति में भी है. वर्तमान समय में जैसे १ से ६ तक अंक और शून्य इन १० चिह्नों से अंकविद्या का संपूर्ण व्यवहार चलता है वैसे प्राचीन काल में नहीं था. उस समय शून्य का व्यवहार ही न था और दहाइयों, सैकड़े, हज़ार आदि के लिये भी अलग चिह्न थे. अंकों के संबंध में इस शैली को ‘प्राचीन शैली’ और जिसमें शून्य का व्यवहार है उसको ‘नवीन शैली’ कहेंगे.
प्राचीन शैली के अंक
c25.s1.1
प्राचीन शैली में १ से ६ तक के अंकों के ६ चिह्न; १०, २०, ३०, ४०, ५०, ६०, ७०, ८० और ६० इन ६ दहाइयों के लिये ६ अलग चिह्न; और १०० तथा १००० के लिये एक एक अलग चिह्न नियत था (देखो, लिपिपत्र ७१ से ७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में). इन २० चिह्नों से ६६६६६ तक की संख्या लिखी जा सकती थी. लाख, करोड़, अरब आदि के लिये जो चिह्न थे उनका पता अब तक नहीं लगा क्योंकि शिलालेख अथवा दानपत्रों में लाख१ या उसके आगे का कोई चिह्न नहीं मिला.
c25.s1.2
इन अंकों के लिखने का क्रम १ से ६ तक तो वैसा ही था जैसा कि अब है. १० के लिये नवीन शैली के अंकों की नांई १ और ० नहीं किंतु एक नियत चिह्न ही लिखा जाता था; ऐसे ही २०, ३०, ४०, ५०, ६०, ७०, ८०, ६०, १०० और १००० के लिये भी अपना अपना चिह्न मात्र लिखा जाता था (देखो, लिपिपत्र ७१ से ७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में).
c25.s1.3
११ से ६६ तक लिखने का क्रम ऐसा था कि पहिले दहाई का अंक लिख कर उसके आगे इकाई का अंक रक्खा जाता था, जैसे कि १५ के लिये १० का चिह्न लिख उसके आगे ५; ३३ के लिये ३० और ३; ६३ के लिये ६० तथा ३, इत्यादि (देखो, लिपिपत्र ७५ में मिश्र अंक).
c25.s1.4
१ प्रसिद्ध पुरातत्त्ववेत्ता डॉ. सर ऑरल स्टाइन ने अगाध परिश्रम के साथ तुर्कस्तान से जो अमूल्य प्राचीन सामग्री प्राप्त की है उसमें कुछ खरड़े ऐसे भी हैं जिन पर भारतवर्ष की गुप्तलिपि से निकली हुई तुर्कस्तान की ई. स. की छठी शताब्दी के आसपास की आर्य लिपि में स्वर, व्यंजन, स्वरों की १२ मात्राओं (ऋ ॠ और ऌ ॡ को छोड़ कर) की बारहखड़ी (द्वादशाक्षरी) तथा किसी में प्राचीन शैली के अंक भी दिये हुए हैं (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६११, पृ. ४५२ और ४५८ के बीच के प्लेट १ से ४ तक). एक खरड़े में १ से १००० तक के वहां के प्रचलित प्राचीन शैली के चिह्नों के पीछे दो और चिह्न [Figure:] ऐसे हैं (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६११, पृ. ४५५) जिनको प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. होर्नले ने क्रमशः १०००० और १००००० के चिह्न माना है, परंतु हमको उन चिह्नों को १०००० और १००००० के सूचक मानने में शंका की है. संभव है कि इनमें से पहिला चिह्न १००००० का सूचक हो और दूसरा केवल समाप्ति (विराम) का चिह्न हो. उसको अंकसूचक चिह्न मानना संदिग्ध ही है.
c25.s1.5
२०० के लिये १०० का चिह्न लिख उसकी दाहिनी ओर, कभी ऊपर कभी मध्य और कभी नीचे की तरफ़, आड़ी (सीधी, तिरछी या वक्र) रेखा जोड़ी जाती थी१. ३०० के लिये १०० के चिह्न के साथ वैसे ही दो लकीरें जोड़ी जाती थीं. ४०० से ६०० तक के लिये १०० का चिन्ह लिख उसके साथ क्रमशः ४ से ६ तक के अंक एक छोटी सी आड़ी लकीर२ से जोड़ देते थे. १०१ से ६६६ तक लिखने में सैकड़े के अंक के आगे दहाई और इकाई के अंक लिखे जाते थे, जैसे कि १२६ के लिये १००, २०, ६ ; ६५५ के लिये ६००, ५०, ५. यदि ऐसे अंकों में दहाई का अंक नहीं हो तो सैकड़े के बाद इकाई का अंक रक्खा जाता था, जैसे कि ३०१ के लिये ३००, १. (देखो, लिपिपत्र ७५ में मिश्र अंक).
c25.s1.6
२००० के लिये १००० के चिह्न की दाहिनी ओर ऊपर को एक छोटीसी सीधी आड़ी (या नीचे को मुड़ी हुई) लकीर जोड़ी जाती थी और ३००० के लिये वैसी ही दो लकीरें. ४००० से ६००० तक और १०००० से ६०००० तक के लिये १००० के चिह्न के आगे ४ से ६ तक के और १० से ६० तक के चिह्न क्रमशः एक छोटी सी लकीर से जोड़े जाते थे (देखो, लिपिपत्र ७५). ११००० के वास्ते १०००० लिख, पास ही १००० लिखते थे. इसी तरह २१००० के लिये २००००, १०००; ६६००० के लिये ६००००, ६००० लिखते थे. ऐसे ही ६६६६६ लिखने हो तो ६००००, ६०००, ६००, ६०, ६ लिखने थे. यदि सैंकड़ा और दहाई के अंक न हों तो हज़ार के अंक के आगे इकाई का अंक लिखा जाता था, जैसे कि ६००१ लिखना हो तो ६०००, १.
c25.s1.7
उपर्युक्त प्राचीन अंकों के चिह्नों में से १, २, और ३ के चिह्न तो क्रमशः -, = और ≡ आड़ी लकीरें हैं जो अब तक व्यापारियों की बहियों में रुपयों के साथ आने लिखने में एक, दो और तीन के लिये व्यवहार में आती हैं. पीछे से इन लकीरों में वक्रता आने लगी जिससे १ की लकीर से वर्तमान नागरी आदि का १ बना, और २ तथा ३ की वक्र रेखाओं के परस्पर मिल जाने से वर्तमान नागरी आदि के २ और ३ के अंक बने हैं. बाकी के चिह्नों में से कितने एक अक्षरों से प्रतीत होते हैं और जैसे समय के साथ अक्षरों में परिवर्तन होता गया वैसे ही उनमें भी परिवर्तन होता रहा. प्राचीन शिलालेख और दानपत्रों में ४ से १००० तक के चिह्नों के, अक्षरों से मिलते हुए, रूप नीचे लिखे अनुसार पाये जाते हैं—
c25.s1.8
१ यह रीति ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी और उसके पीछे के शिलालेखादि में मिलती है. अशोक के लेखों में इससे कुछ भिन्नता पाई जाती है (देखो लिपिपत्र ७४ के पूर्वार्द्ध में अशोक के लेखों से दिये हुए २०० के अंक के तीन रूप).
c25.s1.9
२ पिछले लेखों में कहीं कहीं यह लकीर नहीं भी लगाई जाती थी (देखो, लिपिपत्र ७४ के उत्तरार्द्ध में भिन्न भिन्न लेखों से उद्धृत किये हुए अंकों में ५०० और ७०० तथा प्रतिहारों के दानपत्रों में ६००.)
c25.s1.10
४—अशोक के लेखों में इस अंक का चिह्न ‘क’ के समान है. नानाघाट के लेख में उसपर गोलाईदार या कोणदार सिर बनाया है जिससे उसकी आकृति ‘ष्क’ से कुछ कुछ मिलती होने लगी है. कुशनवंशियों के मथुरा आदि के लेखों में उसका रूप ‘ष्क’ जैसा मिलता है. क्षत्रपों और आंध्रवंशियों के नासिक आदि के लेखों में ‘ष्क’ ही विशेष कर मिलता है परंतु उन लेखों से उद्धृत किये हुए चिह्नों में से चौथे में ‘क’ की खड़ी लकीर को बाईं तरफ मोड़ कर कुछ ऊपर को बढ़ा दिया है जिससे उसकी आकृति ‘प्क’ सी प्रतीत होती है. पश्चिमी क्षत्रपों के सिक्कों में ‘क’ की दाहिनी ओर मुड़ी हुई खड़ी लकीर, चलती कलम से पूरा चिह्न लिखने के कारण, ‘क’ के मध्य की आड़ी लकीर से मिल गई जिससे उक्त सिक्कों से उद्धृत किये चिह्नों में से दो अंतिम चिह्नों की आकृति ‘भ’ के समान बन गई है. जग्गयपेट के लेखादि से उद्धृत किये हुए चिह्नों में चार के चिह्न के ‘प्क’ और ‘प्र’ से रूप मिलते हैं; गुप्तों आदि के लेखों में भी ‘ष्क’ और ‘प्र’ से ही मिलते हैं. पल्लव और शालंकायन वंशियों के दानपत्रों से उद्धृत किये ६ चिह्नों में से पहिला ‘ष्क’, दूसरा ‘प्की’, तीसरा और चौथा ‘ल्क’, पांचवा ‘द्क’ और छठा ‘म’ के समान है. नेपाल के लेखों में ‘प्क’, और भिन्न भिन्न लेख व दानपत्रों की पंक्ति में ‘ष्क’ मिलता है (देखो, लिपिपत्र ७१ और ७२ के पूर्वार्द्ध की तीन पंक्तियां). ४ का मूल चिह्न ‘क’ सा था जिस पर सिर की गोलाईदार या कोणदार रेखा लगाने से उसकी आकृति कुछ कुछ ‘प्क’ से मिलती हुई बनी. लेखकों की भिन्न भिन्न लेखन-शैली, सुंदरता लाने के यत्न और चलती कलम से पूरा अंक लिखने से उपर्युक्त भिन्न भिन्न रूप बने हैं. आगे के अंकों का इस प्रकार का विवेचन करने में लेख बहुत बढ़ जाने की संभावना होने के कारण बहुधा भिन्न भिन्न अक्षरों के नाम मात्र लिखे जायेंगे जिनको पाठक लिपिपत्र ७१ से ७५ के पूर्वार्द्ध के प्रथम खंड तक में दिये हुए अंकों से मिला कर देख लेवें.
c25.s1.11
५—इस अंक के चिह्न त, ता, पु, हु, रु, तृ, तृा, ना, न, ह, ह्ल और ह अक्षरों से मिलते हुए पाये जाते हैं.
c25.s1.12
६—के लिये ‘ज’, स (?), फ्रु, फ्रा, फा, फ और हा से मिलते जुलते चिह्न मिलते हैं, तो भी जग्गयपेट, गुप्तों और पल्लव आदि के लेखों से दिये हुए इस अंक के चिह्न ठीक तरह किसी अक्षर से नहीं मिलते, वे अंकसंकेत ही हैं. उनको अक्षरों से मिलाने का यत्न करना खींचतान ही है.
c25.s1.13
७—के चिह्न ग्र, गु और ग से मिलते जुलते हैं.
c25.s1.14
८—के चिह्न हृ, ह्रा, ह, हा, उ, पु, ट, टा, र, ब्र और द्रा से मिलते हुए हैं, परंतु कुछ चिह्न ऐसे हैं जो अक्षर नहीं माने जा सकते.
c25.s1.15
६—नानाघाट के, कुशनवंशियों के और क्षत्रपों तथा आंध्रवंशियों के लेखों में जो ६ के चिह्न मिलते हैं उनकी किसी प्रकार अक्षरों में गणना नहीं हो सकती. पीछे से अंतर पड़ने पर उसके चिह्न ओ, उ और ओं (के कल्पित चिह्न) से बनते गये.
c25.s1.16
१०—नानाघाट के, कुशनवंशियों के, क्षत्रपों तथा आंध्रों के लेखों; क्षत्रपों के सिक्कों, जग्गयपेट के लेखों तथा गुप्तादिकों के लेखादि में तो १० का अंकसंकेत ही है क्यों कि उसकी किसी अक्षर से समानता नहीं हो सकती परंतु पीछे से उसकी आकृति यै, ह, ह्न, ख और लृ से मिलती हुई बन गई.
c25.s1.17
२०—का चिह्न ‘थ’ था जो पीछे के परिवर्तनों में भी उसी अक्षर के परिवर्तित रूपों के सदृश बना रहा.
c25.s1.18
३०—का चिह्न ‘ल’ के सदृश ही मिलता है.
c25.s1.19
४०—का चिह्न ‘प्त’ और ‘स’ से मिलता हुआ मिलता है.
c25.s1.20
५०—का चिह्न किसी अक्षर से नहीं मिलता. केवल भिन्न भिन्न लेखादि से उद्धृत किये हुए इस अंक के चिह्नों में से दूसरा दक्षिणी शैली के ‘ब’ से मिलता है.
c25.s1.21
६०—का चिह्न ‘प’, ‘पु’ या ‘प्र’ से मिलता हुआ है.
c25.s1.22
७०—का चिह्न ‘स’, ‘भ्र’, रो, ‘प्रा’, ‘प्र’ या ‘हू’ से मिलता है.
c25.s1.23
८०—का चिह्न उपध्मानीय के चिह्न से मिलता हुआ है (देखो, लिपिपत्र १७ में उदयगिरि के लेख के अक्षरों में उपध्मानीय का चिह्न).
c25.s1.24
६०—का चिह्न किसी अक्षर से नहीं मिलता. यदि उपध्मानीय के चिह्न के मध्य में एक आड़ी लकीर और बढ़ा दी जावे तो उसकी आकृति क्षत्रपों के सिक्कों से उद्धृत किये हुए इस चिह्न के दूसरे रूप से मिल जायगी.
c25.s1.25
१००—नानाघाट के लेख में इस अंक का चिह्न ‘सु’ अथवा ‘अ’ से मिलता हुआ है क्यों कि उक्त दोनों अक्षरों की आकृति उस समय परस्पर बहुत मिलती हुई थी. पिछले लेखों में सु, अ, लु, से, सो और सौं से मिलते हुए रूप मिलते हैं, परंतु नासिक के लेखों और क्षत्रपों के सिक्कों में इसके जो रूप मिलते हैं उनकी उस समय के किसी अक्षर से समानता नहीं है.
c25.s1.26
२००—अशोक के लेखों में मिलनेवाले इस अंक के तीन चिह्नों में से पहिला ‘सु’ है, परंतु दूसरे दो रूप उस समय के किसी अक्षर से नहीं मिलते. नानाघाट के लेख का रूप ‘आ’ के समान है. गुप्तों आदि के लेखों का दूसरा रूप ‘ला’ से मिलता हुआ है और भिन्न भिन्न लेखादि से उद्धृत किये हुए इस अंक के दो रूपों में से दूसरा ‘सू’ से मिलता है. नासिक के लेखों, क्षत्रपों के सिक्कों, वलभी के राजाओं तथा कलिंग के गंगवंशियों के दानपत्रों में मिलनेवाले इस अंक के रूप किसी अक्षर से नहीं मिलते.
c25.s1.27
३००—का अंक १०० के अंक की दाहिनी ओर २ आड़ी या गोलाईदार लकीरें लगाने से बनता है. १०० के सूचक अक्षर के साथ ऐसी दो लकीरें कहीं नहीं लगतीं, इसलिये इसकी किसी मात्रासहित अक्षर के साथ समानता नहीं हो सकती. ४०० से ६०० तक के चिह्न, १०० के चिह्न के आगे ४ से ६ तक के अंकों के जोड़ने से बनते थे, उनकी अक्षरों से समानता नहीं है.
c25.s1.28
१०००—का चिह्न नानाघाट के लेख में ‘रो’ के समान है. नासिक के लेखों में ‘धु’ अथवा ‘धु’ से मिलता हुआ है और वाकाटकवंशियों के दानपत्रों में उनकी लिपि के ‘चु’ के समान है.
c25.s1.29
२००० और ३००० के चिह्न, १००० के चिह्न की दाहिनी ओर ऊपर को क्रमशः एक और दो आड़ी लकीरें जोड़ने से बनते थे. इसलिये उनकी किसी अक्षर से समानता नहीं हो सकती. ४००० से ६००० तक के अंक, १००० के चिह्न के आगे क्रमशः ४ से ६ तक के, और १०००० से ६०००० तक के अंक, १००० के आगे १० से ६० तक की दहाईयों के चिह्न जोड़ने से बनते थे इसलिये उनकी अक्षरों से समानता नहीं है.
c25.s1.30
ऊपर प्राचीन शैली के अंकों की जिन जिन अक्षरों से समानता बतलाई गई है उसमें सब के सब अक्षर उक्त अंकों से ठीक मिलते हुए ही हों ऐसा नहीं है. कोई कोई अक्षर ठीक मिलते हैं बाकी की समानता ठीक वैसी ही है जैसी कि नागरी के वर्तमान अक्षरों के सिर हटाने के बाद उनका नागरी के वर्तमान अंकों से मिलान करके यह कहा जाय कि २ का अंक ‘र’ से, ३ ‘रू’ से, ५ ‘प्’ से, ६ ‘द्’ से, ७ ‘उ’ की मात्रा से और ८ ‘ट’ से मिलता जुलता है. १, २, ३,१ ५०, ८० और ६० के प्राचीन उपलब्ध रूपों और अशोक के लेखों में मिलनेवाले २०० के दूसरे व तीसरे रूपों (देखो, लिपिपत्र ७४) से यही पाया जाता है कि ये चिह्न तो सर्वथा अक्षर नहीं थे किंतु अंक ही थे. ऐसी दशा में यही मानना पड़ेगा कि प्रारंभ में १ से १००० तक के सब अंक वास्तव में अंक ही थे. यदि अक्षरों को ही भिन्न भिन्न अंकों, का सूचक माना होता तो उनका कोई क्रम अवश्य होता और सब के सब अंक अक्षरों से ही बतलाये जाते, परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि प्रारंभ में ये सब अंक ही थे. अनायास से किसी अंक का रूप किसी अक्षर से मिल जाय यह बात दूसरी है; जैसे कि वर्तमान नागरी का २ का अंक उसी लिपि के ‘र’ से, और गुजराती के २ (२) और ५ (५) के अंक उक्त लिपि के र (२) और
c25.s1.31
१ एक, दो और तीन के प्राचीन चिह्न तो स्पष्ट ही संख्यासूचक हैं और अशोक की लिपि में चार का चिह्न जो ‘क’ अक्षर से मिलता हुआ है वह संभव है कि चौराहे या स्वस्तिक का सूचक हो. ऐसे ही और अंकों के लिए भी कोई कारण रहा होगा.
c25.s1.32
प (५) से बिलकुल मिलते हुए हैं. कभी कभी अक्षरों की नांई अंकों के भी सिर बनाने से उनकी आकृतियां कहीं कहीं अक्षरों सी बनती गई१. पीछे से अंकचिह्नों को अक्षरों के से रूप देने की चाल बढ़ने लगी और कितने एक लेखकों ने और विशेषकर पुस्तकलेखकों ने उनको सिरसहित अक्षर ही बना डाला जैसा कि बुद्धगया से मिले हुए महानामन् के शिलालेख२, नेपाल के कितने एक लेखों३ तथा प्रतिहारवंशियों के दानपत्रों४ से पाया जाता है. तो भी १, २, ३, ५०, ८० और ९० तो अपने परिवर्तित रूपों में भी प्राचीन रूपों से ही मिलते जुलते रहे और किन्हीं अक्षरों में परिणत न हुए.
c25.s1.33
शिलालेखों और ताम्रपत्रों के लेखक जो लिखते थे वह अपनी जानकारी से लिखते थे, परंतु पुस्तकों की नक़ल करनेवालों को तो पुरानी पुस्तकों से ज्यों का त्यों नक़ल करना पड़ता था. ऐसी दशा में जहां वे मूल प्रति के पुराने अक्षरों या अंकों को ठीक ठीक नहीं समझ सके वहां वे अवश्य चूक कर गये. इसीसे हस्तलिखित प्राचीन पुस्तकों में जो अंकसूचक अक्षर मिलते हैं उनकी संख्या अधिक है जिनमें और कई अशुद्ध रूप दर्ज हो गये हैं.
c25.s1.34
लिबिपत्र ७२ (पूर्वार्द्ध की अंतिम तीन पंक्तियों) और ७४ (उत्तरार्द्ध की अंतिम दो पंक्तियों) में हस्तलिखित प्राचीन पुस्तकों से अंकसूचक अक्षरादि दिये गये हैं वे बहुत कम पुस्तकों से हैं. भिन्न भिन्न हस्तलिखित पुस्तकों में वे नीचे लिखे अनुसार मिलते हैं—
c25.s1.35
१–ए, ख और ऌ.
२–द्वि, स्ति और न.
३–त्रि, श्री और मः.
४–ङ्क५, ईं, ऌ, एक, ऌर्क, ष्क्र, र्क्क, प्कि (प्के), ष्क्र६, र्क७, र्क और पु.
५–तृ, र्तृ, र्तॄ, र्तृं, ह्र और नृ.
६–फ़, र्फ़, र्फ़ु, घ्र, भ्र, र्पु, व्या और फ़्ल.
७–ग्र, ग्रा, ग्री, र्ग्रा र्ग्गा और भ्र.
८–ह्र, ह्रीं, ह्र्ाँ और द्र.
९–ओं, उँ, र्उ, उं, ऊं, भ्र और नृं.
१०–लृ, लूं, ळ, ष्ट, डा, अ और सां.
२०–थ, था, र्थ, र्था, घ, र्घ, प्व और व.
३०–ल, ला, र्ल और र्ला.
४०–प्त, प्ता, सा, सां और म.
५०–ठ, ॡ, ॡ, ६, I और प्.
c25.s1.36
१ फ़्ली; गु. इं; सैट ३६ A.
c25.s1.37
२ फ़्ली; गु. इं; सैट ४१ A.
c25.s1.38
३ इं. ऐँ; जि. ६, पृ. १६३-८०.
c25.s1.39
४ ऐँ. इं; जि. ५, पृ २०६. इं. ऐँ; जि. १५, पृ ११२ और १४० के पास के प्लेट; और राजपूताना म्यूज़िअम् में रक्खा हुआ प्रतिहार राजा महेंद्रपाल (दूसरे) के समय का वि. सं. १००३ का लेख. यह लेख मैंने 'ऐपिग्राफ़िआ इंडिका' में छपने के लिये भेज दिया है.
c25.s1.40
५ 'सूर्यप्रज्ञप्ति' नामक जैन ग्रंथ का टीकाकार मलयगिरि, जो ई. स. की १२वीं शताब्दी के आसपास हुआ, मूल पुस्तक के 'ङ्क' शब्द को ४ का सूचक बतलाता है (अत्र ङ्कम्ब्दोपादानात् प्रासादीया इत्यनेन पदेन सह पदचतुष्टयस्य सूचा कृता —इं. ऐँ; जि. ६, पृ. ४७).
c25.s1.41
६ यह चतुरस्र चिह्न उपध्मानीय का है (देखो, लिपिपत्र ४१). 'क' के पूर्व इसका प्रयोग करना यही बतलाता है कि उस समय इस चिह्न का ठीक ठीक ज्ञान नहीं रहा था.
c25.s1.42
७ 'क' के ऊपर का यह चिह्न जिह्वामूलीय का है (देखो, लिपिपत्र १६).
c25.s1.43
६०-**जु, वु, घु, थु, र्थु, थू, र्थू, र्ध, र्धु और धु.** ७०-**चु, चृ, थू, र्थू, घू और र्म्त.** ८०-**[Figure:], [Figure:], [Figure:], [Figure:]१ और पु.** ६०-[Figure:], [Figure:], [Figure:], [Figure:] **और [Figure:]२.** •१००-**सु, सू, लु और अ.** २००-**सु, सू, सु, आ, लू और र्घू.** ३००-**स्ता, स्त्रा, श्या, सा, सु, सुं और स्त्र.** ४००-**स्त्रो, स्तो और स्ता.**
c25.s1.44
ऊपर लिखे हुए अंकसूचक संकेतों में १, २ और ३ के लिये क्रमशः **ए, द्वि और त्रि; स्व, स्ति और श्री; और ओं, न और मः** मिलते हैं; वे प्राचीन क्रम के कोई रूप नहीं है किंतु पिछले लेखकों के कल्पित हैं. उनमें से ए, द्वि और त्रि तो उन्ही अंकों के वाचक शब्दों के पहिले अक्षर हैं और स्व, स्ति और श्री तथा ओं, न और मः मंगल वाचक होने से इनको प्रारंभ के तीन अंकों का सूचक मान लिया है. एक ही अंक के लिये हस्तलिखित पुस्तकों में कई भिन्न अक्षरों के होने का कारण कुछ तो प्राचीन अक्षरों के पढ़ने में और कुछ पुस्तकों से नक़ल करने में लेखकों की ग़लती है, जैसे २० के अंक का रूप ‘थ’ के समान था जिसकी आकृति पीछे से ‘घ’ से मिलती हुई होने से लेखकों ने ‘थ’ को ‘घ’, फिर ‘घ’ को ‘ध्व’ और ‘प’ पढ़ा होगा. इसी तरह दूसरे अंकों के लिये भी अशुद्धियां हुई होंगी.
c25.s1.45
प्राचीन शिलालेखों और दानपत्रों में सब अंक एक पंक्ति में लिखे जाते थे परंतु हस्तलिखित पुस्तकों के पन्नों में चीनी अक्षरों की नांई एक दूसरे के नीचे लिखे मिलते हैं. ई. स. की छठी शताब्दी के आस पास के मि. बावर के प्राप्त किये हुए पुस्तकों में भी पत्रांक इसी तरह एक दूसरे के नीचे लिखे मिलते हैं. पिछले पुस्तकों में एक ही पत्रे पर प्राचीन और नवीन दोनों शैलियों से भी अंक लिखे मिलते हैं. पत्रे की दूसरी तरफ़ के दाहिनी ओर के ऊपर की तरफ़ के हाशिये पर तो अक्षरसंकेत से, जिसको अक्षरपल्ली कहते थे; और दाहिनी तरफ़ के नीचे के हाशिये पर नवीन शैली के अंकों से, जिनको अंकपल्लि कहते थे. इस प्रकार के अंक नेपाल, पाटण (अणहिलवाड़ा), खंभात और उदयपुर (राजपूताना में) आदि के पुस्तकमंडारों में रक्खे हुए पुस्तकों में पाये जाते हैं. पिछले हस्तलिखित पुस्तकों में अक्षरों के साथ कभी कभी अंक, तथा खाली स्थान के लिये शून्य भी लिखा हुआ मिलता है, जैसे कि ३३=(ला)/३, १००=(सु)/(°), १०२=(सु)/((°)/२), १३१=(सु)/((ला)/१), १५०=(सु)/(इ/(°)), २०६=(सू)/((°)/(वै)) आदि. नेपाल के बौद्ध, तथा गुजरात, राजपूताना आदि के जैन पुस्तकों में यही अक्षरक्रम ई. स. की १६ वीं शताब्दी तक कहीं कहीं मिल आता है और दक्षिण की मलयालम् लिपि के पुस्तकों३ में अब तक अक्षरों से अंक
c25.s1.46
१ यह चिह्न उपध्मानीय का है (देखो, लिपिपत्र २१, २४, ४७).
c25.s1.47
२ यह चिह्न उपध्मानीय का है (देखो, लिपिपत्र ३८, ४२, ४४).
c25.s1.48
३ मलयालम् लिपि के पुस्तकों में बहुधा अब तक इस प्रकार अक्षरों में अंक लिखने की रीति चली आती है. ऍच. गंडर्ट ने अपने मलयालम् भाषा के व्याकरण (दूसरे संस्करण) में अक्षरों से बतलाये जाने वाले अंकों का ब्योरा इस तरह दिया है:— १=न. २=न्न. ३=न्य. ४=क्र. ५=झ. ६=हा (ह). ७=ग्र. ८=प्र. ६=द्रे (?). १०=म. २०=थ. ३०=ल. ४०=प्त. ५०=व. ६०=च. ७०=रू (त्रु). ८०=च. ६०=ण. १००=ञ. (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८६६, पृ. ७६०). इनमें भी प्राचीन अक्षरों के पढ़ने में ग़लती होना पाया जाता है जैसे कि ६ का सूचक ‘हा’, ‘फ’ को ‘ह’ पढ़ने से ही हुआ है. उस लिपि में ‘फ’ और ‘ह’ की आकृति बहुत मिलती हुई है (देखो, लिपिपत्र ८२). ऐसे ही और भी अशुद्धियां हुई हैं.
c25.s1.49
बतलाने का प्रचार बना हुआ है; परंतु उनके देखने से पाया जाता है कि उनके लेखक सर्वथा प्राचीन क्रम को भूले हुए थे और ‘मक्षिकार्याने मक्षिका’ की नांई केवल प्राचीन पुस्तकों के अनुसार पत्रांक लगा देते थे.
c25.s1.50
शिलालेख और दानपत्रों में ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास तक तो केवल प्राचीन क्रम से ही अंक लिखे मिलते हैं. पहिले पहिल गूर्जरवंशी किसी राजा के ताम्रपत्र के दूसरे पत्रे में, जो [ कलचुरि ] संवत ३४६ ( ई. स. ५६५ ) का है, नवीन शैली से अंक दिये हुए मिलते हैं अर्थात् उसमें क्रमशः ३, ४ और ६ के अंक हैं. उक्त संवत् के पीछे कहीं प्राचीन शैली से और कहीं नवीन शैली से अंक लिखे जाने लगे और १० वीं शताब्दी के मध्य तक प्राचीन शैली का प्रचार कुछ कुछ रहा१; फिर तो उठ ही गया२ और नवीन शैली से ही अंक लिखे जाने लगे. उसके पीछे का केवल एक ही लेख ऐसा मिला है, जो नेपाल के मानदेव के समय का [ नेवार ] सं. २५६ ( ई. स. ११३६ ) का है और जिसमें अंक प्राचीन शैली से दिये हैं३.
c25.s1.51
भारतवर्ष में अंकों की यह प्राचीन शैली कब से प्रचलित हुई इसका पता नहीं चलता परंतु अशोक के सिद्धापुर, सहस्राम और रूपनाथ के लेखों में इस शैली के २००, ५० और ६ के अंक मिलते हैं जिनमें से २०० का अंक४ तीनों लेखों में बिलकुल ही भिन्न प्रकार का है और ५० तथा ६ के दो दो प्रकार के रूप मिलते हैं. २०० के भिन्न भिन्न तीन रूपों से यही कहा जा सकता है कि ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में तो अंकों की यह शैली कोई नवीन बात नहीं किंतु सुदीर्घ काल से चली आती रही होगी. यदि ऐसा न होता तो अशोक के लेखों में २०० के अंक के एक दूसरे से बिलकुल ही भिन्न तीन रूप सर्वथा न मिलते. अशोक से पूर्व उक्त अंकों के चिह्न कैसे थे और किन किन परिवर्तनों के बाद वे उन रूपों में परिणत हुए इस विषय में कहने के लिये अब तक कोई साधन उपलब्ध नहीं हुआ.
c25.s1.52
२ तामिळ लिपि में अब तक अंक प्राचीन शैली से ही लिखे जाते हैं, नवीन शैली के अंकों का प्रचार अब होने लगा है. थोड़े समय पूर्व के छपे हुए पुस्तकों में पत्रांक प्राचीन शैली से ही दिये हुए मिलते हैं परंतु अब नवीन शैली से देने लगे हैं. तामिळ अंकों के लिये देखो, लिपिपत्र ८१ में तामिळ लिपि.
c25.s1.53
४ अशोक के लेखों में मिलनेवाले २०० के अंक के भिन्न भिन्न ३ चिह्नों के लिये देखो लिपिपत्र ७४ का पूर्वार्द्ध. उक्त चिह्नों में से दूसरा सहस्राम के लेख से है. करीब ८०० वर्ष पीछे उसीका किंचित् बदला हुआ रूप फिर मथुरा से मिली हुई गुप्त सं. २३० (ई. स. ५४६) की एक बौद्ध मूर्ति के नीचे के लेख (सी; गु. इं; सेट ४० D) में मिलता है; बीच में कहीं नहीं मिलता. कभी कभी लेखकों को अक्षरों या अंकों के प्राचीन चिह्नों की स्मृति रहने का यह अद्भुत उदाहरण है.
c25.s1.54
कई विद्वानों ने जैसे ब्राह्मी अक्षरों की उत्पत्ति के विषय में भिन्न भिन्न कल्पनाएं की हैं वैसे ही इन प्राचीन शैली के अंकों की उत्पत्ति के विषय में भी की हैं जिनका सारांश नीचे लिखा जाता है—
c25.s1.55
प्रथम ई. स. १८३८ में जेम्स प्रिन्सेप ने यह अनुमान किया कि ये अंक उनके सूचक शब्दों के प्रथम अक्षर हैं, जिसको वोप्के आदि कितने एक यूरोपियन विद्वानों ने स्वीकार भी किया.
c25.s1.56
१ यद्यपि शिलालेखों और दानपत्रों में प्राचीन शैली के अंकों का प्रचार १०वीं शताब्दी के मध्य तक कुछ न कुछ पाया जाता है तो भी ताम्रपत्रों के लेखक ई. स. की आठवीं शताब्दी से ही उस शैली के अंकों के लिखने में गलतियां करने लग गये थे. वलभी के राजा शीलादित्य (छठे) के गुप्त सं. ४४१ के दानपत्र में १०० के साथ जुड़नेवाले ४ के अंक के स्थान में ४० का अंक जोड़ दिया है (इं. पं; जि. ६ पृ. १६ के पास का सेट), और पूर्वी गंगवंशी राजा देवेंद्रवर्मन् के गांगेय सं. १८४ के दानपत्र में ८० के स्थान पर ८ का और ३ के स्थान पर ३० का चिह्न ('लो', 'ल' का घसीट रूप) लिखा है और २० के लिये २ के आगे बिंदी लगा कर एक ही दानपत्र में प्राचीन और नवीन शैली का मिश्रण भी कर दिखाया है (एं. इं; जि. ३, पृ. १३३ के पास का सेट).
c25.s1.57
३ बें; ज. ने; पृ. ८१.
c25.s1.58
पंडित भगवानलाल इंद्रजी ने इन अंकों के उनके सूचक शब्दों के प्रथम अक्षर होने न होने के विषय में कुछ न कह कर भारतवर्ष के प्राचीन अंकों के विषय के अपने लेख में ई. स. १८७७ में लिखा है कि ‘अंकों की उत्पत्ति के विषय में मेरा विश्वास है कि मैं निश्चय के साथ यह प्रतिपादन कर सकता हूं कि पहिले तीन अंकों को छोड़ कर बाकी सब के सब अक्षरों या संयुक्ताक्षरों के सूचक हैं और भिन्न भिन्न वंशों के लेखों और [भिन्न भिन्न] शताब्दियों में उन (अंकों) की आकृतियों में जो अंतर पाया जाता है उसका मुख्य कारण उक्त समय और वंशों के अक्षरों का अंतर ही है’१.
c25.s1.59
डॉ. बूलर ने उक्त लेख के साथ ही अपनी संमति प्रकट करते समय लिखा है कि ‘प्रिन्सेप का यह पुराना कथन, कि अंक उनके सूचक शब्दों के प्रथम अक्षर हैं, छोड़ देना चाहिये. परंतु अब तक इस प्रश्न का संतोषदायक समाधान नहीं हुआ. पंडित भगवानलाल ने आर्यभट और गंवशास्त्र की अक्षरों द्वारा अंक सूचित करने की रीति को भी जांचा परंतु उसमें सफलता न हुई (अर्थात् अक्षरों के क्रम की कोई कुंजी न मिली); और न मैं इस रहस्य की कोई कुंजी प्राप्त करने का दावा करता हूं. मैं केवल यही बतलाऊंगा कि इन अंकों में अनुनासिक, जिह्वामूलीय और उपध्मानीय का होना प्रकट करता है कि उन(अंकों)को ब्राह्मणों ने निर्माण किया था, न कि वाणिज्याओं (महाजनों) ने और न बौद्धों ने जो प्राकृत को काम में लाते थे’२.
c25.s1.60
२ इं. ऐं; जि. ६, पृ. ४८.
c25.s1.61
डॉ. कर्न ने ई. स. १८७७ में ‘इंडियन ऐंटिक्बरी’ के संपादक को एक पत्र के द्वारा यह सूचित किया कि ‘मैं सामान्यतः बूलर के इस कथन से सहमत हूं कि अंक ब्राह्मणों ने निर्माण किये थे’३.
c25.s1.62
३ इं. ऐं; जि. ६, पृ. १४३.
c25.s1.63
ई. स १८७८ में बर्नल ने लिखा कि ‘अंकसूचक शब्दों के आदि अक्षरों से इन [अंक] चिह्नों की उत्पत्ति मानना बिलकुल असंभव है क्योंकि उनकी दक्षिणी अशोक (ब्राह्मी) अक्षरों से, जो अंकसूचक शब्दों के आदि अक्षर हैं, बिलकुल समानता नहीं है’४. परंतु बर्नल ने ब्राह्मी अक्षरों की उत्पत्ति फिनिशियन् अक्षरों से होना तो मान ही रक्खा था; इससे इन अंकों की उत्पत्ति भी बाहरी स्रोत से होना अनुमान करके लिखा कि ‘इस (अंक) क्रम की इजिप्ट (मिसर) के डेमोटिक् अंकक्रम से सामान्य समानता, मेरे विचार में, इस कामचलाऊ अनुमान के लिये बस होगी कि अशोक के अंकक्रम की उत्पत्ति उसी (डिमोटिक) क्रम से हुई है, परंतु इसका विकास भारतवर्ष में हुआ है’५.
c25.s1.64
४ ब; सा. इं. पे; पृ. ६०.
c25.s1.65
५ ब; सा. इं. पे; पृ. ६५.
c25.s1.66
फिर इ. सी. बेले ने ‘वर्तमान अंकों का वंशक्रम’ नामक विस्तृत लेख६ में यह बतलाने का यत्न किया कि ‘भारतीय अंकशैली का सिद्धान्त मिसर के हिएरोग्लिफिक अंकों से निकला है, तो भी भारतीय अंकचिह्नों में से अधिकतर फिनिशियन्, बाक्ट्रियन और अक्केडियन् अंकों या अक्षरों से लिये हुए हैं; परंतु कुछ थोड़ेसों की विदेशी उत्पत्ति प्रमाणित नहीं हो सकती’.
c25.s1.67
इस पर ई. स. १८८६ में बूलर ने लिखा कि ‘बेले का कथन, यह मानने से बड़ी आपत्ति उपस्थित करता है कि हिंदुओं ने [अंक] भिन्न भिन्न चार या पांच स्रोतों से लिये, जिनमें से कुछ तो बहुत प्राचीन और कुछ बहुत अर्वाचीन हैं. परंतु उसके लेख के साथ प्रकट किया हुआ मिसर और भारत के अंकों के मिलान का नक्शा और उन दोनों में सैंकड़ों के अंकों के बनाने की रीति की समानता के बारे में उसका कथन, भगवानलाल की कल्पना को छोड़ देने और कुछ परिवर्तन के साथ बर्नल के कथन को, जिससे बार्थ भी सहमत है, स्वीकार करने को प्रस्तुत करता है. मुझे यह संभव प्रतीत
c25.s1.68
१ इं. ऐं; जि. ६, पृ. ४४.
c25.s1.69
६ ज. रॉ. ए. सो. (न्यू सीरीज़) जि. १४, पृ. ३३५ से और जि. १५, पृ. १ से.
c25.s1.70
होता है कि ब्राह्मी अंकों के चिह्न मिसर के हिएरेटिक अंकों से निकले हैं और हिंदुओं ने उनका अक्षरों में रूपांतर कर दिया, क्योंकि उनको शब्दों से अंक प्रकट करने का पहिले ही से अभ्यास था तो भी ऐसी उत्पत्ति का विवेचन अभी तक बाधा उपस्थित करता है और निश्चयात्मक नहीं कहा जा सकता. परंतु दूसरी दो महत्त्व की बातें निश्चय समझना चाहिये कि—
c25.s1.71
(१) अशोक के लेखों में मिलने वाले [अंकों के] भिन्न रूप यही बतलाते हैं कि इन अंकों का इतिहास ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दि से बहुत पूर्व का है;
c25.s1.72
(२) इन चिह्नों का विकास ब्राह्मण विद्वानों के द्वारा हुआ है क्योंकि उनमें उपध्मानीय के दो रूप मिलते हैं जो निःसंशय शिक्षा के आचार्यों के निर्माण किये हुए हैं१.
c25.s1.73
ई. स. १८६८ में फिर बूलर ने डा. बर्नल के मत को ठीक बतलाया परंतु उसमें इतना बदलने की संमति दी कि भारतीय अंक मिसर के डेमोटिक् क्रम से नहीं किंतु हिएरेटिक् से निकले हुए अनुमान होते हैं, और साथ में यह भी लिखा कि ‘डाॅ. बर्नल के मत को निश्चयात्मक बनाने के लिये ई. स. पूर्व की तीसरी और उससे भी पहिले की शताब्दियों के और भी [भारतीय] अंकों की खोज करने, तथा भारतवर्ष और मिसर के बीच के प्राचीन संपर्क के विषय में ऐतिहासिक अथवा परंपरागत वृत्तान्त की खोज, की अपेक्षा है. अभी तो इसका सर्वथा अभाव है और यदि कोई मिसर के अंकों का भारत में प्रचार होना बतलाने का यत्न करे तो उसको यही अटकल लगाना होगा कि प्राचीन भारतीय नाविक और व्यापारी मिसर के अधीनस्थ देशों में पहुंचे होंगे अथवा अपनी समुद्रयात्रा में मिसर के व्यापारियों से मिले होंगे. परंतु ऐसी अटकल अवश्य संदिग्ध है जब तक कि उसका सहायक प्रमाण न मिले.’२
c25.s1.74
इस तरह डाॅ. बर्नल भारतवर्ष के प्राचीन शैली के अंकों की उत्पत्ति मिसर के डिमोटिक् अंकों से; बेले उनका क्रम तो मिसर के हिएरोग्लिफिक् अंकों से और अधिकतर अंकों की उत्पत्ति फिनिशियन्, बाक्ट्रियन् और अक्केडियन् अंकों से, और बूलर मिसर के हिएरेटिक अंकों से बतलाता है. इन विद्वानों के कथनों का भारतीय अंकों के क्रम और आकृतियों से मिलान करने से पाया जाता है कि—
c25.s1.75
हिएरोग्लिफिक अकों का क्रम भारतीय क्रम से, जिसका विवेचन ऊपर पृ. १०३–४ में किया गया है, सर्वथा भिन्न है, क्योंकि उसमें मूल अंकों के चिह्न केवल तीन, अर्थात् १, १० और १०० थे. इन्हीं तीन चिह्नों को बारंबार लिखने से ९९९ तक के अंक बनते थे. १ से ९ तक के अंक, एक के अंक के चिह्न (खड़ी लकीर) को क्रमशः १ से ९ बार लिखने से बनते थे. ११ से १९ तक के लिये १० के चिह्न की बाईं ओर क्रमशः १ से ९ तक खड़ी लकीरें खींचते थे. २० के लिये १० का चिह्न दो बार और ३० से ९० तक के लिये क्रमशः ३ से ९ बार लिखा जाता था. २०० बनाने के लिये १०० के चिह्न को दो बार लिखते थे, ३०० के लिये तीन बार आदि (देखो, पृ. ११३ में दिया हुआ नकशा). इस क्रम में १००० और १०००० के लिये भी एक एक चित्र था३ और १००००० के लिये
c25.s1.76
१ बू; इं. पे; पृ. ८२.
c25.s1.77
२ बू; इं. खु; संख्या ३, पृ. ११६ (द्वितीय संस्करण). इससे पूर्व उक्त पुस्तक से जहां जहां हवाले दिये हैं वे प्रथम संस्करण से हैं.
c25.s1.78
३ ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५.
c25.s1.79
मेंढक और १०००००० के लिये हाथ फैलाये हुए पुरुष का चिह्न बनाया जाता था. मिसर का सब से पुराना अंकक्रम यही था जो बहुत ही जटिल और गणना की बिलकुल प्रारंभिक दशा का सूचक है. इसीसे फिनिशियन् अंक निकले हैं जिनका क्रम भी ऐसा ही है, केवल १० के चिह्न को बारंबार लिखने की जटिल रीति को कुछ सरल बनाने के लिये उसमें २० के अंक के लिये नवीन चिह्न बनाया गया, जिससे ३० के लिये २० और १० ; ६० के लिये २०, २०, २० और १० लिखने पड़ते थे. इस क्रम के ४ मूल अंकों में से १ का चिह्न तो एक खड़ी लकीर है और १०, २० और १०० के तीन चिह्नों में से एक भी उक्त अंकों के सूचक भारतीय अंक चिह्नों से नहीं मिलता (देखो, पृ. ११३ में दिया हुआ नक्शा). इस लिये बेले का कथन किसी प्रकार स्वीकार नहीं किया जा सकता और इसीसे बूलर को भी यह लिखना पड़ा था कि बेले का कथन बड़ी आपत्ति उपस्थित करता है.
c25.s1.80
पीछे से मिसरवालों ने किसी विदेशी सरल अंकक्रम को देख कर अथवा अपनी बुद्धि से अपने भद्दे हिएरोग्लिफिक क्रम को सरल करने के लिये भारतीय अंकक्रम जैसा नवीन क्रम बनाया, जिसमें १ से ६ तक के लिये ६, १० से ६० तक की दहाइयों के लिये ६, और १०० तथा १००० के लिये एक एक चिह्न स्थिर किया. इस अंकक्रम को 'हिएरेटिक्' कहते हैं और इसमें भी अंक दाहिनी ओर से बाईं ओर लिखे जाते हैं. हिएरेटिक और भारतीय अंकों की आकृतियों का परस्पर मिलान किया जावे तो अंकों के २० चिह्नों में से केवल ६ का चिह्न दोनों में कुछ मिलता हुआ है; बाकी किसी में समानता नहीं है. दूसरा अंतर यह है कि हिएरेटिक अंकों में २०० से ४०० तक के अंक १०० के अंक की बाईं तरफ़ क्रमशः १ से ३ खड़ी लकीरें रखने से बनते हैं परंतु भारतीय अंकों में २०० और ३०० के लिये क्रमशः १ और २ आड़ी लकीरें १०० के अंक के साथ दाहिनी ओर जोड़ी जाती हैं और ४०० के लिये वैसी ही ३ लकीरें १०० के अंक के साथ जोड़ी नहीं जातीं किंतु ४ का अंक ही जोड़ा जाता है. तीसरा अंतर यह है कि हिएरेटिक में २००० से ४००० बनाने के लिये १००० के अंक के कुछ विकृत रूप को आड़ा रख कर उसके ऊपर क्रमशः २ से ४ तक खड़ी लकीरें जोड़ी जाती हैं परंतु भारतीय अंकों में २००० और ३००० के अंक तो १००० के अंक की दाहिनी ओर क्रमशः १ और २ आड़ी लकीरें जोड़ने से बनते हैं परंतु ४००० के लिये वैसी ही तीन लकीरें नहीं किंतु ४ का अंक ही जोड़ा जाता है (देखो, पृ. ११३ में दिया हुआ नक्शा.)
c25.s1.81
डेमोटिक् अंक हिएरेटिक से ही निकले हैं और उन दोनों में अंतर बहुत कम है (देखो, पृ.११३ में दिया हुआ नक्शा) जो समय के साथ हुआ हो. इन अंकों को भारतीय अंकों से मिलाने से यही पाया जाता है कि इनमें से केवल ६ का अंक नानाघाट के ६ से ठीक मिलता है. बाकी किसी अंक में कुछ भी समानता नहीं पाई जाती.
c25.s1.82
ऊपर के मिलान से पाया जाता है कि मिसर के हिएरेटिक और उससे निकले हुए डिमाटिक अंकों का क्रम तो भारतीय क्रमसे अवश्य मिलता है क्योंकि १ से १००० तक के लिये २० चिह्न दोनों में हैं परंतु उक्त २० चिह्नों की आकृतियों में से केवल ६ की आकृति के सिवाय किसीमें सामनता नहीं है, और २०० तथा ३००, एवं २००० और ३००० बनाने की रीति में भी अंतर है और ४०० तथा ४००० बनाने की रीति तो दोनों में बिलकुल ही भिन्न है.
c25.s1.83
१ प. खा. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५.
c25.s1.84
मिसर और भारत दोनों के प्राचीन अंकों में १००० तक के लिये २० चिह्न होने से केवल दो ही अनुमान हो सकते हैं कि या तो एक ने दूसरे का क्रम अपनाया हो अथवा दोनों ने अपने अपने अंक स्वतंत्र निर्माण किये हों. यदि पहिला अनुमान ठीक है तो यही मानना पड़ेगा कि भारतवासियों ने हिएरेटिक् या डिमोटिक् क्रम से अपना अंकक्रम नहीं लिया क्योंकि जैसे भारतीय अंकों में १ से ३ तक के लिये प्रारंभ में क्रमशः १ से ३ आड़ी (एक दूसरी से विलग) लकीरें थीं वैसे ही हिएरोग्लिफिक् अंकों में १ से ६ तक के लिये क्रमशः १ से ६ (एक दूसरी से विलग) खड़ी लकीरें थीं. पीछे से भारत की उन अंकसूचक लकीरों में वक्रता आकर २ और ३ की लकीरें एक दूसरी से मिल गईं जिससे उनका एक एक संमिलित चिह्न बन कर नागरी के २ और ३ के अंक बन गये. अरबों ने ई. स. की ६ वीं शताब्दी में भारत के अंक ग्रहण किये तो ये अंक ठीक नागरी (संमिलित) रूप में ही लिये. इसी प्रकार हिएरोग्लिफिक अंकों की २ से ४ तक की खड़ी लकीरें पीछे से परस्पर मिल कर २, ३ और ४ के लिये नये (मिलवां) रूप बन गये, जो हिएरेटिक् और उनसे निकले हुए डिमोटिक् अंकों में मिलते हैं. यदि भारतवासियों ने अपने अंक हिएरेटिक या डिमोटिक् से लिये होते तो उनमें २ और ३ के लिये एक दूसरी से विलग २ और ३ आड़ी लकीरें न होतीं किंतु उनके लिये एक एक संमिलित चिह्न ही होता. परंतु ऐसा न होना यही सिद्ध करता है कि भारतवासियों ने मिसरवालों से अपना अंकक्रम सर्वथा नहीं लिया. अतएव संभव है कि मिसरवालों ने भारत के अंकक्रम को अपनाया हो; और उनके २, ३, ४, ७, ८, ६, २०, ३०, ४०, ५०, ६०, ७०, ८० और ६० के अंकों को बाईं तरफ़ से प्रारंभ कर दाहिनी ओर समाप्त करने की रीति भी, जो उनकी लेखनशैली के बिलकुल विपरीत है, इसी अनुमान को पुष्ट करती है. दूसरी बात यह भी है कि डिमोटिक् लिपि और उसके अंकों की प्राचीनता का पता मिसर के २५ वें राजवंश के समय अर्थात् ई. स. पूर्व ७१५ से ६५६ से पहिले नहीं चलता. मिसरवालों ने अपने अंडे हिएरोग्लिफि अंकक्रम को कब, कैसे और किन साधनों से हिएरेटिक् क्रम में पलटा इसका भी कोई पता नहीं चलता, परंतु हिएरेटिक् और डिमोटिक् अंकों में विशेष अंतर न होना यही बतलाता है कि उनकी उत्पत्ति के बीच के समय का अंतर अधिक नहीं होगा. अशोक के समय अर्थात् ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में २०० के अंक के एक दूसरे से बिलकुल भिन्न ३ रूपों का मिलना यही प्रकट करता है कि ये अंक सुदीर्घकाल से चले आते होंगे. ऐसी दशा में यही मानना पड़ता है कि प्राचीन शैली के भारतीय अंक भारतीय आर्यों के स्वतंत्र निर्माण किये हुए हैं.
c25.s1.85
पृष्ठ ११३ पर अंकों का एक नक्शा१ दिया गया है जिसमें हिएरोग्लिफिक, फिनिशिअन, हिएरेटि , और डिमोटिक अंकों के साथ अशोक के लेखों, नानाघाट के लेख, एवं कुशनवंशियों के तथा क्षत्रपों और आंध्रों के लेखों में मिलनेवाले भारतीय प्राचीन शैली के अंक भी दिये हैं. उनका परस्पर मिलान करने से पाठकों को विदित हो जायगा कि हिएरोग्लिफिक् आदि विदेशी अंकों के साथ भारतीय अंकों की कहां तक समानता है.
c25.s1.86
१ इस नकशे में ६ खड़ी पंक्तियां बनाई गई हैं, जिनमें से पहिली पंक्ति में वर्तमान नागरी के अंक दिये हैं; दूसरी पंक्ति में मिसर के हिएरोग्लिफिक अंक (ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५); तीसरी में फिनिशिअन अंक (ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५); चौथी में हिएरेटिक अंक (१ से ३०० तक ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५ से और ४०० से ४००० तक बूह्लर, इं. एं; संख्या ३, प्लेट ३); पांचवीं में डिमोटिक अंक (बू; इं. एं; संख्या ३, प्लेट ३); छठी में अशोक के लेखों में मिलनेवाले अंक (लिबिपत्र ७१, ७२, ७४); सातवीं में नानाघाट के लेख के अंक (लिपिषत्र ७१, ७२, ७४, ७५); आठवीं में कुशनवंशियों के लेखों में मिलनेवाले अंक (लिपिपत्र ७१, ७२), और नवीं में क्षत्रपों तथा आंध्रों के नासिक आदि के लेखों से अंक उद्धृत किये गये हैं (लिपिपत्र ७२, ७२, ७४, ७५).
नवीन शैली के अंक
c25.s2.1
नवीन शैली के अंकक्रम में १ से ६ तक के लिये ६ अंक और खाली स्थान का सूचक शून्य ० है. इन्हीं १० चिह्नों से अंकविद्या का समस्त व्यवहार चलता है. इस शैली में प्राचीन शैली की नांई प्रत्येक अंक नियत संख्या का ही सूचक नहीं है किंतु प्रत्येक अंक इकाई, दहाई, सैंकड़े आदि प्रत्येक स्थान पर आ सकता है और स्थान के अनुसार दाहिनी ओर से बाईं ओर हटने पर प्रत्येक अंक का स्थानीय मुख्य दसगुना बढ़ता जाता है, जैसे ११११११ में छओं अंक १ के ही हैं परंतु पहिले से ( दाहिनी ओर से लेने से) १, दूसरे से १०, तीसरे से १००, चौथे से १०००, पांचवें से १०००० और छठे से १००००० का बोध होता है. इसीसे इस संख्यासूचकक्रम को दशगुणोत्तर संख्या कहते हैं, और वर्तमान समय में बहुधा संसार भर का अंकक्रम यही है.
c25.s2.2
यह अंकक्रम भारतवर्ष में कब से प्रचलित हुआ इसका ठीक ठीक पता नहीं चलता. प्राचीन शिलालेखों तथा दानपत्रों में ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आस पास तक तो प्राचीन शैली से ही अंक लिखे मिलते हैं. नवीन शैली से लिखे हुए अंक पहिलेपहल कलचुरि सं. ३४६१ ( ई. स. ५६५ ) के दानपत्र में मिलते हैं, जिसके पीछे ई. स. की १० वीं शताब्दी के मध्य के आस पास तक कहीं प्राचीन और कहीं नवीन शैली के अंकों का व्यवहार है. उसके बाद नवीन शैली ही मिलती है. परंतु ज्योतिष के पुस्तकों में ई. स. की छठी शताब्दी से बहुत पूर्व इस शैली का प्रचार होना पाया जाता है क्योंकि शक सं. ४२७२ ( ई. स. ५०५ ) में वराहमिहर ने ‘पंचसिद्धांतिका’ नामक ग्रंथ लिखा जिसमें सर्वत्र नवीन शैली से ही अंक३ दिये हैं. यदि उस समय नवीन शैली का व्यवहार सामान्य रूप से न होता तो वराहमिहर अपने ग्रंथ में नवीन शैली से अंक न देता. इससे निश्चित है कि ई. स. की पांचवीं शताब्दी के अंत के आसपास तो नवीन शैली से अंक लिखने का प्रचार सर्वसाधारण में था परंतु शिलालेख और दानपत्रों के लिखनेवाले प्राचीन शैली के ढर्रे पर ही चलते रहे हों जैसा कि इस देश में हर बात में होता आया है. वराहमिहर ने ‘पंचसिद्धांतिका’ में पुलिश, रोमक, वसिष्ठ, सौर ( सूर्य )
c25.s2.3
१ संखेड़ा से मिले हुए गुर्जरवंशी किसी राजा के उक्त दानपत्र में संवत् ‘संवत्सरशतत्रयं(ये) षट्चत्वारिंशो- (शदु)त्तरेके । ३४६’ दिया है. जी. आर. के ने अपनी ‘इंडियन् मॅथेमॅटिक्स’ (भारतीय गणितशास्त्र) नामक पुस्तक में उक्त ताम्रपत्र के विषय में लिखा है कि ‘वह संदेहरहित नहीं है’ और टिप्पण में लिखा है कि ‘ये अंक पीछे से जोड़े गये हैं’ (पृ. ३१). मि. के का यह कथन सर्वथा स्वीकार करने योग्य नहीं है, क्योंकि उक्त दानपत्र को संदिग्ध मानने के लिये कोई कारण नहीं है और न कोई कारण मि. के ने ही बतलाया है. इसी तरह अंकों के पीछे से जोड़ने का कथन भी स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि जब संवत् शब्दों में दिया ही था तो पीछे से फिर उसको अंकों में बनाने की आवश्यकता ही न थी. हरिलाल हर्षदराय ध्रुव ने, जिसने उसका संपादन किया है, मूल ताम्रपत्र को देखा था परंतु उक्त विद्वान् को उन अंकों का पीछे से बनाया जाना मालूम न हुआ और न उसके फोटो पर से ऐसा पाया जाता है. मि. के की भारतीय गणितशास्त्र को नवीन ठहराने की खैंचतान ने ही इस और ऐसी ही और प्रमाणशून्य कल्पनाओं की सृष्टि कर दी है जिस- का कुछ परिचय आगे दिया जायगा. शब्दों और अंकों दोनों में संवत् देने की परिपाटी प्राचीन है और कई लेखादि में मिलती है; जैसे कि छार (चार) गांव से मिले हुए राजा हुविष्क के लेख में हुविस्क(ष्क)स्य स(संवत्सर चत(तु)रिश्र ४०’ (आ. स. रि; ई. स. १६०८-६, प्लेट ५६); गिरनार के पास के चट्टान पर खुदे हुए महाक्षत्रप रुद्रदामन् के लेख में ‘वर्षे द्विसप्ततितमे ७० २’ (एं. इं. जि. ८, पृ. ४२) आदि.
c25.s2.4
२ डॉ; फ्रां. इं; पृ. ३८. सु; ग. त; पृ. १३. ‘खंडखाद्य’ की टीका में आमराज ने वराहमिहर की मृत्यु शक सं. ५०६ (ई. स. ५८७) में होना लिखा है वह विश्वास योग्य नहीं है (सु; ग. त; पृ. १३).
c25.s2.5
३ सप्ताश्विवेद (४२७) संख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ (पंचसिद्धांतिका, अध्याय १, आर्या ८). रोमकसूर्यो द्युगणान् खतिथि (१५०) बजात् पंचऋतुं (५६) परिक्रीड्यास । सप्ताष्टकखजलेनेंद्रियो (४५०८७) हुताशनधमार्कतः सः (पंच; ८। ९) आदि.
c25.s2.6
और पितामह इन पांच सिद्धांत ग्रंथों का तो करणरूप से वर्णन किया है; और लाटाचार्य्य१ (लाटदेव), सिंहाचार्य्य,२ यवनाचार्य्य के गुरु३ (जिसका नाम नहीं दिया), आर्य्यभट४, प्रद्युम्न४ और विजयनंदिन्४ के प्रसंगवशात् नाम तथा मत दिये हैं, जिससे पाया जाता है कि ये ज्योतिष के आचार्य्य 'पंचसिद्धांतिका' की रचना से पूर्व के हैं, परंतु खेद की बात यह है कि न तो वराहमिहिर के वर्णन किये हुए पांच सिद्धांतों में से एक भी अब उपलब्ध५ है और न आर्य्यभट६ (प्रथम) के सिवाय लाटाचार्य्य आदि किसी आचार्य्य का कोई ग्रंथ मिलता है, जिससे उनकी अंकशैली का निर्णय हो सके. इस समय 'पुलिशसिद्धांत' नामक कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है परंतु भट्टोत्पल ने वराहमिहिर की बृहत्संहिता की टीका में कई जगह 'पुलिशसिद्धांत' से वचन उद्धृत किये हैं और एक स्थल में 'मूलपुलिशसिद्धांत' के नाम से एक श्लोक भी उद्धृत किया है. उन दोनों में अंक वर्तमान७ शैली से ही मिलते हैं. इससे पाया जाता है कि वराहमिहिर से पूर्व भी इस शैली का प्रचार था. बख्शाली (युसफ़ज़ई ज़िले, पंजाब में) गांव से अंकगणित का एक भोजपत्र पर लिखा हुआ प्राचीन पुस्तक ज़मीन से गड़ा हुआ मिला है जिसमें अंक नवीन शैली से ही दिये हैं. प्रसिद्ध विद्वान् डॉ. हॉर्नले ने उसकी रचना का काल ई. स. की तीसरी अथवा चौथी शताब्दी८ होना अनुमान किया है. इस पर डॉ. बूलर ने लिखा है कि 'यदि हॉर्नले का अंकगणित की प्राचीनता का यह बहुत संभावित अनुमान ठीक हो तो उस [अंकक्रम] के निर्माण का समय ई. स. के प्रारंभकाल अथवा उससे भी पूर्व का होगा'९. अभी तक तो नवीन शैली के अंकों की प्राचीनता का यहीं तक पता चलता है.
c25.s2.7
१ पंचभ्यो द्वावाद्यौ व्याख्यातौ लाटदेवेन (पंच० १।३).
c25.s2.8
२ लाटाचार्य्योक्तो यवनपुरे ऽर्द्धास्तंगते ऽर्के। रव्युदये लंकायां सिंहाचार्य्येण दिनगणो ऽभिहितः। (१४।४४).
c25.s2.9
३ यवनानां निशि दशभिर्गतैर्मुहूर्त्तैश्च तद्भवः। लंकायामर्द्धरात्रसमये दिनप्रवृत्तिं जगाद चार्य्यभटः (१४।४५).
c25.s2.10
४ प्रद्युम्नो भूतनयं जीवे सौरे च विजयनंदी (१८।५६).
c25.s2.11
५ जो 'सूर्यसिद्धांत' इस समय उपलब्ध है वह वराहमिहिर का वर्णन किया हुआ उक्त नाम का सिद्धांत नहीं किंतु उससे भिन्न और पिछला है.
c25.s2.12
६ आर्य्यभट (प्रथम) ने, जिसका जन्म ई. स. ४७६ में (उ; क्रॉ. इं; पृ. ३४. सु; ग. त; पृ. २) हुआ था, 'आर्य्यभटीय' (आर्य्यसिद्धांत) नामक ग्रंथ बनाया, जिसको डॉ. कर्न ने ई. स. १८७४ में हॉलैंड देश के लेडन नगर में छपवाया है. उसमें अंक न तो शब्दों में और न अंकों में दिये हैं किंतु सर्वत्र अक्षरों से दिये हैं जिनका क्रम नवीन शैली से ही है.
c25.s2.13
७ तिथिरंशाः खवसुद्विकदशहताः शून्यखमध्यरदघ्नाः (२५८८२९००); अंबरगगनविषयमुनिगुणविवरमंगैर्भजिते (१७९५०००) शशिसुतमस्य (शंकर बालकृष्ण दीक्षितरचित 'भारतीय ज्योतिःशास्त्र, पृ. १६२) आदि; ये वचन 'पुलिशसिद्धांत' से भट्टोत्पल ने उद्धृत किये हैं. खखाष्टमुनिरामाश्विन नावशरराशिवः ( १२८५२२३७८००).। मानां चतुर्युगेनेते परिवर्त्ताः प्रकीर्त्तिताः (वही, पृ. १६३), यह वचन भट्टोत्पल के अनुसार, 'मूलपुलिशसिद्धांत' से है.
c25.s2.14
८ इं. ऐं; जि. १७, पृ. ३६.
c25.s2.15
९ वू; इं. पे; पृ. ८२. मि. के ने ई. स. १८०७ के एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के जर्नल में (पृ. ४७५-५०८) 'नोट्स ऑन इंडि-अन मैथेमॅटिक्स' (भारतीय गणितशास्त्र पर टिप्पण) नामक विस्तृत लेख में यह बतलाने का यत्न किया है कि भारतीय गणितशास्त्र अब तक जितना प्राचीन माना गया है उतना प्राचीन नहीं है और उसी लेख में भारतवर्ष के नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के विषय में लिखा है कि 'हम पूरी सत्यता के साथ कह सकते हैं कि हिंदुओं के गणित शास्त्र भर में ई. स. की दसवीं शताब्दी के पूर्व नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के व्यवहार की कल्पना का तनिक भी चिह्न नहीं मिलता' (पृ. ४६३). मि. के के इस कथन में कुछ भी वास्तविकता नहीं है केवल हठधर्मी ही है क्योंकि ई. स. की छठी शताब्दी के प्रारंभ के आचार्य्य वराहमिहिर[^cont]
* द्विघनं शशिरस (६१) भक्तं द्वादशहीनं दिवसमानं (पंचसिद्धान्तिका १२।५). सप्ताश्विवेद (४७७) संख्यं शककालमपास्य चैत्रशु-क्लादौ (पं. सि; १।८). रोमकसूर्यो द्युगणात खतिथि (१५०) घ्नात्स पंचकर्तु (६५) परिवहीनात् । सप्ताष्टकषट्तकेंदियो (५६७८०) हुता-शाद्यप्तात्कंसः (पं. सि; १।९). रोमकयुगमर्केंद्वोर्वर्षाण्याकाशषट्पंचविषयाः (२८५०)। खाग्निशरा (१५०) द्विमासाः खरसविषयाश्वयः (२५६०) प्रजयाः (पं. सि; १। १५). आासन्नादासु सुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ। षड्द्विकपंचद्वियुतः (२५२६) शककालस्तस्य राज्ञः (वाराहीसंहिता, सप्तर्षिचार, श्लोक ३). क्या उपर्युक्त उदाहरण, जिनमें कई जगह शून्य (०) का भी प्रयोग हुआ है, वराहमिहिर के समय अर्थात् ई. स. की छठी शताब्दी के प्रारंभ में नवीन शैली के अंकों का प्रचार होना नहीं बतलाते? और सातवीं शताब्दी के लल्ल† तथा ब्रह्मगुप्त‡ के ग्रंथों में सैकड़ों जगह नवीन शैली से दिये हुए अंक मिलते हैं जिनको देखे बिना ही यह मनमानी कल्पना की गई है. प्राचीन लेख और दानपत्रों में यद्यपि अंक विशेष कर शब्दों में दिये जाते हैं तो भी ई. स. की छठी शताब्दी के अंत के आसपास से कहीं नवीन शैली से दिये हुए भी मिलते हैं. मि. के ने ई. स. ५६४ से लगा कर ८८२ तक के १६ लेखों की सूची अपने उक्त लेख में दी है जिनमें अंक नवीन शैली से दिये हुए हैं परंतु उनमें से प्रत्येक के अंकों में कुछ न कुछ दूषण लगा कर एक का भी ठीक होना स्वीकार नहीं किया (पृ. ४८२-८६) जिसका कारण यही है कि वे लेख उक्त कथन के विरुद्ध १० वीं शताब्दी से बहुत पूर्व के लेखों में भी नवीन शैली के अंकों का प्रचार होना सिद्ध करते हैं. कोई कोई ताम्रपत्र जाली भी बने होते हैं क्योंकि उनके भूमि पर अधिकार रहता है परंतु शिलालेखों का बहुधा भूमि से संबंध होता ही नहीं इस लिये उनको कृत्रिम बनाने की आवश्यकता ही नहीं रहती. शेरगढ़ (कोटाराज्य में) के दरवाज़े के पास की तिबारी की सीढ़ियों के पास एक ताक़ में लगे हुए सामंत देवदत्त के वि. सं. ८४७ (ई. स. ७६१) के लेख को मैंने देखा है उसमें नवीन शैली के संवत् के अंक बहुत स्पष्ट हैं. डॉ. फ़्लीट ने उसके संवत् के अंश की प्रतिकृति छापी है (इं. ऐं; जि. १४, पृ. ३५१) जिसमें भी संवत् के अंक स्पष्ट हैं (डॉ. फ़्लीट ने ८३६ पढ़ा है वह अशुद्ध है). प्रतिहार नागभट के समय के बुचकला (जोधपुर राज्य में) के वि. सं. ८७२ (ई. स. ८१५) के शिलालेख के संवत् के अंक (एं. इं; जि. ६, पृ. २०० के पास का लेट), ग्वालियर् से मिले हुए प्रतिहार भोजदेव के समय के ई. स. ८७० के आस पास के शिला लेख के (जिसमें संवत् नहीं दिया) १ से २६ तक श्लोकांक (आ. स. ई; ई. स. १६०३-४, सेट ७२) और वहीं से मिले हुए उसी राजा के समय के वि. सं. ६३३ (ई. स. ८७६) के शिलालेख में दिये हुए ६३३, १८७ और ५० के अंक सब के सब नवीन शैली से ही हैं (एं. इं; जि. १, पृ. १६० के पास का प्लेट). इन सब लेखों की उत्तम प्रतिकृतियां छपी हैं. उनमें दिये हुए अंकों को कोई विद्वान् संशययुक्त नहीं कह सकता. ऐसी दशा में मि. के की उपर्युक्त "पूर्ण सत्यता" में वास्तविक सत्यता का अंश कितना है इसका पाठक लोग स्वयं विचार कर सकेंगे.
c25.s2.16
शून्य की योजना कर नव अंकों से गणित शास्त्र को सरल करनेवाले नवीन शैली के अंकों का प्रचार पहिलेपहल किस विद्वान् ने किया इसका कुछ भी पता नहीं चलता. केवल यही पाया जाता है कि नवीन शैली के अंकों की सृष्टि भारतवर्ष में हुई. फिर यहां से अरबों ने यह क्रम सीखा और अरबों से उसका प्रवेश युरोप में हुआ, जिसके पहिले चाल्डिअन्, हिब्रू, ग्रीक, अरब आदि एशिया और युरोप की जातियां वर्णमाला के अक्षरों१ से अंकों का काम लेती थीं. अरबों के यहां खलिफ़ वलीद के समय (ई. स. ७०५-७१५) तक अंकों का प्रचार न था२ जिसके बाद उन्होंने भारतवासियों से अंक लिये.
c25.s2.17
१ पहिले ६ अक्षरों से १ से ६ तक के अंक, उनके बाद के ६ अक्षरों से १० से ६० तक की दहाइयों के अंक और बाकी के अक्षरों से १००, २०० आदि के अंक बतलाये जाते थे. जब वर्णमाला के अक्षर पूरे हो जाते तब फिर उन्हींके ऊपर चिह्न लगा कर १००० तक सूचित करने के लिये उनको काम में लाते थे. ग्रीक लोगों में १०००० तक के लिये अक्षर संकेत थे परंतु रोमन लोगों में १००० तक के ही. रोमन अक्षरों से अंक लिखने का प्रचार अब तक युरोप में कुछ कुछ बना हुआ है और बहुधा घड़ियों में घंटों के अंकों और पुस्तकों में कभी कभी सन् के अंक तथा सेटों की संख्या आदि में उसका व्यवहार होता है. अरबों में भारतीय अंक ग्रहण करने के पहिले अक्षरों से ही अंक बतलाये जाते थे, जिसको 'अबजद' (हिब्रू वर्णमाला के पहिले ४ अक्षरों के उच्चारणों-अ, ब, ज और द-से) कहते हैं. उन्होंने यह अक्षरसंकेत ग्रीकों से सीखा था. अरबी से फ़ारसी में उसका प्रयोग होने लगा और हिंदुस्तान के मुसलमानों के समय के फ़ारसी लेखों तथा पुस्तकों में कभी कभी अंकसूचक अक्षरों से शब्द बना कर सन् का अंक बतलाया हुआ मिलता है, जैसे कि 'वफ़ात् फीरोज़ (फ़ीरोज़ का देहांत) = हिजरी सन् ७६०; 'मस्जिद जामिउल् शर्क = हिजरी सन् ८५२ आदि (क; ई. इं; पृ. २२६).
c25.s2.18
२ ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२५, टिप्पण २. † शाके नवाब्धिष्व (४६०) रन्विते शशिनो ऽङ्कदस्त्रै (२६) स्तत्तुंगतः कतशिबै (१४७) स्तमसः षडंकैः (६६)। शैलाग्निभिः (३७) सुरगुरोर्गणिते सितो ऽक्षान् शोध्यं चिपंचकु (१५२) स्ततेऽश्वराचि (२५०) भक्ते ॥ १८॥ स्तंबैरमांबुधि (४८०) हते क्षिति नंदनस्य सूर्यात्मजस्य गणिते ऽस्वर लोचनै- (२०) श्च। व्योमाग्निवेद (४३०) निहते विदधीत लब्धं शीतांशुकुंगकलाश्रुदं बर्के ॥ १६ ॥ ( शिष्यधीवृद्धिदतंत्र, उत्तराधिकार ). ‡ पंचाम्वराणि गुणगु णपञ्चसु नित्वर शरे (५००५५६०००००) र्गिताः शशिनः । भौमस्य द्वियसशराल्पपचवर सुरसन वहियमाः (२२६६८५२२५६२२) ॥ १६ ॥ (ब्रह्मस्फुटसिद्धांत, मध्यमाधिकार).
c25.s2.19
इस विषय में 'एन्साइक्लोपीडिया ब्रिटॅनिका' नामक महान् अंग्रेजी विश्वकोश में लिखा है कि 'यह सर्वथा निःसंशय है कि हमारे (अंग्रेजी) वर्तमान दशगुणोत्तर अंकक्रम की उत्पत्ति ˙˙˙भारतीय है. संभवतः खगोलसंबंधी उन सारणियों के साथ, जिनको एक भारतीय राजदूत ई. स. ७७३ में बगदाद में लाया था, भारतवासियों से उसका प्रवेश अरबों में हुआ. वस्तुतः
c25.s2.20
ई. स. की नवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में प्रसिद्ध अबुजफ़र मुहम्मद अल् खारिज़मी ने अरबी में उक्त क्रम का विवेचन किया और उसी समय से उसका प्रचार...अरबों में बढ़ता रहा.'
c25.s2.21
'यूरोप में शून्यसहित यह पूरा [अंक]क्रम ई. स. की १२ वीं शताब्दी में अरबों से लिया गया और इस क्रम से बना हुआ अंकगणित 'अल्गोरिद्मस्' (अल्गोरिथम्) नाम से प्रसिद्ध हुआ. यह (अल्गोरिद्मस्) विदेशी शब्द 'अल्खारिज़्मी' का अक्षरांतर मात्र है जैसा कि रेनाड ने अनुमान किया था, और उक्त अरब गणितशास्त्रवेत्ता के अनुपलब्ध अंकगणित के पुस्तक के केंब्रिज से मिले हुए अद्वितीय हस्तलिखित लैटिन अनुवाद के, जो संभवतः बाथ-निवासी ऐडेतहर्ड का किया हुआ है, प्रसिद्ध होने के बाद वह (अनुमान) प्रमाणित हो गया है. खारिज़्मी के अंकगणित के प्रकारों को पिछले पूर्वीय विद्वानों ने सरल किया और उन अधिक सरल किये हुए प्रकारों का पश्चिमी यूरोप में पीसा के लेओनार्डो ने और पूर्वी में मेक्सिमम् प्लैनुडेस ने प्रचार किया. 'ज़िरो' शब्द की उत्पत्ति अरबी के 'सिफर' शब्द से, लिओनार्डो के प्रयुक्त किये हुए 'ज़िफिरो' शब्दद्वारा, प्रतीत होती है१'.
c25.s2.22
भारतीय अंकों से अरबों के और उनसे यूरोप के अंकों की सर्वमान्य उत्पत्ति के विरुद्ध मि. के ने उपर्युक्त लेख के प्रारंभ में ही लिखा है कि 'यह कहा जाता है कि हमारे अंकगणित के अंकों की उत्पत्ति भारतीय है. पीकॉक, चैसिल्स, वोप्के, केंटोर, बेले, बूलर, मेकडोनेल और दूसरे लेखक प्रायः निश्चय के साथ यही कहते हैं और विश्वकोशों तथा कोशों का यही कथन है. तो भी इस समय जो सामग्री उपलब्ध है उसकी सावधानी के साथ परीक्षा करने से यह पाया जाता है कि उन(अंकों)की भारतीय उत्पत्ति की कल्पना उचित प्रमाण से रहित है. वैसी परीक्षा यही बतलाती है कि उन कथनों में से बहुत से निस्सार हैं' (बंगा.ए.सो.ज.; ई. स. १६०७, पृ. ४७५). अरबी में अंकों को 'हिंदसे' कहते हैं जिसका अबतक के विद्वान् हिंद (हिंदुस्तान) से लिये जाने के कारण ऐसा कहलाना मानते हैं, परंतु मि. के का कथन है कि 'शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र का बड़ा ज्ञाता फ़ीरोज़ आबादी (ई. स. १३२६-१४२४) 'हिंदसह' शब्द की उत्पत्ति 'अंदाज़ह' से होना बतलाता है, जिसका अर्थ परिमाण है. हरेक आदमी विचार सकता है कि यह काफ़ी अच्छा प्रमाण है परंतु भारतवर्ष के विषय में लिखनेवालों में से अधिकतर ने इसे स्वीकार नहीं किया' (पृ. ४८६). इसी तरह इब्न सिना के वर्गसंख्या-विषयक नियम में लिखे हुए 'फी अल्तरीक अल्हिंदसे' और उसीके घनसंख्याविषयक नियम में दिये हुए 'अल्हिसाब अल्हिंदसे' में 'हिंदसे' शब्दों का हिंद (हिंदुस्तान) से कोई संबंध न बतलाने का यत्न किया है (पृ. ४६०). मि. के का यह कथन भी स्वीकार करने योग्य नहीं है और वैसा ही है जैसा कि उपर्युक्त यह कथन कि 'हिंदुओं के गणितशास्त्र भर में ई. स. की दसवीं शताब्दी के पूर्व नवीन शैली के (वर्तमान) अंकों के व्यवहार की कल्पना का तनिक भी चिह्न नहीं मिलता' (देखो, ऊपर पृ. ११६, टिप्पण ६). ऐसे कथनों का प्रतिवाद कर लेख को बढ़ाने की हम आवश्यकता नहीं समझते. प्रसिद्ध विद्वान् अल्बेरुनी ने, अपनी भारतवर्ष संबंधी तहकीकात की अरबी पुस्तक में, जो ई. स. १०३० के आस पास लिखी गई थी, लिखा
c25.s2.23
१ अरबों के द्वारा भारतीय अंकों का यूरोप में प्रवेश हुआ उससे बहुत पहिले अर्थात् ई. स. की ४ थी शताब्दी के आस पास 'निओ-पिथागोरियन' नामक अध्यात्म विद्या के उपदेशक, संभवतः अलेक्ज़ेंड्रिया (मिसर में) की तरफ भारतीय अंकों का ज्ञान प्राप्त कर, उनको यूरोप में ले गये परंतु उनका प्रचार अधिक न बढ़ा और वे सार्वदेशिक न हुए. यूरोप में भारतीय अंकों का वास्तविक प्रचार स्पेन पर अरबों का अधिकार होने के बाद अरबों के द्वारा ही हुआ. इसीसे यूरोप के वर्तमान अंकों को 'अरेबिक (अरबों के) अंक' कहते हैं. *ए. ब्रि; जि. १७, पृ. ६२६.
c25.s2.24
है कि 'हिंदूलोग अपनी वर्णमाला के अक्षरों को अंकों के स्थान में काम में नहीं लाते जैसे कि हम हिब्रू वर्णमाला के क्रम से अरबी अक्षरों को काम में लाते हैं. हिंदुस्तान के अलग अलग हिस्सों में जैसे अक्षरों की आकृतियां भिन्न हैं वैसे ही संख्यासूचक चिह्नों की भी, जिनको अंक कहते हैं, भिन्न हैं. जिन अंकों को हम काम में लाते हैं वे हिंदुओं के सब से सुंदर अंकों से लिये गये हैं.…जिन भिन्न भिन्न जातियों से मेरा संपर्क रहा उन सबकी भाषाओं के संख्यासूचक क्रम के नामों (इकाई, दहाई, सैकड़ा आदि) का मैंने अध्ययन किया है जिससे मालूम हुआ कि कोई जाति हज़ार से आगे नहीं जानती. अरब लोग भी हज़ार तक [नाम] जानते हैं…इस विषय में मैंने एक अलग पुस्तक लिखा है. अपने अंकक्रम में जो हज़ार से अधिक जानते हैं वे हिंदू हैं. …वे संख्यासूचक क्रम को १८ वें स्थान तक ले जाते हैं…जिसको 'परार्द्ध' कहते हैं. ……अंकगणित में हिंदू लोग अंकों का उसी तरह प्रयोग करते हैं जैसे कि हम करते हैं. मैंने एक पुस्तक लिख कर यह बतलाया है कि इस विषय में हिंदू हमसे कितने आगे बढ़े हुए हैं'१.
c25.s2.25
अलबेरूनी का, जो अरबों तथा हिंदुओं के ज्योतिष और गणितशास्त्र का अपूर्व ज्ञाता था और जिसने कई बरस तक हिंदुस्तान में रहकर संस्कृत पढ़ा था इतना ही नहीं किंतु जो संस्कृत में अनुष्टुभ् छंद भी बना लेता था और जिसको इस देश का व्यक्तिगत अनुभव था, यह कथन कि 'जिन अंकों को हम काम में लाते हैं वे हिंदुओं के सब से सुंदर अंकों से लिये गये हैं,' मि. के के विचार में ठीक न जचा परंतु १५ वीं शताब्दी के आसपास के शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र के ज्ञाता फ़ीरोज़ अबदी का, जो गणितशास्त्र का ज्ञाता न था, 'हिंदसह' शब्द की उत्पत्ति 'अंदाज़ह' शब्द से बतलाना ठीक जच गया जिसका कारण यही है कि पहिले का लेख मि. के के विरुद्ध और दूसरे का अनुकूल था. 'एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका' नामक महान् अंग्रेज़ी विश्वकोष की १७ वीं जिल्द के ६२६ वें पृष्ठ पर नानाघाट के लेख के, भारतीय गुफ़ाओं के लेखों के और १० वीं शताब्दी के नागरी के अंक दिये हैं और उनके नीचे ही शीराज़ में लिखी हुई १० वीं शताब्दी की एक अरबी पुस्तक के भी अंक दिये हैं जो वस्तुतः प्राचीन नागरी ही हैं; उनमें केवल ४ के अंक को टेढ़ा और ७ को उलटा लिखा है बाक़ी कोई अंतर नहीं है. अरबी, फ़ारसी और उर्दू तक के अंक, उन लिपियों की लेखनशैली तथा सेमेटिक अंकों के अनुसार दाहिनी ओर से बाईं ओर न लिखे जा कर हिंदू रीति से ही बाईं ओर से दाहिनी ओर अब तक लिखे जाते हैं. ऐसी दशा में अलबेरूनी और मि. के में से किसका कथन यथार्थ है यह पाठक लोग स्वयं जान सकेंगे.
शब्दों से अंक बतलाने की भारतीय शैली
c25.s3.1
आर्य लोगों में वेदमंत्रों में स्वरों की अशुद्धि यजमान के लिये नाश का हेतु मानी जाती थी इस लिये वेदों का पठन गुरु के मुख से ही होता था और वे रट रट कर स्वरसहित कंठस्थ किये जाते थे (देखो, ऊपर पृ. १३-१४). उसी की देखादेखी और शास्त्र भी कंठस्थ किये जाने लगे और मुखस्थ विद्या ही विद्या मानी जाने लगी. इसी लिये सूत्रग्रंथों की संक्षिप्त शैली से रचना हुई कि वे आसानी से कंठ किये जा सकें और इसी लिये ज्योतिष, गणित, वैद्यक और कोश आदि के ग्रंथ भी श्लोकबद्ध लिखे जाने लगे. अन्य विषय के ग्रंथों में तो अंकों का विशेष काम नहीं रहता था परंतु ज्योतिष और गणित संबंधी ग्रंथों में लंबी लंबी संख्याओं को
c25.s3.2
१ सा; अ. इं; जि. १, पृ. १७४, १७७.
c25.s3.3
श्लोकों में लाने में कठिनता रहती थी जिसको सरल करने के लिये संभवतः उक्त शास्त्रों के आचार्यों ने संख्यासूचक सांकेतिक शब्द स्थिर किये हों. ये सांकेतिक शब्द मनुष्य के अंग, छंदों अथवा उनके चरणों के अक्षर, देवता, साहित्य के अंग, ग्रह, नक्षत्र आदि एवं संसार के अनेक निश्चित पदार्थों की संख्या पर से कल्पित किये गये हैं. प्रत्येक नाम के लिये संस्कृत भाषा में अनेक शब्द होने से प्रत्येक संख्या के लिये कई शब्द मिलते हैं जिनमें से कुछ नीचे दिये जाते हैं—
c25.s3.4
०=शून्य, ख, गगन, आकाश, अंबर, अभ्र, वियत, व्योम, अंतरिक्ष, नभ, पूर्ण, रंध्र आदि.
१=आदि, शशि, इंदु, विधु, चंद्र, शीतांशु, शीतरश्मि, सोम, शशांक, सुधांशु, अब्ज, भू, भूमि, क्षिति, धरा, उर्वरा, गो, वसुंधरा, पृथ्वी, क्ष्मा, धरणी, वसुधा, इला, कु, मही, रूप, पितामह, नायक, तनु आदि.
२=यम, यमल, अश्विन, नासत्य, दस्र, लोचन, नेत्र, अक्षि, दृष्टि, चक्षु, नयन, ईक्षण, पक्ष, बाहु, कर, कर्ण, कुच, ओष्ठ, गुल्फ, जानु, जंघा, द्वय, द्वंद्व, युगल, युग्म, अयन, कुटुंब, रविचंद्रौ आदि.
३=राम, गुण, त्रिगुण, लोक, त्रिजगत्, भुवन, काल, त्रिकाल, त्रिगत, त्रिनेत्र, सहोदराः, अग्नि, वह्नि, पावक, वैश्वानर, दहन, तपन, हुताशन, ज्वलन, शिखिन, कृशानु, होतृ आदि.
४=वेद, श्रुति, समुद्र, सागर, अब्धि, जलधि, उदधि, जलनिधि, अंबुधि, केंद्र, वर्ण, आश्रम, युग, तुर्य, कृत, अय, आय, दिश् ( दिशा ) बंधु, कोष्ठ, वर्ष आदि.
५=बाण, शर, सायक, इषु, भूत, पर्व, प्राण, पांडव, अर्थ, विषय, महाभूत, तत्त्व, इंद्रिय, रत्न आदि.
६=रस, अंग, काय, ऋतु, मासार्ध, दर्शन, राग, अरि, शास्त्र, तर्क, कारक आदि.
७=नग, अग, भूभृत्, पर्वत, शैल, अद्रि, गिरि, ऋषि, मुनि, अत्रि, वार, स्वर, धातु, अश्व, तुरग, वाजि, छंद, धी, कलत्र, आदि.
८=वसु, अहि, नाग, गज, दंति, दिग्गज, हस्तिन, मातंग, कुंजर, द्विप, सर्प, तक्ष, सिद्धि, भूति, अनुष्टुभ्, मंगल आदि.
९=अंक, नंद, निधि, ग्रह, रंध्र, छिद्र, द्वार, गो, पवन आदि.
१०=दिश, दिशा, आशा, अंगुलि, पंक्ति, ककुभ, रावणशिरम्, अवतार, कर्मन् आदि.
११=रुद्र, ईश्वर, हर, ईश, भव, भर्ग, शूलिन्, महादेव, अक्षौहिणी आदि.
१२=रवि, सूर्य, अर्क, मार्तंड, द्युमणि, भानु, आदित्य, दिवाकर, मास, राशि, व्यय आदि.
१३=विश्वेदेवाः, काम, अतिजगती, अघोष आदि.
१४=मनु, विद्या, इंद्र, शक्र, लोक आदि.
१५=तिथि, घस्र, दिन, अहन्, पक्ष आदि.
१६=नृप, भूप, भूपति, अष्टि, कला आदि.
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- Śiṣyadhīvṛddhidatantra — Lalla, Sanskrit
- Bakhshālī Manuscript — Sanskrit
- Mahāsiddhānta (Āryasiddhānta) — Āryabhaṭa II, Sanskrit
- Maṅgalagiri Pillar Inscription — Sanskrit
- Alampundi Plate of Virupaksha; Saka-Samvat 1305 — Sanskrit
- Tirukuranguḍi bell inscription of Ādityavarmā — Sanskrit