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Pracin Bharatiya Veshabhusha c7: तीसरा अध्याय : महाजानपद और शैशुनाग युगों की वेश-भूषा

Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c7

Language
Hindi

Contents

तीसरा अध्याय : महाजानपद और शैशुनाग युगों की वेश-भूषा

c7.1

महाजानपद और शैशुनाग युगों की वेश-भूषा

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६४२ ई० पू० में ३२० ई० पू० तक का भारतीय इतिहास षोडश जनपदों शैशुनागों (६४२-४१३ ई० पू०) और नंदों (४१३-३२२ ई० पू०) का इतिहास है। शैशुनाग वंश में नवीन राजगृह की नींव डालने वाले बिंबिसार, श्रेणिक और कुणिक अजातशत्रु बुद्ध और महावीर के समकालीन थे। इस युग के राजनीतिक और सामाजिक इतिहास की प्रचुर सामग्री हमें बौद्ध और जैन साहित्यों तथा धर्मसूत्रों, गृह्यसूत्रों और अष्टाध्यायी से प्राप्त है। इन सब ग्रंथों के कालनिर्णय में भी हमें उसी कठिनाई का सामना करना पड़ता है जिसे हमें वैदिक ग्रंथों के कालनिर्णय में। फिर भी उनके अध्ययन से हमें पता चलता है कि उनमें वर्णित राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्थाएं मौर्य युग से पूर्व की हैं। इस युग के ब्राह्मण, जैन, बौद्ध और व्याकरण शास्त्रों में उल्लिखित भारतीय संस्कृति का रूप करीब करीब एक सा है। इसलिए अगर हम इस युग की संस्कृति को षोडश महाजनपद युग की संस्कृति कहें तो इसमें कोई हरज नहीं है। श्रुत होने से इस युग के ग्रंथ बाद में इकट्ठे करके लिखे गये और संभव है कि बहुत सी बाद की बातों का भी उनमें समावेश हो गया हो, पर आधुनिक ग्रंथानुशीलन की परिपाटी को ध्यान में रखकर अगर हम इन ग्रंथों का अध्ययन करें तो पुराने को नये से अलग करने में हम समर्थ हो सकते हैं। इस बात को ध्यान में रख कर हमने बौद्ध और जैन ग्रंथों के उन्हीं अंशों को लिया है जो आलोचना की कसौटी पर खरे और प्राचीन उतरते हैं।

महाजानपद युग में सभ्यता का विकास

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इस युग की सभ्यता का अध्ययन करने से यह पता चलता है कि इस युग में वैदिक युग से भारतीय सभ्यता आगे बढ़ चुकी थी। ग्राम्य सभ्यता से निकलकर भारतीय सभ्यता अब नगरों में केंद्रित होने लगी थी और इसके फलस्वरूप राजगृह, साकेत, वाराणसी, वैशाली और पुष्कलावती ऐसे बड़े बड़े नगर सभ्यता के केन्द्र बन गये थे। परिखा और प्राकारों से परिवेष्टित नगर शत्रुओं के लिए दुर्गम थे। उनकी करीनेदार सड़कें, सजी दुकानें तथा कला कौशल के कारखानें भारतीय सभ्यता के प्रतीक थे। विचार स्वतंत्रता इस युग की खास देन थी जिसके फलस्वरूप प्राचीन वैदिक धर्म की नींव हिल गयी। इस युग में बहुत सी धातुएं जैसे रांगा, सीसा, चांदी, लोहे और तांबे का खूब व्यवहार होने लगा था। राज प्रासाद और रईसों के एक या कई मंजिलों वाले प्रशस्त गृह ईंट और लकड़ी के बनने लगे

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थे। कपास, क्षौम, रेशम, और ऊनी कपड़ों का खूब चलन था। कपड़ों पर कसीदे का काम भी होता था। तरह तरह के बरतन और सज्जा के सामान जैसे कुरसियां, सिंहासन, सेज, शीशे इत्यादि लोग व्यवहार में लाते थे। लोग सोने चांदी के गहने पहनते थे और बहुत से रत्नों का उन्हें पता था।

बौद्ध और जैन साहित्यों में कारीगरों का सामाजिक स्थान

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जातक कथाओं के अनुसार कारीगर अट्ठारह श्रेणियों में विभक्त थे जिनमें बढ़इयों, लुहारों और चितेरों की श्रेणियां भी सम्मिलित थीं। कसीदा काढ़ने वालों (पेसकारसिप्प) और बेंत बीनने वालों (नलकार)१ को शायद इसलिये नीच काम करने वाला कहा गया है कि ये व्यवसाय देश के आदिम निवासियों के हाथों में थे जिन्हें आर्य हेय दृष्टि से देखते थे। भीमसेन जातक२ में एक धनुर्धारी ब्राह्मण बुनकर (तंतुवाय) के व्यवसाय को नीच काम कहता है। सुत्तविभंग३ में भी नलकारशिल्प, कुंभकारशिल्प, पेशकार शिल्प और स्नापित शिल्प को नीच काम कहा गया है। ऊपर के उल्लेखों से यह न समझ लेना चाहिए कि यह विचार बौद्धों के हैं क्योंकि बुद्ध ने तो जात पांत तोड़ने की पूरी व्यवस्था दी है। ये भाव तो केवल तत्कालीन ब्राह्मण आर्य सभ्यता के प्रतीक मात्र हैं जो कहानियों के प्रसंग में बौद्ध साहित्य में भी आ गये हैं। जंबूद्वीप प्रज्ञप्ति४ में जो जैनग्रंथ है दरजियों (तुण्णाग), बुनकरों (तंतुवाय) और रेशमी कपड़े बिनने वालों (पट्टगार) को शिल्पायों के श्रेणी में रक्खा गया है जिसका मतलब यह है कि अपने शिल्प बल से ये कारीगर आर्यत्व को प्राप्त थे। इसी तरह दौष्यिक, सौत्रिक और कार्पासिक भी कर्म आर्य५ माने गये हैं।

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१ जातक, भा० ४, पृ० २५१

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२ जा०, भा० १, पृ० ३५६

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३ पाचित्तिय, २।२।१

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४ जं० प्र०, सूत्र ७०

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५ वही, सूत्र ६१

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इस युग में निम्नलिखित तरह के कपड़ों का व्यवहार होता था :—

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कपास—हम दूसरे अध्याय में दिखला चुके हैं कि वैदिक साहित्य में कपास का सर्वप्रथम उल्लेख आश्वलायन गृह्य सूत्र में आया है। पाणिनि के सूत्रों में कर्पास का उल्लेख नहीं है लेकिन पाणिनि तूल से, जैसा कि ईषीका तूल६ से मालूम पड़ता है परिचित थे। तूल का अर्थ बाद में तो कपास होता है लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि पाणिनि के युग में भी इस शब्द के यही अर्थ होते थे। आचारांग सूत्र७ में भी तूल (तूलकड) का उल्लेख है लेकिन

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६ अष्टाध्यायी, ६।३।६५; डा० वासुदेव शरण, यू० पी० हि० सो० ज०, जुलाई १९४०, पृ० १०६

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७ आचारांग सूत्र, २।५।१।१

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टीकाकार ने इसका अर्थ कपास का बना कपड़ा न करके सेमल की रुई (अर्कतूल) किया है। यह अर्थ संदेहात्मक है क्योंकि सेमल की रुई का सूत इतना कोमल होता है कि उसका बना कपड़ा एक धोब के बाद फट जाता है। लगता है यहां तूल से कपास का ही मतलब है। जातक कथाओं८ में तो कपास का बहुत उल्लेख हुआ है। तुंडिल जातक९ में बनारस के आसपास कपास के खेतों का वर्णन है। स्त्रियां कपास के खेतों की रखवारी करती थीं। महाजनक जातक१० में इन्हें कप्पास रक्खिका नाम से संबोधन किया गया है। कताई और बुनाई संबंधी उपकरणों के भी कभी कभी उल्लेख आते हैं। रुई धुनने की धनुही (कप्पास-पोथन-धनुके) का उल्लेख आता है११। स्त्रियों द्वारा महीन सूत कात कर (सुखुम सुत्तानि कन्तित्वा) गंडी (गुलं)१२ बनाने का भी उल्लेख है।

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९ जातक, भाग ३, पृ० २८६

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१० जातक, भाग ६, पृ० ३३६

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११ जातक, भाग ६, पृ० ४१

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१२ जातक, भाग ६, पृ० ३३६

कौशेय

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हम दूसरे अध्याय में कह चुके हैं शायद कौशेय का उल्लेख सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण में आता है। पाणिनि की अष्टाध्यायी में१३ तो कौशेय के लिए एक अलग सूत्र ही है। रामायण१४ में सीता को पीला रेशमी वस्त्र पहिने बतलाया गया है (पीते कौशेय वाससी) बौद्ध साहित्य१५ में कौशेय का उल्लेख है और रेशमी चादर (कौशेय प्रावार) पहनने की अनुमति बुद्ध ने भिक्षुओं को दी है१६। प्राचीन जैन ग्रंथ आचारांग सूत्र में कौशेय का उल्लेख नहीं है पर पट्ट१७ शब्द से शायद रेशम का बोध होता हो। इसी सूत्र के वस्त्रों की तालिका में चीनांसुक या चीन के बने रेशमी वस्त्र का भी उल्लेख है। चीन शब्द के आने से इस तालिका की प्राचीनता पर संदेह किया जा सकता है पर अभी तक यह प्रश्न विवादास्पद है कि चीन शब्द भारतीय साहित्य में कब से आया। जैसा हम चौथे अध्याय में देखेंगे चीन के बने रेशमी वस्त्रों का उल्लेख कौटिल्य अर्थशास्त्र में भी आया है, और महाभारत के सभापर्व में बाह्लीक और चीन के बने कीटज और पट्टज१८ वस्त्रों का उल्लेख है। बाह्लीक और

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८ जातक, भाग ६, पृ० ४७

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१३ अष्टाध्यायी, ४।३।४२

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१४ रामायण, २।४०।६

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१५ जातक, भा० ६, पृ० ४७

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१६ महावग्ग, ८।१।३६

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१७ आ० सू०, २।५।१।४

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१८ महाभारत, २।४७।२२

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चीन के उल्लेख से शायद मध्य एशिया के उस बड़े रास्ते की ओर इशारा है जिससे होकर चीन से रेशम भारत और शाम आता था।

क्षौम

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दूसरे अध्याय में हम देख चुके हैं कि पिछले वैदिक काल में अतसी की छाल के रेशे से बने हुये कपड़े का व्यवहार होता था। पाणिनि ने रेशेदार पौधों में उमा१९ यानी अतसी के पौधे का भी वर्णन किया है। उमा धान्य विशेष है या नहीं इस प्रश्न को लेकर वार्तिककार कात्यायन और महाभाष्यकार पतञ्जलि के मतों में भेद है। कात्यायन उमा और भंगा को धान्य नहीं मानते और पतञ्जलि उन्हें धान्य मानते हैं। बौद्ध और जैन ग्रंथों के आधार पर तो कात्यायन की राय ठीक मालूम पड़ती है क्योंकि इनमें भंगा और उमा का व्यवहार अन्न विशेष के लिए नहीं वरन् रेशों के लिये किया गया है जिनसे कपड़े बनते थे। रामायण में क्षौम के बहुत से उल्लेख आये हैं राम की माता क्षौम (क्षौमवाससा)२० पहनती थीं, एक विमल क्षौम पहने ब्राह्मण का वर्णन है२१ और राम के नगर दर्शन के अवसर पर क्षौम और पट्ट के पांवड़े सड़कों पर बिछाए जाने का उल्लेख है२२। जातकों में क्षौम का उल्लेख आया है२३ और महावग्ग में२४ बुद्ध ने भिक्षुओं को क्षौम के चीवर बनाने की आज्ञा दी है। जैनों के आचारांग सूत्र में२५ जैन साधुओं को क्षौम पहनने की आज्ञा दी गयी है। आचारांग सूत्र में२६ कीमती वस्त्रों की तालिका में भी क्षौम आया है जिसे टीकाकार शीलांक ने सामान्य सूत का बना कपड़ा कहा है। यह अर्थ ठीक नहीं है क्योंकि क्षौम का व्यवहार कहीं भी कपास से बने कपड़े के लिए नहीं हुआ है। संभव यह है कि मोटे सूत के क्षौम साधारण रूप से जैन साधु व्यवहार कर सकते थे लेकिन बहुत बारीक सूत के कीमती क्षौम का व्यवहार उनके लिए वर्जित था।

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१९ अष्टाध्यायी, ५।२।४; डा० वासुदेवशरण, यू० पी०, हि० सो० ज० (जुलाई १६४०), पृ० १०५

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२० रामायण, २।६।२८

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२१ रामायण, २।८।७

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२२ रामायण, २।१६।९

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२३ जातक, भा० ६, पृ० ४७

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२४ महावग्ग, ८।१।३६

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२५ आचारांग सू० १।७।२।१; २।५।१।१

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२६ आचारांग सू० २।५।१।४; निशीथ चूर्णि, भा० ७, पृ० ४६७ में क्षौम का अर्थ रूई का कपड़ा (पोंण्डमया) अथवा वृक्ष विशेष की छाल से बना वस्त्र दिया है।

कंबल

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हम दूसरे अध्याय में देख चुके हैं कि अथर्ववेद में कंबल शब्द का प्रयोग ऊनी

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वस्त्रों के लिए हुआ है। महावग्ग२७ में भी कंबल शब्द का व्यवहार ऊनी वस्त्रों के लिए ही हुआ है। जातकों में२८ गंधार के रक्त पांडु कंबल (इंदगोपक वण्णाभा गंधारा पंडुकंबला) की तारीफ की गयी है। महावाणिज जातक२९ में बहुमूल्य वस्तुओं की तालिका में उड्डीयान के कंबल भी शामिल हैं। शिवि लोगों का देश ऊनी शालों के लिए, जिन्हें बौद्ध साहित्य में सीवेय्यक दुस्स३० कहा है, प्रसिद्ध था। सिवि जातक३१ में इसका उल्लेख है कि कोशल राज ने दशबल नाम के एक व्यक्ति को सिवि देश का वस्त्र (सीवेय्यक वत्थं) जिसका दाम एक लाख कार्षापण था, उपहार में दिया। दुस्स शब्द अब भी पंजाबी और हिन्दी में धुस्सा के रूप में चला आता है लेकिन धुस्से की चादर मामूली कीमत की होती है। लगता है कि प्राचीन दुस्स दुशाले की तरह कोई कीमती ऊनी चादर थी। दुस्स प्राचीन वैदिक तूष जिसके अर्थ कपड़े में बटी या अनबटी छीर है, निकला है। दुशाले में बराबर छीर छोड़ी जाती है इसलिए उसका नाम महाजनपद युग में दुस्स पड़ा।

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२७ —महावग्ग, ८।३।१

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२८ —जातक, भा० ६, पृ० ५००

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२९ —जातक, भा० ४, पृ० ३५२

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३० —महावग्ग, ८।१।२६

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३१ —जातक, भा० ४, पृ० ४०१

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रामायण और महाभारत के अध्ययन से भी ऐसा पता चलता है कि गंधार और पंजाब ऊनी वस्त्रों के लिये प्रसिद्ध थे। रामायण में कहा गया है कि कैकय देश (आधुनिक शाहपुर-झेलम) के राजा ने अपने भांजे भरत को विदाई में उपहार स्वरूप अलंकृत कालीन (चित्रांकंबलान्) शुभ्र कंबल और बकरों की खालें दीं३२। महाभारत के सभापर्व के उन अध्यायों से जिनमें राजसूय यज्ञ के अवसर पर देश के विभिन्न भागों से आये उपायनों का वर्णन है यह पता चलता है कि पंजाब, उत्तर पश्चिमी सीमाप्रान्त और पूर्वी अफगानिस्तान से ऊनी कपड़े और अधिकतर शालें आयीं। कंबोज (आधुनिक ताजिकिस्तान) से कदली मृग की खालें, कीमती कंबल, ३३भेड़ों की खालें (ऐडान्वैलान्) और वृषदंश पशु के समूर और बकरों की खालें आयीं३४। परिसिधु३५ प्रदेश से भी तरह तरह के कंबल आये। चीनियों हूणों, शकों, ओड्रों और पर्वतांतर में रहने वाले कबीलों ने भी तरह तरह के ऊनी वस्त्र उपहार में

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३२ —रामायण, २।७६।२०

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३३ —महाभारत, २।४५।१६

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३४ —महाभारत, २।४७।३

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३५ —महाभारत, २।४७।११

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भेजे। वे वस्त्र प्रमाण और रंग में पक्के तथा बाह्लीक और चीन के बने हुए थे। उनमें ऊनी (और्ण), पश्मीने (रांकवम्) नमदे तथा भेड़ों और बकरों की खालें भी थीं३६।

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३६ —महाभारत, २।४७।४२-४३

काशी के वस्त्र

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पालि साहित्य में काशी के बने वस्त्रों के अनेक उल्लेख आये हैं। इन्हें काशीकुत्तम३७ और कहीं कहीं कासीय३८ कहते थे। बनारस का बना कपड़ा इतना प्रसिद्ध था कि महापरिनिर्वाण सूत्र३९ का टीकाकार विहितकण्पास पर टीका करते हुए कहता है कि बुद्ध का मृत शरीर बनारस के बने कपड़े से लपेटा गया था और वह इतना महीन और गंठ कर बुना गया था कि तेल तक नहीं सोख सकता था। बनारसी वस्त्र का उसी सूत्र में एक दूसरी जगह वर्णन करते हुए कहा गया है४० कि वह कपड़ा हर तरफ से नीली झलक मारता था। इसके सिवाय वह पीला, लाल और सफेद भी हो गया था४१। बनारसी कपड़े (वाराणसेय्यक)४२ के बारीक पोत का उल्लेख मज्झिमनिकाय में भी आया है। टीकाकार इसलिए बनारसी कपड़े की प्रशंसा करता है कि उसके अनुसार बनारस में अच्छी कपास होती थी, वहां की कात्तिनें और बुनकर होशियार होते थे, और वहां का नरम पानी धुलाई के लिये बहुत अच्छा पड़ता था। बनारसी कपड़े ऊपर नीचे दोनों ओर से मुलायम और चिकने होते थे। बनारस में सूती कपड़े के सिवाय रेशमी कपड़े क्षोम और शायद ऊनी कपड़े भी बनते थे। बनारस के रेशमी वस्त्र का एक जगह उल्लेख है४३। बनारस में क्षौम मिश्रित कंबल भी बनते थे। जीवक कुमारभृत्य को एक ऐसा ही कंबल काशिराज से उपहार में मिला था४४। महावग्ग में एक दूसरी जगह कहा गया है४५ कि एक समय काशी के राजा ने जीवक की सेवाओं से प्रसन्न होकर उसे अड्ढकासिक कंबल उपहार में भेजा। श्री राइस डेविड ने इसका अनुवाद आधे बनारसी कपड़े से बना हुआ ऊनी वस्त्र किया है लेकिन उनके कथनानुसार भी यह माने अटकल से लगाया गया है। बुद्धघोस ने अड्ढकासीय में कासी का अर्थ एक हज़ार कार्षापण किया है, और अड्ढकासीय का पांच सौ और इस तरह अड्ढकासीय का अर्थ पांच

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३७ —जातक (अंग्रेजी अनुवाद), ६, पृ० ४७; ६, १५१; १, ३३५

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३८ —जातक, ६, ५००

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३९ —महापरिनिव्वाण सुत्त, ५।२६

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४० —वही, ३।२६

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४१ —वही, ३।३०-३२

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४२ —म० नि०, २।३।७

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४३ —जा० (अनुवाद), ६, पृ० ७७

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४४ —महावग्ग, ८।१।४

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४५ —वही, ८।२

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सौ कार्षापण मूल्यवाला कपड़ा किया है। हमारा अनुमान है कि अङ्ढकासीय कोई बहुत बारीक कपड़ा रहा होगा क्योंकि आज दिन भी बारीक सूती कपड़े को अढ़ी कहते हैं। लगता है बनारस में कसीदे का काम भी बनता था। इसे कासिक सूचीवस्त्र कहते थे४६।

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४६ जा० ६, १४४, १४५, १५४

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कोटुंवर—बौद्ध युग में इसकी गणना अच्छे कपड़ों में होती थी४७। अगर कोटुंवर देश की ओदुंवर देश से पहचान ठीक है४८ तो यह कपड़ा अमृतसर के पास पठानकोट के इलाके में बुना जाता था, और शायद यह ऊनी कपड़ा होता था।

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४७ जा० ६, ४७

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४८ बागची, प्री आर्यन एंड प्रीद्रवीडियन, पृ० १६०

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शाण—सन की काफी खेती होती थी४९। सन से सूत (शाणसुत्तं) काता जाता था और उसकी ठीक तरह से गंडियां (सुसनद्धो) बनायी जाती थीं। इस सूत से सत्री कपड़ा (साणिय) बुना जाता था। इसी तरह से क्षौम और कपास के कपड़े भी बनते थे।

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४९ पायासि-सुत्त, २६; दीघनिकाय, भा० २, पृ० ३४६-५०

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भांगिक—भांग वृक्ष की छाल से भी कपड़े बनते थे५०। आज दिन भी युक्तप्रान्त के कुमायूं जिले में ऐसा कपड़ा बनता है जिसे भंगेला कहते हैं।

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५० महावग्ग, ८।३।१

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फलकचीर५१—लगता है यह वस्त्र किसी विशेष लकड़ी की पतली फरांटियों से बनाया जाता था। इसका उपयोग बौद्ध भिक्षुओं के लिए निषिद्ध था। इसका अर्थ फल के रेशों से बना वस्त्र भी हो सकता है।

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५१ वही, ८।२८।२; चुल्लवग्ग, ५।२६।३

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कुशचीर५२—कुश के बने कपड़ों का बौद्ध भिक्षुओं के लिए निषेध था।

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५२ महावग्ग, ८।२८।२-३

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बल्कल५३—छाल के बने वस्त्र। ऐसे वस्त्र भी बौद्ध भिक्षुओं के लिए अविहित थे।

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५३ वही, ८।२८।२-३

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तृण के बने हुए वस्त्र विशेष—मध्य देश में एरगु, मोरगु और मज्जheaderaru५४ नाम के तृणों से बने कपड़े व्यवहार में लाये जाते थे। वहां जाकर बौद्ध भिक्षु भी ऐसे वस्त्र पहन सकते थे। तृण के बने वस्त्रों का व्यवहार किसी सुदूर प्राचीन काल की ओर हमारा ध्यान खींचता है।

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५४ वही, ५।१३।६

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हिरण्य वस्त्र—किखाव का भी कभी कभी उल्लेख हुआ है५५।

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५५ महापरिनिब्वाण सुत्त, ४।४४

वस्त्रों के लिए चमड़े का व्यवहार

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जातकों में अजिन की वस्त्र की तरह उपयोग में लाने का उल्लेख है५६। ऐसा लगता है कि बहुत प्राचीन काल में सिंह, व्याघ्र, चीते, तेंदुए, गाय और हिरन के चमड़ों का उपयोग बिछावन और वस्त्रों के लिए होता था५७। दक्षिणापथ में भी बकरों, भेड़ों और हिरन की खालों का उपयोग आस्तरण और वस्त्र के लिए होता था५८। बौद्ध भिक्षुओं को चमड़े के वस्त्र पहनने की अनुमति नहीं थी, पर दक्षिणापथ में वे इनका उपयोग कर सकते थे।

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५६ जा० ६, ५००

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५७ महावग्ग, ५।१०।५-७

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५८ वही, ५।१३।६

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ऊनी और सूती वस्त्रों का व्यवहार पहनने के सिवाय चांदनी, कालीन, पर्दों और मेजपोश इत्यादि के लिए भी होता था । सज्जा के लिए ऐसे कपड़ों के उल्लेख बौद्ध साहित्य में काफी आये हैं और इनकी तालिकाएं भी महावग्ग और ब्रह्मजाल सुत्त में दी हुई हैं जिनमें बिछाने ओढ़ने के निम्नलिखित वस्त्र हैं।

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गोणक—टीका में इसका अर्थ लंबेबाल वाले बकरे के बाल से बना हुआ आस्तरण है५९। यह शब्द भारतीय साहित्य में बहुत ही कम आया है और संभव है कि यह ईरानी भाषा से लिया गया हो। इस सम्बन्ध में मैं पाठकों का ध्यान सुमेर और अक्काद के प्राचीन निवासियों के पहरावे की ओर दिलाना चाहता हूं। यह एक तहबंदनुमा वस्त्र होता था जो घुटनों तक पहुंचता था और जिसे लोग कमर में लपेट लिया करते थे । यह तहबंद एक टुकड़े में होता था, इस पर उभरी हुई धारियां होती थीं और हर धारी के अंत में झालर। यूनानी लोग इस वस्त्र को कौनकेस (Kaunkes) कहते थे और अरिस्तोफानेज के समय में यह एकबातना में बुना जाता था६०। इस कौनकेस का व्यवहार दुंगी के समय में तिपाइयों के ढकने के लिये भी होता था६१। गोणक और कौनकेस एक ही शब्द मालूम पड़ते हैं। भारत में गोणक का व्यवहार आस्तरण रूप में ही होता था, कपड़े के रूप में नहीं। अब प्रश्न यह उठता है कि भारतवर्ष में यह शब्द कहां से और कैसे आया। इसका सर्वप्रथम उल्लेख जहां तक मुझे मालूम है ब्रह्मजाल सूत्र में हुआ है । लगता यह है कि लगभग ५०० ई० पू० में ईरानी भाषा से यह शब्द पालि में आया ।

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५९ ब्र० सू०, १५, डायलाग्स ऑफ बुद्ध, पृ० ११ इत्यादि

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६० एल० देलापोर्ते, मेसोपोटामिया, पृ० १६४, लंदन, १६२५

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६१ वही, पृ० १६६

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चित्तक६२—बिस्तर ढांकने के लिए अनेक वस्त्र खंडों से बनी रंग बिरंगी कालीन ।

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६२ ब्र० सू० १५; महावग्ग, ५।१०।३

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पलिका६३—सफेद ऊनी कालीन

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६३ वही, छन्नामयो सेतत्थरको, ब्र० जा० सूत्र पर टीका

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पटलिका६४—खूब पास बने हुए फूलों वाले कालीन ।

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६४ वही, शायद यह बाद के पटोले का सर्व प्रथम उल्लेख है ।

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तूलिका६५—रूई भरी रजाई ।

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६५ ७४, वही

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विकटिका६६—ऐसे आस्तरण जिन पर सिंह, व्याघ्र इत्यादि के चित्र कढ़े हों ।

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उद्दलोमी६७—दोनों ओर रोएं वाले कंबल । यह ऊदबिलाव की खाल भी हो सकती हैं ।

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एकंतलोमी६८—एक रुखा रोएंदार कंबल ।

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कट्ठिस६९—जवाहरातों से सजे आस्तरण ।

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कोसेय्य७०—रेशमी कालीन ।

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कुत्तक७१—इतना बड़ा ऊनी कालीन जिस पर सोलह नर्तकियां एक साथ नाच सकती थीं।

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हत्थत्थर और अस्सत्थर७२—हाथी, घोड़े और रथ पर बिछाये जाने वाले आस्तरण ।

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अजिनपवेणी७३—मृगचर्मों को जोड़ कर बनाया गया कंबल ।

c7.s7.26

कदलीमृगपवरपच्चत्थरण७४—कदलीमृग के चमड़ों से बना हुआ कंबल । कदलीमृग कौन सा पशु था यह ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता । सुमंगलविलासिनी के अनुसार यह केले के पेड़ों के झुरमुट में रहने वाला एक पशु था। लेकिन महाभारत७५ और अर्थशास्त्र७६ तो इसे पहाड़ों पर रहने वाला एक मृग मानते हैं, इसलिए कदलीमृग केले के पेड़ों के झुरमुट में रहने वाला पशु नहीं हो सकता ।

c7.s7.27

७५ महाभारत, २।४५।१६

c7.s7.28

७६ अर्थशास्त्र (गणपति शास्त्री), भा० १, पृ० १६१-१६२

c7.s7.29

चिलिमिका७७—साफ सुथरे फर्श की शोभा की रक्षा के लिए एक विशेष प्रकार का कालीन ।

c7.s7.30

७७ महावग्ग, ६।२।६, परिकम्मकत्ताय भूमिया छविसंरक्खणत्थाय अत्थरणं वुच्चति ।

c7.s7.31

बाहीतिक७८—यह एक सोलह हाथ लंबी और आठ हाथ चौड़ी एक ऊनी चादर होती थी। एक ऐसी ही चादर राजा अजातशत्रु ने प्रसेनजित् के पास उपहार में भेजी थी। प्रसेनजित् ने इसे आनंद को भेंट कर दी।

c7.s7.32

७८ मज्झिम निकाय, २।४।८

c7.s7.33

नमतक७९—भेड़ों या पहाड़ी बकरों के रोएं से कूट कर जमाया हुआ नमदा। कश्मीर में आज दिन भी सादे या कामदार नमदे बहुतायत से बनते हैं।

c7.s7.34

७९ चुल्लवग्ग, १०।१०।४

c7.s7.35

कोजव८०—लंबे रोएं वाला कंबल । शायद यह आधुनिक थुलमे की तरह कोई कंबल या।

c7.s7.36

८० महावग्ग, ८।१।३६

वस्त्रों की धुलाई और रंगाई

c7.s8.1

कपड़े धोने की रीति का वर्णन बौद्ध साहित्य में तो नहीं मिलता लेकिन जैन ग्रंथ ज्ञाताधर्म कथा८१ में उसका पूरा वर्णन है। पहले वस्त्र में सज्जीखार लगा कर फिर उसे उबालते थे और बाद में साफ पानी से धो लेते थे। अभी तक धोबी इसी रीति से कपड़े धोते हैं। रंगने के पहले भी कपड़ा अच्छी तरह से धो लिया जाता था८२। कपड़े नीले, पीले, लाल, मजीठ, काले और हल्दी के रंग में रंग लिये जाते थे८३। भिक्षुओं को रंगीन कपड़े पहनने की आज्ञा नहीं थी ।

c7.s8.2

८१ ज्ञाता धर्मकथा, ३। ६०

c7.s8.3

८२ महावग्ग, ५।१। १०

c7.s8.4

८३ महावग्ग, ८।२६। १

भिक्षु, श्रमणों और जैन साधुओं के पहनने के वस्त्र

c7.s9.1

बौद्ध और जैन साहित्यों में भिक्षुओं और साधुओं के विहित वस्त्रों का बड़ा सविस्तर वर्णन हुआ है । प्रसंगवश श्रमण ब्राह्मणों के वस्त्रों का इसलिए उल्लेख हुआ है कि उनका व्यवहार बौद्ध और जैन साधु न करें । अपने अपने संघों की ब्राह्मण धर्मानुयायी संघों से विभिन्नता दिखलाने के लिए ऐसा आवश्यक भी था

ब्राह्मण और श्रमणों के वस्त्र

c7.s10.1

सीहनाद सुत्त८४ में इनके वस्त्रों का पूरा पूरा वर्णन हुआ है। ये सन के बने वस्त्र (शाणानि), सन और दूसरी तरह के सूतों के मेल से बुने कपड़े, मृत शरीर से अलग किये

c7.s10.2

८४ कस्सप सीहनाद सुत्त, -१४, डायलॉग्स ऑफ़ बुद्ध, पृ० २३०-२३१, पाठ दीघनिकाय, पा० टे० पृ० १६६-१६७

c7.s10.3

हुए कपड़े (छवदुस्स), घूर पर फेंके हुये चीथड़ों से बने कपड़े (पांसुदुकूलानि), तिरीट की छाल से बने कपड़े (तिरीटानि), मृगचर्म (अजिनानि), कृष्णमृग के चर्म की पट्टियों से बने कपड़े (अजिनक्खिपं), कुशा के बने कपड़े (कुशचीरं), वल्कल के बने कपड़े (वाकचीरं), लकड़ी की फराटियों या टुकड़ों से बने कपड़े (फलकचीरं), मनुष्य के बालों से बने कंबल (केसकंबलं), घोड़े की दुम के बालों से बने कंबल (वालकंबलं) और उल्लू के पंखों से बने कंबल (उलूकपक्खं) पहनते थे। ब्राह्मणों और श्रमणों के वस्त्रों का वर्णन देखकर यह पता चलता है कि उनके भिन्न भिन्न वर्गों में भिन्न भिन्न तरह के कपड़े प्रचलित थे। सन, तिरीट, मृगचर्म और वल्कल के बने कपड़े तो ब्राह्मण पहनते थे। छवदुस्स एरंड नाम की घास की चटाई शव के लपेटने के लिए होती थी८५ और पांसुदुकूल लगता है कापालिक क्रिया साधने वाले पहनते थे। केसकंबल भी एक तरह के श्रमणों का वस्त्र था। बुद्ध के समकालीन एक आचार्य का नाम केसकंबली था। लगता है फलकचीर, बालकंबल और उलूकपक्ख पहनने वाले श्रमणों के वर्ग भी रहे होंगे।

c7.s10.4

८५ कस्सप सीहनाद सुत्त, १५, टीका

बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियों के वस्त्र

c7.s11.1

बौद्ध भिक्षु और भिक्षुणियों के वस्त्र प्रायः एक से होते थे। पीले रंग में रंगे इनके वस्त्रों की संख्या तीन होती थी यथा संघाटी अर्थात् कमर में लपेटने की दोहरी तहमत, अंतरवासक अर्थात् शरीर के ऊपरी भाग ढकने का वस्त्र और उत्तरासंग अर्थात् चादर८६। इनके सिवाय बैठने के लिए आसन (प्रत्यस्तरण), खुजली होने पर पहनने के लिए चार बित्ता लंबा और दो बित्ता चौड़ा कोपीन (कंडूक प्रतिच्छादन)८७ वर्षा काल में पहनने के लिए एक वस्त्र (वार्षिक साटिक)८८ जो छः बित्ता लंबा और ढाई बित्ता चौड़ा होता था, उनके लिए विहित थे। भिक्षु आयोगपट्ट८९ (बैठने पर दोनों घुटनों और पीठ के जोड़ने के लिए एक पट्टी) भी व्यवहार में लाते थे। इनके कमरबंद (कायबंध)९० सादी और फेरदार बुनावट की पट्टियों से बनते थे। इन कायबंधों के किनारे फटने के डर से उलट कर सी दिये जाते थे। इनके किनारों पर लगी पट्टियों को शोभक कहते थे, और इन पर की हुई बरफीदार तगमी को गुणक९१। कायबंधों में हुक (वीठ) भी लगते थे पर ये वीठ सदा हड्डी, शंख और डोरे के बने होते थे, भिक्षुओं के लिए सोने चांदी के वीठ वर्जित थे९२। भिक्षु अपने वस्त्रों में तुक (पासक)और मेख (घुंडी) लगा सकते थे। मेख हड्डी, सूत और शंख के बने होते थे सोने चांदी के नहीं९३।

c7.s11.2

८६ महावग्ग, ८।१३।४-५

c7.s11.3

८७ भिक्खु पातिमोक्ख, ५।३६।६०; महावग्ग, ८।१६।२

c7.s11.4

८८ भि० पा०, ५।३६।६१; म० व०, ८।१५।६

c7.s11.5

८९ चुल्लवग्ग, ५।२७।२

c7.s11.6

९० वही, ५।२९।२ [^९१]—[^९३]: चुल्लवग्ग, ५।२९।२

c7.s11.7

भिक्षु कंचुक नहीं पहन सकते थे९४। वे लहरियादार लंबे, कसीदेदार सर्प फणाकार, तथा पंजरुक्त किनारों का वस्त्र नहीं पहन सकते थे क्योंकि ऐसे वस्त्र केवल सर्वसाधारण ही पहन सकते थे

c7.s11.8

९४ महावग्ग, ८।२९।१

करघे और उनके भाग

c7.s12.1

ऐसा मालूम पड़ता है कि बौद्ध युग के आरंभिक युग में बौद्ध भिक्षुओं को कपड़े बिनने की स्वतंत्रता थी। इसी प्रकरण में करघा (तंतक), ढरकी (वेमक), टट्टी (शलाका) और छोर (वट्ट) के नाम आये हैं९५। जहां तक मुझे पता है कम से कम किसी भारतीय धर्म ने साधुओं और भिक्षुओं को कपड़े बुनने की स्वतंत्रता नहीं दी है। बुनाई की आज्ञा देकर बौद्ध धर्म अपनी प्रगतिशीलता का परिचय देता है।

c7.s12.2

९५ चुल्लवग्ग, ५।२७।२

बौद्ध भिक्षुणियों के वस्त्र

c7.s13.1

बौद्ध भिक्षुणियां संघाटी, अंतरवासक और उत्तरासंग के अतिरिक्त कंचुक भी पहन सकती थीं। एक जगह इस बात का उल्लेख है कि बिना कंचुक पहने गांव में जाने वाली भिक्षुणियों के लिए प्रायश्चित्त का विधान था९६। यह कहना कठिन है कि इस युग में कंचुक का आकार चोली जैसा होता था या कुरते जैसा, पर शुंग काल की मिट्टी की मूर्तियों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि शायद कंचुक कुरते जैसा था। भिक्षुणियां एकांत में कटिसूत्र से बंधा लंगोट जैसा एक वस्त्र पहनती थीं९७। यह लंगोट डेढ़ फुट लंबे और छः इंच चौड़े एक तिकोने कपड़े से बना होता था और कमर से बांधने के लिए एक डोरी लगती थी ।

c7.s13.2

९६ भिक्खुनी पातिमोक्ख, ४।४०।६६

c7.s13.3

९७ चुल्लवग्ग, १०।१६।२

जैन साधुओं के वस्त्र

c7.s14.1

आचारांग सूत्र९८ के अनुसार जैन साधु केवल तीन वस्त्र ग्रहण कर सकते थे, इनमें दो तो क्षौम की धोतियां (क्षौम कल्प) होती थीं और एक ऊनी चादर (और्णिक कल्प) । शीलांक अपनी टीका९९ में कहते हैं कि जाड़ों में जैन साधु ढाई हाथ वर्ग गज की दो कोपीनें और एक ऊनी वस्त्र ग्रहण कर सकते थे। जिस अवस्था में कपड़े साधुओं को मिलते थे उसी

c7.s14.2

९८ आ० सू०, १।७।४।१

c7.s14.3

९९ टीका, पृ० २५१ अ

c7.s14.4

अवस्था में वे उन्हें पहन सकते थे। जैन साधु अपने कपड़े धो, रंग नहीं सकते थे। जाड़ा बीत जाने पर साधु सोमसाटी भी पहन सकते थे१००। जिनकल्पधारी साधू हमेशा नंगे रहते थे।

c7.s14.5

१०० आचारांग सूत्र, १।७।५।१

साधारण लोगों की वेश-भूषा

c7.s15.1

गृहस्थों के पहरावे में तीन कपड़े होते थे यथा धोती (अंतरवासक), दुपट्टा (उत्तरासंग) और पगड़ी (उष्णीष)। स्त्रियाँ१०१ और पुरुष१०२ कंचुक पहनते थे। शायद यह कुरता जैसा कोई वस्त्र रहा हो, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि यह वस्त्र आगे से खुला रहता था अथवा बंद।

c7.s15.2

१०१ भिक्खुनी पातिमोक्ख, ४।४०।६६

c7.s15.3

१०२ चुल्लवग्ग, ५।२९।२

c7.s15.4

स्त्रियां साड़ी भी पहनती थीं जो काफी मजबूत होती थीं (वलित्थग साटको)१०३। रानियां अमूमन साड़ियां पहना करती थीं और इसे सट्ठ-साट्ठक कहते थे१०४। बौद्ध साहित्य से यह पता नहीं चलता कि उस समय साड़ी पहनने का क्या तरीका था।

c7.s15.5

१०३ जातक (३२४), ३, पृ० ५५

c7.s15.6

१०४ जातक, (४३१), ३, २६६

आकर्षक ढंग से कपड़े पहनने की प्रथा

c7.s16.1

बौद्ध साहित्य से पता चलता है कि लोग अपने कपड़े बड़े शौक से संवार बना कर पहनते थे। वैशाली के नागरिक कपड़ों के बड़े शौकीन थे। महापरिनिब्वान सुत्त१०५ में कहा गया है कि यह समाचार पाकर बुद्ध अंबपालिका के यहां पधारने वाले हैं वैशाली के नागरिक आतुरतापूर्वक उनसे मिलने चले। उन्होंने अपने शरीर के रंगों से मेल खाते हुए वस्त्र और आभूषण धारण कर रखे थे। सांवले रंग के आदमी गहरे रंग का वस्त्राभूषण पहिने थे, साफ रंग के लोग हल्के कपड़े और गहने पहने थे। स्त्रियां भी अपने बनाव श्रृंगार में रंगों के मिलान पर बड़ा ध्यान देती थीं। जातकों में एक जगह कहा गया है१०६ कि विरुपाक्ष की पुत्री कालकण्णी ने सुचिपरिवार नाम सेट्ठी से मिलते समय नीले रंग का वस्त्र, नील विलेपन और नील मणियों से अपना श्रृङ्गार कर रक्खा था। लेकिन श्रेष्ठी को यह रंगविन्यास पसंद नहीं आया और उसने अपनी राय कालकण्णी से साफ साफ कह दी।

c7.s16.2

१०५ महापरिनिब्वान सुत्त, २, १८

c7.s16.3

१०६ जातक (३८२), ३, पृ० ५५

धोती पहनने के तरीके

c7.s17.1

इस युग में भारतीयों का पहिरावा सादा तो अवश्य होता था लेकिन उसे वे बड़े आकर्षक ढंग से पहनते थे । धोती वे निम्नलिखित तरीक़ों से पहिनते थे१०७ —

c7.s17.2

१०७ चुल्लवग्ग, ५।२९।४

c7.s17.3

हस्तिशौंडिक—अट्ठकथा के अनुसार धोती की चुन्नट वैसी ही होती थी जैसी कि चोल देश की स्त्रियों की साड़ी में । लगता ऐसा है कि धोती का एक सिरा चुन कर कमर में खोंस लिया जाता था और लटकती हुई चूनन का आकार कुछ हाथी के सूंड की तरह भासित होता था ।

c7.s17.4

मत्स्यवालक—धोती में लंबान और चौड़ान के किनारे मछली की पूंछ के आकार में सज्जित किये जाते थे ।

c7.s17.5

चतुष्कर्णक—इस प्रकार के वस्त्र विशेष में चार कोने होते थे । शायद यह दुपट्टे ऐसा कोई वस्त्र रहा हो। भरहुत में चौकोने दुपट्टे पहने (आ० २१) मनुष्य दिखलाये गये हैं । अथवा यह चाकदार जामा ऐसा कोई सिला हुआ वस्त्र था या धोती के चार छोर इसमें दिखलाई देते थे ।

c7.s17.6

तालवृन्तक—इसमें वस्त्र या धोती का चुन्नटदार छोर ताल के पंखे के आकार का होता था । पंखे के आकार के शिरोवस्त्र बहुधा अर्धचित्रों में आते हैं ।

c7.s17.7

शतवल्लिक—इस प्रकार की धोती में बहुत सी चूननें और सिलवेंट पड़ती थी ।

c7.s17.8

धोती या साड़ी पहनने में लांग पीछे बांध ली जाती थी, लेकिन भिक्षुओं के लिए लांग बांधना अविहित था ।

कमरबंद

c7.s18.1

कायबंध१०८ कमरबंद बांधने के भी अनेक तरीके थे तथा आकार के अनुसार इसके अनेक नाम भी थे । कलावुक नाम का कमरबंद बटी रस्सियों से बना होता था । डेड्डुभक की शक्ल जल में रहने वाले डेड़े साँप की तरह होती थी, मुरज ढोल के आकार का होता था और मद्दवीन नामक कमरबंद से एक अलंकार लटका करता था ।

c7.s18.2

१०८ वही, ५।२९।२

c7.s18.3

कलात्मक ढंग से कमरबंद और पटके बांधने की रीति स्त्रियों में काफी प्रचलित थी, लेकिन बुद्ध की आज्ञानुसार भिक्षुणियां अपने कमरबंद सादे तौर से ही बांध सकती थीं ।

c7.s18.4

उनके कमरबंदों में एक ही फेंटा लगता था। पटके बांस के रेशे (विलीव) चर्मपट्ट, ऊनी पट्टी (दुस्सपट्ट) गुथे हुए ऊन (दुस्सवेणी), बंटे हुए ऊन (दुस्सवट्टी), बंटे हुए चोलवस्त्र (चोलवट्टी) गुथे हुए चोल वस्त्र (चोलवेणी) और गुथे हुए सूती कपड़े (चोलवट्टी) के बनते थे१०९।

c7.s18.5

१०९ चुल्लवग्ग, १०।१०।१

c7.s18.6

जूते मनुष्य के पहिरावे में जूतों और पादुकाओं का एक विशेष स्थान होता था। एक जातक में कहा गया है कि शरीर की रक्षा और आराम के लिए जूतों का खरीदना आवश्यक था११०। जूते आकार और रंग में भिन्न भिन्न प्रकार के होते थे। जूते एकतल्ले (एक पलासिक), दोतल्ले (द्विपटल), तिनतल्ले (तिपटल) और चौतल्ले होते थे१११। जूते नील, लोहित, मंजीठ, कृष्ण, नारंगी (महारंग) और पीले (कुरुंदिय) चमड़ों से बनाये जाते थे । जूतों में रंग बिरंगे किनारे भी लगाये जाते थे११२। ऐसे रंग बिरंगे तथा अनेक तल्ले वाले जूते केवल गृहस्थ पहन सकते थे । भिक्षु केवल एक तल्ले जूते पहन सकते थे११३ लेकिन अनेक तल्ले वाले पुराने जूते पहने जा सकते थे११४।

c7.s18.7

१११ महावग्ग, ५।१।२६

c7.s18.8

११२ महावग्ग, ५।२।२

c7.s18.9

११३ महावग्ग, ५।२।१

c7.s18.10

११४ महावग्ग, ५।३।२

c7.s18.11

जूते निम्नलिखित आकारों के होते थे११५ —

c7.s18.12

११५ महावग्ग, ५।२।२३

c7.s18.13

(१) पुटबद्ध—घुटने तक चढ़े हुए जूते । बुद्धघोस के अनुसार ये जूते यवनों के होते थे और ये जंघों से लेकर सब पैर को ढक लेते थे । सांची के एक अर्धचित्र में इसी तरह का जूता चित्रित किया गया है । बाद में वृहद् कल्पसूत्र भाष्य में इस जूते को जंघा अथवा खपुसा कहा गया है ।

c7.s18.14

(२) पालिगुंठिम—ये जूते केवल पैर ढकते थे और जंघे खुले रहते थे। सांची के अर्धचित्रों में एक जगह इस जूते की आकृति बतलायी गयी है ।

c7.s18.15

(३) खल्लकबद्ध—बुद्धघोस के अनुसार इस जूते के तले में एंड़ी ढांकने के लिए खल्लक लगा होता था। लगता है इस जूते का आकार आधुनिक पेशावरी चप्पल जैसा रहा होगा (आ० ११०)। वृहद कल्पसूत्र भाष्य११६ में पूरे पैर ढकने वाले जूते को खल्लक कहते थे। (४) मेण्डविषाण बद्धिक—बुद्धघोस के अनुसार इस जूते की नोक पर अलंकार स्वरूप मेंढ़े के सींग लगाये जाते थे।

c7.s18.16

११० जातक (२२७), २, पृ० १५५

c7.s18.17

११६ बृहत्कल्प सूत्रभाष्य, ४,३८४७

c7.s18.18

(५) अजविषाण बद्धिक—इस जूते की नोक (कर्णिका) पर बकरे के सींग लगाये जाते थे।

c7.s18.19

(६) वृश्चिकालिक—इस जूते की नोक पर बिच्छू की पूंछ का अलंकरण होता था।

c7.s18.20

(७) मोरपिंछ परिसिब्वित—बुद्धघोस के अनुसार इस जूते के तले या बंदों में मोरपंख सिला हुआ होता था।

c7.s18.21

(८) तूलपुण्णिक—लगता है यह जूता रुई से भरा हुआ होता था।

c7.s18.22

(९) तित्तिरपट्टिक—इस जूते की बनावट तीतर के पंखों जैसी होती थी।

c7.s18.23

उपरोक्त किस्म के जूते केवल गृहस्थ पहन सकते थे। भिक्षुओं को इनके पहनने की मनाही थी। लेकिन उन प्रत्यन्त देशों में जहाँ बौद्ध धर्म घुस नहीं सका था उन्हें वहां के बने हर एक प्रकार के जूते पहनने की आज्ञा थी[^११७।

c7.s18.24

११७ महावग्ग, ५।१३।६

c7.s18.25

भिक्षु धार्मिक शिक्षा ग्रहण करते समय चप्पल नहीं पहन सकते थे[^११८। आराम में प्रवेश करते हुए भिक्षुओं को आदेश था कि वे अपनी चप्पलें अथवा पादुकाएं उतार दें और उनसे गरदा पीट कर निकाल दें। बाद में वस्त्र मांग कर चप्पलें पोंछें। पहले सूखे कपड़े से और बाद में गीले कपड़े से जूते पोंछने का आदेश मिलता है[^११९।

c7.s18.26

११८ पातिमोक्ख, ६१

c7.s18.27

११९ चुल्लवग्ग, ८।२

c7.s18.28

जिन जूतों का वर्णन हम ऊपर कर आये हैं उनके अलावा भी सिंह, व्याघ्र, मृग, चीते, ऊदबिलाव, बिल्ली, गिलहरी और उल्लू के चमड़ों से भी जूते बनाये जाते थे[^१२०। उन दिनों इस देश में जूतों का इतना अधिक चलन था कि चर्मकार के व्यवसाय से ली गयी उपमाओं का प्रयोग कहीं कहीं पालि साहित्य में हुआ है। काम जातक की एक गाथा में कहा गया है कि जिस तरह चर्मकार जूता बनाने में चमड़े के कोने काट कर उसमें रूप पैदा करता है (रथकारो व चम्मस्स परिकन्तं उपाहनं) उसी तरह इच्छाओं के नाश होने पर सुख की प्राप्ति होती है।

c7.s18.29

१२० महावग्ग, ५।२।४

c7.s18.30

१२१ जातक, ४,१७२

चप्पल और पादुकाएं

c7.s19.1

जूतों के सिवाय गृहस्थ काठ की पादुकाएं तथा तालपत्र ओर बांस की बनी चप्पलें भी पहनते थे।१२२। पर इनका व्यवहार भिक्षुओं के लिए वर्जित था। चप्पलें तृण, मूंज, हिंताल की लकड़ी, कमल, बल्वज नाम की घास और कंबल की बनती थीं। आज दिन भी भारत के ऐसे इलाकों में जहां आधुनिक सभ्यता पूरी तरह से नहीं घुस सकी है, घास और मूंज की बनी चप्पलें काम में लायी जाती हैं।

c7.s19.2

१२२ महावग्ग, ५।७।१

c7.s19.3

कुछ शौकीन और पैसे वाले अपनी पादुकाएं सोने, चांदी, स्फटिक, वैडूर्य, कांसा, कांच, रांगा और तांबे के अलंकारों से सजाते थे।१२३ पर साधारण गृहस्थ ऐसा नहीं करते थे। भिक्षुओं को भी ऐसी अलंकृत पादुकाएं पहनने की आज्ञा नहीं थी ।

c7.s19.4

१२३ वही, ५।८।१

एक धनुर्धारी की वेश-भूषा

c7.s20.1

पालि साहित्य में कहीं कहीं जन समाज की वेश-भूषा के प्रकरण भी आ गये हैं। एक जगह एक धनुर्धारी के पहिरावे का सजीव वर्णन है। कथा यह है कि एक समय बोधिसत्व धनुर्धारी के रूप में उत्पन्न हुए और एक शस्त्र प्रतियोगिता में अपने कौशल का परिचय दिया। एक परदे की आड़ में पहले उन्होंने अपने सफेद कपड़े उतार कर बदन से सटा हुआ एक लाल कपड़ा पहन लिया, काछ कस लिया, और लाल फेंटे में तलवार खोंस ली। सब के ऊपर एक सुनहला कंचुक पहन लिया। उसके ऊपर चापनाली धारण कर के, मेढ़े के सींग से बनी धनुष कसा और अंत में धनुष टंकार करते हुए परदे के बाहर निकल आये।१२४।

c7.s20.2

१२४ जातक, (१८१), २.६१

c7.s20.3

दुकूल चुंबट-एक जातक में एक राजा के दुकूल चुंबट पहनने का उल्लेख है।१२५। यह कहना कठिन है कि दुकूल चुंबट का क्या रूप था।

c7.s20.4

१२५ जातक, १.१६

सिलाई और उसके उपकरण

c7.s21.1

कंचुक इत्यादि के उल्लेखों से यह तो निश्चय हो गया है कि बौद्धकालीन भारत में या उसके पहले भी लोग सीना-पिरोना बहुत अच्छी तरह जानते थे। इससे कुछ अंग्रेज विद्वानों का यह विचार भ्रमात्मक सिद्ध होता है कि भारतीयों में सिले वस्त्रों की परंपरा का आरंभ मुसलमानों के भारत विजय के बाद से आरंभ होता है। महावग्ग में तो सिलाई

c7.s21.2

का विशद वर्णन आया है जिससे पता चलता है कि कम से कम २५०० बरस पहले लोग सीने की कला में पूरी तौर से प्रवीण हो चुके थे । सिलाई संबंधी जो कुछ भी ज्ञान हमें बौद्ध साहित्य से प्राप्त होता है उसका वर्णन नीचे दिया जाता है ।

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