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भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c31: परिशिष्ट: भारतीय संवत्

भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c31

Language
Hindi

Contents

परिशिष्ट: भारतीय संवत्

c31.1

भारतीय संवत्१.

c31.2

भारतवर्ष के भिन्न भिन्न विभागों में समय समय पर भिन्न भिन्न संवत् चलते रहे जिनके प्रारंभ आदि का हाल जानना प्राचीन शोध के अभ्यासियों के लिये आवश्यक है, इस लिये उनका संक्षेप से विवेचन किया जाता है.

१—सप्तर्षि संवत्

c31.s1.1

सप्तर्षि संवत् को लौकिककाल, लौकिक संवत्३, शास्त्र संवत्४, पहाड़ी संवत्५ या कच्चा संवत्६ भी कहते हैं. यह संवत् २७०० वर्ष का कल्पित चक्र है जिसके विषय में यह मान लिया गया है कि सप्तर्षि नाम के सात तारे अश्विनी से रेवती पर्यंत २७ नक्षत्रों में से प्रत्येक पर क्रमशः सौ सौ वर्ष तक रहते हैं७. २७०० वर्ष में एक चक्र पूरा हो कर दूसरे चक्र का प्रारंभ होता है. जहां जहां यह संवत् प्रचलित रहा या है वहां नक्षत्र का नाम नहीं लिखा जाता, केवल १ से १०० तक के वर्ष लिखे जाते हैं. १०० वर्ष पूरे होने पर शताब्द्दी का अंक छोड़ कर फिर एक से प्रारंभ करते हैं. कश्मीर के पंचांग८ तथा कितने एक पुस्तकों९ में कभी कभी प्रारंभ से भी वर्ष लिखे हुए मिलते हैं. कश्मीरवाले इस संवत् का प्रारंभ कलियुग

c31.s1.2

१ 'संवत्' शब्द 'संवत्सर' शब्द का संक्षिप्त रूप है जिसका अर्थ 'वर्ष' है. कभी कभी इसके और भी संक्षिप्त रूप 'संव', 'सं,' या 'सव' और 'स' (प्राकृत लेखों में) मिलते हैं. संवत् शब्द को कोई कोई विक्रम संवत् का ही सूचक मानते हैं परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है. यह शब्द केवल 'वर्ष' का सूचक होने से विक्रम संवत्, गुप्त संवत् आदि प्रत्येक संवत् के लिये आता है और कभी कभी इसके पूर्व उक्त संवतों के नाम भी (विक्रम संवत्, वलभी संवत् आदि) लिखे मिलते हैं. इसके स्थान में वर्ष, अब्द, काल, शक आदि इसी अर्थवाले शब्दों का भी प्रयोग होता है.

c31.s1.3

२ सप्तर्षि नामक ७ तारों की कल्पित गति के साथ इसका संबंध माना गया है जिससे इसको 'सप्तर्षि संवत्' कहते हैं.

c31.s1.4

३ कश्मीर आदि में शताब्दियों के अंकों को छोड़ कर ऊपर के वर्षों के अंक लिखने का लोगों में प्रचार होने के कारण इसको 'लौकिक संवत्' या 'लौकिक काल' कहते हैं.

c31.s1.5

४ विद्वानों के शास्त्रसंबंधी ग्रंथों तथा ज्योतिःशास्त्र के पंचांगों में इसके लिखने का प्रचार होने से ही इसको शास्त्र संवत् कहते हैं.

c31.s1.6

५ कश्मीर और पंजाब के पहाड़ी प्रदेश में प्रचलित होने से इसको पहाड़ी संवत् कहते हैं.

c31.s1.7

६ इस संवत् के लिखने में शताब्दियों को छोड़ कर ऊपर के ही वर्ष लिखे जाने से इसे कच्चा संवत् कहते हैं.

c31.s1.8

७ एकैकस्मिन्नृक्षे शतं शतं ते (मुनयः) चरन्ति वर्षाणाम् (वाराही संहिता, अध्याय १३, श्लोक ४). सप्तर्षीणां तु यौ पूर्वौ दृश्येते उदितौ दिवि। तयोस्तु मध्ये नक्षत्रं दृश्यते तत्समं निशि॥ तेनैत ऋषयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम् (भागवत, स्कंध १२, अध्याय २, श्लोक २७-२८. विष्णुपुराण, अंश ४, अध्याय २४, श्लोक ५३-५४). पुराण और ज्योतिष के संहिताओं में सप्तर्षियों की इस प्रकार की गति लिखी है वह कल्पित है. 'सिद्धांततत्वविवेक' का कर्ता कमलाकर भट्ट भी ऐसी गति को स्वीकार नहीं करता (अद्यापि कैरपि नरैर्गतिरायर्सृष्टेर्नैव न यात्र कथिता किल संहितासु। तत्काव्यमेव हि पुराणवदत्र तज्ज्ञास्तेनैव तत्वविषयं गदितुं प्रवृत्ताः॥ (सिद्धांततत्वविवेक, भग्रहयुत्यधिकार, श्लोक ३२).

c31.s1.9

८ श्रीसप्तर्षिचारानुमतेन संवत् ४९६६ तथा च संवत् ६६ चैत्रसुति १ श्रीशाकाः १७१५ करणागताव्दा(ब्दाः) १०२८ दिनगणाः ४१२०१० श्रीविक्रमादित्यसंवत् १६५० कल्पगताव्दा(ब्दाः) १६७२६४८८६४ शेषाव्दा(ब्दाः) २३४७०५११०६...कलेर्गतवर्षाणि ४८६४ शेषवर्षाणि ४२७१०६ (विक्रम संवत् १८५० का पंचांग, इं. ऍ.; जि. २०, पृ. १५०).

c31.s1.10

९ सप्तर्षिः(र्षि)संवत् ४८५१ अ[श्वि]नयु[क्त]कृष्णसप्तमी मंगल(ल)वासरे(रे) (हस्तलिखित 'ध्वन्यालोक'; इं. ऍ; जि. २०, पृ. १५१).

c31.s1.11

के २५ वर्ष पूरे होने पर१ (२६ वें वर्ष से) मानते हैं परंतु पुराण तथा ज्योतिष के ग्रंथों में इस का प्रचार कलियुग के पहिले से होना माना गया है२.

c31.s1.12

(अ). 'राजतरंगिणी' में कल्हण पंडित लिखता है कि 'इस समय लौकिक [संवत्] के २४ वें (वर्तमान) वर्ष में शक संवत् के १०७० वर्ष बीत चुके हैं'३. इस हिसाब से वर्तमान४ लौकिक संवत् और गत शक संवत् के बीच का अंतर (१०७०-२४=) १०४६=४६ है. अर्थात् शताब्दी के अंकसहित सप्तर्षि संवत् में ४६ जोड़ने से शताब्दोरहित शक (गत), ८१ जोड़ने से चैत्रादि विक्रम (गत), २५ जोड़ने से कलियुग (गत) और २४ या २५ जोड़ने से ई. स. (वर्तमान) आता है.

c31.s1.13

(आ). चंबा से मिले हुए एक लेख में विक्रम संवत् (गत) १७१७, शक संवत् १५८२ (गत) और शास्त्र संवत् ३६ वैशाख वति (वदि)५ १३ बुधवार६ लिखा है. इससे भी वर्तमान शास्त्र संवत् और [गत] विक्रम संवत् (१७१७-३६=१६८१=८१) तथा शक संवत् (१५८२-३६= १५४६=४६) के बीच का अंतर ऊपर लिखे अनुसार ही आता है.

c31.s1.14

२ क; ई; ई; पृ. ४.

c31.s1.15

४ सप्तर्षि संवत् के वर्ष वर्तमान और कलियुग, विक्रम तथा शक संवतों के वर्ष पंचांगों में गत लिखे रहते हैं. ता० १२ एप्रिल ई. स. १८९८ को जो चैत्रादि विक्रम संवत् १९५५ और शक संवत् १८२० प्रवेश हुआ उसको लोग वर्तमान मानते हैं. परंतु ज्योतिष के हिसाब से वह गत है, न कि वर्तमान. मद्रास इहाते के दक्षिणी विभाग में अबतक शक संवत् के वर्तमान वर्ष लिखे जाते हैं तो वहां का वर्ष बंबई इहाते तथा उत्तरी भारतवर्ष के पंचांगों के शक संवत् से एक वर्ष आगे रहता है.

c31.s1.16

५ 'शुदि' (सुदि) और 'बदि' या 'वदि' का अर्थ शुक्लपक्ष और बहुल (कृष्ण) पक्ष माना जाता है परंतु वास्तव में इन शब्दों का अर्थ 'शुक्लपक्ष का दिन' और 'बहुल (कृष्ण) पक्ष का दिन' है. ये स्वयं शब्द नहीं हैं किंतु दो दो शब्दों के संक्षिप्त रूपों के संकेत मात्र हैं जिनको मिला कर लिखने से ही उनकी शब्दों में गणना हो गई है. प्राचीन लेखों में संवत्सर (संवत्), ऋतु, पक्ष और दिन या तिथि ये सब कभी कभी संक्षेप से भी लिखे जाते थे. जैसे संवत्सर के संक्षिप्त रूप संवत्, संव, सं आदि मिलते हैं (देखो, ऊपर पृ. १५६, टि. १) वैसे ही ग्रीष्मः (प्राकृत में गिम्हाण) का संक्षिप्त रूप 'ग्री', या 'गृ' और 'गि' (प्राकृत लेखों में); 'वर्षाः' का 'व'; 'हेमन्तः' का 'हे'; 'बहुलपक्ष' या 'बहुल' (कृष्ण) का 'ब'; 'शुक्लपक्ष' या 'शुक्ल' का 'शु'; 'दिवसे' का 'दि' और 'तिथि' का 'ति' मिलता है. 'बहुल' और 'दिवसे' के संक्षिप्त रूप 'ब' और 'दि' को मिला कर लिखने से 'बदि' और उससे 'वदि' (वबयोरैक्यम्) शब्द बन गया, ऐसे ही 'शुक्ल' के 'शु' और 'दिवसे' के 'दि' को साथ लिखने से 'शुदि' और उससे 'सुदि' ('श' के स्थान में 'स' लिखने से) बन गया. कश्मीरवाले 'दिवस' के स्थान में 'तिथि' शब्द का प्रयोग करते रहे जिससे उनके यहां बहुधा 'शुति' और 'वति' शब्द मिलते हैं. देहली के अशोक के स्तंभ पर अजमेर के चौहान राजा वीसलदेव (विग्रहराज) के तीन लेख खुदे हुए हैं जिनमें से दो संवत् १२२० वैशाख शुदि १५ के हैं. उन दोनों में 'शुति' खुदा है (संवत् १२२० वैशाखशुति १५. ई. एं; जि. १९, पृ. २१७-१८). व्याकरण के पिछले आचार्यों ने 'शुदि' और 'बदि' (वदि) शब्दों की उत्पत्ति न जान कर ही उनकी अव्ययों में गणना कर दी है. 'शुदि' या 'शुति' और 'बदि' या 'वति' (वति) के पीछे 'तिथि' शब्द (श्रावणशुदि पंचम्यां तिथौ) लिखना भी अशुद्ध है क्योंकि 'शुदि' और 'वदि' में तिथिसूचक 'दिवस' शब्द मौजूद है. केवल उप- र्युक्त शब्दों के ही संक्षिप्त रूप लेखादि में मिलते हैं ऐसा ही नहीं किंतु अनेक दूसरे शब्दों के भी संक्षिप्त रूप मिलते हैं, जैसे कि 'ठक्कुर' का 'ठ०' 'महन्तम' का 'महं०', श्रेष्टिन' का 'श्रे०', 'ज्ञातीय' या 'ज्ञाति' का 'ज्ञा०', 'उत' (पुत्र का प्राकृत रूप) का 'उ०' (इं. इं; जि. ८, पृ. २१६-२२) आदि अनेक. ऐसे संक्षिप्त रूपों के साथ कहीं कुंडल (०) लगाया मिलता है और कहीं नहीं भी.

c31.s1.17

(इ). पूना के दक्षिण कॉलेज के पुस्तकालय में शारदा (कश्मीरी) लिपि का 'काशि- कावृत्ति' पुस्तक है जिसमें गत विक्रम संवत् १७१७ और सप्तर्षि संवत् ३६ पौष वति (वदि)

c31.s1.18

१ कोलेर्गतेः सायकनेत्र(२५)वर्षैः सप्तर्षिवर्यास्त्रिदिवं प्रयाताः । लोके हि संवत्सरपत्रिकायां सप्तर्षिमानं प्रवदन्ति सन्तः ॥ (डॉ. बूलर की कश्मीर की रिपोर्ट; पृ. ६०).

c31.s1.19

३ लौकिकाब्दे चतुर्विंशे शककालस्य सांप्रतम् । सप्तत्याम्यधिकं यातं सहस्त्रं परिवत्सराः (राजतरंगिणी, तरंग १, श्लोक ५२).

c31.s1.20

६ श्रीमन्नृपतिविक्रमादित्यसंवत्सरे १७१७ श्रीशालिवाहनशके १५८२ श्रीशास्त्रसंवत्सरे ३६ वैशाख(ख)वदि त्रयोदश्यां बु(ध)वासरे मेषार्कसंक्रान्तौ (इं. पं; जि. २०, पृ. १५२).

c31.s1.21

३ रवि वार और तिष्य (पुष्य) नक्षत्र लिखा है.१ इससे भी सप्तर्षि और विक्रम संवत् के बीच का अंतर ऊपर लिखे अनुसार (१७१७-३६=१६८१=८१) ही आता है.

c31.s1.22

सप्तर्षि संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से होता है और इसके महीने पूर्णिमांत हैं. इस संवत् के वर्ष बहुधा वर्तमान२ ही लिखे जाते हैं. प्राचीन काल में इस संवत् का प्रचार कश्मीर और पंजाब में था परंतु अब कश्मीर तथा उसके आस पास के पहाड़ी इलाकों में ही, विशेष कर ज्योतिषियों में, रह गया है.

२—कलियुग संवत्

c31.s2.1

कलियुग संवत् को भारतयुद्ध संवत् और युधिष्ठिर संवत् भी कहते हैं. इस संवत् का विशेष उपयोग ज्योतिष के ग्रंथों तथा पंचांगों में होता है तो भी शिलालेखादि में भी कभी कभी इसमें दिये हुए वर्ष मिलते हैं४. इसका प्रारंभ ई. स. पूर्व ३१०२ तारीख १८ फरवरी के प्रातःकाल से माना जाता है. चैत्रादि विक्रम संवत् १६७५ (गत) और शक संवत् १८४० (गत) के पंचांग में गत कलि ५०१६ लिखा है. इस हिसाब से चैत्रादि गत विक्रम संवत् में (५०१६-१६७५=) ३०४४, गत शक संवत् में (५०१६-१८४०=) ३१७६, और ई. स. में ३१०१ जोड़ने से गत कलियुग संवत् आता है.

c31.s2.2

२ कभी कभी गत वर्ष भी लिखे मिलते हैं, जैसे कि कथ्यटरचित 'देवीशतक' की टीका के अंत में यह श्लोक है—

c31.s2.3

दक्षिण के चालुक्यवंशी राजा पुलकेशि (दूसरे) के समय के, एहोल की पहाड़ी पर के जैन मंदिर के शिलालेख में भारतयुद्ध से ३७३५ और शक राजाओं (शक संवत्) के ५५६ वर्ष बीतने पर उक्त मंदिर का बनना बतलाया है५. उक्त लेख के अनुसार भारत के युद्ध (भारत-युद्ध संवत्) और शक संवत् के बीच का अंतर (३७३५-५५६=) ३१७९ वर्ष आता है. ठीक यही अंतर कलियुग संवत् और शक संवत् के बीच होना ऊपर बतलाया गया है, अतएव उक्त लेख के अनुसार कलियुग संवत् और भारतयुद्ध संवत् एक ही हैं. भारत के युद्ध में विजयपाने से राजा युधिष्ठिर को राज्य मिला था जिससे इस संवत् को युधिष्ठिर संवत्६ भी कहते हैं. पुराणों में कलियुग का

c31.s2.4

१ श्रीनृपविक्रमादित्यराज्यस्य गताब्दाः १७१७ श्रीसप्तर्षिमते संवत् ३६ पौ [व] ति ३ रवौ तिष्यनक्षत्रे (इं. ऐं; जि. २०, पृ. १५२).

c31.s2.5

६ डॉ० कीलहॉर्न संगृहीत दक्षिण के लेखों की सूची, पृ. १६२, लेखसंख्या १०१७.

c31.s2.6

वसुमुनिगगनोदधिसमकाले याते कलेस्तथा लोके ।
द्वापञ्चाशे वर्षे रचितेयं भीमगुप्तेनृपे ॥ (इं. ऐं; जि. २०, पृ. १५४).

c31.s2.7

यहाँ पर गत कलियुग संवत् ४०७८ और लौकिक संवत् ५२ दिया है जो गत है ('याते' दोनों के साथ लगता है) क्योंकि वर्तमान ५३ में ही गत कलियुग संवत् ४०७८ आता है. परंतु ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं.

c31.s2.8

३ हिंदुओं की कालगणना के अनुसार कलियुग एक महायुग का १० वां अंश मात्र है. महायुग में ४ युग माने जाते हैं जिनको कृत, त्रेता, द्वापर और कलि कहते हैं. कलियुग ४३२००० वर्ष का, द्वापर उससे दुगुना अर्थात् ८६४००० वर्ष का, त्रेता तिगुना अर्थात् १२९६००० वर्ष का और कृत चौगुना अर्थात् १७२८००० वर्ष का माना जाता है. इस प्रकार एक महायुग, जिसको चतुर्युगी भी कहते हैं, कलियुग से १० गुना अर्थात् ४३२०००० वर्ष का माना जाता है. ऐसे ७१ महायुग का एक मन्वंतर कहलाता है. १४ मन्वंतर और ६ महायुग अर्थात् १००० महायुग (=४३२००००००० वर्ष) को एक कल्प या ब्रह्मा का दिन कहते हैं और उतने ही वर्षों की रात्री भी मानी गई है.

c31.s2.9

४ अष्टाचत्वारिंशदधिकत्रिशतो[त्त]रेषु चतुःसहस्रेषु कलियुगसंवत्सरेषु परावृत्तेषु सत्सु । स्वराज्यस्यानुभवकाले पंचमे साधारणसंवत्सरे (गोवा के कदंबवंशी राजा शिवचित्त [षष्ठदेव दूसरे] के समय के दानपत्र से. इं. ऐं; जि. १४, पृ. २६०).

c31.s2.10

५ त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः [।] सप्ताब्दशतयुक्तेषु श(ग)तेष्वब्देषु पंचसु [।।] पंचाशत्सु कलौ काले षट्सु पंचशतासु च [।] समासु समतीतासु शकानामापि भूभुजाम् (ऐं. इं.; जि. ६, पृ. ७).

c31.s2.11

प्रारंभ कृष्ण के स्वर्गारोहण१ से अर्थात् भारत के युद्ध के पीछे माना है परंतु उसको पिछले विद्वानों ने स्वीकार नहीं किया. वराहमिहिर लिखता है कि युधिष्ठिर के राज्यसमय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर थे और उस राजा का शककाल ( संवत् ) २५२६ वर्ष रहा२ अर्थात् उसके संवत् के २५२६ वर्ष बीतने पर शक संवत् चला. इससे महाभारत के युद्ध का द्वापर के अंत में नहीं किंतु कलियुग संवत् के (३१७६-२५२६= ) ६५३ वर्ष व्यतीत होने पर होना मानना पड़ता है. कल्हण पंडित कश्मीर के राजाओं के राज्यसमय के विषय में लिखते हुए कहता है कि ‘द्वापर के अंत में भारत [ युद्ध ] हुआ इस दंतकथा से विमोहित हो कर कितने एक [ विद्वानों ] ने इन राजाओं का राज्यकाल गलत मान लिया है.......जब कलि के ६५३ वर्ष व्यतीत हुए तब कुरुपांडव हुए३’ अर्थात् भारत का युद्ध हुआ. यह कथन वराहमिहिर के उपर्युक्त कथन के अनुसार ही है.

c31.s2.12

पुराणों में परीक्षित के जन्म४ ( महाभारत के युद्ध ) से लगा कर महापद्म ( नंद ) के राज्याभिषेक तक १०५०५ वर्ष होना भी लिखा मिलता है. महापद्म (नंद) के वंश का राज्य १०० वर्ष तक रहा जिसके पीछे मौर्य चंद्रगुप्त ने राज्य पाया. चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक ई. स. पूर्व ३२१ के आसपास होना निश्चित है अतएव पुराणों के उपर्युक्त कथनानुसार भारत युद्ध का ई. स. पूर्व ( ३२१+१००+१०५०= ) १४७१ के आस पास होना मानना पड़ता है. पुराणों में दी हुई भारत के युद्ध से लगा कर महापद्म ( नंद ) तक की वंशावलियों में मिलनेवाली राजाओं की संख्या६ देखते हुए भी यह समय ठीक प्रतीत होता है.

c31.s2.13

१ यदैव भगवद्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज । वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैव कलिरागतः ( विष्णु पुराण, अंश ४, अध्याय २४, श्लोक ५४). विष्णोर्भगवतो भानुः कृष्णाख्योऽसौ दिवं गतः । तदा विशत्कलिर्लोकं पाप यद्रमते जनः ( भागवत, स्कंध १२, अध्याय २, श्लोक २६. ) महाभारत से पाया जाता है कि पांडवों ने विजयी होने के बाद १५ वर्ष तक तो राजा ( धृतराष्ट्र ) की आज्ञा के अनुसार सब कार्य किया. फिर भीम के वाग्बाण से खिन्न हो कर राजा विरक्त हुआ तब युधिष्ठिर स्वतंत्र राजा बना. फिर ३६ वें वर्ष कृष्ण और यादवों के स्वर्गवास की खबर आई तब परीक्षित को राज्यसिंहासन पर बिठला कर पांडवों ने द्रौपदी सहित महाप्रस्थान किया’ ( इं. पं; जि. ४०, पृ. १६३-६४ ). इस हिसाब से तो कृष्ण का स्वर्गारोहण, पांडवों का महाप्रस्थान, एवं पुराणों का कलियुग का प्रारंभ भारतयुद्ध से ( १५+३६= ) ५१ वर्ष बाद होना चाहिये.

c31.s2.14

२ आसन्मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्द्विकपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्यस्य ( वाराही संहिता, सप्तर्षिचार, श्लोक ३ ).

c31.s2.15

३ भारतं द्वापरान्तेऽभूद्वार्तेयेति विमोहिताः । केचिदेतां मृषा तेषां कालसङ्ख्यां प्रचक्रिरे ॥ ४८ ॥....॥ शतेषु षट्सु सार्द्वेषु त्र्यधिकेषु च भूतले । कलेर्गतेषु वर्षाणामभवन्कुरुपाण्डवाः ॥ ५१ ॥ ( राजतरंगिणी, तरंग १ ).

c31.s2.16

४ भारत का युद्ध हुआ उस समय परीक्षित गर्भ में था इसलिये उसका जन्म भारत के युद्ध की समाप्ति से कुछ ही महीनों बाद हुआ होगा.

c31.s2.17

५ महापद्माभिषेकात्तु यावज्जन्म परीक्षितः । एवं वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पंचाशदुत्तरं ( मत्स्यपुराण, अध्याय २७३, श्लोक ३६. वायुपुराण, अ. ६६, श्लो. ४१५. ब्रह्मांडपुराण, मध्यम भाग, उपोद्घात पाद ३, अ. ७४, श्लो. २२७ ). यावत्परीक्षितो जन्म यावन्नंदाभिषेचनम् । एतद्वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पंचदशोत्तरं ( विष्णुपुराण, अंश ४, अ. २४, श्लो. ३२ ). आरभ्य भवतो जन्म यावन्नंदाभिषेचनम् । एतद्वर्षसहस्रं तु शतं पंचदशोत्तरम् ( भागवत, स्कंध १२, अ. २, श्लो. २६ ). इस प्रकार परीक्षित के जन्म से लगा कर महापद्म (नंद) के राज्याभिषेक तक के वर्षों की संख्या मत्स्य, वायु और ब्रह्मांडपुराण में १०५०, विष्णु में १०१५ और भागवत में १११५ दी है. अधिकतर पुराणों में १०५० ही है जिसको हमने स्वीकार किया है.

c31.s2.18

६ चंद्रवंशी अजमीढ के पुत्र ऋक्ष का वंशज और जरासंध का पुत्र सहदेव भारत के युद्ध में मारा गया. फिर उसका पुत्र ( या उत्तराधिकारी ) सोमाधि ( सोमापि ) गिरिव्रज का राजा हुआ जिसके पीछे २१ और राजा हुए. ये २२* राजा वृहद्रथवंशी कहलाये. इस वंश के अंतिम राजा रिपुंजय को मार कर उसके मंत्री शौनक ( पुलिक ) ने अपने पुत्र प्रद्योत को राजा बनाया. प्रद्योत के वंश में ५ राजा हुए जिनके पीछे शिशुनाग वंश के १० राजा हुए. जिनमें से १०वें राजा महानंदी का
* ब्रह्मांडपुराण में बृहद्रथवंशी राजाओं की संख्या २२ और मत्स्य तथा वायु में ३२ दी है. विष्णु और भागवत में संख्या नहीं दी. किसी पुराण में २२ से अधिक राजाओं की नामावली नहीं मिलती इसीसे हमने बृहद्रथवंशी राजाओं की संख्या २२ मानी है. पुत्र महापद्म (नंद) था. इस गणना के अनुसार महाभारत के युद्ध से लगा कर महापद्म की गद्दीनशीनी तक ३७ राजा होते हैं जिनके लिये १०५० वर्ष का समय कम नहीं किंतु अधिक ही है क्योंकि औसत हिसाब से प्रत्येक राजा का राजत्व-काल २८ वर्ष से कुछ अधिक ही आता है.

c31.s2.19

'भारत युद्ध के समयसंबंधी ऊपर उद्धृत किये हुए भिन्न भिन्न मतों पर से यही कहा जा सकता है कि पहिले के कितने एक लेखकों ने कलियुग संवत्‌ और भारतयुद्ध संवत्‌ को एक माना है परंतु भारत का युद्ध कलियुग के प्रारंभ में नहीं हुआ.

३—वीरनिर्वाण संवत्‌

c31.s3.1

जैनों के अंतिम तीर्थंकर महावीर (वीर, वर्द्धमान) के निर्वाण (मोक्ष) से जो संवत्‌ माना जाता है उसको 'वीरनिर्वाण संवत्‌' कहते हैं. उसका प्रचार बहुधा जैन ग्रंथों में मिलता है तो भी कभी कभी उसमें दिये हुए वर्ष शिलालेखों में भी मिल आते हैं.

c31.s3.2

(अ) श्वेतांबर मेरुतुंगसूरि ने अपने 'विचारश्रेणि' नामक पुस्तक में वीरनिर्वाण संवत्‌ और विक्रम संवत्‌ के बीच का अंतर ४७० दिया है१. इस हिसाब से विक्रम संवत्‌ में ४७०, शक संवत्‌ में ६०५ और ई. स. में ५२७ मिलाने से वीरनिर्वाण संवत्‌ आता है.

c31.s3.3

(आ) श्वेतांबर अंबदेव उपाध्याय के शिष्य नेमिचंद्राचार्य रचित 'महावीरचरियं' नामक प्राकृत काव्य में लिखा है कि 'मेरे (महावीर के) निर्वाण से ६०५ वर्ष और ५ महीने बीतने पर शक्क राजा उत्पन्न होगा२. इससे भी वीरनिर्वाण संवत्‌ और शक संवत्‌ के बीच ठीक वही अंतर आता है जो ऊपर लिखा गया है.

c31.s3.4

२ छंहिं वासाणासएहिं पंचहिं वासेहिं पंचमासेहिं। मम निव्वुागयस्स उ उप्पज्जिस्सइ सगो राया॥ (महावीरचरियं). यह पुस्तक वि. सं. ११४१ (ई. स. १०८४) में बना था.

c31.s3.5

(इ) दिगंबर संप्रदाय के नेमिचंद्र रचित 'त्रिलोकसार' नामक पुस्तक में भी वीरनिर्वाण से ६०५ वर्ष और ५ महीने बाद शक राजा का होना लिखा है३. इससे पाया जाता है कि दिगंबर संप्रदाय के जैनों में भी पहिले वीरनिर्वाण और शक संवत्‌ के बीच ६०५ वर्ष का अंतर होना स्वीकार किया जाता था जैसा कि श्वेतांबर संप्रदायवाले मानते हैं, परंतु 'त्रिलोकसार' के टीकाकार माधवचंद्र ने त्रिलोकसार में लिखे हुए 'शक' राजा को भूल से 'विक्रम'४ मान लिया जिससे कितने एक पिछले दिगंबर जैन लेखकों ने विक्रम संवत्‌ से ६०५५ (शक संवत्‌ से ७४०) वर्ष पूर्व वीरनिर्वाण होना मान लिया जो ठीक नहीं है. दिगंबर जैन लेखकों ने कहीं शक संवत्‌ से ४६१, कहीं ६७६५ और कहीं १४७६३६ वर्ष पूर्व वीरनिर्वाण होना भी लिखा है परंतु ये मत स्वीकार योग्य नहीं हैं.

c31.s3.6

१ विक्रमरज्जारंभा परउ सिरिवीरनिव्वुई भणिया। सुन्न मुणिवेयजुत्तो विक्कमकालउ जिणकालो॥ विक्रमकालाज्जिनस्य वीरस्य कालो जिनकालः शून्यमुनिवेदयुक्तः चत्वारिशतानि सप्तत्यधिकवर्षाणि श्रीमन्महावीरविक्रमादित्ययोरंतरमित्यर्थः (विचारश्रेणि). यह पुस्तक ई. स. १३१० के आस पास बना था.

c31.s3.7

३ पणछस्सयवस्सं पणमासजुदं गमिअ वीरनिव्वुइदो सगराजो० (त्रिलोकसार, श्लो. ८४८). यह पुस्तक वि. सं. की ११ वीं शताब्दी में बना था. हरिवंशपुराण में भी वीरनिर्वाण से ६०५ वर्ष बीतने पर शक राजा का होना लिखा है और मेघर्नदि के श्रावकाचार में भी ऐसा ही लिखा है (इं. ऐं; जि. १२ पृ. २२).

c31.s3.8

४ श्रीवीरनाथनिर्वृत्तेः सकाशात्‌ पंचोत्तरषट्छतवर्षाणि पञ्चमासयुतानि गत्वा पश्चात्‌ विक्रमाङ्क शकराजोऽजायत (त्रिलोकसार के उपर्युक्त श्लोक की टीका).

c31.s3.9

५ दिगंबर जैनों के प्रसिद्ध तीर्थस्थान श्रवणबेल्गोला के एक लेख में वर्धमान(वीर) निर्वाण संवत्‌ २४६३ में विक्रम संवत्‌ १८८८ और शक संवत्‌ १७५२ होना लिखा है जिसमें वीरनिर्वाण संवत्‌ और विक्रम संवत्‌ का अंतर ६०५ आता है (इं. ऐं; जि. २४, पृ. ३४६). इस अशुद्धि का कारण माधवचंद्र की अशुद्ध गणना का अनुसरण करना ही हो.

c31.s3.10

६ वीरजिणं सिद्धिगदे चउसदइगिसिढिवासपरिमाणो। कालंमि अदिक्कते उप्पण्णो एत्थ सगराओ॥ अथवा वीरे सिद्धे सहस्साणवक्कंमि सग(त)सयभहिये। पणासीदिंमि चेतादे पणमासे सगसिओ जादा (पाठान्तरं)॥ चोद्दससहस्ससग(त)सयतेणउदीवासकालविच्छेदे। वीरेसर- सिद्धीवो उप्पणणो सगणिग्रो अहवा (पाठान्तरं) ।। (त्रिलोकप्रज्ञप्ति—देखो, 'जैनहितैषी मासिक पत्र', भाग १३, अंक १२, दिसंबर १९१७, पृ. ५३३).

४—बुद्धनिर्वाण संवत्

c31.s4.1

बौद्धों में बुद्ध (शाक्यमुनि) के निर्वाण से जो संवत् माना जाता है उसको 'बुद्धनिर्वाण संवत्' कहते हैं. यह बौद्ध ग्रंथों में लिखा मिलता है और कभी कभी शिलालेखों१ में भी. बुद्ध का निर्वाण किस वर्ष में हुआ इसका यथार्थ निर्णय अब तक नहीं हुआ. सीलोन२ (सिंहलद्वीप, लंका), ब्रह्मा और स्याम में बुद्ध का निर्वाण ई. स. से ५४४ वर्ष पूर्व होना माना जाता है और ऐसा ही आसाम के राजगुरु मानते हैं३. चीनवाले ई. स. पूर्व ६३८ में उसका होना मानते हैं४. चीनी यात्री फाहियान ने, जो ई. स. ४०० में यहां आया था, लिखा है कि इस समय तक निर्वाण से १४६७ वर्ष व्यतीत हुए हैं५. इससे बुद्ध के निर्वाण का समय ई. स. पूर्व (१४६७-४००=) १०६७ के आस पास मानना पड़ता है. चीनी यात्री हुएन्त्संग ने निर्वाण से १०० वें वर्ष में राजा अशोक (ई. स. पूर्व २६६ से २२७ तक) का राज्य दूर दूर फैलना बतलाया है६ जिससे निर्वाणकाल ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी के बीच आता है. डॉ. बूलर ने ई. स. पूर्व ४८३-२ और ४७२-१ के बीच७, प्रोफेसर कर्न८ ने ई. स. पूर्व ३८८ में, फग्र्सन९ ने ४८१ में, जनरल कनिंगहाम् ने१० ४७८ में, मैक्समूलर११ ने ४७७ में, पंडित भगवानलाल इंद्रजी ने१२ ६३८ में (गया के लेख के आधार पर), मिस़ डफ़ने१३ ४७७ में, डॉ. बार्नेट ने१४ ४८३ में, डॉ. फ्लीट ने१५ ४८२ में और वी. ए. स्मिथ१६ ने ई. स. पूर्व ४८७ या ४८६ में निर्वाण होना अनुमान किया है. बुद्धनिर्वाण संवत्वाले अधिक लेख न मिलने तथा विद्वानों में इसके प्रारंभ के विषय में मतभेद होने पर भी अभी तो इसका प्रारंभ ई. स. पूर्व ४८७ के आस पास होना स्वीकार करना ठीक जंचता है, परंतु वही निश्चित है ऐसा नहीं कहा जा सकता.

c31.s4.2

२ कॉर्पस् इन्स्क्रिप्शनम् इंडिकेरम् (जनरल् कनिंगहाम संपादित), जि. १, भूमिका, पृ. ३.

c31.s4.3

३ प्रिं; पॅँ; जि. २, यूसफुल् टेबल्स, पृ. १६५.

c31.s4.4

४ वी; यु. रे. वे. व; जि. १ की भूमिका, पृ. ७५.

c31.s4.5

७ साइक्लोपीडिआ ऑफ़ इंडिया, जि. १, पृ. ४६२.

c31.s4.6

८ कॉर्पस् इन्स्क्रिप्शनम् इंडिकेरम् जि. १ की भूमिका, पृ. ६.

c31.s4.7

९ मॅ; हि. ए. सं. लि; पृ. २६८.

c31.s4.8

१० इं. पॅँ; जि. १०, पृ. ३४६.

c31.s4.9

११ ड; क्रॉ. इं; पृ. ६.

c31.s4.10

१२ बा; पॅ. इं; पृ. ३७.

c31.s4.11

१३ ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १८०६, पृ. ६६७.

c31.s4.12

१४ स्मि; अ. हि. इं; पृ. ४७ (तीसरा संस्करण).

५—मौर्य संवत्

c31.s5.1

उदयगिरि (उड़ीसे में कटक के निकट) की हाथी गुंफा में जैन राजा खारवेल (महामेघवाहन) का एक लेख है जो मौर्य संवत् (मुरियकाल) १६५ का है१५. उक्त लेख को छोड़ कर और कहीं

c31.s5.2

१ भगवति परिनिर्वृते संवत् १८१३ कार्तिकवदि १ बुधे (गया का लेख. इं. पॅँ; जि. १०, पृ. ३४३).

c31.s5.3

५ बी; यु. रे. वे. व; जि. १, पृ. १५०.

c31.s5.4

६ इं. पॅँ; जि. ६, पृ. १४५.

c31.s5.5

१५ पनंतारियसठिवससते राजमुरियकाले वोछिन्ने च चोयठअग्रसतिकतुरियं (पंडित भगवानलाल इंद्रजो संपादित 'दी हाथी गुफ़ा ऐंड थ्री अदर इन्स्क्रिप्शन्स'). डॉक्टर स्ट्रेन कॉनो ने ई. स. १९०५-६ की आर्किआलाजिकल सर्वे की रिपोर्ट में लिखा है कि 'इस वर्ष कलिंग के राजा खारवेल के प्रसिद्ध हाथी गुंफा के लेख की नकल (प्रतिकृति) तय्यार की गई... वह लेख मौर्य संवत १६५ का है' (पृ. १६६). उक्त पुस्तक की समालोचना करते हुए डॉक्टर फ्लीट ने उक्त लेख के संवत संबंधी अंश के विषय में लिखा कि 'उक्त लेख में कोई संवत् नहीं है किंतु वह यह बतलाता है कि खारवेल ने कुछ मूल पुस्तक और ६४ वें अध्याय अथवा [जैनों के] सात अंगों के किसी अन्य विभाग का पुनरुद्धार किया, जो मौर्य काल से उच्छिन्न हो रहा था' (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९१०, पृ. २४३-४४). डॉ. फ्लीट के इस कथनानुसार प्रो. लुडर (ऍ. इं; जि. १०, ब्राह्मी लेखों की सूची, पृ. १६१) और वी. ए. स्मिथ ने (स्मि; अ. हि. इं; पृ. २०७, टि. २) उक्त लेख में कोई संवत् न होना मान लिया है, परंतु थोड़े ही समय पूर्व पश्चिमी भारत के आर्किआलॉजिकल् विभाग के विद्वान् सुपरिंटेंडेंट राखाल-दास बैनर्जी ने उक्त लेख को फिर प्रसिद्ध करने के लिये उसकी प्रतिकृति तय्यार कर पढ़ा है. उनके कथन से पाया गया कि उसमें मौर्य संवत् १६५ होना निर्विवाद है. ऐसी दशा में डा. फ्लीट आदि का कथन ठीक नहीं कहा जा सकता.

c31.s5.6

इस संवत् का उल्लेख१ नहीं मिलता. नंद वंश को नष्ट कर राजा चंद्रगुप्त ने ई. स. पूर्व ३२१ के आस पास मौर्य राज्य की स्थापना की थी अत एव अनुमान होता है कि यह संवत् उसी घटना से चला हो. यदि यह अनुमान ठीक हो तो इस संवत् का प्रारंभ ई. स. पूर्व ३२१ के आस पास होना चाहिये.

६—सेल्यकिडि संवत्

c31.s6.1

ई. स. पूर्व ३२३ में यूनान के बादशाह सिकंदर (अलेक्ज़ैंडर) का देहांत होने पर उसके सेनापति राज्य के लिये आपस में लड़ते रहे. अंत में तीन राज्य मकदूनिया (मसिडोनिया, ग्रीस में), मिसर और सीरिया (बाबीलन्) कायम हुए. सीरिया का स्वामी सेल्युकस् निकाटोर बना जिसके अधीन बाक्ट्रिया आदि एशिया के पूर्वी देश भी रहे. सेल्युकस् के राज्य पाने के समय अर्थात् ता. १ अक्टोबर ई. स. पूर्व ३१२ से उसका संवत् (सन्) चला जो बाक्ट्रिया में भी प्रचलित हुआ. हिंदुस्तान के काबुल तथा पंजाब आदि हिस्सों पर बाक्ट्रिया के ग्रीकों (यूनानियों) का आधिपत्य होने के बाद उक्त संवत् का प्रचार भारतवर्ष के उन हिस्सों में कुछ कुछ हुआ हो यह संभव है. यद्यपि अब तक कोई ऐसा लेख नहीं मिला कि जिसमें इस संवत् का लिखा जाना निश्चयात्मक माना जा सके तो भी इस संवत् के साथ लिखे जानेवाले मसीडोनियन् (यूनानी) महीने२ शक तथा कुशन वंशियों के समय के कितने एक खरोष्ठी लेखों में मिल आते हैं. जिन लेखों में ये विदेशी महीने मिले हैं वे विदेशियों के खुदवाये हुए हैं. उनमें दिये हुए वर्ष किस संवत् के हैं इसका अब तक ठीक निर्णय नहीं हुआ तो भी संभव है कि जो लोग विदेशी मसीडोनियन् (यूनानी) महीने लिखते थे वे संवत् भी विदेशी ही लिखते होंगे चाहे वह सेल्युकिडि (शताब्दियों के अंकसहित), पार्थियन्३ या कोई अन्य (शक) संवत् हो.

c31.s6.2

२ मसीडोनियन् महीनों के नाम क्रमशः हाइपर्बेरेटिअस् (Hyperberetæus), डिअस् (Dius), ऍपेल्लिअस् (Apellæus), ॲडिनिअस् (Audynæus), पेरिटिअस् (Peritius), डिस्टुस् (Dystrus), ज़ैंथिकस् (Xanthicus), आर्टेमिसिअस् (Artemisius), डेसिअस् (Dæsius), पनेमस् (Panemus), लोअस् (Lous) और गॉर्पिण्अस् (Gorpiæus) हैं. इनमें से पहिला हाइपर्बेरेटिअस् अंग्रेज़ी ऑक्टोबर के और अंतिम गॉर्पिण्अस् सप्टेंबर के स्थानापन्न है. अब तक इन मसीडोनियन् महीनों में से ४ महीने—ऍपेल्लिअस् (क; ई. इं; पृ. ४१), आर्टेमिसिअस् (हुविष्क के समय के सं. ५१ के वर्डक से मिले हुए पात्र पर के लेख में; पँ. इं; जि. ११, पृ. २१०), डेसिअस् (दशिसिक, कनिष्क के समय के सं. ११ के सुएविहार के ताम्रलेख में; इं. ऐं; जि. १०, पृ. ३२६; जि. ११, पृ. १२८) और पनेमस् (क्षत्रप पतिक के तक्षशिला से मिले हुए सं. ७८ के ताम्रलेख में; पँ. इं; जि. ४, पृ. ५५)—लेखों में मिले हैं.

c31.s6.3

३ पार्थियन् संवत् का प्रारंभ ई. स. पूर्व २४७ के मध्य के आस पास होना माना जाता है (क; ई. इं; पृ. ४६).

७—विक्रम संवत्

c31.s7.1

**विक्रम संवत् को मालव संवत् (मालव काल४) भी कहते हैं.** इसके संबंध में यह प्रसिद्धि चली आती है कि मालवा के राजा विक्रम या विक्रमादित्य ने शकों का पराजय कर अपने नाम का संवत् चलाया. धौलपुर से मिले हुए चाहमान (चौहान) चंडमहासेन के विक्रम संवत् ८६८ (ई. स. ८४१)

c31.s7.2

१ लोरियन् तंगाई (स्वात ज़िले में) से मिली हुई बुद्ध की मूर्ति के आसन पर खुदे हुए सं. ३१८ के खरोष्ठी लेख (सं ३१८ प्रोठवदस दि २७....श्रा. स. रि; ई. स. १६०३-४, पृ. २५१) तथा हश्तनगर (पुष्कलावती) से मिली हुई बुद्ध की (अपने शिष्यों सहित) मूर्ति के आसन पर खुदे सं. ३८४ (सं ३८४ प्रोठवदस मसस दिवसमि पंचमि ५—पं. इं; जि. १२, पृ. ३०२) के लेख में दिया हुआ संवत् कौनसा है यह अनिश्चित है. संभव है कि उनका संवत् मौर्य संवत् हो.

c31.s7.3

४ मालवालाणांस्तरदां षट्विंशत्संयुतेष्वतीतेषु नवसु शतेषु (ग्यारिसपुर का लेख; क; श्रा. स. रि; जि. १०, प्लेट ११).

c31.s7.4

के शिलालेख में पहिले पहिल१ इस संवत् के साथ विक्रम का नाम जुड़ा हुआ मिलता है२. उसके पहिले के अब तक के मिले हुए लेखों में विक्रम का नाम तो नहीं मिलता किंतु संवत् नीचे लिखे अनुसार भिन्न भिन्न रीति से दिया हुआ मिलता है—

c31.s7.5

(१) मंदसौर से मिले हुए नरवर्मन् के समय के लेख में—‘श्रीर्म्मालवगणाम्नाते प्रशस्ते कृतसंज्ञिते [।] एकषष्ट्यधिके प्राप्ते समाशतचतुष्टये [॥] प्रावृक्का(ट्का)ले शुभे प्राप्ते’३, अर्थात् ‘मालवगण के प्रचलित किये हुए प्रशस्त कृत संज्ञावाले ४६१ वें वर्ष के लगने पर वर्षा ऋतु में’.

c31.s7.6

(२) राजपूताना म्यूज़ियम् (अजमेर) में रक्खे हुए नगरी (मध्यमिका, उदयपुर राज्य में) के शिलालेख में—‘कृतेषु चतुर्षु वर्षशतेष्वेकाशीत्युत्तरेष्वस्यां मालवपूर्व्वायां [४००] ८० १ कार्त्तिकशुक्लपञ्चम्याम्’, अर्थात् ‘कृत [नामक] ४८१ [वें] वर्ष (संवत्) में इस मालवपूर्वा कार्तिक शुक्ला पंचमी के दिन’.

c31.s7.7

(३) मंदसौर से मिले हुए कुमारगुप्त (प्रथम) के समय के शिलालेख में—‘मालवानां गणस्थित्या याते शतचतुष्टये । त्रिनवत्यधिकेब्दान्ध्रि(मृ)तौ सेव्यघनस्तने ॥ सहस्यमासशुक्लस्य प्रशस्तेन्हि त्रयोदशे’४, अर्थात् ‘मालवों के गण (जाति) की स्थिति से ४९३ वर्ष बीतने पर पौष शुक्ल १३ को.’

c31.s7.8

३ पं. इं; जि. १२, पृ. ३२०.

c31.s7.9

(४) मंदसौर से मिले हुए यशोधर्मन् (विष्णुवर्द्धन) के समय के शिलालेख में—‘पञ्चसु शतेषु शरदां यातेष्वेकान्नवतिसहितेषु । मालवगणस्थितिवशात्कालज्ञानाय लिखितेषु’५ अर्थात् ‘मालव गण (जाति) की स्थिति के वश से कालज्ञान के लिये लिखे हुए ५८६ वर्षों के बीतने पर’.

c31.s7.10

४ फ़्ली; गु. इं; पृ. ८३.

c31.s7.11

(५) कोटा के पास के कणस्वा के शिव मंदिर में लगे हुए शिलालेख में—‘संवत्सरशतैर्यातैः सपञ्चनवत्यर्गलैः [।] सप्तभिर्म्मालवेशानां’६, अर्थात् ‘मालवा या मालव जाति के राजाओं (राजा)७ के ७९५ वर्ष बीतने पर’.

c31.s7.12

५ फ़्ली; गु. इं; पृ. १५४.

c31.s7.13

६ इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५६.

c31.s7.14

७ मैनालगढ़ (उदयपुर राज्य में) से मिले हुए अजमेर के चौहान राजा पृथ्वीराज (पृथ्वीभट) के समय के लेख के संवत् १२२६ को मालवा के राजा का संवत् कहा है (मालवेशगतवत्सर(रैः) शतैः द्वादशैश्च षट्(ड्)विंशपूर्वकैः) (ज. ए. सो; बंगा. जि. ५५, भाग १, पृ. ४६).

c31.s7.15

इन सब अवतरणों से यही पाया जाता है कि—

c31.s7.16

(अ) मालव गण (जाति) अथवा मालव (मालवा) के राज्य या राजा की स्वतंत्र स्थापना के समय से इस संवत् का प्रारंभ होता था.

c31.s7.17

(आ) अवतरण १ और २ में दिये हुए वर्षों की संज्ञा ‘कृत’८ भी थी.

c31.s7.18

१ धिनिकि गांव (काठियावाड़) से मिले हुए दानपत्र में विक्रम संवत् ७६४ कार्तिक कृष्णा अमावास्या, आदित्यवार, ज्येष्ठा नक्षत्र और सूर्यग्रहण लिखा है (इं. ऐं; जि. १२, पृ. १५५) परंतु उक्त तिथि को आदित्यवार, ज्येष्ठा नक्षत्र और सूर्यग्रहण न होने, और उसकी लिपि इतनी प्राचीन न होने से डॉ. फ़्लीट और कीलहॉर्न ने उसको जाली ठहराया है.

c31.s7.19

२ वसु नव [अ]ष्टौ वर्षा गतस्य कालस्य विक्रमाख्यस्य [।] वैशाखस्य सिताया (यां) रविवारयुतद्वितीयायां (इं. ऐं; जि. १६, पृ. ३५.)

c31.s7.20

८ संवत् के साथ ‘कृत’ शब्द अब तक केवल ४ शिलालेखों में मिला है. डॉ. फ़्लीट ने इसका अर्थ ‘गत’ अर्थात् गुज़रे हुए [वर्ष] अनुमान किया था परंतु गंगधार के शिलालेख में ‘कृतेषु’ और ‘यातेषु’ (=गत) दोनों शब्द होने से इस अनुमान को ठीक न माना. मंदसौर के लेख में ‘कृतसंज्ञिते’ लिखा है (देखो, ऊपर अवतरण १) उसमें ‘कृत’ वर्ष का नाम होना पाया जाता है. जैसे प्राचीन लेखों में १२ वर्ष (महाचैत्रादि) और ६० वर्ष (प्रभवादि) के दो भिन्न भिन्न बार्हस्पत्यमान (चक्र) मिलते हैं वैसे ही वैदिक काल में ४ वर्ष का एक युगमान (चक्र) भी था (देखो, आर. शामशास्त्री का ‘गवामयन’ पृ. ३, १३८). इस युगमान के वर्षों के नाम वैदिक काल के जुए के पासों की नांई (देखो, ऊपर पृ. २१ और उसी के टिप्पण ३-५) कृत, त्रेता, द्वापर और कलि थे, और उनकी रीति के विषय में यह अनुमान होता है कि जिस गत वर्ष में ४ का भाग देने से कुछ न बचे उस वर्ष की ‘कृत’, ३ बचे उसकी ‘त्रेता’, २ बचे उसकी ‘द्वापर’, और १ बचे उसकी ‘कलि’ संज्ञा होती हो. जैनों के ‘भगवतीसूत्र’ में युगमान का ऐसा ही उल्लेख मिलता है. उसमें लिखा है कि ‘जुग चार हैं कयजुम्म (कृत), दोज (त्रेता), दावरजुम्म (द्वापर) और कलिजुग (कलि). जिस संख्या

c31.s7.21

(इ) इसकी मासपक्षयुक्त तिथिगणना भी **‘मालवपूर्वा’**, अर्थात् मालवे (या मालवों) की गणना१ के अनुसार की, कहलाती थी.

c31.s7.22

जयपुर राज्य के नगर (कर्कोट्क नगर) से कुछ सिक्के ऐसे मिले हैं जिन पर **‘मालवानं(नां) जय(य:)’**२ लेख होना बतलाया जाता है. उनकी लिपि ई. स. पूर्व २५० से लगा कर ई. स. २५० के बीच की अर्थात् विक्रम संवत् के प्रारंभ के आस पास की मानी गई है. इन सिक्कों से अनुमान होता है कि मालव जाति के लोगों ने जय प्राप्त करके उसकी यादगार में ये सिक्के चलाये हों. समुद्रगुप्त ने मालव जाति को अपने अधीन किया था३. इससे भी यह अनुमान होता है कि मालवों का उपर्युक्त विजय गुप्तों से पूर्व ही हुआ था. यह भी संभव है कि मालव जाति के लोगों ने अवंति देश को जीत कर अपना राज्य वहां जमाया हो और उसीसे वह देश पीछे से मालव (मालवा) कहलाया हो एवं वहां पर मालव जाति का राज्य स्थिर होने के समय से प्रचलित होने के कारण यह संवत् **‘मालवकाल’** या **‘मालव संवत्’** कहलाया हो.

c31.s7.23

कुछ विद्वानों का मत यह है कि इस संवत् का नाम वास्तव में **‘मालव संवत्’** ही था परंतु पीछे से गुप्त वंश के राजा चंद्रगुप्त (दूसरे) का, जिसके विरुद **‘विक्रम’** और **‘विक्रमादित्य’** आदि४ मिलते हैं, नाम इस संवत् के साथ जुड़ जाने से इसका नाम **‘विक्रम संवत्’** हो गया हो. यह कल्पना तभी ठीक कही जा सकती है जब इतिहास से यह सिद्ध हो जावे कि चंद्रगुप्त (दूसरे) के पहिले विक्रम नाम का कोई प्रसिद्ध राजा नहीं हुआ, परंतु हाल (सातवाहन, शालिवाहन) की **‘गाथासप्तशती’** से यह पाया जाता है कि उस पुस्तक के संगृहीत होने के पूर्व विक्रम नामका प्रसिद्ध राजा हुआ था५. हाल का समय ई. स.

c31.s7.24

५ संवाहणसुहरसतोसिएण देन्तेण तुह करे लक्खं । चलणेण विक्कमाइज्चचरियमणुसिक्खियं तिस्सा (गाथा ४६४, वेबर का संस्करण). इस गाथा में विक्रमादित्य की दानशीलता की प्रशंसा है.

c31.s7.25

में ४ का भाग देने से ४ बचे (अर्थात् कुछ न बचे) उसका नाम कृत, ३ बचे उसका त्रेता, २ बचे उसका द्वापर और १ बचे उसका कलि है’[^asterisk]. यह युगमान जिन ४ लेखों में 'कृत' संज्ञा का प्रयोग हुआ है नीचे लिखे अनुसार ठीक घट जाता है—

c31.s7.26

(१) विजयमंदिरगढ़ (बयाना) के लेख के वर्ष ४२८dagger को गत[^ddagger] मान कर ४ का भाग देने से कुछ नहीं बचता इससे उसका नाम ‘कृत’ हुआ.
(२) मंदसौर के वर्ष ४६१ को वर्तमान ('प्राप्ते') कहा ही है इस लिये गत वर्ष ४६० है जो 'कृत' ही है.
(३) गंगधार (झालावाड़ राज्य में) के लेख[^section] के वर्ष ४८० को गत ही लिखा है जिससे वह ‘कृत’ ही है.
(४) नगरी के लेख के वर्ष ४८१ को वर्तमान मानें तो गत ४८० होता है जो ‘कृत’ ही है.

c31.s7.27

१ संभव है कि मालवे की गणना चैत्रादि पूर्णिमांत हो.

c31.s7.28

२ क; आ. स. रि; जि. ६, पृ. १८२.

c31.s7.29

३ फ्ली; गु. इं; पृ. ८.

c31.s7.30

४ चंद्रगुप्त (दूसरे) के सिक्कों पर एक तरफ़ उस राजा के नामवाले लेख और दूसरी ओर 'श्रीविक्रमः', 'विक्रमादित्यः', सिंहविक्रमः', ‘अजितविक्रमः' आदि उसीके विरुद्धसूचक लेख हैं (जॉन ऍलन संपादित, गुप्तों के सिक्कों की सूचि.)

c31.s7.31

dagger † कृतेषु चतुर्षु वर्षशतेष्वष्टाविंशेषु ४०० २० ८ फाल्गुण(न)बहुलस्य पञ्चदश्यामेतस्यां पूर्व्वायाँ (फ्ली; गु. इं; पृ. २५३). [^ddagger]: ‡ शिलालेखादि में विक्रम संवत् के वर्ष बहुधा गत लिखे जाते हैं (ऍ. इं; जि. १, पृ. ४०६) वर्तमान बहुत कम. जब कभी वर्तमान वर्ष लिखा जाता है तब एक वर्ष अधिक लिखा रहता है. [^section]: § यातेषु चतुर्षु कि(कृ)तेषु शतेषु सोस्ये(म्ये)ध्या(ष्ट्रा)शीतसोत्तरपदेष्विह वत्स[रेषु]। शुक्ले त्रयोदशदिने भुवि कार्त्तिकस्य मासस्य सर्व्वजनचित्तसुखावहस्य || (फ्ली; गु. इं; पृ. ७४). प्राचीन होना प्रकट करता है इस लिये दंडी और गुणाढ्य दोनों छठी शताब्दी में हुए ऐसा वेबर पंडित ने किस आधार पर माना यह मालूम नहीं होता. अथवा प्रायः यूरोपियन् विद्वानों का यह स्वभाव ही है कि भारतवर्ष के प्राचीनतम ग्रंथों एवं उनके रचयिताओं को अर्वाचीन सिद्ध करने का जहां तक हो सके वे यत्न करते हैं और उनका प्राचीनत्व सिद्ध करने का दृढ प्रमाण मिल भी जावे तो उसको 'प्रक्षिप्त' कह कर अपने को जो अनुकूल हो उसीको आगे करते हैं (अर्थात् ठीक बतलाते हैं) (बंबई के निर्णयसागर प्रेस का छुपा हुआ 'कथासरित्सागर', तीसरा संस्करण, भूमिका, पृ. २).

c31.s7.32

ऐसी दशा में यह कहा जा सकता है कि मालवा और राजपूताने में कृतादि युगगणना की प्राचीन शैली का प्रचार ई. स. की पांचवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध तक बना हुआ था.

c31.s7.33

[^asterisk]: * कतियाणं भंते जुम्मा परुवत्ता ? गोयम चत्तारि जुम्मा परुवत्ता। तं जहा। कयजुम्मं तेयोजे दावरजुम्मे कलिनुगे। से केणट्टेणं भंते ? एवं उच्चति जाव कलिनुगे गोयम ! जेणं रासी चउक्केणं अवहारेणं अवहरिमाणे चउपुज्जववोसिये से तं कयजुम्मे। जेणं रासा चउक्केणं अवहारेणं अवहरिमाणे तिपज्जववोसिये से तं तेयोजे। जेणं रासी चउक्केणं अवहारेणं अवहरिमाणे दुपज्जववोसिये से तं दावरजुम्मे। जेणं राशी चउक्केणं अवहारेणं अवहरिमाणे एकपज्जववोसिये से तं कलिनुगे। से तेणट्टेणं गोयम (१३७२-७२, भगवती सूत्र; 'गवामयन'; पृ. ७२).

c31.s7.34

की दूसरी शताब्दी से इधर का नहीं माना जा सकता. ऐसी दशा में यही मानना पड़ता है कि या

c31.s7.35.1

१० 'गाथासप्तशती' के अंत में सातवाहन को कुंतल देश का राजा, प्रतिष्ठान (पैठण) नगर का अधीश, शतकर्ण (शातकर्णि) उपनामवाला, द्वीपिकर्ण का पुत्र, मलयवती का पति और हालादि उपनामवाला लिखा है (प्रॉ. पीटर्सन की ई. स. १८८४-८६ तक की रिपोर्ट, पृ. ३४६). शिलालेखों में आंध्र (आंध्रभृत्य) वंश के लिये सातवाहन नाम का प्रयोग मिलता है. नानाघाट के लेख में उक्त वंश के मूल पुरुष सिमुक को सातवाहन कहा है और उक्त वंश के राज्य का अंत ई. स. २२५ के आस पास होना (स्मिथ; अ. हि. इं; पृ. २१८ के पास का नक्शा) माना जाता है. ऐसी दशा में 'गाथासप्तशती' का समय उक्त सन से पूर्व का ही होना चाहिये. देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने विक्रम संवत्संबंधी अपने लेख में 'गाथासप्तशती' के राजा विक्रम के विषय में लिखते हुए उक्त पुस्तक के रचनाकाल के संबंध में लिखा है कि 'क्या गाथासप्तशति वास्तव में उतना पुराना ग्रंथ है जितना कि माना जाता है?.......बाण के हर्षचरित के प्रारंभ के १३ वें श्लोक में सातवाहन के द्वारा गीतों के 'कोश' के बनाये जाने का उल्लेख अवश्य है परंतु इस 'कोश' को हाल की सप्तशति मानने के लिये कोई कारण नहीं है जैसा कि प्रॉ. वेबर ने अच्छी तरह बतलाया है. उसी पुस्तक में मिलनेवाले प्रमाण उसकी रचना का समय बहुत पीछे का होना बतलाते हैं. यहां पर केवल दो बातों का विचार किया जाता है. एक तो उस (पुस्तक) में कृष्ण और राधिका का (१। ८६) और दूसरा मंगलवार (३। ६१) का उल्लेख है. राधिका का सब से पुराना उल्लेख जो मुझे मिल सका वह पंचतंत्र में है जो ई. स. की पांचवीं शताब्दी का बना हुआ है. ऐसे ही तिथियों के साथ या सामान्य व्यवहार में वार लिखने की रीति ६ वीं शताब्दी से प्रचलित हुई, यद्यपि उसका सब से पुराना उदाहरण बुधगुप्त के ई. स.

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४८४ के एरण के लेख में मिलता है. यदि हम गाथासप्तशति के हाल का समय छठी शताब्दी का प्रारंभ मानें तो अधिक अनुचित न होगा' (आर. जी. भंडारकर कोम्मेमोरेशन वॉल्यूम, पृ. १८८-८६). हम उक्त विद्वान् के इस कथन से सर्वथा सहमत नहीं हो सकते क्योंकि बाणभट्ट सातवाहन के जिस सुभाषितरूपी उज्ज्वलरत्नों के कोश (संग्रह, खज़ाने) की प्रशंसा करता है (अविनाशिनमग्राम्यमकरोत्सातवाहनः । विशुद्धजातिभिः कोषं रत्नैरिव सुभाषितैः ॥ १३) वह 'गाथासप्तशति' ही है, जिसमें सुभाषित रूपी रत्नों का ही संग्रह है. यह कोई प्रमाण नहीं कि प्रॉ. वेबर ने उसे गाथासप्तशति नहीं माना इस लिये वह उससे भिन्न पुस्तक होना चाहिये. वेबर ने ऐसी ऐसी कई प्रमाणशून्य कल्पनाएं की हैं जो अब मानी नहीं जातीं. प्रसिद्ध विद्वान् डॉक्टर सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने भी वेबर के उक्त कथन के विरुद्ध वाणभट्ट के उपर्युक्त श्लोक का संबंध हाल की सप्तशति से होना ही माना है (बंब. गे; जि. १, भा. २, पृ. १७१). ऐसा ही डॉ० फ़्लीट ने (ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१६, पृ. ८२०) और 'प्रबंधचिंतामणि' के कर्ता मेरुतुंग ने माना है (प्रबंधचिंतामणि, पृ. २६). पांचवीं शताब्दी के बने हुए 'पंचतंत्र' में कृष्ण और राधिका का उल्लेख होना तो उलटा यह सिद्ध करता है कि उस समय कृष्ण और राधिका की कथा लोगों में भलीभांति प्रसिद्ध थी अर्थात् उक्त समय के पहिले से चली आती थी. यदि ऐसा न होता तो पंचतंत्र का कर्ता उसका उल्लेख ही कैसे करता? ऐसे ही तिथियों के साथ या सामान्य व्यवहार में वार लिखने की रीति का ६ वीं शताब्दी में प्रचलित होना बतलाना भी ठीक नहीं हो सकता, क्यों कि कच्छ राज्य के अंधौ गांव से मिले हुए क्षत्रप रुद्रदामन् के समय के [शक] संवत् ५२ (ई. स.

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१३०) के ४ लेखों में से एक लेख में 'गुरुवार' लिखा है (वर्षे द्विपंचाशे ५० २ फागुणाबहुलस द्वितीया वी २ गुरुवास[रे] सिंहलपुत्रस ओपशतस गोत्रस० स्वर्गीय आचार्य वल्लभजी हरिदत्त की तय्यार की हुई उक्त लेख की छाप से) जिससे सिद्ध है कि ई. स. की दूसरी शताब्दी में वार लिखने की रीति परंपरागत प्रचलित थी. राधिका और बुधवार के उल्लेख से ही 'गाथासप्तशति' का छठी शताब्दी में बनना किसी प्रकार सिद्ध नहीं हो सकता. डॉ. सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने भी गाथासप्तशति के कर्त्ता हाल को आंध्रभृत्य वंश के राजाओं में से एक माना है (बंब. गे; जि. १, भा. २, पृ. १७१) जिससे भी उसका आंध्रभृत्य (सातवाहन) वंशियों के राज्यकाल में अर्थात् ई. स. की पहिली या दूसरी शताब्दी में बनना मानना पड़ता है. केवल 'गाथासप्तशति' से ही चंद्रगुप्त (दूसरे) से पूर्व के राजा विक्रम का पता लगता है इतना ही नहीं किंतु राजा सातवाहन (हाल) के समय के महाकवि गुणाढ्य रचित पैशाची (कश्मीर तरफ की प्राकृत) भाषा के 'बृहत्कथा' नामक ग्रंथ से भी, जिसकी प्रशंसा बाणभट्ट ने अपने हर्षचरित के प्रारंभ के १७ वें श्लोक (समुद्दीपितकंदर्पा कृतगौरीप्रसाधना । हरलीलेव नो कस्य विस्मयाय बृहत्कथा) में की है. वह पुस्तक अब तक नहीं मिला परंतु उसके संस्कृत अनुवाद रूपी सोमदेव भट्ट के 'कथासरित्सागर' में उज्जैन के राजा विक्रमसिंह (लंबक ६, तरंग १), पाटलीपुत्र के राजा विक्रमर्तुग (लंबक ७, तरंग १) आदि विक्रम नाम के राजाओं की कई कथाएं मिलती हैं. इस पुस्तक को भी वेबर ने ई. स. की छठी शताब्दी का माना है परंतु डॉ. सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर ने उपर्युक्त सातवाहन के समय का अर्थात् ई. स. की पहिली या दूसरी शताब्दी का माना है (बंब. गे; जि. १ भा. २, पृ.

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१७०-७१) और काव्यमाला के विद्वान् संपादक स्वर्गीय महामहोपाध्याय पं. दुर्गाप्रसाद और पांडुरंग परब ने उसका ई. स. की पहिली शताब्दी में बनना बतलाया है इतना ही नहीं किंतु वेबर के माने हुए उसके समय के विषय में लिखा है कि "वेबर पंडित 'हिस्टरी ऑफ संस्कृत लिटरेचर' नामक पुस्तक में गुणाढ्य का ई. स. की छठी शताब्दी में होना बतलाता है और दशकुमारचरित के रचयिता आचार्य दंडी का भी छठी शताब्दी में होना स्वीकार करता है. किंतु आचार्य दंडी काव्यदर्श में 'भूतभाषामयीं प्राहुरद्भुतार्थां बृहत्कथाम्' में 'प्राहुः' पद से बृहत्कथा का अपने से बहुत

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तो विक्रम१, जिसका नाम इस संवत् के साथ जुड़ा है, मालव जाति का मुखिया या राजा हो, अथवा चंद्रगुप्त (दूसरे) से पहिले का उससे भिन्न कोई राजा हो.

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विक्रम संवत् का प्रारंभ कलियुग संवत् के (५०१६-१६७५=) ३०४४ वर्ष व्यतीत होने पर माना जाता है जिससे इसका गत वर्ष १ कलियुग संवत् ३०४५ के बराबर होता है. इस संवत् में से ५७ या ५६ घटाने से ईसवी सन् और १३५ घटाने से शक संवत् आता है. इसका प्रारंभ उत्तरी हिंदुस्तान में चैत्र शुक्ला १ से और दक्षिण में कार्तिक शुक्ला १ से होता है जिससे उत्तरी (चैत्रादि) विक्रम संवत् दक्षिणी (कार्तिकादि२) विक्रम संवत् से ७ महीने पहिले प्रारंभ होता है. उत्तरी हिंदुस्तान में महीनों का प्रारंभ कृष्णा १ से और अंत शुक्ला १५ को होता है, परंतु दक्षिण में महीनों का प्रारंभ शुक्ला १ से और अंत कृष्णा अमावास्या को होता है. इस लिये उत्तरी विक्रम संवत् के महीने पूर्णिमांत और दक्षिणी के अमांत (दर्शांत) कहलाते हैं. शुक्ल पक्ष तो उत्तरी और दक्षिणी हिंदुस्तान में एक ही होता है परंतु उत्तरी हिंदुस्तान का कृष्ण पक्ष दक्षिणी से १ महीना पहिले रहता है अर्थात् जिस पक्ष को हम उत्तरी हिंदुस्तानवाले वैशाख कृष्ण कहते हैं उसीको दक्षिणवाले चैत्र कृष्ण लिखते हैं. काठियावाड़, गुजरात तथा राजपूताने के कुछ अंश में विक्रम३ संवत् का प्रारंभ आषाढ शुक्ला १ (अमांत) से भी होता था जिससे उसको 'आषाढादि' संवत्' कहते थे. राजपुताने के उदयपुर आदि राज्यों में राजकीय विक्रम संवत् अब श्रावण कृष्णा (पूर्णिमांत) से प्रारंभ होता है.

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१ 'ज्योतिर्विदाभरण' का कर्त्ता कालिदास नामक ज्योतिषी उक्त पुस्तक के २२ वें अध्याय में अपने को उज्जैन के राजा विक्रम का मित्र (श्लोक १६) और 'रघुवंश' आदि तीन काव्यों का कर्ता बतला कर (श्लो. २०) गत कलियुग संवत् ३०६८ (वि. सं. २४) के वैशाख में उक्त पुस्तक का प्रारंभ और कार्तिक में उसकी समाप्ति होना (श्लो. २१) लिखता है. उसमें विक्रम के विषय में यह भी लिखा है कि 'उसकी सभा में शंकु, वररुचि, मणि, अंशु, जिष्णु, त्रिलोचन, हरि, घटखर्पर और अमरसिंह आदि कवि (श्लो. ८); सत्य, वराहमिहिर, श्रुतसेन, बादरायण, मणित्थ और कुमारसिंह आदि ज्योतिषी थे (श्लो. ६). धन्वंतरि, क्षपणक, अमरसिंह, शंकु, वेतालभट्ट, घटखर्पर, कालिदास, वराहमिहिर और वररुचि ये नव विक्रम की सभा के रत्न थे. उसके पास ३००००००० पैदल, १०००००००० सवार, २४३०० हाथी और ४००००० नाव थीं (श्लो. १२). उसने ६५ शक राजाओं को मार कर अपना शक अर्थात् संवत् चलाया (श्लो. १३) और रूम देश के शक राजा को जीत कर उज्जैन में लाया परंतु फिर उसको छोड़ दिया' (श्लो. १७). यह सारा कथन मनघडंत ही है क्यों कि 'ज्योतिर्विदाभरण' की कविता मामूली है और रघुवंश आदि के कर्ता कविशिरोमणि कालिदास की अलौकिक सुंदरतावाली कविता के आगे तुच्छ है. ऐसे ही गत कलियुग संवत् ३०६८ (वि. सं. २४) में उक्त पुस्तक की रचना करने का कथन भी कृत्रिम ही है क्यों कि उसी पुस्तक में अयनांश निकालने के लिये यह नियम दिया है कि 'शक संवत् में से ४४५ घटाकर शेष में ६० का भाग देने से अयनांश आते हैं' (शाकः शराम्भोधिधुगोनिता हृता मानं खतर्कैरयनांशकाः स्मृताः । १२ । १६). विक्रम संवत् के १३५ वर्ष बीतने पर शक संवत् चला था अत एव यदि वह पुस्तक वि. सं. २४ में बना होता तो उसमें शक संवत् का नाम भी नहीं होना चाहिये था. वास्तव में वह पुस्तक श. सं. १२१४ (वि. सं. १२६६=ई. स. १२९२) के आसपास का बना हुआ है (देखो, शंकर बालकृष्ण दीक्षित का 'भारतीय ज्योतिषशास्त्र', पृ. ४७६). ऐसी दशा में उक्त पुस्तक का विक्रमसंबंधी सारा कथन कल्पित ही मानना पड़ता है.

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२ वास्तव में विक्रम संवत् का प्रारंभ कार्तिक शुक्ला १ से और शक संवत् का चैत्र शुक्ला १ से है. उत्तरी हिंदुस्तान के भी पंचांग शक संवत् के आधार पर बनने से उनमें वर्ष चैत्र शुक्ला १ से प्रारंभ होता है, जिससे वहांवालों ने पीछे से विक्रम संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से भी मानना शुरू कर दिया हो. उत्तरी भारत के लेखों में संवत् दोनों तरह से (कार्तिकादि और चैत्रादि) मिल आते हैं. ई. स. की १२ वीं शताब्दी तक के लेखों में कार्तिकादि संवत् अधिक परंतु १३ वीं से १६ वीं शताब्दी तक के लेखों में चैत्रादि अधिक मिलते हैं (इं. पं; जि. २०, पृ. ३६६).

c31.s7.40

३ 'पृथ्वीराजरासो' में दिये हुए कितनी एक घटनाओं के अशुद्ध संवतों का ठीक होना सिद्ध करने की खींचतान में स्वर्गीय पंडित मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या ने पृथ्वीराज के जन्म संवत् संबंधी दोहे (एकादस सै पंच दह विक्रम साक अनंद । तिहि रिपु जय पुर हरन कौं भय प्रथिराज नरिंद। मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या संपादित 'पृथ्वीराजरासो' आदिपर्व, पृ. १३८), के 'अनंद' शब्द पर से 'अनंद विक्रम शक' (संवत्) की कल्पना कर लिखा है कि 'विक्रम साक अनन्द को क्रम से अनन्द विक्रम साक अथवा विक्रम अनंद साक करके उसका अर्थ करे कि नव-रहित विक्रम का शक अथवा विक्रम का नव-रहित शक अर्थात् १००-६=६० । ६१ अर्थात विक्रम का वह शक कि जो उसके राज्य के वर्ष ६० । ६१ से प्रारंभ हुआ है। यहीं थोड़ी सी और उत्प्रेक्षा (?) करके यह भी समझ लीजिये कि हमारे देश के ज्योतिषी लोग जो सैकड़ों वर्षों से यह कहते चले आते हैं और आज भी वृद्ध लोग कहते हैं कि विक्रम के दो संवत् थे कि जिनमें से एक तौ अब तक प्रचलित है और दूसरा कुछ समय तक प्रचलित रह अब अप्रचलित हो गया है.........अतएव विदित हो कि विक्रम के दो संवत् हैं। एक तौ सनन्द जो आज कल प्रचलित है और दूसरा अनन्द जो इस महाकाव्य में प्रयोग में आया है' (पृथ्वीराजरासा, आदि पर्व, पृ. १३६). पं. मोहनलाल पंड्या का यह सारा कथन सर्वथा स्वीकार योग्य नहीं है क्योंकि रासे के 'अनंद' शब्द का अर्थ 'आनंददायक' या 'शुभ' ही है जैसा कि भाषा के अन्य काव्यों में मिलता है*. उसको वास्तविक अर्थ में न ले कर 'विक्रम के राज्य के ६० वे या ६१ वे वर्ष से चलनेवाला अनंद विक्रम संवत्' अर्थ निकालना हठधर्मी से खाली नहीं है. ज्योतिषियों ने विक्रम के दो संवतों का होना कभी नहीं माना और न किसी वृद्ध पुरुष को ऐसा कहते हुए सुना. पं. मोहनलाल की यह कल्पना भी ठीक वैसी ही है जैसी कि 'राजप्रशस्ति' में खुदे हुए 'भाषारासापुस्तकेस्य' के 'भाव-नगर प्राचीनशोधसंग्रह' में छपे हुए अशुद्ध पाठ 'भीपारासापुस्तकेस्य' पर से 'भीपारासा' नामक ऐतिहासिक पुस्तक की सृष्टि खड़ी कर दी गई. पं. मोहनलाल पंड्या के इस मनघडंत कथन के आधार पर डॉ. ग्रीअर्सन (स्मि; अ. हि. इं; पृ. ४२, टिप्पण २), वी. ए. स्मिथ (स्मि; अ. हि. इं; पृ. ३८७, टिप्पण २) और डॉ. बार्नेट ने (वा; ऐ. इं; पृ. ६५) 'अनंद विक्रम संवत्' का ई. स. ३३ से चलना माना है परंतु हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते क्योंकि राजपुताने में विक्रम के दो संवतों का होना कभी माना नहीं गया, न वहां से मिले हुए शिलालेखों, दानपत्रों, हस्तलिखित पुस्तकों, भाटों तथा चारणों के लिखे हुए भाषा कविता के ग्रंथों या ख्यातों में कहीं भी अनंद विक्रम संवत् का उल्लेख मिलता है, न 'पृथ्वीराजरासे' के उपर्युक्त दोहे में 'अनंद विक्रम संवत्' की कल्पना पाई जाती है और न 'पृथ्वीराजविजय' महाकाव्य से, जो चौहानों के इतिहास का प्राचीन और प्रामाणिक पुस्तक है, वि. सं. १२२० (ई. स. ११६३) के पूर्व पृथ्वीराज का जन्म होना माना जा सकता है.

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१ आषाढादि विक्रम संवत शिलालेखों तथा पुस्तकों में मिलता है. अडालिज (अहमदाबाद से १२ मील पर) की बावड़ी के लेख में 'श्रीमन्नृपविक्रमसमयातीता (त) आषाढादिसंवत् १५५५ वर्षे शाके १४२०....माघमासे पंचम्यां तिथौ बुधवासरे' (इं. पं; जि. १८, पृ. २४१). डुंगरपुर राज्य के डेसां गांव के पास के शिवमंदिर के लेख में-' श्रीमन्नृ(न्नृ)पविक्रमार्क (र्क)राज्यसम-यातीतसंवत् १६ आषादादि २३ वर्षे शाके १४८८ प्रवर्त्तमाने । युवसंवत्सराभिध संवत्सरे....वैशाखमासे । कृष्णपक्षे । प्रतिपति (त्ति) या । गुरुवासरे.' डुंगरपुर राज्य से मिले हुए कई शिलालेखों में 'आषाढादि' संवत् लिखा मिलता है. 'प्रभावसक्षेत्रतीर्थयात्राक्रम' नामक पुस्तक के अंत में-'संवत् १५ आषाढादि ३४ वरुपे (वर्षे) श्रावणशुदि ५ बु(धो) मे'-लिखा मिला है (इं. पं; जि. १८, पृ. २४१).

८-शक संवत्

c31.s8.1

शक संवत् के प्रारंभ के विषय में ऐसी प्रसिद्धि है कि दक्षिण के प्रतिष्ठानपुर (पैठण) के राजा शालिवाहन (सातवाहन, हाल) ने यह संवत् चलाया. कोई इसका प्रारंभ शालिवाहन के जन्म से२ मानते हैं. जिनप्रभसूरि अपने 'कल्पप्रदीप'३ नामक पुस्तक में लिखता है कि प्रतिष्ठानपुर (पैठण) में रहनेवाले एक विदेशी ब्राह्मण की विधवा बहिन से सातवाहन (शालिवाहन) नामक पुत्र उत्पन्न हुआ. उसने उज्जैन के राजा विक्रम को परास्त किया. जिसके पीछे उसने प्रतिष्ठानपुर का राजा बन कर तापी नदी तक का देश अपने अधीन किया और वहां पर अपना संवत् प्रचलित किया४.

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२ त्र्यंकेन्द्र (१४६३) प्रमिते वर्षे शालिवाहनजन्मतः । क्लस्तस्तपसि मार्त्तंडोऽधमलं जयतुद्रुतः (मुहूर्त्तमार्तंड, अलंकार, श्लोक ३).

c31.s8.3

३ यह पुस्तक ई. स. १३०० के आस पास बना था.

c31.s8.4

४ ज. ए. सो. बंब; जि. १०, पृ. १३२-३३.
* गगन पाणि पुनि द्वीप ससि (१७२०) हिम रुत मंगसर मास । शुक्ल पक्ष तेरस दिने बुध वासर दिन जाम ॥ २६६ ॥ मरदानो अरु महा बली अवरंग शाह नरिंद । तासु राज महिं हरखसूं रच्यो शास्त्र आनंद ॥ २६७ ॥ (पद्मराग के शिष्य रामचंद्र रचित 'रामविनोद' नामक पुस्तक).

c31.s8.5

अलवेरूनी लिखता है कि ‘विक्रमादित्य ने शक राजा को परास्त कर यह संवत् चलाया’१. इस प्रकार इसके प्रचलित किये जाने के विषय में भिन्न भिन्न मत हैं.

c31.s8.6

पहिले पहिल यह संवत् काठियावाड़ तथा कच्छ से मिले हुए पश्चिमी क्षत्रपों के [शक] संवत् ५२ से १४३ तक के शिलालेखों२ में तथा उन्हीं के सिक्कों में, जो [शक] संवत १०० (ई. स. १७८) के आसपास से लगा कर ३१० (ई. स. ३८८) से कुछ पीछे तक के हैं, मिलता है. उक्त शिलालेखों में केवल ‘वर्षे’ (=संवत्सरे) लिखा मिलता है, ‘शक’ आदि कोई नाम ‘वर्षे’ (संवत्) के साथ जुड़ा हुआ नहीं है, और सिक्कों में तो अंक ही मिलते हैं (‘वर्षे’ भी नहीं.)

c31.s8.7

संस्कृत साहित्य में इस संवत् के साथ ‘शक’ नाम जुड़ा हुआ (=शककाल) पहिले पहिल३ वराहमिहिर की ‘पंचसिद्धांतिका’ में शक संवत् ४२७४ (ई. स. ५०५) के संबंध में मिलता है; और शक संवत ५०० (ई. स. ५७८) से लगा कर १२६२ (ई. स. १३४०) तक के शिलालेखों और दानपत्रों में ‘शकनृपतिराज्याभिषेकसंवत्सर’५, ‘शकनृपतिसंवत्सर’६, ‘शकनृपसंवत्सर’७, शकनृपकाल’८, शकसंवत्’९, ‘शकवर्ष’१०, ‘शककाल’११, ‘शककालसंवत्सर’१२, ‘शक’१३ और ‘शाक’१४ शब्दों का प्रयोग इस संवत् के वास्ते किया हुआ मिलता है जिससे पाया जाता है कि ई. स. ५०० के आसपास से लगा कर शक संवत् १२६२ (ई. स. १३४०) तक तो यह संवत् किसी शक राजा के राज्याभिषेक से चला हुआ या किसी शक राजा अथवा शकों का चलाया हुआ माना जाता था और उस समय तक शालिवाहन का नाम इसके साथ नहीं जुड़ा था.

c31.s8.8

१ सा; अ. इं; जि. २, पृ. ६.

c31.s8.9

२ राज्ञो चष्टनस घ्समोतिकपुत्रस राज्ञो रुद्रदामस जयदामपुत्रस वर्षे द्विपंचाशे ५२ २ फागुणवहुलस द्वितीयं वी २ मदनेन सिंहलपुत्रेण० कच्छराज्य के अँधौ गांव से मिले हुए क्षत्रपों के लेखों की स्वर्गीय आचार्य वल्लभजी हरिदत्त की तय्यार की हुई छापों पर से. राज्ञो महाक्षत्रपस्य गुरुभिरभ्यस्तनाम्नो वर्षे द्विसप्ततितमे ७० २ (महाक्षत्रप रुद्रदामन् के गिरनार के पास के अशोक के लेखवाले चट्टान पर के लेख से. ऐं. इं; जि. ८, पृ. ४२).

c31.s8.10

३ सिंहसूरिरचित ‘लोकविभाग’ नामक संस्कृत जैन ग्रंथ में उक्त पुस्तक का शकाब्द (शक संवत्) ३८० में बनना लिखा है (संवत्सरे तु द्वाविंशे कांचीशसिंहवर्मणः । अशीत्यग्रे शकाब्दानां सिद्धमेतच्छतत्रये ॥ (लोकविभाग नामक ११ वें प्रकरण के अंत की प्रशस्ति, श्लोक ४) परंतु यह मूल ग्रंथ नहीं किंतु सर्वंनंदि नामक मुनि के बनाये हुए प्राकृत ग्रंथ का परिवर्द्धित संस्कृत अनुवाद है और ई. स. की ग्यारहवीं शताब्दी के पीछे का बना हुआ है क्योंकि इसमें यतिवृषभग्रचित ‘त्रिलोक्यविज्ञप्ति,’ राष्ट्रकूट राजा अमोघवर्ष के समय के अर्थात् ई. स. की ६ वीं शताब्दी के बने हुए ‘उत्तरपुराण’ तथा ई. स. की ११वीं शताब्दी के आस पास के बने हुए नेमिचंद्ररचित ‘त्रिलोकसार’ से भी श्लोक उद्धृत किये हुए मिलते हैं. संभव है कि सर्वंनंदि का मूल प्राकृत ग्रंथ शक संवत् ३८० में बना हो, परंतु उसमें इस संवत् के साथ ‘शक’ नाम जुड़ा हुआ था या नहीं इसका जब तक मूल ग्रंथ न मिल आवे तब तक निश्चय नहीं हो सकता. ऐसी दशा में ११ वीं शताब्दी के पीछे के बने हुए ‘लोकविभाग’ के ‘शकाब्द’ को शक संवत् का सब से प्राचीन उल्लेख नहीं कह सकते.

c31.s8.11

४ सप्ताश्विवेदसंख्यं शककालमपास्य चैत्रशुक्लादौ (पंचसिद्धांतिका १।८. देखो, ऊपर पृ. ११६, टिप्पण *.

c31.s8.12

५ शकनृपतिराज्याभिषेकसंवत्सरेष्वतिक्रांतेषु पंचसु शतेषु (इं. पँ; जि. १०, पृ. ५८ के पास का सेट).

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६ शकनृपतिसंवत्सरेषु चतुस्त्रिंशाधिकेषु पंचस्वतीतेषु भाद्रपदग्रामावास्यायां सूर्यग्रहणनिमित्तं (इं. पँ; जि. ६, पृ ७३).

c31.s8.14

७ शकनृपसंवत्सरेषु शरशिखिमुनिषु व्यतीतेषु ज्येष्ठमासशुक्लपञ्चदश्यां पुष्यनक्षत्रे चंद्रवारे (इं. पँ; जि. १२, पृ. १६).

c31.s8.15

८ शकनृपकालातीतसंवत्सरसु(श)तेषु सप्तसु(सु) जे(ष्ठे)शरोत्तरेषु वैशाखव(ब)हुलामावास्यामादित्यग्रहणपर्व्वणि (पँ. इं; जि. ३, पृ १०६).

c31.s8.16

९ शकसंवत् ८३२ वैशाखशुद्धपौरर्णमास्यां महावैशाख्यां (पँ. इं; जि. १, पृ. ५६).

c31.s8.17

१० एकादशोत्तरषट्छतेषु शकवर्षेष्वतीतेषु....कार्तिकपौर्णमास्यां (इं. पँ; जि. ६, पृ. ८६).

c31.s8.18

११ सप्तस(श)त्या नवत्या च समायुक्तेसु(षु) सप्तसु [।] स(श)ककाले(ले) श्व(ष्व)तीतेषु मन्मथाह्वयवत्सरे (ज. ए. सो. बंब. जि. १०, पृ. १६५).

c31.s8.19

१२ पंचसप्तत्यधिकशककालसंवत्सरशतषट्के व्यतीते संवत्(त्) ६७५....माघमासरथसप्तम्यां (इं. पँ; जि. ११, पृ. ११२).

c31.s8.20

१३ शक ११५७ मन्मथसंवत्सरे श्रावणवहुल ३० गुरौ (की; लि. इं. स. इं; पृ. ६३, लेखसंख्या ३४८).

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१४ शाके ११२८ प्रभवसंवत्सरे श्रावणमासे पौर्णमास्यां (पँ. इं; जि. १, पृ. ३४३).

c31.s8.22

इस संवत् के साथ जुड़ा हुआ शालिवाहन (सातवाहन) का नाम संस्कृत साहित्य में ई. स. की १४वीं शताब्दी के प्रारंभ१ के आस पास से और शिलालेखादि में पहिले पहिल हरिहर गांव से मिले हुए विजयनगर के यादव राजा बुक्कराय (प्रथम) के शक संवत् १२७६ (ई. स. १३५४) के दानपत्र२ में मिलता है; जिसके पीछे शालिवाहन का नाम लिखने का प्रचार बढ़ता गया. विद्वान् राजा सातवाहन (शालिवाहन) का नाम 'गाथासप्तशती' और 'बृहत्कथा' से साक्षरवर्ग में प्रचलित था अत एव संभव है कि ई. स. की १४वीं शताब्दी के आस पास दक्षिण के विद्वानों ने उत्तरी हिंदुस्तान में चलनेवाले संवत् के साथ जुड़े हुए राजा विक्रम के नाम का अनुकरण कर अपने यहां चलनेवाले 'शक' (शक संवत्) के साथ दक्षिण के राजा शालिवाहन (सातवाहन, हाल) का नाम जोड़ कर 'नृपशालिवाहनशक',३ 'शालिवाहनशक',४ 'शालिवाहनशकवर्ष',५ 'शालिवाहनशकाब्द'६ आदि से इस संवत् का परिचय देना प्रारंभ किया हो.

c31.s8.23

३ देखो, इसी पृष्ठ का टि. २.

c31.s8.24

४ शालिवाहनशक १४७६ (इं. पँ; जि. १०, पृ. ६४).

c31.s8.25

६ शकाब्दे शालिवाहस्य सहस्रेण चतुःशतैः। चतुस्त्रिंशत्समेतैर्यक्ते संख्याते गणिनक्रमात् ॥ श्रीमुखवत्सरे श्राध्ये माघे चासितपञ्चके। शिवरात्रा महातिथ्यां पुं(पु)ण्यकाले शुभे दिने (ज. ब. ब्रा. जि. १२, पृ. ३८४).

c31.s8.26

शालिवाहन, सातवाहन नाम का रूपांतर७ मात्र है और सातवाहन (पुराणों के 'आंध्रभृत्य') वंश के राजाओं का राज्य दक्षिण पर ई. स. पूर्व की दूसरी शताब्दी से ई. स. २२५ के आस पास तक रहा था, उनकी राजधानियों में से एक प्रतिष्ठान नगर (पैठण, गोदावरी पर) भी थी और उनमें सातवाहन (शातकर्णि, हाल) राजा बहुत प्रसिद्ध भी था अतएव संभव है कि दक्षिण के विद्वानों ने उसीका नाम इस संवत् के साथ जोड़ा हो, परंतु यह निश्चित है कि सातवाहनवंशियों में से किसीने यह संवत् नहीं चलाया क्यों कि उनके शिलालेखों में यह संवत् नहीं मिलता किंतु भिन्न भिन्न राजाओं के राज्यवर्ष (सन् जुलूस) ही मिलते हैं और सातवाहन वंश का राज्य अस्त होने के पीछे अनुमान ११०० वर्ष तक शालिवाहन का नाम इस संवत् के साथ नहीं जुड़ा था. इस लिये यही मानना उचित होगा कि यह संवत् शक जाति के किसी विदेशी राजा या शक जाति का चलाया हुआ है.

c31.s8.27

१ देखो, ऊपर पृ. १७० और टिप्पण ३, ४.

c31.s8.28

२ नृपशालिवाहनशक १२७६ (की; लि. इं. स. इं; पृ. ७८, लेखसंख्या ४५५). इससे पूर्व के थाणा से मिले हुए देवगिरि के यादव राजा रामचंद्र के समय के शक संवत् १२१२ (ई. स. १२९०) के दानपत्र की छपी हुई प्रति में (की; लि. इं. स. इं; पृ. ६७, लेखसंख्या ३७६) में 'शालिवाहनशके १२१२' छपा है परंतु डॉ. फ्लीट का कथन है कि उक्त ताम्रपत्र का अब पता नहीं है और नउसकी कोई प्रतिकृति प्रसिद्धि में आई और जैसे थाना से मिले हुए ई. स. १२७२ के दानपत्र में शालिवाहन का नाम न होने पर भी नक़ल में जोड़ दिया गया वैसा ही इसमें भी हुआ होगा (ज. रॉ ए. सो; ई. स. १६१६, पृ. ८१३). ऐसी दशा में उक्त ताम्रपत्र को शालिवाहन के नामवाला सब से पहिला लेख मान नहीं सकते.

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