Pracin Bharatiya Veshabhusha c14: दसवां अध्याय : मूर्तियों और चित्रों में गुप्त-युग की वेश-भूषा
Prācīn Bhāratīya Veśabhūṣā c14
- Language
- Hindi
Contents
- c14.s1 उच्च पदस्थ लोगों की वेश-भूषा — 2 parts
- c14.s2 सिपाहियों की वेश-भूषा — 7 parts
- c14.s3 ब्राह्मणों की वेश-भूषा — 1 part
- c14.s4 प्रतिहारी की वेश-भूषा — 3 parts
- c14.s5 स्त्रियों की वेश-भूषा — 6 parts
- c14.s6 वेश-भूषा पर विदेशी प्रभाव — 2 parts
- c14.s7 अजंटा के भित्ति-चित्रों में बोधिसत्वों की रूढ़िगत वेश-भूषा — 1 part
- c14.s8 सिक्कों पर अंकित गुप्त राजाओं की वेश-भूषा — 3 parts
- c14.s9 अजंटा के भित्ति-चित्र में राजाओं और उच्चपदस्थ राजकर्मचारियों की वेश-भूषा — 24 parts
- c14.s10 ईरानी बादशाह की पोशाक — 2 parts
- c14.s11 अजंटा में आये मुकुट — 17 parts
- c14.s12 घुड़सवारों की वेश-भूषा — 19 parts
- c14.s13 फीलवानों की वेश-भूषा — 8 parts
- c14.s14 पैदल सिपाहियों की वेश-भूषा — 3 parts
- c14.s15 युद्धभूमि में राजाओं और सामंतों की वेश-भूषा — 2 parts
- c14.s16 शिकारी और बहलियों की वेश-भूषा — 6 parts
- c14.s17 कंचुकी की वेश-भूषा — 4 parts
- c14.s18 मंत्रियों की वेश-भूषा — 4 parts
- c14.s19 सामंतों और उच्चवर्ण नागरिकों की वेश-भूषा — 16 parts
- c14.s20 वादकों की वेश-भूषा — 7 parts
- c14.s21 द्वारपालों की वेश-भूषा — 7 parts
- c14.s22 राजभृत्योंकी वेश-भूषा — 19 parts
- c14.s23 स्नापकों की वेश-भूषा — 2 parts
- c14.s24 साधारणजन की वेश-भूषा — 3 parts
- c14.s25 ब्राह्मणों की वेश-भूषा — 4 parts
- c14.s26 विदूषकों की वेश-भूषा — 11 parts
- c14.s27 मदारी की वेश-भूषा — 2 parts
- c14.s28 विदेशियों की वेश-भूषा — 4 parts
- c14.s29 बच्चों का पहरावा — 10 parts
- c14.s30 गुप्त-युग में रानियों और दूसरी स्त्रियों की वेश-भूषा — 19 parts
- c14.s31 दासियों की वेश-भूषा — 13 parts
- c14.s32 मध्यवर्ग की स्त्रियों की वेश-भूषा — 3 parts
- c14.s33 ईरानी नस्ल की दासियां — 23 parts
- c14.s34 हाथी पर सवार स्त्रियों की वेश-भूषा — 4 parts
- c14.s35 अजंटा में स्त्रियों के शिरोवस्त्र और मुकुट — 3 parts
- c14.s36 जंगली स्त्रियों की वेश-भूषा — 2 parts
- c14.s37 ग्रामीण स्त्रियों की वेश-भूषा — 2 parts
- c14.s38 नाचने, बजाने और गाने वाली स्त्रियों की वेश-भूषा — 15 parts
- c14.s39 कपड़ों पर आये हुए अलंकार — 11 parts
दसवां अध्याय : मूर्तियों और चित्रों में गुप्त-युग की वेश-भूषा
c14.1
मूर्तियों और चित्रों में गुप्त-युग की वेश-भूषा
c14.2
गोली के अर्धचित्रों में दक्षिण भारतीयों के चौथी शताब्दी की वेश-भूषा का सुंदर चित्रण हुआ है । इस वेश-भूषा का वर्णन करने के पहले यह जान लेना आवश्यक है कि दक्षिण भारत के लोगों की चौथी शताब्दी के वेश-भूषा में और नागार्जुनीकुण्ड और अमरावती के अर्ध चित्रों में चित्रित दक्षिण भारत की वेश-भूषा में बहुत अंतर नहीं है ।
उच्च पदस्थ लोगों की वेश-भूषा
c14.s1.1
धोती—राजकुमार और उच्चवर्ग के लोग कमरबंद से बंधी धोती और पगड़ी पहनते थे । नागराज की मूर्ति में१ तत्कालीन धोती पहनने का सुंदर चित्रण है (आ० २७१) जरा घुटनों के ऊपर तक पहुंचती धोती कमर के साथ एक फंदेदार कमरबंद से बंधी है । धोती का फंदेदार और छूट्टे सिरे एक चूड़ी से निकाल दिये गये हैं, एक दूसरी जगह एक राजकुमार की धोती का सिरा चुन कर आगे घुंसा है । कमर के साथ धोती एक फूंदनेदार उमेठी पेटी से बंधी है । पेटी के अंदर से कमरबंद निकाल कर पहना गया है । पगड़ी में पान के आकार का एक शीर्षपट्ट, जिस पर एक पक्षी बना है, लगा है (आ० २७२)२ । अपने घर के एकान्त में दोनों सिरे आगे लटकते हुए कमरबंद के साथ लोग धोती पहनते थे (आ० २७३)३ ।
c14.s1.2
१ रामचंद्रन, बुद्धिस्ट स्कल्पचर्स फ्राम ए स्तूप नियर गोली विलेज, गुंटूर डिसट्रिक्ट, प्ले० ४ जे मद्रास, १९२६।
सिपाहियों की वेश-भूषा
c14.s2.1
युद्ध यात्रा पर निकले सिपाही अपनी धोती का अगला हिस्सा मोड़ कर कमर में खोंस लेते थे, जिससे चलने में धोती लपटे नहीं । धोती के बंधन में मजबूती लाने के लिए कमरबंद भी पहनते थे (आ० २७४)४ । इस कमरबंद के सिरे नाभि के नीचे लगी दो चूड़ियों के बीच से निकाल दिये जाते थे । अक्सर उनकी धोती घुटनों तक ही पहुंचती थी (आ० २७५)५ । सिपाही पगड़ी भरी बांह के कंचुक और धोती भी पहनते थे (आ० २७६)६ ।
c14.s2.2
२ वही, प्ले० ६, ६
c14.s2.3
४ वही, प्ले० ५, बी०
c14.s2.4
५ वही, प्ले० ४, ६
c14.s2.5
६ वही, प्ले० ४
c14.s2.6
एक जगह भगवान बुद्ध की पूजा करते हुए एक भक्त की पीठ दिखलाई गयी है जिससे
c14.s2.7
पता लगता है कि लोग लांग खोंसते थे । शीर्षपट्ट को यथास्थान स्थिर रखने के लिए पगड़ी के पीछे एक चौपतिया कोंढ़ा भी लगा दिखलाया गया है (आ० २७७)७ ।
ब्राह्मणों की वेश-भूषा
c14.s3.1
अधिकतर ब्राम्हण धोती जिसका एक सिरा कमर के बगल में खुंसा होता था और वैकक्ष्य पहनते थे (आ० २७८)८ ।
प्रतिहारी की वेश-भूषा
c14.s4.1
प्रतिहारी भरी बांह का कंचुक ऊंची टोपी और वैकक्ष्य पहने दिखलाया गया है (आ० २७९)९ ।
c14.s4.2
७ वही, प्ले० ६, ५
c14.s4.3
९ वही, प्ले० २, ई
स्त्रियों की वेश-भूषा
c14.s5.1
स्त्रियां पतली साड़ी पहने दिखलायी गयी हैं । एक जगह एक विदेशी स्त्री टोपी पहने दिखलायी गयी है (आ० २८०)१० ।
c14.s5.2
८ वही, प्ले० ४, एफ
c14.s5.3
१० वही, प्ले० ३, जी
c14.s5.4
२
c14.s5.5
गुप्त-युग की वेश-भूषा के जिन अंगों पर साहित्य से कम प्रकाश पड़ता है, उनका पुरातत्व से समाधान हो जाता है । इस युग की मूर्ति-कला अमरावती के अर्ध चित्रों की तरह हमें तात्कालिक सामाजिक जीवन के चित्र नहीं देती और इसका कारण इस युग की कला के उद्देश्य में परिवर्तन है, जिसमें अनुप्राणित हो कर वह अध्यात्मचिंतन की ओर उन्मुख हो जाती है । इससे उसमें वर्णनात्मकता की तो कमी हो जाती है, पर रसभावना कहीं अधिक बढ़ जाती है । पर भाग्यवश यह चिंतनशीलता मूर्तियों तक ही सीमित रही। इस युग के भारतीय चित्रकार तो अपने पुरानों की तरह चित्रों को तत्कालीन समाज और संस्कृति के प्रतिबिंब मानते रहे। अजंटा के भित्ति-चित्र गुप्त-युग के वस्त्रों के लिए कोश के समान हैं । नक्कांशियां इन वस्त्रों पर कम मिलती हैं । चित्रों में सादे और सिले वस्त्र दोनों आते हैं ।
c14.s5.6
गुप्त-युग के सिक्के भी हमें तत्कालीन राजकीय वेश-भूषा के बारे में काफी मसाला देते हैं । इनमें अंकित राजाओं की छोटी शबीहों में भी वेश-भूषा का आकर्षक चित्रण हुआ है ।
वेश-भूषा पर विदेशी प्रभाव
c14.s6.1
गुप्त-साम्राज्य के स्थापित होने के सैकड़ों वर्ष पहले तक उत्तर पश्चिमी भारत हिन्द-यूनानियों, शकों और कुषाणों के आधीन रहा । देशी और विदेशी संस्कृतियों के पारस्परिक संबंध और आदान-प्रदान से दोनों संस्कृतियां एक दूसरे का दृष्टिकोण समझ गयीं । मध्य एशिया का विशाल सांस्कृतिक क्षेत्र शकों और कुषाणों ने खोल कर भारतीय और चीनी
c14.s6.2
संस्कृतियों का संपर्क स्थापित किया। गुप्त युग में भारतीय संस्कृति का बृहत्तर भारत में प्रसार होने से यह देश एशिया की बहुत सी जातियों का तीर्थ क्षेत्र बन गया। अजंटा के भित्ति-चित्रों में अपने जातीय पहरावों से अलंकृत, भारतीय, अफगान, तथा मध्य एशिया वासी बुद्ध की पूजा करते दिखलाये गये हैं। यात्रियों की इस रंग बिरंगी भीड़ से और अपने जातीय पहरावे पहरे हुए व्यापारियों के वस्त्रों से इस देश की वेश-भूषा पर प्रभाव पड़ना कुछ असंभव न था। बाणभट्ट की आख्यायिकाओं से भी इस बात का पता चलता है कि सातवीं शताब्दी में यहाँ कुछ सिले विदेशी वस्त्रों का व्यवहार होता था। इसका कारण भारतीय संस्कृति का ईरानी, अफगानी और चीनी संस्कृतियों से व्यापारिक और धार्मिक संबंध था। इसी संबंध की वजह से हम अजंटा के भित्ति चित्रों में भारतीय पहरावों के सिवाय पड़ोसी देशों के पहरावों का भी अध्ययन कर सकते हैं ।
अजंटा के भित्ति-चित्रों में बोधिसत्वों की रूढ़िगत वेश-भूषा
c14.s7.1
गुप्त-युग के सिक्के और अजंटा के भित्ति-चित्र ही हमारे गुप्त कालीन वेश-भूषा की जानकारी के प्रधान साधन हैं । अजंटा के भित्ति-चित्रों में राजे और राज पुरुष धोती और गहरे काम वाले मुकुट पहने दिखलाये गये हैं । पगड़ी तो शायद ही कहीं आती है । लेकिन सिक्कों में तो गुप्त राजे धोती, दुपट्टा, कंचुक और पायजामे पहने दिखलाये गये हैं। वे पगड़ी और कभी कभी टोपी भी पहनते थे, पर प्रायः वे अपने सिर नंगे रखते थे । अजंटा के भित्ति-चित्रों में और सिक्कों पर आये राजाओं की वेश-भूषाओं में जो फर्क आ जाता है, उसका कारण शायद भित्ति-चित्रों में बोधिसत्वों के देवत्व की कल्पना है। इन बोधिसत्वों की वेश-भूषा में हम मूर्ति रचना के मध्यकालीन नियमों का आरम्भ देखते हैं। अजंटा के भड़कीले मुकुट उन्हीं मध्यकालीन नियमों की देन मालूम पड़ते हैं, क्योंकि तत्कालीन साहित्य में तो ऐसे मुकुटों के वर्णन नहीं से हैं । भड़कीले मुकुट और गहने पहने हुए अजंटा के बोधिसत्वों को हम तत्कालीन ऐसी ही विष्णु की मूर्तियों की श्रेणी में रख सकते हैं और इसीलिए हम इनके वस्त्राभूषणों से उस युग के राजाओं के वस्त्राभूषणों की तुलना नहीं कर सकते । जैसा हम पहले देख चुके हैं, हर्षचरित के राजों का पहरावा कीमती कपड़ों का तो अवश्य होता था, पर वह चड़क भड़क से तो बहुत दूर रहता था । अजंटा के भित्ति-चित्रों और गुप्त सिक्कों पर राजाओं की वेश-भूषा में अन्तर के कारण सिक्कों पर आई वेश-भूषा का ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्व बढ़ जाता है । नीचे के पृष्ठों में सिक्कों और चित्रों में आई राजाओं की वेश-भूषा का वर्णन दिया जाता है ।
सिक्कों पर अंकित गुप्त राजाओं की वेश-भूषा
समुद्रगुप्त
c14.s8.t1.1
साधारण भांति के सिक्कों पर समुद्रगुप्त अधबाँहिया कंचुक अथवा कोट जिसके चाकदार नुकीले कोने नीचे लटक रहे हैं तथा जिसके आगे पर दोनों घुंडीदार
c14.s8.t1.2
कसीदे का काम है पहिने है (आ० २८१)११। अधिकतर सिक्कों में तो कंचुक के दो ही नुकीले कोने होते हैं लेकिन एक सिक्के में१२ चारों कोने दिखलाये गये हैं। इस कंचुक की तुलना मथुरा से मिली हुई एक शक योद्धा की मूर्ति के कंचुक से की जा सकती है१३। समुद्रगुप्त का पाजामा ढीला शलवार न होकर चूड़ीदार है और इनके सिर पर सटकर बैठने वाली टोपी है । जूते अर्धजंघा किस्म के हैं ।
c14.s8.t1.3
११ —एलन, केटलाग ऑफ दि कॉयन्स ऑफ दि गुप्त डाइनेस्टी एण्ड शशांक किंग ऑफ गौड, प्ले० १, ११, लंदन १६१४
c14.s8.t1.4
१२ —वही, प्ले० १, ५
c14.s8.t1.5
१३ —अग्रवाल, हैंड बुक ऑफ दि कर्जन म्यूजियम ऑफ आर्कियोलोजी, प्ले० २१ तथा जे० बाई० एस० ओ० ए०, १६४०, पृ० २०६।
c14.s8.t1.6
साधारण भांति के कुछ दूसरे सिक्कों में कंचुक पूरी बांह का है बांहें चपकी न होकर ढीली हैं और कलाइयों पर मोड़ी हुई हैं (आ० २८२)१४। बूट जंघा किस्म का है और उसमें बटन लगे हैं ।
c14.s8.t1.7
१४ —एलन, वही, प्ले० १, ११-१३
c14.s8.t1.8
साधारण भांति के तीसरी किस्म के सिक्कों में अधबहियां कंचुक का संयोग जांघिये के साथ है । घुटनों के नीचे तक पहुंचते जूतों के जोड़ पर फुल्ले लगे हैं (आ० २८३)१५ ये बूट साहित्य में आये खपुसा की तरह हैं ।
c14.s8.t1.9
१५ —वही, प्ले० १
c14.s8.t1.10
व्याघ्र-पराक्रम भांति के सिक्कों में राजा मुड़ी आस्तीन वाला कसा हुआ कंचुक, बटा हुआ कमरबंद, घुटनों के ऊपर तक पहुंचती जांघिया और कुषाण कालीन पगड़ी, जिस पर शीर्षपट्ट लगा हुआ है, पहने है (आ० २८४)१६।
c14.s8.t1.11
१६ —वही, प्ले० १, १४-१७
c14.s8.t1.12
चंद्रगुप्त-कुमार देवी भांति के सिक्कों में चन्द्रगुप्त चाकदार जामा, जिसके गले पर घुंडीदार काम है और फूंदने लटक रहे हैं, पहनता है । जामा के मध्य में तुक-मेक की पंक्ति है (आ० २८५ ए० बी० सी०)१७। ब्रीचेस ऐसे पाजामे पर गरारीदार खपुसा किस्म के जूते हैं।
c14.s8.t1.13
१७ —वही, प्ले० २, १४
c14.s8.t1.14
समुद्रगुप्त के वीणावादक भांति के सिक्कों से पता चलता है कि राज के थकाने वाले कामों से छुट्टी पा कर आराम के समय अथवा संगीत का आनंद लेते हुए गुप्त राजे सादी धोती और टोपी पहनते थे (आ० २८६)१८। अपने घरेलू जीवन में गुप्त राजे ऐसी सादी वेश-भूषा पसंद करते थे, इसका पता हमें चन्द्रगुप्त द्वितीय के आसंदिक सिक्कों से लगता है१९। यहां आसंदी पर बैठे राजा एक धोती पहने हैं।
c14.s8.t1.15
१८ —वही, प्ले० ३, १
c14.s8.t1.16
१९ —वही, प्ले० ५
चन्द्रगुप्त द्वितीय की वेश-भूषा
c14.s8.t2.1
चन्द्रगुप्त द्वितीय के धनुर्धारी भाँति के सिक्कों में राजा एक सटा कंचुक पहनते हैं जो कभी कभी कमरबंद से बंधा होता है। इसका फंदा बांयीं ओर होता था और उसी ओर इसके सिरे ज़मीन पर लहराते थे२० (आ० २८७)। धनुर्धारी भांति के दूसरे सिक्कों में राजा जांघिया और दाहिनी ओर फंदेदार कमरबंद पहनते हैं२१।
c14.s8.t2.2
२० वही, प्ले० ६, ८-९
c14.s8.t2.3
२१ वही, प्ले० ६, १०-११
c14.s8.t2.4
एक सिंह-पराक्रम भांति के सिक्के में राजा कंचुक, कमरबंद, धोती और चोटीदार फुल्ले वाला खोद पहने दिखाये गए हैं (आ० २८८)२२। एक दूसरी तरह के खोद में चोटी से ले कर पीछे तक घुंडियां बनी हैं (आ० २८९)२३।
c14.s8.t2.5
२२ वही, प्ले० ७, १८
c14.s8.t2.6
२३ वही, प्ले० ८, ११
c14.s8.t2.7
अश्वारोही भांति के सिक्कों में चन्द्रगुप्त द्वितीय के पहरावे में धोती और कमरबंद, जिसके छोर पीछे फड़फड़ा रहे हैं, मुख्य हैं (आ० २९० ए० बी०)२४। पर कभी घोड़े पर सवार राजा कमरबंद से कसा कंचुक और धोती भी पहनते हैं (आ० २९१)२५।
c14.s8.t2.8
२४ वही, प्ले० ८, १३
c14.s8.t2.9
२५ वही, प्ले० ९-१०
c14.s8.t2.10
एक तांबे के सिक्के में बरामदे में आराम से खड़े चन्द्रगुप्त द्वितीय को दोनों कंधों पर पड़ा दुपट्टा, जिसका एक छोर उनके बांयें हाथ में है, पहरे दिखलाया गया है (आ० २९२)२६।
c14.s8.t2.11
२६ वही, प्ले० १०
कुमारगुप्त प्रथम
c14.s8.t3.1
कुमारगुप्त प्रथम के राज्यकाल में जब गुप्त-साम्राज्य अपनी चोटी पर पहुंच चुका था, हम उस जातीय पहरावे की चलन देखते हैं जिसमें से कुषाण युग के पाजामे और पूरे बूट निकाल दिये गये थे। साधारणतः कुमारगुप्त प्रथम चाकदार कंचुक और घुटनों तक की धोती पहने दिखलाये गये हैं (आ० २९३)२७। कभी कभी यह धोती एड़ी तक पहुंचती थी२८। पगड़ी की जगह चूर्ण कुंतल देख पड़ते हैं। कमरबंद का फंदा बायीं ओर होता है और उसके सिरे उसी ओर लटका करते थे२९।
c14.s8.t3.2
२७ वही, प्ले० १०, ९
c14.s8.t3.3
२८ वही, प्ले० ११, ११
c14.s8.t3.4
२९ वही, प्ले० १२, ४
c14.s8.t3.5
कुमारगुप्त के चांदी के सिक्कों में वेश-भूषा की दृष्टि से आकर्षक वस्तु चपकी
c14.s8.t3.6
टोपी३० अथवा सजी पगड़ी३१ है जिसका छज्जा ऊपर मुड़ा है (आ० २९४)३२।
c14.s8.t3.7
३० वही, प्ले० १२, ८
c14.s8.t3.8
३१ वही, प्ले० १५, ६
c14.s8.t3.9
३२ वही, प्ले० १६, ५
अजंटा के भित्ति-चित्र में राजाओं और उच्चपदस्थ राजकर्मचारियों की वेश-भूषा
c14.s9.1
अजंटा के भित्ति-चित्रों में राजाओं का पहरावा बड़ा सादा यानी केवल धोती दुपट्टे का होता था, लेकिन वस्त्रों के इस सादेपन को वे अपने रत्न जटित मुकुटों की कारीगरी से पीछे डाल देते थे। इस बात में संदेह है कि पेचीदी कारीगरी वाले मुकुट यथार्थ में व्यवहार में लाये जाते थे अथवा नहीं, क्योंकि तत्कालीन साहित्य इनकी ओर संकेत नहीं करता, तथा तत्कालीन गुप्त सिक्कों की राजमूर्तियों की वेश भूषा में भी इनका पता नहीं चलता। संभव है सादी कारीगरी वाले मुकुट यथार्थ में राजाओं द्वारा पहने जाते हों, लेकिन बहुत पेचीदी कारीगरी वाले मुकुट तो देवताओं और बोधिसत्वों के लिए ही थे।
c14.s9.2
अजंटा के एक भित्ति-चित्र में राजा बिंबिसार एक लाल और नीली धारियों वाली धोती और डब्बेदार कमरबंद पहने हैं। इनकी पगड़ी अथवा टोपी एक सरपेंच से, जिसके दोनों ओर टिकरें लगे हैं, सुसज्जित है (आ० २९५)३३।
c14.s9.3
३३ हेरिंगम, अजंटा फ्रेस्कोज, प्ले० १, १, केव १७
c14.s9.4
अजंटा में चित्रित काशिराज बारीक धोती जो कमर पर पेटी से बंधी है पहने हैं। पटके का छोर जमीन पर लहरा रहा है। उनके बायें कंधे पर एक संकरा धारीदार दुपट्टा है। उनकी ऊंची टोपी फूलों और सितारों से सज्जित है (आ० २९६)३४।
c14.s9.5
३४ वही, प्ले० २५, २७
c14.s9.6
एक दूसरी जगह राजा धारीदार धोती जिसका एक खाना मोटी धारियों से सज्जित है, पहरे हैं। उनकी धातु-निर्मित टोपी के चोटी और बगलों पर फुल्ले हैं (आ० २९७)३५।
c14.s9.7
३५ वही, प्ले० २२, २४
c14.s9.8
विश्वंतर जातक के चित्रण में राजकुमार विश्वंतर राज महल के बाहर निकलते समय आधे बांह का कसा हुआ कंचुक (कूर्पासक), कमरबंद सहित धोती और कुलाहनुमा टोपी पहने दिखलाये गये हैं (आ० २९८)३६। उसी चित्र में राजमहल के अंदर ब्राह्मणों को दक्षिणा बांटते हुए विश्वंतर खूब कामदार मुकुट, छाती को ढंकता हुआ आधे बांह का कसा कंचुक (कूर्पासक) जो मोतियों पर गाँठ से सजा है, उमठे दुपट्टे से बना वैकक्ष्य, छोटी धोती तथा करधनी, जिसके फूंदने नीचे लटक रहे हैं, पहरे हैं (आ० २९९)।
c14.s9.9
३६ वही, प्ले० २२, २४
c14.s9.10
एक दूसरे चित्र में घोड़े पर सवार एक राजकुमार एक पूरे बांहों वाला कंचुक, छोटी धोती और कमरबंद, जिसमें कटार खुसी है, पहने दिखलाया गया है (आ० ३००)३७।
c14.s9.11
३७ वही, प्ले० ८, १०
c14.s9.13
२६६
c14.s9.14
३००
c14.s9.15
३०१
c14.s9.16
३०२
c14.s9.17
३०३
c14.s9.18
बाघ गुफा के एक भित्ति-चित्र में एक राजा धारीदार धोती और जड़ाऊदार चौखूटा मुकुट पहने है (आ० ३०१)। उसी चित्र में एक दूसरा राजा तिकोना मुकुट पहने दिखाया गया है (आ० ३०२)३८।
c14.s9.19
३८ वही, प्ले० ८, १०
c14.s9.20
राजाओं की रूढ़िगत वेश-भूषा का सुंदर चित्रण पद्मपाणि के चित्र में हुआ है। इसमें आभूषणों की संख्या कम, पर आकर्षक है। धोती धारीदार है और उसके कुछ खानों में चार-खाने बने हैं (आ० ३०३)३९। एक दूसरी जगह अवलोकितेश्वर करधनी से बंधी लाल हरी धारियों वाली धोती और जड़ाऊदार त्रिकूट मुकुट पहने दिखलाये गये हैं४०। एक तीसरी जगह एक राजा धारी और चारखाने दार धोती और पैरों के बीच लटकता दुपट्टा पहरे हैं तथा दीवार में लगे एक फंदे में अपना बायां हाथ डाल कर सुखपूर्वक खड़े हैं (आ० ३०४)४१। एक नागराज बारीक काम का मुकुट, तथा कमरबंद के कई फेंटों से बंधी धोती पहने हैं४२। लेण १७ के एक भित्ति-चित्र में एक राजा भरे काम वाला मुकुट, धोती और करधनी पहने हैं और उनके कमरबंद के छोर नीचे लटक रहे हैं४३।
c14.s9.21
३९ मार्शल, दि बाघ केव्स, प्ले० बी०
c14.s9.22
४० हरिंघम, वही, प्ले० १०, १२
c14.s9.23
४१ वही, प्ले० १०, १२
c14.s9.24
४२ ग्रिफिथ, अजंटा, भा० १
c14.s9.25
४३ हेरिंगम, वही
ईरानी बादशाह की पोशाक
c14.s10.1
दीवान पर बैठा एक ईरानी राजा एक हलके नीले रंग का कोट, जिसके मोरियों, गले और बाजुओं पर काम हैं, पहने है। यह कसीदे का काम जरा हलके रंग का है। टोपी में फीते लगे हैं और उसके जूते या मोजे कोमल ऊन के बने मालूम पड़ते हैं (आ० ३०५)४४।
c14.s10.2
४४ याजदानी, अजंटा, भा० १, पृ० ५०, प्ले० ३९
अजंटा में आये मुकुट
c14.s11.1
१—मुकुट का आकार लंबोतरा है। इसके अलंकारों में हम वृत्त, घुंडियां अथवा मनके और फूल देख सकते हैं (आ० ३०६)४५। लेण, १७
c14.s11.2
४५ हेरिंगम, प्ले० १६, १८
c14.s11.3
२—अनेक चोटियों वाला पगड़ी से लगा मुकुट (आ० ३०७)४६। लेण, १७
c14.s11.4
४६ वही, प्ले० २९, ४८; २४, २६
c14.s11.5
३—दो पुरुषों के राजमुकुट—एक लंबोतरे रत्न जटिल मुकुट में मोती की लड़ें लगी
c14.s11.6
हैं (आ० ३०८)४७। दूसरा मुकुट वृत्तों, अर्धचंद्रों और मोती की लड़ों से अलंकृत है और उसके बगल के उभरे अंश कटावदार हैं (आ० ३०९। लेण, १७
c14.s11.7
४७ वही, प्ले० २६, २८
c14.s11.8
४—राजकुमार के त्रिभुजाकार मुकुट की नक्काशी में वृत्त, फुल्ले, खिले फूल इत्यादि देख सकते हैं । मुकुट फीतों से पीछे बंधा है[^४८। लेण, १
c14.s11.9
४८ वही, प्ले० ११, १३
c14.s11.10
५—इस मुकुट का आकार टिकरेदार पट्टी की तरह है। पट्टी में लगे कई कलंगों में दो दिखलायी देते हैं । इनमें एक का आकार तीन आमलकों से मंडित कूट के समान है । फुल्ले से अलंकृत बीच का कलंगा त्रिभुजाकार है[^४९। लेण, १
c14.s11.11
४९ वही, प्ले० १४, १६
c14.s11.12
६—त्रिभुज के दोनों पक्ष लहरियादार है । मुकुट पुष्पों और जड़ाऊ तख्तियों से सजा है और उसके दोनों ओर गोल तख्तियां हैं। मुकुट पीछे बंदों से बंधा है[^५०। लेण, १
c14.s11.13
५० वही, प्ले० १५, ७
c14.s11.14
७—मुकुट का आकार चिपकी टोपी जैसा है जिस पर एक पेचक और फूले कमल के आकार हैं (आ० ३१०)[^५१। लेण, २
c14.s11.15
५१ वही, प्ले० ११, ४९
c14.s11.16
८—ऊंची टोपी जैसा मुकुट । यह घुंडीदार वृत्तों और खिले पुष्पों से सुसज्जित है[^५२।
c14.s11.17
५२ ग्रिफिथ, अजंटा
घुड़सवारों की वेश-भूषा
c14.s12.1
अजंटा की नं० १ लेण में एक घुड़सवार एक योगी से बातचीत करता हुआ बताया गया है (आ० ३११)[^५३। इसका पूरा बांहों वाला कंचुक काली बुंदकियों से सजा है। ये काली बुंदकियां हमें अगरुपंक से लिप्त वाणभट्ट द्वारा वर्णित कंचुक की याद दिलाती है[^५४। दुपट्टे के सिरे पीछे फड़क रहे हैं और बाल एक फीते से बंधे हैं ।
c14.s12.2
५३ हेरिंगम, वही, प्ले० ६, ८
c14.s12.3
५४ हर्षचरित, पृ० १६
c14.s12.4
अजंटा के सिंहल-युद्ध नामक चित्र में घुड़सवार आधी बाहों वाले कूर्पासक और जांघिया पहने हैं । इस कूर्पासक के गले और मुहरियों पर गोटें लगी मालूम पड़ती हैं (आ० ३१२)[^५५।
c14.s12.5
५५ हेरिंगम, प्ले० १७, १९
c14.s12.6
१७ नंबर की लेण के एक भित्ति-चित्र में दो घुड़सवार नुकीले गले वाले कंचुक पहरे दिखलाये गये हैं । गले पर छाया से पता लगता है कि शायद वह समूर का बना होगा । बायें ओर के अश्वारोही की टोपी का ऊपर मुड़ा छज्जा कटावदार है तथा उसके चोटी पर एक
c14.s12.7
३०४
c14.s12.8
३०५
c14.s12.9
३०६
c14.s12.10
३०७
c14.s12.20
फूंदना है । अपनी वेश-भूषा और आकृति से ये अश्वारोही ईरानी अथवा हूण विदित होते हैं (आ० ३१३)५६।
c14.s12.21
५६ वही, प्ले० २२, २४
c14.s12.22
१७ नं० की लेण के एक दूसरे भित्ति-चित्र में आगे के दो घुड़सवारों में बायीं ओर का घुड़सवार पूरी बांहों वाला आगे से खुला कोट (वारबाण) पहने है । उसका साथी चाकदार कंचुक, पाजामा और पूरा बूट पहने है । इसके एक वस्त्र का जिसका कोना बाहर निकला है, क्या रूप था ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता (आ० ३१४)५७।
c14.s12.23
५७ वही, प्ले० ८, १०
c14.s12.24
१७ नंबर की लेण के मातृपोषक जातक वाले भित्ति-चित्र में बायीं ओर एक घुड़सवार एक बहुत चौड़े कालर वाला हलके नीले रंग का पूरे बांह का कंचुक पहरे है । उसका फेंटा कसा हुआ और पैरों में बूट हैं (आ० ३१५)५८।
c14.s12.25
५८ प्रिंस ऑफ वेल्स म्यूजियम में प्रतिकृति
c14.s12.26
बाग के एक भित्ति-चित्र में सत्रह घुड़सवारों का एक समूह तरह तरह के कंचुक पहरे हैं (आ० ३१६)५९। घुड़सवारों का सरदार नीली बूंदकीदार पीला कंचुक पहने है, इसके दाहिने ओर एक दूसरा सवार फूलदार चारखाने का कंचुक पहने है । यह कहना कठिन है कि चारखानों का मतलब सकरपारेदार सीयनों से है अथवा अलंकार से । अगर इसका मतलब सीयन से है तो इस वस्त्र से शायद वारबाण का तात्पर्य हो सकता है । सरदार के बायें ओर दूसरा सवार एक गेरुए रंग का कोट और नीले रंग के सूक्ष्म अलंकारों से सज्जित पीली टोपी पहने है । आगे के तीन सवारों में एक सवार के कंचुक में रूढ़िगत पक्षियों जैसे अलंकार हैं । घुड़सवारों के तीसरी पंक्ति के चार सवारों में एक सवार कोणाकार गले वाला कंचुक और पाजामा पहरे है और इसका साथी चूंदरी का बना कंचुक (पुलकबंध) पहने है । पीछे के चार सवारों में एक सवार पूरी बांह का वारबाण पहने है । सवारों के सिर प्रायः नक्काशीदार रंगीन रुमालों से ढंके हैं । यह चित्र हमें बाणभट्ट द्वारा वर्णित श्रीहर्ष के घुड़सवारों की याद दिलाता है६०।
c14.s12.27
५९ मार्शल, वही, प्ले० एफ०
c14.s12.28
६० हर्षचरित, पृ० २०२
फीलवानों की वेश-भूषा
c14.s13.1
फीलवान प्रायः अधबहियां मिरजई (कूर्पासक), जिसमें कोणाकार गला और मोहरियों पर सादी गोटें लगी रहती थीं, पहनते थे (आ० ३१७)६१। पर कभी कभी वे पूरे बाहों वाला कंचुक भी पहनते थे (आ० ३१८)६२ और उनके बाल एक रुमाल अथवा चपटी टोपी से ढंके
c14.s13.2
६१ याजदानी, अजंटा, भा० २, प्ले० १४
c14.s13.3
६२ हेरिंगम, वही, प्ले० १९, २१
c14.s13.4
होते थे। बाग के एक चित्र में फीलवान सुनहरे धारीदार कपड़े से बनी जांघिया पहने हैं६३।
c14.s13.5
६३ मार्शल, बाग, प्ले० जी०
c14.s13.6
१७ नं० की लेण के एक भित्ति चित्र में सिपाही छोटी धोतियां पहने दिखलाये गये हैं (आ० ३१९)६४ कभी कभी वे पट्टियों से अपने बाल बांध लेते थे (आ० ३२०)। १७ नं० की लेण में सिंहलयुद्ध वाले भित्ति-चित्र में सिपाही धोती अधबहियां मिर्जई (कूर्पासक) जो छाती को ढाकती है और जिसके गले और मोहरियों पर गोंट लगी है, पहनते हैं। उनके सिर रूमाल से ढंके होते हैं (आ० ३२१)६५।
c14.s13.7
६४ हेरिंगम, वही, प्ले० १७, १९
c14.s13.8
६५ वही, प्ले० १७, १८
पैदल सिपाहियों की वेश-भूषा
c14.s14.1
१७ नं० की लेण के एक भित्ति-चित्र में एक असिवाहक अधबहियां, घुटनों तक पहुंचता हुआ तथा कमरबंद से बंधा चाकदार कंचुक पहने है (आ० ३२२)६६। उसी चित्र में एक कुंतल-वाहक भी अधबहियां कंचुक पहने है। इसका कमरबंद दो फेंटों में बंधा है (आ० ३२३)। १ नं० की लेण में एक सिपाही पत्रों की नक्काशी से सज्जित कंचुक पहने हैं६७। उसी चित्र में एक ढाल-वाहक ने एक कंधों को ढांकती चादर, जिसमें एक गट्ठी लगी है, पहन रक्खा है।
c14.s14.2
६६ वही, प्ले० ३८, ४६
c14.s14.3
६७ याजदानी, अजंटा, १, प्ले० १४
युद्धभूमि में राजाओं और सामंतों की वेश-भूषा
c14.s15.1
युद्धभूमि में, जैसा कि सिंहलयुद्ध नामक चित्र में दिखलाया गया है, राजे और राजकुमार अधबहियां मिर्जई (कूर्पासक) और सरपेंच से युक्त भारी भरकम पगड़ियां पहनते हैं६८।
c14.s15.2
६८ हेरिंगम, वही, प्ले० १७-१९
शिकारी और बहलियों की वेश-भूषा
c14.s16.1
१७ नं० की लेण में मातृपोषक जातक नाम के भित्ति-चित्र में शिकारी और बढ़क छोटी धोती पहने दिखलाये गये हैं, और उनके बाल फीतों से बंधे हैं६९। उसी लेण के षड्दंत जातक नामक चित्र में बढ़क जो किसी जंगली जाति के मालूम पड़ते हैं पेटीदार जांघिया जिसमें कटार खुंसी है, पहनते हैं (आ० ३२४)७०। पकड़े ग षड्दंत गज को दंडवत करते हुए एक बढ़क की चप्पल दर्शनीय है। यह चप्पल आधुनिक पठानी चप्पलों की तरह एड़ी पर एक तस्मे से बंधी है (आ० ३२५)। लंगोटी पहरे हुए तथा धनुषबाण और दंड से युक्त
c14.s16.2
६९ वही, प्ले० २०, २२
c14.s16.3
७० प्ले० २७, २९
c14.s16.10
एक ठेठ जंगली आदमी भी उसी दृश्य में दिखलाया गया है (आ० ३२६)। शंखपाल जातक में दाहिनी ओर एक नाग को रस्सी से घसीटता हुआ शिकारी चारखानेदार लंगोटी पहने है (आ० ३२७)७१। इसी दृश्य में एक दूसरे शिकारी की धारीदार लंगोटी की धारियों पर तीर के फल अथवा उड़ती चिड़ियों के रूढ़िगत अलंकार बने हैं।
c14.s16.11
७१ —याजदानी, वही १, प्ले० ११
शिकारी की वेश-भूषा
c14.s16.t1.1
उच्चपदस्थ मनुष्यों की शिकारी वेश-भूषा दूसरे ही तरह की होती थी। १७ नं० की लेण के एक भित्ति-चित्र में एक बाणसंधान करता हुआ जमीन पर खड़ा शिकारी कमर तक पहुंचता कंचुक जिसमें नीचे सुनहरी गोंट लगी है, सफेद पाजामा और बूट पहने है (आ० ३२८)। उसका साथी एक चाकदार कंचुक जिसके ऊपर किसी दूसरे वस्त्र का कोना देख पड़ता है पहने है।
कंचुकी की वेश-भूषा
c14.s17.1
१७ नं० की लेण के एक भित्ति-चित्र में सांवले बदन का कंचुकी एक बंटे कपड़े की चपटी पगड़ी पहने है। पूरे बांह वाले कंचुक के ऊपर तिरछे बल एक चादर, जिस पर सेहरे की तरह अलंकार बने हैं, पड़ी है (आ० ३२९)७२।
c14.s17.2
७२ —हेरिंगम, वही, प्ले० २५, १८
c14.s17.3
१ नं० की लेण में राजा का स्नान दिखलाते हुए एक भित्ति-चित्र में एक वृद्ध कंचुकी तिकोने गले वाला पूरे बांह का कंचुक, जिसका छोर इकट्ठा कर के कमरबंद में खोंस लिया गया है, और लाल बारी वाली धोती पहने है (आ० ३३०)७३।
c14.s17.4
७३ —वही, प्ले० १२, १४
मंत्रियों की वेश-भूषा
c14.s18.1
१७ नं० की लेण के एक भित्ति-चित्र में राजमंत्री एक सफेद पूरी बांह का कंचुक और चादर पहरे दिखलाये गये हैं। उसका सिर अनावृत है और वह खल्लका किस्म का पूरा बूट पहने है (आ० ३३१)७४।
c14.s18.2
७४ —वही, प्ले० २५, २७
c14.s18.3
शिवि जातक के एक चित्र में जहाँ इन्द्र को अपनी आंखें देने के बाद राजा घोर कष्ट में है एक राज मंत्री का चित्रण हुआ है। मंत्री एक अधबहियां मिर्जई (कूर्पासक) जिसकी मुहरियों पर वृत्त और चारखाने के जाल बने हैं और जिनमें मोती की झालरें हैं तथा छाती पर तिरछी तरह से चादर डाले है। गले में एक वैकक्ष्य भी है जिसके दोनों सिरे एक कांटे से फंसे हैं। बालों के चारों तरफ एक फूलों से सुशोभित पट्टी है (आ० ३३२)७५।
c14.s18.4
७५ —वही, प्ले० ३९, ४७
सामंतों और उच्चवर्ण नागरिकों की वेश-भूषा
c14.s19.1
राजाओं का पहरावा तो सादा होता था पर उनके मुकुट काफी कामदार और रत्न जटित होते थे । सामंतों और उच्च पदस्थ नागरिकों के पहरावे भी इसी तरह सादे होते थे, पर उनमें मुकुट का अभाव होता था । ऐसा लगता है कि मुकुट पहनने के अधिकारी केवल राजे ही थे । सादापन होते हुए भी सामंत अपने कपड़े खूब सजा कर पहनते थे । हम नीचे इन वस्त्रों के पहनने के भिन्न भिन्न तरीकों की समीक्षा करेंगे ।
c14.s19.2
मीरपुर खास (सिंध) से मिले एक मिट्टी के अर्ध चित्र में गुप्त-युग के एक समृद्ध नागरिक की मूर्ति है (आ० ३३३)७६। उसने जांघिया के ऊपर धोती इस तरह से पहन रखी है कि उसका सामना तो घुटनों तक पहुंचता है पर पीछा एंड़ियों के जरा ऊपर । ढीले तौर से बंधे कमरबंद के दोनों मुक्त छोर बायीं ओर लटक रहे हैं। जांघिये के ऊपर धोती पहनने की इस युग में साधारण प्रथा थी । अजंटा की १७ नं० की लेण के एक भित्ति-चित्र में भी एक नागरिक जांघिया के ऊपर एक छोटी धोती पहरे दिखलाया गया है । बायीं ओर सफाई से बंधे पटके का छोर नीचे लटक रहा है । वैकक्ष्य के दोनों छोर छाती पर एक मोती के कांटे से फंसे हैं७७।
c14.s19.3
७६ ए० एस० आई० एन० रि०, १९०९-१०, प्ले० ३८, बी०
c14.s19.4
७७ हेरिंगम, वही, प्ले० ४१, ५५
c14.s19.5
ईडर रियासत के सामलाजी पहाड़ी से मिली एक बेसिर वाली शिव की मूर्ति में एक उच्च गुप्त नागरिक की वेश-भूषा अंकित है । धोती घुटनों के नीचे तक पहुंचती है और उसका चुना हुआ छोर सामने लटकता है । कमर पर बंटे हुए कमरबंद के तीन फंदे हैं। कमरबंद के चुने हुए छोर दोनों ओर देख पड़ते हैं (आ० ३३४)७८। ईडर से मिली एक दूसरी शिव की मूर्ति एंड़ी तक पहुंचती कमर पेटी से बंधी है तथा एक ढीला कमरबंद जांघों को घेरे है (आ० ३३५)७९। जोधपुर रियासत के मंडोर नामक स्थान से मिले एक स्तंभ पर गोवर्धन-धारी कृष्ण एंड़ी तक पहुंचती धोती पहने हैं। कमरपेटी में एक घुमावदार कमरबंद संकर मुट्ठी लगा कर दाहिनी ओर बंधा है (आ० ३३६)८०।
c14.s19.6
७८ इनामदार, सम आर्किओलोजिकल फाइंडस् इन ईडर स्टेट, प्ले० १, १; अहमदाबाद, १९३६
c14.s19.7
७९ वही, प्ले० २, ५
c14.s19.8
८० ए० एस० आई० एन० रि०, १९०५-०६, पृ० १३६
c14.s19.9
ग्वालियर रियासत के उदयगिरि के पांच नंबर के लेण में वराह अवतार के अर्ध चित्र में समुद्र की वेश-भूषा तत्कालीन भद्रपुरुष की सी है८१। धोती और कंधों को ढांकते दुपट्टे के सिवाय वह एक शीर्षपट्ट युक्त पगड़ी भी पहने है जो मथुरा की कुषाण मूर्तियों में आई पगड़ी का ध्यान दिलाती है । सारनाथ से मिली अवलोकितेश्वर की मूर्ति में हम धोती और
c14.s19.10
८१ एन० रि० आर० डि० ग्वालियर स्टेट, १९२८-२९, प्ले० ५
c14.s19.19
कमरबंद पहनने के आकर्षक ढंग को देख सकते हैं। अवलोकितेश्वर के शरीर का निचला भाग एक चुनी धोती से, जिसकी चूंदन पैरों के बीच में लटकती है, ढंका है। कमर से यह धोती एक रत्न जटिल पेटी से बंधी है। कमर के ऊपर हम ढीले तरीके से बंधे एक रुमाल को देखते हैं जो दाहिनी बाहु के पास बंधा है और जिसके लहराते छोर दाहिने पैर के पास नीचे लटक रहे हैं (आ० ३३७)८२।
c14.s19.20
८२ साहनी, केटलाग ऑफ दि म्यूजियम ऑफ आर्किपोलोजी एट सारनाथ, प्ले० १३ बी०, पृ० ११८
c14.s19.21
१७ नं० की लेण में सारिपुत्रप्रश्न नामक एक भित्ति-चित्र में एक सामंत या राजा का जो उच्च पदाधिकारी बायीं ओर दिखलाया गया है, खड़ी धारियों वाली धोती और छाती को ढकती हुई चादर जो बायें कंधे पर डाल दी गयी है पहरे है। इसकी चक्करदार छोटी पगड़ी के एक तरफ सोने का फुल्ला लगा है (आ० ३३८)८३।
c14.s19.22
८३ हेरिगम, वही, प्ले० ४२, ५६
c14.s19.23
सारनाथ से मिली सातवीं सदी के अंत की मंजुश्री की मूर्ति घुटने के नीचे तक पहुंचती धोती, जिसका एक भाग चुन कर बायीं ओर खूसा है, पहरे है। एक भारी करधनी कमर में है। कमरबंद का एक बटा हिस्सा एक चूड़ी से निकाल कर दाहिनी जांघ पर लटका दिया गया है (आ० ३३९)८४।
c14.s19.24
८४ साहनी, वही, पृ० १२०-१२१, प्ले० १३ सी०
वादकों की वेश-भूषा
c14.s20.1
गुप्तकालीन भूमरा के मंदिर में अर्ध चित्रों में एक नरसिंहा बजाने वाला कुलाहनुमा टोपी, जिसकी चोटी जरा आगे झुकी है, घुटनों के नीचे पहुंचता चाकदार कंचुक और पाजामा पहने है (आ० ३४०)८५। हुडुक्क बजाता हुआ एक दूसरा वादक चोटीदार टोपी, कामदार कोट और पाजामा पहने है (आ० ३४१)। एक गायक कूर्पासक और सकच्छ धोती पहने है (आ० ३४२)। एक शहनाई बजाने वाला हल्की चोटीदार टोपी पहने है (आ० ३४३)। ढोल बजाने वाले की टोपी गोल है (आ० ३४४) और नर्तक की टोपी झालरदार है (आ० ३४५)।
c14.s20.2
८५ बेनर्जी, दि शिव टेंपिल एट भूमरा, प्ले० १०, कलकत्ता, १९२४
c14.s20.3
१७ नं० की लेण के एक भित्ति चित्र में आकाशचारी एक गंधर्व सफेद और भूरी रंग की धारियों वाली धोती और भूरी और हरी धारियों से सज्जित कमरबंद, जो धोती से मिलान खाता है, पहरे है८६। उसी लेण के एक दूसरे भित्ति-चित्र में एक दूसरा गवैंया सफेद जमीन पर हरी लहरिया वाली धोती पहने है८७।
c14.s20.4
८६ हेरिगम, प्ले० २, २
c14.s20.5
८७ वही, प्ले० २
c14.s20.6
एक वीणावादक का, जो अपनी वीणा कंधे पर रक्खे है, पहरावा आकर्षक है। वह औरों की तरह धोती, कमरबंद और पेटी पहने है। एक रूमाल गले से बँधा है। कमरबंद और रूमाल के छोर हवा में फड़फड़ा रहे हैं। दो जूड़ों में बंधे बालों में केशरक लगे हैं (आ० ३४६)८८।
c14.s20.7
८८ वही, प्ले० ३६, ४०
द्वारपालों की वेश-भूषा
c14.s21.1
गुप्तयुग के द्वारपाल या तो सिले हुए कपड़े अथवा अपने कपड़ों को संवार सुधार कर पहिनते थे। उदयगिरि के ६ नं० की लेण में द्वारपाल एक धोती, जिसका चुना हुआ भाग खुंसा है और जो नाभि के नीचे कमरबंद और सकर मुद्धी दार पेटी से बंधी है, पहरे हैं। कमरबंद के दोनों छोर कमर पर पंखे के आकार में सुसज्जित हैं (आ० ३४७)८९।
c14.s21.2
८९ एम० रि० आ० डि० ग्वालियर स्टेट, १९२८-२९, केव ६, प्ले० बी०
c14.s21.3
अजंटा के भित्ति-चित्रों में द्वारपाल प्रायः सिले कपड़े पहने दिखलाये गये हैं। नं० १ की लेण के एक भित्ति-चित्र में द्वारपाल सफेद और काले चारखानों वाले कपड़े से बना पूरे बांह का कंचुक पहने है जो कमर से एक चौड़ी पेटी से बंधा है (आ० ३४७)९०। उसी लेण के एक दूसरे भित्ति-चित्र में एक द्वारपाल गोल टोपी (आ० ३४८)९१ जिसका छज्जा उलटा हुआ है और एक कसी भर बांहों वाला हल्के रंग का फूलदार कोट पहने हैं। याजदानी के मत से कोट का कपड़ा किंख़ाब हो सकता है९२। दूसरे नं० की लेण में एक भित्ति चित्र में द्वारपाल कमर के नीचे पहुंचता पूरे बांह का कंचुक, जिसके किनारों पर कसीदे का काम है, (आ० ३४९)९३ पहने है।
c14.s21.4
९० याजदानी, अजंटा, १, प्ले० १
c14.s21.5
९१ वही, प्ले० ३५
c14.s21.6
९२ वही, पृ० ४२, फु० नो० २
c14.s21.7
९३ याजदानी, अजंटा, भा० २, प्ले० २५, पृ० २५
राजभृत्योंकी वेश-भूषा
c14.s22.1
अजंटा के भित्ति-चित्रों में राजभृत्य सिले कपड़े अथवा सादी धोती पहने दिखलाये गये हैं। ७ नं० की लेण के एक भित्ति-चित्र में बुद्ध के बायीं ओर खड़ा एक सेवक एक चार-खानेदार धोती पहरे हैं (आ० ३५०)९४। १ नं० की लेण के अवलोकितेश्वर वाले प्रसिद्ध भित्ति-चित्र में फूलचंगेर लिए हुए सेवक गहरे भूरे रंग की धारियों वाला कंचुक और एक सुंदर मुकुट पहने है (आ० ३५१)९५। इसी लेण के एक दूसरे भित्ति-चित्र में एक सेवक घुमावदार नक्काशी से सज्जित कंचुक पहने है। अलंकार पट्टियों में बने हैं और उनमें फुल्ला
c14.s22.2
९४ हेरिंगम, वही, प्ले० ४२, ५६
c14.s22.3
९५ वही, प्ले० १०, १२
c14.s22.4
३४२
c14.s22.5
३४३
c14.s22.6
३४४
c14.s22.7
३४५
c14.s22.8
३४६
c14.s22.9
३४७
c14.s22.10
३४९
c14.s22.11
३४८
c14.s22.12
३५०
c14.s22.13
३५१
c14.s22.14
३५२
c14.s22.15
वृत्त और सिंघाड़े मुख्य हैं (आ० ३५२)९६। इसी लेण के एक तीसरे भित्ति-चित्र में फर्श पर बैठा हुआ सेवक एक रुपहले किमखाब, जिस पर गहरे मटमैले रंग से बना पुष्पालंकार हैं, से बना कंचुक पहने है (आ० ३५३)९७।
c14.s22.16
९६ याजदानी, अजंता, भा० १, प्ले० ७ बी०, पृ० ९
c14.s22.17
९७ वही, प्ले० २४, बी०, पृ० ४१
c14.s22.18
युद्ध अथवा यात्रा में अपने स्वामियों के पीछे चलते हुए सेवक समयानुकूल पहरावे पहरते थे । यथा सिंहलयुद्ध वाले चित्र में हाथी के पीछे बैठा हुआ एक सेवक, दुमचीदार खोद, कूर्पासक, और कमरबंद से बंधी एक छोटी धोती पहने है (आ० ३५४)९८।
c14.s22.19
९८ हेरिंगम, वही, प्ले० ४२, ५; १७, ४३
स्नापकों की वेश-भूषा
c14.s23.1
१ नं० की लेण के एक भित्ति-चित्र में स्नापक एक महीन वस्त्र की लाल धारियों वाली छोटी धोती पहरे है । उसका सिर एक रूमाल से ढंका है (आ० ३५५)९९।
c14.s23.2
९९ वही, प्ले० १२, १४
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- Bharhut
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