भारतीय पराचीन लिपिमाला (Bharatiya Pracina Lipimala: The Palaeography of India) c30: २४—लेखनसामग्री
भारतीय प्राचीन लिपिमाला (Bhāratīya Prācīna Lipimālā: The Palaeography of India) c30
- Language
- Hindi
Contents
- c30.s1 ताड़पत्र — 10 parts
- c30.s2 भूर्जपत्र ( भोजपत्र ) — 4 parts
- c30.s3 कागज़ — 10 parts
- c30.s4 रूई का कपड़ा — 5 parts
- c30.s5 लकड़ी का पाटा और पाटी — 6 parts
- c30.s6 रेशमी कपड़ा — 3 parts
- c30.s7 चमड़ा — 4 parts
- c30.s8 पत्थर — 30 parts
- c30.s9 ईंट — 7 parts
- c30.s10 सोना — 4 parts
- c30.s11 चांदी — 4 parts
- c30.s12 तांबा — 17 parts
- c30.s13 पीतल — 2 parts
- c30.s14 कांसा — 1 part
- c30.s15 लोहा — 2 parts
- c30.s16 काली स्याही — 8 parts
- c30.s17 रंगीन स्याही — 2 parts
- c30.s18 सोने और चांदी की स्याही — 2 parts
- c30.s19 क़लम — 1 part
- c30.s20 परकार — 2 parts
- c30.s21 रेखापाटी — 3 parts
- c30.s22 कांची ( रुल ) — 1 part
२४—लेखनसामग्री
ताड़पत्र
c30.s1.1
ताड़पत्र—ताड़ (ताल, ताली) नामक वृक्ष की दो भिन्न जातियों के पत्ते हैं. ताड़ के वृक्ष दक्षिण में तथा समुद्रतट के प्रदेशों में विशेष रूप से और राजपूताना, पंजाब आदि में कम होते हैं. टिकाउ होने तथा थोड़े मूल्य में बहुत मिल आने के कारण प्रारंभिक काल से१ ही ताड़ के पत्ते पुस्तक आदि लिखने के काम में आते थे. ताड़ के पत्ते बहुत बड़े बड़े होते हैं; उन्हें संधियों में से काट कर, अधिक लंबी परंतु चौड़ाई में एक से चार इंच तक की ही, पट्टियां निकाली जाती हैं जिनमें से जितनी लंबाई का पत्ना बनाना हो उतना काट लेते हैं. पुस्तक लिखने के लिये जो ताड़पत्र काम में आते थे उनको पहिले सुखा देते थे, फिर उनको पानी में उबालते या भिगो रखते थे. पीछे उनको फिर सुखा कर शंख, कौड़े या चिकने पत्थर आदि से घोटते थे. मामूली कामों के लिये जो पत्ते पहिले काम में लाये जाते थे या अब लाये जाते हैं वे इस तरह तय्यार नहीं किये जाते. कश्मीर और पंजाब के कुछ अंश को छोड़ कर बहुधा सारे भारतवर्ष में ताड़पत्र का बहुत प्रचार था. पश्चिमी और उत्तरी भारतवाले उनपर स्याही से लिखते थे परंतु दक्षिणवाले
c30.s1.2
१ बौद्धों की जातक कथाओं में 'पण्ण' (पत्र, पत्ता, पन्ना) का उल्लेख कई जगह मिलता है (देखो, ऊपर पृ. ५, टिप्पण २, ३, ४) जो ताड़पत्र का ही सूचक होना चाहिये. हुएन्त्सांग के जीवनचरित से, जो उसीके, शिष्य ह्ली का बनाया हुआ है, पाया जाता है कि बुद्ध के निर्वाण के वर्ष में बौद्धों का जो पहिला संघ एकत्र हुआ (देखो, ऊपर पृ. ४, टिप्पण ६) उसमें बौद्धों का 'त्रिपिटक' ताड़पत्रों पर प्रथम लिखा गया था (बील अनुवादित हुएन्त्सांग का जीवनचरित, पृ. ११६-१७). ऐसा कह सकते हैं कि भारतवर्ष में लिखने के लिये सबसे पहिले ताड़पत्र ही काम में आया हो और प्रारंभ में उसपर दक्षिणी शैली से लोहे की तीखे गोल मुंह की शलाका से अक्षर कुचरना ही प्रतीत होता है क्योंकि 'लिख्' धातु का मूल अर्थ कुचरना, रगड़ना या रेखा करना ही है; स्याही से लिखने के लिये 'लिप्' धातु (लीपना, रंग पोतना) अधिक उपयुक्त है, अत एव संभव है कि ताड़पत्रों पर स्याही से लिखने की उत्तरी प्रथा पीछे की हो. संसकृत साहित्य के कई शब्द और मुहावरे सबसे प्राचीन पुस्तकों का ताड़पत्र पर ही होना सूचित करते हैं, जैसे कि एक विषय का पुस्तक 'ग्रंथ' या 'सूत्र' कहलाता था जो ताड़पत्रों के एक गांठ या एक डोरी से बंधे हुए होने का स्मरण दिलाता है; वृक्ष के पत्तों के संबंध से ही पुस्तक के विषयों का विभाग स्कंध, कांड, शाखा, वल्ली आदि शब्दों से किया गया है; पत्र (पन्ना) और पर्ण (पन्ना) शब्द भी वृक्षों के पत्तों के ही स्मारक हैं.
c30.s1.3
तीखे गोल मुख की शलाका को उनपर दबा कर अक्षर कुरेदते थे. फिर पत्रों पर कज्जल फिरा देने से अक्षर काले बन जाते थे. कम लंबाई के पत्रों के मध्य में एक, और अधिक लंबाईवालों के मध्य से कुछ अंतर पर दाहिनी और बाईं ओर एक एक, छिद्र किया जाता था. पुस्तकों के नीचे और ऊपर उसी अंदाज़ के सूराखवाली लकड़ी की पट्टियां रहती थीं. इन सूराखों में डोरी डाली जाने से एक माप की एक या अधिक पुस्तकें एकत्र बंध सकती थीं. पढ़ने के समय. डोरी को ढीला करने से प्रत्येक पन्ना दोनों ओर से आसानी के साथ उलटाया तथा पढ़ा जा सकता था. सुंदर सस्ते कागज़ों के प्रचार के साथ ताड़पत्रों का प्रचार कम होता गया और अब तो बंगाल में कोई कोई 'दुर्गा-पाठ' लिखने में ही उन्हें काम में लेते हैं. भारत के सब से दक्षिणी और दक्षिणपूर्वी हिस्सों की प्रारंभिक पाठशालाओं में विद्यार्थियों के लिखने में या रामेश्वर, जगदीश आदि के मंदिरों में जमा कराये हुए रुपयों की रसीदें देने आदि में ताड़पत्र अब भी काम में आते हैं. दक्षिण की अधिक उष्ण हवा में ताड़पत्र के पुस्तक उतने अधिक समय तक रह नहीं सकते जितने कि नेपाल आदि शीत देशों में रह सकते हैं.
c30.s1.4
अब तक मिले हुए स्याही से लिखे ताड़पत्र के पुस्तकों में सब से पुराना एक नाटक का कुछ त्रुटित अंश है जो ई. स. की दूसरी शताब्दी के आस पास का है१. मि. मॅकार्टने के काशगर से भेजे हुए ताड़पत्रों के टुकड़े ई. स. की चौथी शताब्दी के हैं२. जापान के होरियूज़ि के मठ में रक्खे हुए 'प्रज्ञापारमिताहृदयसूत्र' तथा 'उष्णीषविजयधारणी' नामक बौद्ध पुस्तक३, जो मध्य भारत से वहां पहुंचे थे, ई. स. की ६ठी शताब्दी के आस पास के लिखे हुए हैं. नेपाल के ताड़पत्र के पुस्तकसंग्रह में ई. स. की ७वीं शताब्दी का लिखा हुआ 'स्कंदपुराण'४, कैंब्रिज के संग्रह में हर्ष संवत् २५२ (ई. स. ८५६) का लिखा हुआ 'परमेश्वरतंत्र'५ और नेपाल के संग्रह में नेवार सं. २८ (ई. स. ६०६-७)६ का लिखा हुआ 'लंकावतार' नामक पुस्तक है. ई. स. की ११ वीं शताब्दी और उसके पीछे के तो अनेक ताड़पत्र के पुस्तक गुजरात, राजपूताना, नेपाल आदि के एवं यूरोप के कई पुस्तकसंग्रहों में रक्खे हुए हैं. दक्षिणी शैली के अर्थात् लोहे की तीक्ष्ण अग्रभागवाली शलाका से दबा कर बनाये हुए अक्षरवाले पुस्तक ई. स. की १५ वीं शताब्दी से पहिले के अब तक नहीं मिले जिसका कारण दक्षिण की उष्ण हवा से उनका शीघ्र नष्ट होना ही है.
c30.s1.5
१ देखो, ऊपर पृ. २, टिप्पण २.
c30.s1.6
२ ज. ए. सो. बंगा; जि. ६६, पृ. २१८; प्लेट ७, संख्या १, टुकड़े ६ (a से i तक).
c30.s1.7
३ ऐं. ऑ. (आर्यन सीरीज़); प्लेट १-४.
c30.s1.8
४ ह; कँ. पा; अंग्रेजी भूमिका, पृ. ५२, और अंत का प्लेट.
c30.s1.9
५ ह; कँ. पा; अंग्रेजी भूमिका, पृ. ५२.
c30.s1.10
६ ह; कँ. पा; पृ. १४०.
भूर्जपत्र ( भोजपत्र )
c30.s2.1
भूर्जपत्न (भोजपत्र)—'भूर्ज' नामक वृक्ष की, जो हिमालय प्रदेश में बहुतायत से होता है, भीतरी छाल है. सुलभता तथा नाममात्र के मूल्य से बहुत मिलने के कारण प्राचीन काल में वह पुस्तक, पत्र आदि के लिखने के काम में बहुत आता था. अल्बेरूनी लिखता है कि 'मध्य और उत्तरी भारत के लोग 'तूज़' (भूर्ज) वृक्ष की छाल पर लिखते हैं. उसको 'भूर्ज' कहते हैं. वे उसके प्रायः एक गज़ लंबे और एक बालश्त चौड़े पन्ने लेते हैं और उनको भिन्न भिन्न प्रकार से तय्यार करते हैं. उनको मज़बूत और चिकना बनाने के लिये वे उनपर तेल लगाते हैं और [घोट कर] चिकना करते हैं, फिर उनपर लिखते हैं७.' भूर्जपत्र लंबे चौड़े निकल आते हैं जिनको काट कर लेखक अपनी इच्छानुसार भिन्न भिन्न लंबाई चौड़ाई के पन्ने बनाते और
c30.s2.2
७ सा; अ. इं; जि. १, पृ. १७१.
c30.s2.3
उनपर स्याही से लिखते थे. ताड़पत्रों का अनुकरण कर भूर्जपत्र की पुस्तकों के प्रत्येक पन्ने का मध्य का हिस्सा खाली छोड़ा जा कर उसमें छेद किया जाता था. पुस्तक के ऊपर और नीचे रक्खी जानेवाली लकड़ी की पार्टियों में भी उसी अंदाज़ से छेद रहता था. इस प्रकार सब पन्नों के छेदों में डोरी पोई जाकर पार्टियों पर लपेट ली जाती थी. मुगलों के समय से कश्मीरवाले भूर्जपत्र के पुस्तकों पर वर्तमान किताबों की नांई चमड़े की जिल्दें भी बांधने लगे. सस्ते और सुंदर कागजों के प्रचार के साथ भूर्जपत्र पर पुस्तकें लिखने की प्रथा कम होती गई और अब तो केवल हिंदुओं में तावीज़ों के लिये यंत्र लिखने के काम में उसका प्रचार रहा है जिससे हरेक बड़े शहर में पन्सारियों आदि की दुकानों पर वह मिल आता है.
c30.s2.4
भूर्जपत्र पर लिखी हुई पुस्तकें विशेष कर कश्मीर में मिलती हैं और कुछ उड़ीसा आदि में. हिंदुस्तान में पूना आदि के तथा यूरोप के कई प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकसंग्रहों में भूर्जपत्र पर लिखी हुई पुस्तकें सुरक्षित हैं जो बहुधा कश्मीर से ही ली गई हैं. भूर्जपत्र पर लिखी हुई सब से पुरानी पुस्तक, जो अब तक मिली है, खोतान से मिला हुआ खरोष्ठी लिपि के 'धंमपद' (प्राकृत) का कुछ अंश है. वह ई. स. की दूसरी या तीसरी शताब्दी का लिखा हुआ होना चाहिये. 'संयुक्तागमसूत्र' (संस्कृत) ई. स. की चौथी शताब्दी का लिखा हुआ मिला है१०. मि. बावर के पुस्तक ई. स. की छठी शताब्दी के आस-पास के और बख्शाली का अंकगणित ई. स. की ८ वीं शताब्दी के आस पास का लिखा हुआ प्रतीत होता है. ये पुस्तक स्तूपों के भीतर रहने या पत्थरों के बीच गड़े रहने से ही इतने दीर्घकाल तक बचने पाये हैं परंतु खुले रहनेवाले भूर्जपत्र के पुस्तक ई. स. की १५वीं शताब्दी के पूर्व के नहीं मिलते जिसका कारण यही है कि भूर्जपत्र, ताड़पत्र या कागज़ जितना टिकाउ नहीं होता.
कागज़
c30.s3.1
यह माना जाता है कि पहिले पहिल चीनवालों ने ई. स. १०५२० में कागज़ बनाया, परंतु उससे ४३२ वर्ष पूर्व अर्थात् ई. स. पूर्व ३२७ में, निआर्कस, जो सिकंदर बादशाह के साथ हिंदुस्तान में आया था, अपने व्यक्तिगत अनुभव से लिखता है कि 'हिंदुस्तान के लोग रुई को कूट कर लिखने के लिये कागज़ बनाते हैं'३०. इससे स्पष्ट है कि ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी में भी यहांवाले रुई या चीथड़ों से कागज़ बनाते थे, परंतु हाथ से बने हुए कागज़ सस्ते और सुलभ नहीं हो सकते. यहां पर ताड़पत्र और भूर्जपत्र (भोजपत्र) की बहुतायत होने और नाममात्र के मूल्य से उनके बहुत मिल जाने से कागज़ों का प्रचार कम ही होना संभव है. यूरोप के बने हुए सस्ते और सुंदर कागज़ों के प्रचार के पहिले भी इस देश में चीथड़ों से कागज़ बनाने के कई कारखाने थे और अब भी हैं परंतु यहां के बने कागज़ चिकने न होने से पुस्तक लिखने की पक्की स्याही उनमें और पार फैल जाती थी. इस लिये उनपर गेहूं या चावल के आटे की पतली लेई लगा कर उनको सुखा देते थे जिससे वे करड़े पड़ जाते थे. फिर शंख आदि से घोटने से वे चिकने और कोमल हो जाते
c30.s3.2
१० देखो, ऊपर पृष्ठ ९, टिप्पण २.
c30.s3.3
२० बा; ए. इं; पृ. २२६.
c30.s3.4
३० इस विषय में मैक्समुलर लिखता है कि 'निआर्कस् भारतवासियों का रुई से कागज़ बनाने की कला का जानना प्रकट करता है' (देखो, ऊपर पृ. ३, टि. ७), और वूलर निआर्कस के कथन का आशय अच्छी तरह कूट कर तय्यार किये हुए रुई के कपड़ों के 'पट' से होना मानता है (वृ; इं. पे; पृ. ६८) जो भ्रमपूरित है क्योंकि 'पट' अब तक बनते हैं और वे सर्वथा कूट कर नहीं बनाये जाते (उनका विवेचन आगे किया जायगा). निआर्कस् का अभिप्राय कागज़ों से ही है.
c30.s3.5
थे तभी उनपर पुस्तक लिखे जाते थे. जैन लेखकों ने कागज़ की पुस्तकें लिखने में ताड़पत्र पर लिखी हुई पुस्तकों का अनुकरण किया है, क्यों कि उनकी लिखी हुई पुरानी पुस्तकों में ताड़पत्नों की पुस्तकों की नांई प्रत्येक पत्ते का मध्य का हिस्सा, जहां डोरी डाली जाती थी, बहुधा खाली छोड़ा हुआ मिलता है जिसमें कहीं हिंगलू का वृत्त और चतुर्मुख वापी आदि के रंगीन या खाली चित्र मिलते हैं. इतना ही नहीं, ई. स. की १४ वीं शताब्दी की लिखी हुई पुस्तकों१ में प्रत्येक पत्ते और ऊपर नीचे की पाटियों तक में छेद किये हुए भी देखने में आये हैं यद्यपि उन छेदों की कोई आवश्यकता न थी.
c30.s3.6
भारतवर्ष के जलवायु में कागज बहुत अधिक काल तक नहीं रह सकता. काग़ज पर लिखी हुई पुस्तकों में, जो अब तक इस देश में मिली हैं, सब से पुरानी ई. स. १२२३-२४ की बतलाई जाती है२, परंतु मध्य एशिया में यारकंद नगर से ६० मील दक्षिणे 'कुगियर' स्थान से ज़मीन में गड़े हुए भारतीय गुप्त लिपि के ४ पुस्तक मि. वेबर को मिले जो ई. स. की पांचवीं शताब्दी३ के आस पास के होने चाहियें. इसी तरह मध्य एशिया के काशगर आदि से जो जो पुराने संस्कृत पुस्तक४ मिले हैं वे भी उतने ही पुराने प्रतीत होते हैं.
c30.s3.7
१ अजमेर के सेठ कल्याणमल ढड्ढा के यहां हस्तलिखित प्राचीन जैन एवं अन्य पुस्तकों का बड़ा संग्रह है. उसमें ज्योतिषसंबंधी पुस्तकों तथा विषयों के संग्रह का २६२ पत्नों का एक पुस्तक है जिसके पत्रांक प्राचीन और नवीन शैली दोनों तरह से दिये हुए हैं. उसके प्रारंभ में दो पत्रों में उक्त संग्रह की पत्रांकसहित विषयसूची भी लगी हुई है जो वि. सं. १४२६ (ई. स. १३७२) में उक्त संग्रह के लेखक श्रीलोक हिताचार्य ने ही तय्यार की थी. उक्त पुस्तक के प्रत्येक पत्रे के मध्य के खाली छोड़े हुए हिस्से में बने हुए हिंगलू के वृत्त में सुराख बना हुआ है और ऊपर नीचे की पाटियों में भी. वहीं के २३५ पत्नों के एक दूसरे पुस्तक में, जिसमें भिन्न भिन्न पुस्तकों का संग्रह है और जो १४ वीं शताब्दी के आस पास का लिखा हुआ प्रतीत होता है (संवत् नहीं दिया), इसी तरह सुराख बने हुए हैं.
c30.s3.8
२ गुजरात, काठियावाड़, कच्छ, सिंध और खानदेश के खानगी पुस्तक्संग्रहों की सूचियां, बूलर संगृहीत, भाग १, पृ. २३८; पुस्तकसंख्या १४७.
c30.s3.9
३ देखो, ऊपर पृ. २, टि. ४.
c30.s3.10
४ ज. ए. सो. बंगा; जि. ६६, पृ. २१३-२६०. इन पुस्तकों में से जो मध्य एशिया की गुप्तकाल की लिपि में हैं वे तो मध्य एशिया के ही लिखे हुए हैं, परंतु कितने एक जो भारतीय गुप्त लिपि के हैं (सेट ७, संख्या ३ के a, b, c, e, f टुकड़े; संख्या ५-८, ११. सेट १३, १५, १६) उनका भारतवर्ष से ही वहां पहुंचना संभव है जैसे कि होर्युज़ी के मठ के ताड़पत्र के और मि० बावर के भोजपत्र के पुस्तक यहीं से गये हुए हैं. बूलर आदि कितने एक यूरोपियन विद्वानों ने युरोप की नांई भारतवर्ष में भी काग़ज़ों का प्रचार मुसलमानों ने किया ऐसा अनुमान कर मध्य एशिया से मिले हुए भारतीय गुप्त लिपि के पुस्तकों में से एक का भी यहां से वहां पहुंचना संदेहसहित नहीं माना परंतु थोड़े समय पूर्व डॉ० सर ऑरल स्टाइन को चीनी तुर्केस्तान से चींथड़ों के बने हुए ई. स. की दूसरी शताब्दी के जो कागज़ मिले उनके आधार पर डा० बार्नेट ने लिखा है कि 'यह संभव है कि मुग़लों (? मुसलमानों) के आने से बहुत पहिले हिंदुस्तान में काग़ज़ का प्रचार होगा परंतु उसका उपयोग कम होता था (बा; ऐं. इं; पृ. २२६-३०).
रूई का कपड़ा
c30.s4.1
रूई का कपड़ा जिसको 'पट' कहते हैं प्राचीन काल से लिखने के काम में कुछ कुछ आता था और अब तक भी आता है. उसे भी कागजों की तरह पहिले आटे की पतली लेई लगा कर सुखाते हैं, फिर शंख आदि से घोट कर चिकना बनाते हैं तब वह लिखने के काम में आता है. जैनों के मंदिरों की प्रतिष्ठा के समय अथवा उत्सवों पर रंगीन चावल आदि अन्नों से जो भिन्न भिन्न मंडल बनाये जाते हैं उनके पटों पर बने हुए रंगीन नक्शों का संग्रह जैन मंदिरों या उपासरों में पुस्तकों के साथ जगह जगह मिलता है५. ब्राह्मणों के यहां 'सर्वतोभद्र,' 'लिंगतोभद्र' आदि
c30.s4.2
५ अजमेर के बीसपंथी आम्नाय के बड़े धड़े के दिगंबर जैन मंदिर में २० से अधिक पट रक्खे हुए हैं, जिनपर ढाई द्वीप, तीन लोक, तेरह द्वीप, जंबू द्वीप आदि के विवरणसहित रंगीन चित्र हैं; उनमें से कितने एक पुराने और कुछ नये हैं. सब से छोटा १ फुट ५½ इंच लंबा और उतना ही चौड़ा, और सबसे बड़ा १५½ फुट लंबा और ५ फुट ७½ इंच चौड़ा है. कितने ही अन्य स्थानों में भी ऐसे अनेक पट देखने में आये हैं.
c30.s4.3
मंडलों के पट्ट पर बने हुए रंगीन नक्शे तथा 'मातृकास्थापन', 'ग्रहस्थापन' के सादे नक्शे मिलते हैं जिनके प्रत्येक कोष्ठ में स्थापित किये जानेवाले देवता आदि का नाम स्याही से यथास्थान लिखा रहता है. राजपूताने में 'भडली' या 'गुरडे' लोग कपड़े के लंबे लंबे खरड़ों पर लिखे हुए पंचांग रखते हैं जिनमें देवताओं, अवतारों आदि के रंगीन चित्र भी होते हैं. वे गांवों और खेतों में फिर कर वहां के लोगों को पंचांग सुना कर और उनके साथ के रंगीन चित्रों का हाल कह कर अपनी जीविका चलाते हैं. दक्षिण में माईसोर आदि की तरफ के व्यापारी लोग कपड़े पर इमली की गुठली की लेई लगा कर पीछे उसको काला करते हैं और उससे अपने हिसाब की 'बही' बनाते हैं जिसको 'कडितम्' कहते हैं और उसपर खड़िया से लिखते हैं. ऐसे दो तीन सौ वर्ष तक के पुराने सैंकड़ों कड़िते श्रृंगेरी के मठ में मिले हैं१ जिनमें मठ के हिसाब, शिलालेखों और ताम्र-पत्रों आदि की नकलें, तथा गुरुपरंपरा आदि बातें लिखी हुई हैं. पाटण (अणहिलवाड़ा) के एक जैन पुस्तकमंडार में श्रीप्रभसूरिरचित 'धर्मविधि' नामक पुस्तक, उदयसिंह की टीका सहित, १३ इंच लंबे और ५ इंच चौड़े कपड़े के ६३ पत्रों पर लिखा हुआ विद्यमान है२. कपड़े के पन्ने बना कर उनपर पुस्तक लिखे जाने का केवल यही एक उदाहरण मिला है.
c30.s4.4
१ माइसोर राज्य की आर्किआलॉजिकल सर्वे की रिपोर्ट, ई. स. १६१६, पृ. १८.
c30.s4.5
२ पी. पीटरसन की बंबई इहाते के संस्कृत पुस्तकों की खोज की पांचवीं रिपोर्ट, पृ. ११३.
लकड़ी का पाटा और पाटी
c30.s5.1
भारतवर्ष में पत्थर की स्लेटों के प्रचार के पहिले प्राचीन काल से ही विद्यार्थी लोग पाटों पर लिखना सीखते थे. ये पाटे लकड़ी के होते थे और चारों कोनों पर चार पाये उसी लकड़ी में से निकाले हुए होते थे. पाटों पर मुलतानी मिट्टी या खड़िया पोत कर सुखा देते थे. फिर उनपर ईंटों की सुरखी बिछा कर तीखे गोल मुख की लकड़ी की कलम से, जिसको राजपूताने में 'बरतना' या 'बरथा' (वर्णक) कहते हैं, लिखते थे. अब पाटों के स्थान में स्लेटों का प्रचार हो गया है तो भी कितने ही ग्रामीण पाठशालाओं के विद्यार्थी अब तक पाटों पर ही 'पहाड़े', 'हिसाब' आदि लिखते हैं. ज्योतिषी लोग अब तक बहुधा जन्मपत्र और वर्षफल आदि का गणित३ पाटों पर करने के बाद काग़ज़ों पर उतारते हैं. बच्चों की जन्मकुंडलियां तथा विवाह के समय लग्नकुंडलियां प्रथम पाटे पर गुलाल बिछा कर उसपर ही बनाई जाती हैं. फिर वे काग़ज़ पर लिखी जाकर यजमानों को दी जाती हैं.
c30.s5.2
३ इस प्रकार गणित करने की चाल को ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथों में 'धूलीकर्म' कहा है.
c30.s5.3
लकड़ी की बनी हुई पतली पाटी (फलक) पर भी प्राचीन काल में विद्यार्थी लिखते थे. बौद्धों की जातक कथाओं में विद्यार्थियों के फलक का उल्लेख मिलता है४. अब भी उसपर मुलतानी मिट्टी या खड़िया पोतने बाद स्याही से लिखते हैं. अब तक राजपूताना आदि के बहुत से दुकानदार बिक्री या रोकड़ का हिसाब पहिले ऐसी पाटियों पर लिख लेते हैं, फिर अवकाश के समय उसे बहियों में दर्ज करते हैं. विद्यार्थियों को सुंदर अक्षर लिखना सिखलाने के लिये ऐसी पाटियों को बहुधा एक तरफ़ लाल और दूसरी ओर काली रंगवाते हैं. फिर सुंदर अक्षर लिखनेवाले से उन-पर हरताल से वर्णमाला, बारखड़ी (द्वादशाक्षरी) आदि लिखवा कर उनपर रोगन फिरा देते हैं
c30.s5.4
४ देखो, ऊपर पृ. ३, और उसी पृष्ठ का टिप्पण २.
c30.s5.5
जिससे उनपर के हरताल के अक्षर पक्के हो जाते हैं. फिर विद्यार्थी लोग खड़िया को पानी में घोल कर नड (बरू) की कलम से उनपर लिखने का अभ्यास करते हैं जिसको 'पाटी घोटना' कहते हैं. इस तरह कुछ समय तक उनपर लिखने से विद्यार्थियों के अक्षर सुंदर बनने लग जाते हैं.
c30.s5.6
प्राचीन पुस्तकों की नक़ल करनेवाले अर्थात् पुस्तकलेखक लकड़ी की सादी या रंगीन पाटी पर, ऊपर से करीब ४ इंच छोड़ कर, डोरी लपेटते हैं और उसमें चार पांच इंच लंबी पतली लकड़ी लगा देते हैं, जिससे मूल प्रति का पन्ना दबा रहता है. उस पाटी को घुटनों पर रख ज़मीन पर बैठ कर पुस्तकों की नक्ल करते हैं.
रेशमी कपड़ा
c30.s6.1
रेशमी कपड़ा भी सूती कपड़े की नांई प्राचीन काल में लिखने के काम में लाया जाता था परंतु उसके बहुत महंगे होने के कारण उसका उपयोग बहुत कम ही होता होगा. अल्बेरूनी लिखता है कि 'मैंने यह सुना कि रेशम पर लिखी हुई काबुल के शाहियावंशी हिंदू राजाओं की वंशावली नगरकोट के क़िले में विद्यमान है. मैं उसे देखने को बहुत उत्सुक था परंतु कई कारणों से वह न बन सका'१. डॉ. बूलर ने जेसलमेर के 'बृहत् ज्ञानकोष' नामक जैन पुस्तकभंडार में रेशम की एक पट्टी पर स्याही से लिखी हुई जैन सूत्रों की सूची देखी थी२.
c30.s6.2
१ सँ; अ. इं; जि. २, पृ १२.
c30.s6.3
२ बू; इं पे; पृ ६३.
चमड़ा
c30.s7.1
यूरोप तथा अरब आदि एशिया के देशों में प्राचीन काल में लेखनसामग्री की सुलभता न होने से वहां क लोग जानवरों के चमड़ों को साफ़ कर उनपर भी लिखते थे परंतु भारतवर्ष में ताड़पत्र, भोजपत्र आदि प्राकृतिक लेखनसामग्री की प्रचुरता तथा सुलभता एवं जैनों में चर्ममात्र, तथा वैदिक काल के पीछे के ब्राह्मणों के मृगचर्म के अतिरिक्त और चमड़ा, अपवित्र माना जाने के कारण लिखने में उसका उपयोग शायद ही होता हो. तो भी कुछ उदाहरण ऐसे मिल आते हैं जिनसे पाया जाता है कि चमड़ा भी लिखने के काम में कुछ कुछ आता होगा. बौद्ध ग्रंथों में चमड़ा लेखनसामग्री में गिनाया गया है३. सुबंधु ने अपनी 'वासवदत्ता' में अंधकारयुक्त आकाश में रहे हुए तारों को स्याही से काले किये हुए चमड़े पर चंद्रमा रूपी खड़िया के टुकड़े से बनाये हुए शून्यबिंदुओं (बिंदियों) की उपमा दी है४. जेसलमेर के 'बृहत् ज्ञानकोष' नामक जैन पुस्तकभंडार में बिना लिखे हुए एक चर्मपत्र का हस्तलिखित पुस्तकों के साथ मिलना डॉ. बूलर बतलाता है५.
c30.s7.2
३ कत्त्यायन की भूमिका, पृ. २७. बू; इं. पे; पृ. ६५.
c30.s7.3
४ विप्रवं गणयतो विधातुः शशिकठिनीखण्डेन तमोमषीश्यामेऽजिन इव नभसि संसारस्यातिशून्यत्वाच्छून्यबिन्दव इव (वासवदत्ता; हॉल का संस्करण, पृ. १८२).
c30.s7.4
५ बू; इं. पे; पृ. ६५.
पत्थर
c30.s8.1
ताड़पत्र, भूर्जपत्र (भोजपत्र) या काग़ज़ पर लिखा हुआ लेख बहुत काल तक बचा नहीं रहता इस लिये जिस घटना की यादगार चिरस्थायी करना होता उसको लोग पत्थर पर खुदवाते थे और अब भी खुदवाते हैं. ऐसे लेख चट्टान, स्तंभ, शिला, मूर्तियों के आसन या पीठ, पत्थर के पात्रों या उन- के ढक्कनों पर खुदे हुए मिलते हैं. पत्थर पर खुदे हुए लेखों को 'शिलालेख,' और जिनमें राजाओं आदि का प्रशंसायुक्त वर्णन होता है उनको 'प्रशस्ति' कहते हैं. जिस आधार पर लेख खुदवाना होता वह यदि समान और चिकना न हो तो पहिले टांकियों से छील कर उसे समान बनाते फिर पत्थर आदि से घोंटकर वह चिकना बनाया जाता था१. जिस आशय का लेख लिखना होता उसकी रचना कोई कवि, विद्वान्, राजकीय अधिकारी१० या अन्य पुरुष करता. फिर सुंदर अक्षर लिखनेवाला लेखक२ एक एक अथवा दो दो पंक्तियां स्याही से पत्थर पर लिखता और उनको कारीगर (सूत्रधार) खोदता जाता था. इस प्रकार क्रमशः सारा पत्थर खोदा जाता४. इस प्रकार से तैयार किये जाते हुए शिलालेख मैंने स्वयं देखे हैं. लिखने के पूर्व पंक्तियां सीधी लाने के लिये यदि पत्थर अधिक लंबा होता तो सूत की पतली डोरी को गेरू में भिगो कर उससे पंक्तियों के निशान बनाते, जैसे कि लकड़ी के लट्ठे को चीर कर तख्ते निकालनेवाले खाती लोग लट्ठे पर बनाते हैं, और पत्थर कम लंबाई का होता तो गज़ या लकड़ी की पट्टी रख कर उसके सहारे टांकी आदि से लकीर का निशान बना लेते. मंदिर, बावड़ी आदि की भींतों में लगाये जानेवाले लेख पत्थर की छोटी बड़ी पट्टियों (शिलाओं) पर खुदवाये जाकर बहुधा ताकों में, जो पहिले बना लिये जाते थे, लगाये जाते थे. ऐसे लेखों के चारों ओर पुस्तकों के पन्नों की नांई हाशिया छोड़ा जाता था. कभी कभी खोदे जानेवाले स्थान के चारों ओर लकीरें५ खुदी हुई मिलती हैं. कभी वह स्थान पाव इंच से एक इंच या उससे भी अधिक खोद कर हाशिये से नीचा६ किया हुआ मिलता है. अधिक सावधानी से खुदवाये हुए लेखों में कभी पत्थर की चटक उड़ गई तो उसमें पत्थर के रंग की मिश्रधातु भर कर उस स्थान को समान बनाते थे और यदि अक्षर का कोई अंश चटक के साथ उड़ जाता तो उसको पीछा उस धातु पर खोद लेते थे७. बहुधा शिलालेखों के प्रारंभ में और कभी अंत में कोई मंगल सूचक सांकेतिक चिह्न८, शब्द८ या किसी देवता के प्रणामसूचक
c30.s8.2
१ यह हाल सावधानी के साथ तय्यार किये हुए लेखों का है. कई लेख खरदरे पत्थरों पर बेपरवाही के साथ खोदे हुए भी मिलते हैं.
c30.s8.3
१० जिन शिलालेखों में राजा की तरफ़ की किसी आज्ञा आदि का उल्लेख होता उन्हें राजकर्मचारी ही तय्यार करते थे.
c30.s8.4
२ लेखक बहुधा ब्राह्मण, कायस्थ, जैन साधु या सूत्रधार (सिलावट) लोग होते थे.
c30.s8.5
४ हिंदुओं के शिलालेखों के अक्षर पत्थर के भीतर बांदे जाते हैं परंतु मुसलमानों के अरबी या फारसी के लेखों के अक्षर उभड़े हुए होते हैं और पत्थर का वह अंश जहां पर अक्षर नहीं होता टांकियों से तोड़कर उड़ा दिया जाता है. कोई कोई हिंदू मुसल्मानों का अनुकरण कर उभड़े हुए अक्षरवाले लेख भी बनाने लग गये परंतु ऐसे लेख बहुत ही कम मिलते हैं. अब तक ऐसे केवल दो ही लेख मेरे देखने में आये हैं. एक तो मथुरा के म्यूज़िअम में और दूसरा बाड़ी(धौलपुर राज्य में) में. वे दोनों मुसल्मानों के समय के हैं.
c30.s8.6
५ अशोक के गिरनार के लेख की १४ धर्माज्ञाओं में से प्रत्येक के चारों ओर लकीरें खुदी हुई हैं. वि. सं. १३७३ (ई. स. १३१६) के लाडनू (जोधपुर राज्य में) से मिले हुए लेख (जो राजपूताना म्यूज़िअम, अजमेर, में रक्खा हुआ है) के चारों ओर लकीरें हैं (पें. इं; जि. १२, पृ. २४ के पास का प्लेट)
c30.s8.7
६ वसंतगढ़ (सिरोही राज्य में) से मिले हुए परमार राजा पूर्णपाल के समय के वि. सं. १०९६ (ई. स. १०४२) के लेख का, जो राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खा हुआ है, खुदा हुआ अंश हाशिये से करीब पाव इंच नीचा है और वहीं रक्खे हुए अर्थूणा (बांसवाड़ा राज्य में) के दो शिलालेखों का खुदा हुआ अंश प्रायः एक इंच नीचा है. उनमें से एक (खंडित) परमार राजा चामुंडराज के समय का वि. सं. ११५७ (ई. स. ११०१) का और दूसरा परमार राजा विजयराज के समय का वि. सं. ११६६ (ई. स. १११०) का है.
c30.s8.8
७ राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में अजमेर के चौहान राजा विग्रहराज (बीसलदेव) रचित 'हरकेलिनाटक,' की तथा सोमेश्वर पंडितरचित 'ललितविग्रहराजनाटक' की दो दो शिलाएं रक्खी हुई हैं. इन चारों शिलाओं में कई जगह धातु भरी हुई है और कहीं उसपर अक्षर का अंश भी खुदा हुआ है.
c30.s8.9
८ चिह्नों में स्वस्तिक (आ. स. स. ई; जि. १, प्लेट ६६; आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ४६, लेख संख्या ५, ६, ७, ९, ११, १३, १४ आदि), चक्र (धर्मचक्र) पर रहा हुआ त्रिशूल (त्रिरत्न; आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ४६, लेख संख्या ८, १०, १५ आदि), 'ॐ' का सांकेतिक चिह्न (देखो, लिपिपत्र १६, २१, २३ आदि के साथ दी हुई मूल पंक्तियों के आरंभ में) तथा कई अन्य चिह्न मिलते हैं जिनका आशय ठीक ठीक ज्ञात नहीं हुआ (आ. स. वे. इं; जि ४, सेट ४४, भाजा का लेख ७; सेट ४५, कूडा के लेख १, ६, १६; प्लेट ४६, कूडा के लेख २०, २२, २७, २६).
c30.s8.10
८ शब्दों में 'सिद्धम्' (पें. इं; जि. १२, पृ. १२० के पास का प्लेट, लिपिपत्र ७, ६, ११, १२, १५ आदि के साथ दी हुई मूलपंक्तियों के प्रारंभ में ), ‘स्वस्ति’ ( लिपिपत्र १७ की मूलपंक्तियों के प्रारंभ में ‘ओं’ के सांकेतिक चिह्न के बाद ), ‘हरिः ओम् स्वस्ति श्रीः’ ( ऍ. इं; जि. ३, पृ. १४ के पास का सेट ) आदि.
c30.s8.11
शब्द१ मिलते हैं. वर्तमान लेखनशैली के अनुसार उनमें पदच्छेद अर्थात् प्रत्येक शब्द का अलग अलग लिखना नहीं मिलता परंतु पंक्ति की पंक्ति बिना स्थान छोड़े लिखी जाती थी. कभी कभी शब्द अलग अलग भी लिखे मिलते हैं२ परंतु किसी नियम से नहीं. विराम के चिह्नों के लिये केवल एक और दो खड़ी लकीरों (दंड) का बहुधा प्रयोग होता था३. श्लोकार्ध बतलाने अथवा शब्दों या वाक्यों को अलग करने के लिये एक, और श्लोकांत या विषय की समाप्ति के लिये दो खड़ी लकीरें बहुधा बनाई जाती थीं४. कहीं कहीं प्रत्येक पंक्ति में आधा या एक श्लोक ही लिखा हुआ मिलता५ है और कभी कविताबद्ध लेखों में श्लोकांक भी पाये जाते हैं६. कभी अंत में अथवा एक विषय की समाप्ति पर कमल७, फूल८, वृत्त९ या कोई अन्य चिह्न१० भी खोदा जाता था. लेखक जब
c30.s8.12
१ ‘ओं ( सांकेतिक चिह्न से ) नमः शिवाय’ ( लिपिपत्र २१ की मूल पंक्तियों के प्रारंभ में ), ‘ओं ( सांकेतिक चिह्न से ) नमो विष्णवे’ ( लिपिपत्र २३ की मूल पंक्तियों के प्रारंभ में ), ‘नमो अरहंतो वर्धमानस्र्य’ ( लिपिपत्र ५ की मूल पंक्तियों के प्रारंभ में ), ‘ओं ( सांकेतिक चिह्न से ) ओं नमो वीतरागाय’ ( राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खे हुए परमार राजा विजयराज के समय के वि. सं. ११६६ के शिलालेख के प्रारंभ में ), ‘ओं ( सांकेतिक चिह्न से ) नमो बुद्धाय’ ( ऍ. इं; जि. १२, पृ. २८ के पास का सेट ), ‘ओं नमो रत्नत्रयाय’ ( शेरगढ का लेख; इं. ऍ; जि. १४, पृ. ४५ ) आदि. लेखों के अंत में कभी कभी ‘श्रीः’, ‘शुभं भवतु’, ‘श्रीरस्तु’ आदि शब्द मिलते हैं और कभी कभी ‘॥ छ ॥’ लिखा हुआ मिलता है. यह ‘छ’ प्राचीन ‘थ’ अक्षर का रूपांतर प्रतीत होता है जो वास्तव में धर्मचक्र या सूर्य का सूचक होना चाहिये.
c30.s8.13
२ अशोक के देहली ( ई. ऍ; जि. १३, पृ. ३०६ से ३१० के बीच के सेट; जि. १६, पृ. १२२ और १२४ के बीच के सेट ), रधिया, मथिया, रामपुरवा ( ऍ. इं; जि. २, पृ. २४८ से २५२ के बीच के सेट ), पदेरिया, निग्लीवा ( ऍ. इं; जि ५, पृ. ४ के पास का सेट ) और सारनाथ ( ऍ. इं; जि. ८, पृ. १६८ के पास का सेट ) के स्तंभों के लेखों; खालसी के चट्टान की १ से ६ तक की धर्मज्ञाओं ( ऍ. इं; जि. २, पृ. ४५० और ४५६ के बीच के दो सेट ), एवं कितने एक अन्य लेखों में ( आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ५२, लेखसंख्या ५, १०, १८, १६; सेट ५३, लेखसंख्या १३, १४; सेट ५४, लेखसंख्या ११; सेट ५६, लेखसंख्या ४; ऍ. इं; जि. ८, पृ. १७६ के पास का सेट, लेख e ) शब्दों या समासवाले शब्दों के बीच स्थान छोड़ा हुआ मिलता है.
c30.s8.14
३ इन विरामचिह्नसूचक लकीरों के लिये कोई निश्चित नियम नहीं था. कहीं बिना आवश्यकता के लगाई जाती थीं और कहीं आवश्यकता होने पर भी छोड़ दी जाती थीं. कहीं लेख की प्रत्येक पंक्ति के प्रारंभ में ( वेरावल से मिले हुए वलभी संवत् ६२७ के लेख में प्रत्येक पंक्ति के प्रारंभ में दो दो खड़ी लकीरें हैं; ऍ. इं; जि. ३, पृ. ३०६ के पास का सेट ) और कहीं अंत में भी ( अजमेर म्यूज़िअम में रक्खी हुई चौहानों के किसी ऐतिहासिक काव्य की शिलाओं में से पहिली शिला की बहुधा प्रत्येक पंक्ति के अंत में एक या दो खड़ी लकीरें हैं ) ऐसी लकीरें बिना आवश्यकता के मिलती हैं.
c30.s8.15
४ इन विरामसूचक लकीरों में भी अक्षरों की नांई सुंदरता लाने का यत्न करना पाया जाता है. कहीं खड़ी लकीर के स्थान में अर्धवृत्त, कहीं उनके ऊपर के भाग में गोलाई या सिर की सी आड़ी लकीर और कहीं मध्य में आड़ी लकीर लगी हुई मिलती है.
c30.s8.16
५ मौखरी अनंतवर्मन् के नागार्जुनी गुफा के लेख की प्रत्येक पंक्ति में आधा ( फ़्ली; गु. इं; सेट ३१ A ) और अजंटा की गुफा के एक लेख ( आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ५६, लेखसंख्या ४ ) तथा गुलवाड़ा के पास की गुफा के घटोत्कच के लेख ( आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ६० ) में एक एक श्लोक ही खुदा है.
c30.s8.17
६ समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के अशोक के लेखवाले स्तंभ पर खुदे हुए लेख के श्लोकबद्ध अंश में ( फ़्ली; गु. इं; सेट १ ) तथा ग्वालिश्रर से मिलें हुए प्रतिहार राजा भोजदेव के शिलालेख ( आ. स. इं; ई. स. १८०३-४, प्लेट ७२ ) में श्लोकांक दिये हैं.
c30.s8.18
७ जोधपुर से मिले हुए प्रतिहार राजा बाउक के लेख में, जो राजपूताना म्यूज़िअम ( अजमेर ) में रक्खा हुआ है, संवत् के पूर्व कमल खुदा है.
c30.s8.19
८ चाहमान विग्रहराज के हर्षनाथ के लेख की ३३ वीं पंक्ति में विषय की समाप्ति पर फूल खुदा है ( ऍ. इं; जि. २, पृ. १२० के पास का सेट ).
c30.s8.20
९ परतावगढ़ ( राजपूताने में ) से मिले हुए कन्नौज के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल ( दूसरे ) के समय के वि. सं. १००३ ( ई. स. ९४६ ) के शिलालेख में, जो राजपूताना म्यूज़िअम ( अजमेर ) में रक्खा हुआ है, १४ वीं और ३० वीं पंक्तियों में वृत्त ( O ) बने हुए हैं.
c30.s8.21
१० वसंतगढ़ ( सिरोही राज्य में ) से मिले हुए परमार राजा पूर्णपाल के समय के वि. सं. १०६६ ( ई. स. १०४२ ) के शिलालेख के अंत में, तथा ऊपर दो जगह भिन्न भिन्न प्रकार के चिह्न बने हुए हैं. कितने एक लेखों के ऊपर के खाली हिस्सों में शिवलिंग, नंदी, वत्ससहित गौ, सूर्य या चंद्र आदि के चित्र भी खुदे मिलते हैं.
c30.s8.22
किसी अक्षर या शब्द को भूल से छोड़ जाता तो वह अक्षर या शब्द या तो पंक्ति के ऊपर या नीचे अथवा हाशिये पर लिखा जाता था और कभी वह अक्षर या शब्द किस स्थान पर चाहिये था यह बतलाने के लिये ^ या × चिह्न भी मिलता है जिसको ‘काकपद’ या ‘हंसपद’ कहते हैं१. भूल से अधिक लिखा हुआ अक्षर, शब्द, मात्रा या अनुस्वार आदि या तो टांकी से उड़ा दिया जाता या उस पर छोटी छोटी खड़ी या तिरछी लकीर या लकीरें२ बना कर उसे काट दिया जाता था. कई लेखों के अंत में उनके लगाये जाने या उनसे संबंध रखनेवाले स्थानों के बनने का संवत्, ऋतु, मास, दिन, पक्ष, तिथि आदि३ एवं उनके रचयिता, लेखक और खोदनेवालों के नाम भी दिये हुए मिलते हैं४. मंदिर आदि की दीवारों के ताकों में लगाये जानेवाले लेख बहुधा एक ही छोटी या बड़ी शिला पर खुदे हुए होते हैं परंतु कभी पांच तक पर भी खुदे हुए मिलते हैं५. ये लेख प्राकृत, संस्कृत, कनड़ी, तेलुगु, तामिळ, प्राचीन हिंदी आदि भाषाओं में हैं.
c30.s8.23
१ बुद्धगया से मिले हुए अशोकचल्ल के लक्ष्मणसेन संवत् ५१ के लेख की पहिली पंक्ति में ‘तथागतो द्यवदत्’ में ‘वो’ लिखना रह गया जिसको पंक्ति के ऊपर लिखा है और नीचे ^ चिह्न बनाया है (एं. इं; जि. १२, पृ. २८ के पास का प्लेट). वि. सं. १२०७ की महाबन की प्रशस्ति की ८ वीं पंक्ति में ‘तस्याभूत्तनयो नयोन्नतमतिः’ में दूसरा ‘नयो’ लिखना रह गया जिसको पंक्ति के नीचे लिखा है. उसी प्रशस्ति की ११ वीं पंक्ति में [८ वें] श्लोक का चतुर्थ चरण लिखना रह गया, जो बाईं ओर के हाशिये पर लिखा गया है और जहां वह चाहिये था उस स्थान पर पंक्ति के ऊपर () चिह्न किया है. ऐसे ही उसी प्रशस्ति की २० वीं पंक्ति में [१७ वां] श्लोक रह गया वह भी बाईं ओर के हाशिये पर लिखा है और जहां वह चाहिये था वहां पंक्ति के ऊपर × चिह्न किया है और वही चिह्न हाशिये पर (अंत में) दिया है (एं. इं; जि. २, पृ. २७६ के पास का प्लेट).
c30.s8.24
२ बिल्हारी के लेख की पहिली पंक्ति [श्लोक १] में पहिले ‘० तोरगपतिः प्रस्फार०’ खुदा था परंतु पीछे से ‘०पीतः’ का विसर्ग टांकी से उड़ा दिया है तो भी नीचे की विंदी का कुछ अंश दीखता है (एं. इं; जि. १, पृ. २५४ के पास का प्लेट). उसी लेख की पांचवीं पंक्ति [श्लोक ६] में ‘लीलोल्लालितशार्वपर्वतपते०’ खुदा था परंतु पीछे से ‘शार्व’ के ‘शा’ के साथ लगी हुई ‘आ’ की मात्रा की सूचक खड़ी लकीर को तिरछी लकीर से काट दिया है. कणस्वा के लेख की १६ वीं पंक्ति में ‘यति- हीनंमथशब्दहीनं’ खुदा था परंतु पीछे से ‘मथ’ के दोनों अक्षरों के ऊपर पांच पांच छोटी खड़ी लकीरें बना कर उन्हें काट दिया है (इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट).
c30.s8.25
३ कहीं पुराने लेखों में संवत् के साथ ऋतु और दिन (‘कनिष्कस्य सं ४ हे १ दि १’—एं. इं; जि. १, पृ. ३८१); कहीं ऋतु, मास और दिन (‘संवत्सरे पंचविशे हेमंतमसे त्रितिये दिवस वीशे’—एं. इं; जि. १, पृ. ३८४); कहीं मास, पक्ष और तिथि (रुद्रदाम्नो वर्षे द्विसप्ततितमे ७२ मार्गशीर्षवहुलप्रति...—एं. इं; जि. ८, पृ. ४२) मिलते हैं. कहीं संवत् के स्थान में राज्यवर्ष (सन जुलूस) भी मिलते हैं. चौथी शताब्दी के पीछे के लेखों में बहुधा संवत्, मास, पक्ष, तिथि आदि मिलते हैं.
c30.s8.26
४ अर्थूणा (बांसवाड़ा राज्य में) के मंडलेसर के मंदिर में लगे हुए परमार चामुंडराज के वि. सं. ११३६ फाल्गुन सुदि ७ शुक्र वार के कविताबद्ध बड़े लेख में उसका रचयिता चंद्र, लेखक वालभ्यजाति का कायस्थ आसराज और खोद- नेवाला चामुंडक होना लिखा है.
c30.s8.27
५ कुंभलगढ़ (मेवाड़ में) के कुंभस्वामी (मामादेव) के मंदिर में लगा हुआ महाराणा कुंभकर्ण का लेख बड़ी बड़ी पांच शिलाओं पर खुदा हुआ था जिनमें से ४ के टुकड़े मिल गये हैं.
c30.s8.28
पुस्तकें भी चिरस्थायी रखने के लिये कभी कभी चट्टान या शिलाओं पर खुदवाई जाती थीं६.
c30.s8.29
६ प्राग्वाट (पोरवाड़) श्रेष्ठी (सेठ) लोलाक (लोलिग) ने वीजोल्यां (मेवाड़ में) के निकट के जैन मंदिर के पास के एक चट्टान पर ‘उन्नतशिखरपुराण’ नामक दिगंबर जैन पुस्तक वि. सं. १२२६ (ई. स. ११७०) में खुदवाया जो अब तक विद्यमान है. बीजोल्यां के विद्यानुरागी स्वर्गीय राव कृष्णसिंह ने उसपर तथा उसके पास के दूसरे चट्टान पर खुदे हुए उक्त जैन मंदिर के संबंध के ही विशाल लेखपर भी (जो उसी संवत् का है और जिसमें चाहमान से लगाकर सोमेश्वर तक की सांभर और अजमेर के चौहानों की पूरी वंशावली और लोलाक के वंश का वर्णन है) मेरे आग्रह से पक्के मकान बनवा कर उनकी रक्षा का सुप्रबंध कर दिया है. चौहान राजा विग्रहराज (वीसलदेव) के बनाये हुए ‘हरकेलिनाटक’ की दो शिला, सोमेश्वर कविरचित ‘ललितविग्रहराजनाटक’ की दो शिला तथा चौहानों के किसी ऐतिहासिक काव्य की पहिली शिला, ये पांचों अजमेर के ढाई दिन के झोंपड़े से (जो प्रारंभ में वीसलदेव की बनाई हुई पाठशाला थी) मिलीं हैं और इस समय अजमेर के राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खी हुई हैं. मालवे के प्रसिद्ध विद्वान् राजा भोजरचित ‘कूर्मशतक’ नामक दो प्राकृत काव्य (एं. इं; जि. ८, पृ. २४३—६०) और राजकवि मदनरचित ‘पारि- जातमंजरी(विजयश्री)नाटिका’—एं. इं; जि. ८, पृ. ९०१—१७, ये तीनों पुस्तक धार (मालवे में) में कमल मौला नामक स्थान (जो पहिले राजा भोज की बनवाई हुई ‘सरस्वतीकंठाभरण’ नामक पाठशाला थी) से शिलाओं पर खुदे हुए मिले हैं. मेवाड़ के महाराणा कुंभकर्ण (कुंभा) ने कीर्तिस्तंभों के विषय का कोई पुस्तक शिलाओं पर खुदवाया था जिसकी पहिली शिला का प्रारंभ का अंश चित्तोड़ के क़िले से मिला जिसको मैंने वहां से उठवा कर उदयपुर के विक्टोरिआ हाल के म्यूज़ियम् में रखवाया है. मेवाड़ के महाराणा राजसिंह (प्रथम) ने, तैलंग भट्ट मधुसूदन के पुत्र रणछोड़ भट्ट रचित ‘राजप्रशस्ति’ नामक २५ सर्गों का महाकाव्य बड़ी बड़ी २४ शिलाओं पर खुदवाकर अपने बनवाये हुए ‘राजसमुद्र’ नामक विशाल तालाब के सुंदर बंद पर २४ ताकों में लगवाया जो अब तक वहां पर सुरक्षित है.
c30.s8.30
अकीक, स्फटिक आदि कीमती पत्थरों पर भी खुदे हुए छोटे छोटे लेख मिले हैं १.
ईंट
c30.s9.1
बौद्ध लोग पत्थर की नांई मिट्टी की ईंटों पर भी अपने धर्मसंबंधी सूत्रों आदि को खुदवाते थे. मथुरा के म्यूज़ियम् में कितने एक बड़ी बड़ी ईंटों के टुकड़े रक्खे हुए हैं जिनकी मोटाई पर एक तरफ की लंबाई की ओर ई. स. पूर्व की पहिली शताब्दी के आसपास की लिपि में बड़े अक्षरों की एक एक पंक्ति खुदी हुई है. अनुमान होता है कि ये ईंटे दीवार आदि में एक पंक्ति में लगाई गई होंगी कि उनपर खुदा हुआ आशय क्रम से पढ़ा जावे. गोरखपुर ज़िले के गोपालपुर गांव से तीन ईंटें अखंडित और कुछ के टुकड़े मिले हैं जिनके दोनों ओर बौद्ध सूत्र खुदे हैं. ये ईंटें ११ १/२ से ६ १/२ इंच तक लंबी और ४ १/२ से ४ १/२ इंच तक चौड़ी हैं और उनकी एक ओर १२ से १० और दूसरी तरफ १२ से ६ तक पंक्तियां ई. स. की तीसरी या चौथी शताब्दी की लिपि में खुदी हुई हैं२. नैनीताल ज़िले के तराई परगने में काशीपुर के निकट के उज्जैन नामक प्राचीन क़िले से दो ईंटें मिली हैं जिनमें से एक पर ‘...त्तस्य राज्ञोः श्रीपृथिविमित्तस’ और दूसरी पर ‘राज्ञो मातृमित्तपुत्त’ लेख खुदा हुआ है३. ये लेख ई. स. की तीसरी शताब्दी के आसपास के होने चाहिये. कच्ची ईंटों पर लेख खोद लेने के बाद वे पकाई जाती थीं.
c30.s9.2
१ स्फटिक के टुकड़े पर खुदा हुआ एक छोटा लेख भट्टिप्रोलु के स्तूप से मिला है (एं. इं; जि. २, पृ ३९८ के पास का प्लेट.)
c30.s9.3
२ एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के प्रोसीडिंग्ज़, ई. स. १८६६, पृ. १००-१०२. डें; बु. इं; पृ. १२२ के पास का प्लेट.
c30.s9.4
३ इन लेखों की प्रतिकृतियां ई. स. १६०१ ता. ६ डिसंबर के ‘पायोनिअर’ नामक अलाहाबाद के दैनिक अंग्रेज़ी पत्र में प्रसिद्ध हुई थीं.
c30.s9.5
ईंटों के अतिरिक्त कभी मिट्टी के पात्रों४ पर भी लेख खुदवाये जाते थे और मिट्टी के ढेलों पर भिन्न भिन्न पुरुषों, स्त्रियों आदि की मुद्राएं लगी हुई मिलती हैं, जिनके अक्षर उभड़े हुए होते हैं. पुरुषों की५ मुद्राओं के अतिरिक्त कितने एक ढेलों पर बौद्धों के धर्ममंत्र ‘ये धर्महेतुप्रभवा०’ की मुद्रा लगी हुई भी मिलती हैं. बरतन एवं ढेले लेख के खुदने और मुद्रा के लगने के बाद पकाये जाते थे.
c30.s9.6
४ वलभीपुर (वळा, काठियावाड़ में) से मिले हुए मिट्टी के एक बड़े पात्र के टुकड़े पर ‘[२००] ४० ७ श्रीगुहसेनः घटा...’ लेख है (इं. ऐं; जि. १४, पृ. ७५). यह पात्र वलभी के राजा गुहसेन (दूसरे) के समय का गुप्त सं. २४७ (ई. स. ५६६-७) का होना चाहिये
c30.s9.7
५ आ. स. रि; ई. स. १६०३-४, प्लेट ६०-६२.
सोना
c30.s10.1
बौद्धों की जातक कथाओं में कभी कभी कुटुंबसंबंधी आवश्यक विषयों, राजकीय आदेशों तथा धर्म के नियमों के सुवर्ण के पत्रों पर खुदवाये जाने का उल्लेख मिलता है६, परंतु सोना बहुमूल्य होने के कारण उसका उपयोग कम ही होता होगा. तक्षशिला के गंग नामक स्तूप से खरोष्ठी लिपि
c30.s10.2
६ देखो, ऊपर पृ. ५ और उसी पृष्ठ के टिप्पण ६, ७, ८.
c30.s10.3
के लेखवाला एक सुवर्ण का पत्रा१ जनरल कनिंगहाम को मिला था. बर्मा के प्रोम ज़िले के ह्ड़ुवा नामक गांव के पास से दो सोने के पत्रे२ खुदे हुए मिले हैं. उनमें से प्रत्येक के प्रारंभ में ‘ये धर्महेतुप्रभवा०’ श्लोक और उसके पीछे पाली भाषा का गद्य है. उनकी लिपि ई. स. की चौथी या पांचवीं शताब्दी के आस पास की है और उसमें कई अक्षर दक्षिणी शैली के हैं.
c30.s10.4
२ ए. इं; जि. ५, पृ. १०१ और उसी के पास का प्लेट.
चांदी
c30.s11.1
सुवर्ण की नांई कभी कभी चांदी के पत्रों पर भी लेख खुदवाये जाते थे. ऐसा एक पन्ना भट्टिप्रोलू के स्तूप से३ और दूसरा तक्षशिला४ से मिला है. जैन मंदिरों में चांदी के गट्टे५ और यंत्र५ मिलते हैं.
c30.s11.2
३ बृ; इं; पे; पृ. ६५.
c30.s11.3
४ ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १६१४, पृ. ६७५—७६ और ई. स. १६१५, पृ. १६२ के सामने का प्लेट.
c30.s11.4
५ जैन मंदिर में मूर्तियों के साथ पूजन में रक्खे हुए चांदी के गट्टे गोल आकृति के होते हैं जिनपर ‘नमोकार मंत्र’ (नमो अरिहंताणं०) आठ दल के कमल और मध्य के वृत्त, इन नव स्थानों में मिल कर पूरा खुदा हुआ होने से उसको ‘नवपदजी का गट्टा’ कहते हैं; ऐसे ही चांदी के गट्टों पर यंत्र भी खुदे रहते हैं. अजमेर में श्वेताम्बर संप्रदाय के मूंतां के मंदिर में चांदी के ४ नवपद के गट्टे और करीब एक फुट लंबे और उतने ही चौड़े चांदी के पत्रे पर ‘ऋषिमंडलमंत्र’ खुदा है. वहीं के बड़े मंदिर (श्वेतांबरी) में ‘ह्रीं बीज’ तथा ‘सिद्धचक्र’ यंत्रों के गट्टे भी रक्खे हुए हैं.
तांबा
c30.s12.1
लेखन सामग्री के संबंध में धातुओं में तांबा सब से अधिक काम में आता था. राजाओं तथा सामंतों की तरफ़ से मंदिर, मठ, ब्राह्मण, साधु आदि को दान में दिये हुए गांव, खेत, कुए आदि की सनदें तांबे पर प्राचीन काल से ही खुदवा कर दी जाती थीं और अब तक दी जाती हैं जिनको ‘दानपत्र’, ‘ताम्रपत्र’, ‘ताम्रशासन’ या ‘शासनपत्र’ कहते हैं. दानपत्रों की रचना अमात्य (मंत्री), सांधिविग्रहिक६, बलाधिकृत (सेनापति) या अक्षपटालिक७ आदि अधिकारियों८ में से कोई स्वयं करता या किसी विद्वान् से कराता था. कहीं उस काम के लिये एक अधिकारी८ भी रहता था. फिर उसको सुंदर अक्षर लिखनेवाला लेखक तांबे के पत्रे पर स्याही से लिखता और सुनार, ठठेरा, लुहार या कोई शिल्पी उसे खोदता था. कभी कभी ताम्रलेख रूप में नहीं किंतु बिंदियों९ से खुदे हुए भी मिलते हैं. जिस पुरुष की मारफ़त भूमिदान की सनद तय्यार करने की राजाज्ञा पहुंचती उसको ‘दूतक१०’ कहते थे. दूतक का नाम बहुधा दानपत्रों में लिखा रहता है. दक्षिण से मिले
c30.s12.2
१ क; आ. स. रि; जि. २, पृ. १३० और प्लेट ५६.
c30.s12.3
६ ‘सांधिविग्रहिक’ उस राजमंत्री को कहते थे जिसको ‘संधि’ (सुलह) और ‘विग्रह’ (युद्ध) का अधिकार होता था.
c30.s12.4
७ ‘अक्षपटलिक’ राज्य के उस अधिकारी को कहते थे जिसके अधीन हिसावसंबंधी काम रहता था परंतु कभी इस शब्द का प्रयोग राज्य के दफ़्तर के अध्यक्ष के लिये भी होता था. अतएव संभव है कि दफ़्तर और हिसाब दोनों ही कहीं कहीं एक ही अधिकारी के अधीन रहते हों.
c30.s12.5
८ कश्मीर के राजा ताम्रपत्र तय्यार करने के लिये ‘पट्टोपाध्याय’ नामक अधिकारी रखते थे. यह अधिकारी अक्षपटलिक के अधीन रहता था (कल्हणकृत राजतरंगिणी; तरंग ४, श्लो. ३६७-६८).
c30.s12.6
९ देखो, ऊपर पृ. १००, टिप्पण ३.
c30.s12.7
१० दूतक कभी कभी राजकुमार, राजा का भाई, कोई राज्याधिकारी आदि होते थे. कभी राजा स्वयं आज्ञा देता था. राजपूताने में ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आस पास से ताम्रपत्र राजस्थानी हिंदी में लिखे जाने लगे तो भी दूतक का नाम रहता था (अत हुए).
c30.s12.8
हुए किसी किसी दानपत्र के अक्षर इतने पतले हैं कि वे पहिले स्याही से लिखे गये हों ऐसा प्रतीत नहीं होता. संभव है कि तांबे के पत्नों पर पहिले मुलसानी मिट्टी या ऐसा ही कोई और पदार्थ पोतने के बाद दक्षिणी शैली के ताड़पत्रों की नांई उनपर तीखे गोल मुंह की लोहे की कलम से लेखक ने अक्षर बनाये हों जिनको खोदनेवाले कारीगर ने किसी तीक्ष्ण औज़ार से खोदा हो. उत्तरी हिंदुस्तान से मिलनेवाले दानपत्र बहुधा एक या दो पत्रों पर ही खुदे मिलते हैं परंतु दक्षिण से मिलनेवाले अधिक पत्रों पर भी खुदे हुए मिलते हैं, जैसे कि विजयनगर के वेंकटपतिदेव महाराज का मदुरा से मिला हुआ शक सं. १५०८ (ई. स. १५८६) का दानपत्र ६ पत्रों१ पर और हॉलैंड देश की लेडन युनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) के म्यूजिअम् में रक्खा हुआ राजेंद्रचोल के २१ वें राज्यवर्ष का दानपत्र २१ पत्रों२ पर खुदा हुआ है. दो से अधिक और ६ से कम पत्नों पर खुदे हुए तो कई एक मिल चुके हैं. कभी कभी ऐसे ताम्रपत्रों की एक तरफ़ के बाईं ओर के हाशिये पर या ऊपर पत्रांक भी खुदे मिलते हैं. जो दानपत्र दो या अधिक पत्रों पर खुदे रहते हैं उनका पहिला और अंत का पत्रा बहुधा एक ही ओर अर्थात् भीतर की तरफ़ से खुदा रहता है. ऐसे दानपत्रों के प्रत्येक पत्रे में यदि पंक्तियां कम लंबाई की हों तो एक, और अधिक लंबाई की हों तो दो, छेद होते हैं जिनमें तांबे की कड़ियां डाली जाती हैं जिनसे सब पत्रे एकत्र रहते हैं. कभी कभी ताम्रपत्रों को एकत्र रखनेवाली कड़ी की संधि पर तांबे का लोंदा लगा कर उसपर राजमुद्रा लगाई जाती थी३, जिसके साथ के लेख के अक्षर उभड़े हुए मिलते हैं. कभी कभी एक ही पत्ने पर खुदे हुए दानपत्र की बाईं ओर राजमुद्रा, जो अलग ढाली जा कर बनाई जाती थी, जुड़ी हुई मिलती है.४ कभी कभी राजमुद्रा पत्रे पर५ ही खोदी जाती थी, जिसके साथ कोई लेख नहीं होता. कितने एक ताम्रपत्रों के अंत में राजाओं के हस्ताक्षर खुदे हुए रहते हैं जिनसे उनके लेखनकला के ज्ञान का भी पता लगता है. ताम्रपत्र छोटे बड़े भिन्न भिन्न लंबाई चौड़ाई के पतले या मोटे पत्रों६ पर खुदवाये जाते थे जो तांबे के पाट को कूट कूट कर बनाये जाते थे. कई ताम्रपत्रों पर हथोड़ों की चोटों के निशान पाये जाते हैं. अब जो ताम्रपत्र बनते हैं वे तांबे की चद्दरों को काट कर उनपर ही खुदवाये जाने हैं. ताम्रपत्र खोदने में यदि कोई अशुद्धि हो जाती तो उस स्थान को कूट कर बराबर कर देते और फिर उसपर शुद्ध अक्षर खोद देते. ताम्रपत्रों पर भी शिलालेखों की तरह कुछ कुछ हाशिया छोड़ा जाता और कभी कभी किनारें ऊंची उठाई जाती थीं. दानपत्रों के अतिरिक्त कभी कोई राजाज्ञा७ अथवा स्तूप, मठ आदि बनाये जाने के लेख८ तथा ब्राह्मणों और जैनों के विविध यंत्र९ भी तांबे के त्रिकोण, गोल या चतुरस्र पत्त्रों पर खुदे हुए मिलते हैं. तांबे आदि के बरतनों पर उनके मालिकों के नाम खुदाये जाने की प्रथा भी प्राचीन है. कभी कभी तांबे के पत्त्रों पर पुस्तकें१ भी खुदवाई जाती थीं.
c30.s12.9
१ ऐ. इं; जि. १२, पृ. १७१-८५.
c30.s12.10
२ डॉ० बर्जेस संपादित 'तामिल ऐंड संस्कृत इन्स्क्रिप्शन्र्स,' पृ. २०६-१६.
c30.s12.11
३ राजमुद्रा में राज्यचिह्न, किसी जानवर या देवता का सूचक होता है. भिन्न भिन्न वंशों के राज्यचिह्न भिन्न भिन्न मिलते हैं जैसे कि वलभी के राजाओं का नंदी, परमारों का गरुड, दक्षिण के चालुक्यों का वराह, सेनवंशियों का सदाशिव आदि.
c30.s12.12
४ राजपूताना म्यूज़िअम् में रक्खे हुए प्रतिहार राजा भोजदेव के वि. सं. ९०० (ई. स. ८४३) के दानपत्र की बड़ी राजमुद्रा अलग बनाई जाकर ताम्रपत्र की बाईं ओर झाल कर जोड़ी है. प्रतिहार महेन्द्रपाल (प्रथम) और विनायकपाल के दानपत्रों की मुद्राऐं भी इसी तरह जुड़ी हुई होनी चाहियें (ई. पं; जि. १५, पृ. ११२ और १४० के पास के प्लेट. इन प्लेटों में मुद्रा की प्रतिकृति नहीं दी परंतु बाईं ओर जहां वह जुड़ी थी वह स्थान खाली पाया जाता है).
c30.s12.13
५ मालवे के परमारों के दानपत्रों में राजमुद्रा बहुधा दूसरे पन्ने के बाईं ओर के नीचे के कोण पर लगी होती है.
c30.s12.14
६ राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए दानपत्रों में से सब से छोटा ४ १/२ इंच लंबा और ३ इंच चौड़ा है और तोल में १२ तोले है. सब से बड़ा प्रतिहार राजा भोजदेव का दौलतपुरे (जोधपुर राज्य में) से मिला हुआ मुद्रासहित २ फुट ५ १/२ इंच लंबा और १ फुट ४ इंच चौड़ा तथा तोल में १६ १/२ सेर (३६ १/२ पौंड) के करीब है: ये दोनों एक पत्रे पर ही खुदे हैं.
c30.s12.15
७ सोहगौरा के ताम्रलेख में राजकीय आज्ञा है (ए. सो. बंगा. के प्रोसीडिंग्स ई. स. १८६४, प्लेट १).
c30.s12.16
८ तक्षशिला के ताम्रलेख में क्षत्रप पतिक के बनाये बौद्ध स्तूप एवं मठ का उल्लेख है (ऐ. इं; जि. ४, पृ. ५४-५६).
c30.s12.17
९ राजकोट के सुप्रसिद्ध स्वर्गीय वैद्य बावा मेहता के घर की देवपूजा में तांबे के कई एक छोटे बड़े यंत्र मेरे देखने में आये. मंगल का त्रिकोण यंत्र कई लोगों के यहां मिलता है. अजमेर के संभवनाथ के जैन (श्वेताम्बर) मंदिर में छोटी ढाल जैसा बड़ा एक गोल यंत्र रक्खा हुआ है, जिसको 'वीसस्थानक' का यंत्र कहते हैं.
पीतल
c30.s13.1
जैन मंदिरों में पीतल की बनी हुई बड़ी बड़ी कई मूर्तियां मिलती हैं जिनके आसनों२ पर और छोटी मूर्तियों की पीठ पर लेख खुदे रहते हैं. ऐसे लेखोंवाली १००० से अधिक जैन मूर्तियां मेरे देखने में आई हैं जिनपर के लेख ई. स. की ७ वीं से १६ वीं शताब्दी तक के हैं. जैन मंदिरों में पीतल के गोल गट्टे रक्खे हुए मिलते हैं जिनपर 'नमोकार' मंत्र और यंत्र खुदे रहते हैं.
c30.s13.2
२ आबू पर अचलगढ़ के जैन मंदिर में पीतल की बनी हुई ४ विशाल और ८ कुछ छोटी मूर्तियें स्थापित हैं जिनके आसनों पर ई. स. की १५ वीं और १६ वीं शताब्दी के लेख खुदे हुए हैं. अन्यत्र भी ऐसी मूर्तियां देखने में आती हैं परंतु इतनी एक साथ नहीं.
कांसा
c30.s14.1
कई मंदिरों में लटकते हुए कांसे के घंटों पर भी उनके भेट करनेवालों के नाम और भेट करने का संवत् आदि खुदा हुआ मिलता है.
लोहा
c30.s15.1
लोहे पर भी लेख खोदे जाने के कुछ उदाहरण मिल आते हैं. देहली (मिहरोली) के कुतुब मीनार के पास के लोह के स्तंभ पर राजा चंद्र का लेख खुदा है जो ई. स. की ५ वीं शताब्दी का है. आबू पर अचलेश्वर के मंदिर में खड़े हुए लोहे के विशाल त्रिशूल पर वि. सं. १४६८ फाल्गुन सुदि १५ का लेख खुदा हुआ है. चित्तौड़ आदि कई स्थानों में लोहे की तोपों पर भी लेख खुदे हुए मिलते हैं. सोने, चांदी, तांबे और सीसे के सिक्कों के ठप्पे लोहे के ही बनते थे और उनपर अक्षर उलटे खोदे जाते थे.
c30.s15.2
१ त्रिषती (मद्रास इहाते में) में तांबे के पत्नों पर खुदे हुए तेलुगु पुस्तक मिले हैं (बी; सा. इं. पे; पृ. ८६). हुएन्त्संग के लेख से पाया जाता है कि 'राजा कनिष्क ने प्रसिद्ध विद्वान् पार्श्व की प्रेरणा से कश्मीर में बौद्धसंघ एकत्रित किया जिसने सूत्रपिटक पर 'उपदेशशास्त्र', विनयपिटक पर 'विनयविभाषाशास्त्र' और अभिधर्मपिटक पर 'अभिधर्मविभाषाशास्त्र' नामक लाख लाख श्लोकों की टीकाएं तैयार कीं. कनिष्क ने इन तीनों टीकाओं को ताम्रफलकों पर खुदवाया और उनको पत्थर की पेटियों में रख कर उनपर स्तूप बनवाया' (बी; बु. रे. वे. व; जि. १, पृ. १५५. हुएन्त्संग की भारतीय यात्रा पर थॉमस वॉटर्स का पुस्तक, जि. १, पृ. २७१). ऐसी भी प्रसिद्धि है कि सायण के वेदभाष्य भी तांबे के पत्त्रों पर खुदवाये गये थे (मॅक्समूलर संपादित ऋग्वेद, जि. १, पृ. XVII).
काली स्याही
c30.s16.1
कागज़ पर लिखने की काली स्याही (मसी) दो तरह की होती है पक्की और कच्ची. पक्की स्याही से पुस्तकें लिखी जाती हैं और कच्ची स्याही से व्यापारी लोग अपनी बही आदि लिखते हैं. पक्की स्याही बनाने
c30.s16.2
के लिये पीपल की लाख को, जो अन्य वृक्षों की लाख से उत्तम समझी जाती है, पीस कर मिट्टी की हंडिया में रक्खे हुए जल में डाल कर उसे आग पर चढ़ाते हैं. फिर उसमें सुहागा और लोध पीस कर डालते हैं. उबलते उबलते जब लाख का रस पानी में यहां तक मिल जाता है कि काग़ज़ पर उससे गहरी लाल लकीर बनने लगती है तब उसे उतार कर छान लेते हैं. उसको अलता ( अलक्तक ) कहते हैं. फिर तिलों के तेल के दीपक के कज्जल को महीन कपड़े की पोटली में रख कर अलते में उसे फिराते जाते हैं जब तक कि उससे सुंदर काले अक्षर बनने न लग जावें. फिर उसको दवात (मसीभाजन) में भर लेते हैं. राजपूताने के पुस्तकलेखक अब भी इसी तरह पक्की स्याही बनाते हैं. संभव है कि ताड़पत्र के पुस्तक भी पहिले ऐसी ही स्याही से लिखे जाते हों.
c30.s16.3
कच्ची स्याही कज्जल, कत्था, बीजाबोर और गोंद को मिला कर बनाई जाती है परंतु पत्रे पर जल गिरने से स्याही फैल जाती है और चौमासे में पत्रे परस्पर चिपक जाते हैं इस लिये उसका उपयोग पुस्तक लिखने में नहीं किया जाता.
c30.s16.4
भूर्जपत्र (भोजपत्र) पर लिखने की स्याही बादाम के छिलकों के कोयलों को गोमूत्र में उबाल कर बनाई जाती थी१. भूर्जपत्र उष्ण हवा में जल्दी खराब हो जाते हैं परंतु जल में पड़े रहने से वे बिलकुल नहीं बिगड़ते इस लिये कश्मीरवाले जब मैले भूर्जपत्र के पुस्तकों को साफ़ करना चाहते हैं तब उनको जल में डाल देते हैं जिससे पत्रों एवं अक्षरों पर का मैल निकल कर वे फिर स्वच्छ हो जाते हैं और न स्याही हलकी पड़ती है और न फैलती है. भूर्जपत्र पर लिखे हुए पुस्तकों में कहीं अक्षर आदि अस्पष्ट हों तो ऐसा करने से वे भी स्पष्ट दीखने लग जाते हैं.
c30.s16.5
१ बूलर की कश्मीर आदि के पुस्तकों की रिपोर्ट, पृ. ३०
c30.s16.6
काली स्याही से लिखे हुए सब से पुराने अक्षर ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी तक के मिले हैं२.
c30.s16.7
२ द्वितीय राजतरंगिणी का कर्ता जोनराज अपने ही एक मुक़द्दमे के विषय में लिखता है कि '[मेरे दादा] लोलराज ने किसी कारण से अपनी दस प्रस्थ भूमि में से एक प्रस्थ भूमि किसी को बेची और अपने नोनराज आदि बालक पुत्रों को यह कह कर उसी वर्ष वह मर गया. नोनराज आदि को असमर्थ देख कर भूमि ख़रीदनेवाले एक के बदले ज़बर्दस्ती से दसों प्रस्थ भोगते रहे और उसके लिये उन्होंने यह जाल बना लिया कि विक्रयपत्र (बैनामे) में लिखे हुए ‘भूप्रस्थमेकं विक्रीतं’ में ‘म’ के पूर्व रेखारूप से लगनेवाली ‘ए’ की मात्रा[^asterisk] को ‘द’ और ‘म’ को ‘श’[^dagger] बना दिया, जिससे विक्रयपत्र में ‘भूप्रस्थमेकं’ का ‘भूप्रस्थदशकं’ हो गया. मैंने यह मामला उस राजा (जैनोल्लाभद्दीन; ज़ैन-उल्-आबदीन) की राजसभा में पेश किया तो राजा ने भूर्जपत्र पर लिखे हुए विक्रयपत्र को मंगवा कर पढ़ा और उसे पानी में डाल दिया तो नये अक्षर घुल गये और पुराने ही रह गये जिससे ‘भूप्रस्थमेकं’ ही निकल आया. इस [न्याय] से राजा को कीर्ति, मुझको भूमि, जाल करनेवालों को अद्भुत दंड, प्रजा को सुख और दुष्टों को भय मिला’ (जोनराजकृत राजतरंगिणी, श्लोक १०२५-३७). इससे यह पाया जाता है कि या तो कश्मीरवाले तीन पीढ़ी में ही पक्की स्याही बनाने की विधि भूल गये थे, या भूर्जपत्र पर की स्याही जितनी पुरानी हो उतने ही अक्षर दृढ़ हो जाते थे या अधिक संभव है कि पंडित लोलराज की पुस्तक लिखने की स्याही, जिससे विक्रयपत्र लिखा गया था, पक्की थी और दूसरी स्याही, जिससे जाल किया गया, कच्ची थी. [^asterisk]: शारदा (कश्मीरी) एवं अन्य प्राचीन लिपियों में पहिले ‘ए’ की मात्रा का चिह्न छोटी या बड़ी खड़ी लकीर भी था जो व्यंजन के पहिले लगाया जाता था (देखो, लिपिपत्र २८ में ‘शे’; २६ में ‘दे’; ३० में दिये हुए अरिगांव के लेख के अक्षरों में ‘ते’).
c30.s16.8
dagger कश्मीरी लिपि में ‘म’ और ‘श’ में इतना ही अंतर है कि ‘म’ के ऊपर शिर की लकीर नहीं लगती और ‘श’ के लगती है (देखो, लिपिपत्र ३१), बाकी कोई भेद नहीं है. सांची के एक स्तूप में से पत्थर के दो गोल डिब्बे मिले हैं जिनमें सारिपुत्र और महामोगलान की हड्डियां निकली हैं. एक डिब्बे के ढक्कन पर ‘सारिपुतस’ खुदा है और भीतर उसके नाम का पहिला अक्षर ‘सा’ स्याही से लिखा हुआ है. दूसरे के ढक्कन पर ‘महामोगलानस’ खुदा है और भीतर ‘म’ अक्षर स्याही का लिखा हुआ है. सारिपुत्र और महामोगलान दोनों बुद्धदेव (शाक्य मुनि) के मुख्य शिष्य थे. सारिपुत्र का देहांत बुद्धदेव की मौजूदगी में हो गया था और महामोगलान का बुद्ध के निर्वाण के बाद हुआ था. यह स्तूप ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी का बना हुआ माना जाता है (कनिंगहाम का ‘भिलसा टोप्स’, पृ. २६४-३०८). यदि ये डिब्बे उक्त स्तूप के बनने के समय नये बनाये जाकर उनमें वे हड्डियां रक्खी गई थीं ऐसा माना जावे तो ये स्याही से लिखे हुए अक्षर ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी के होने चाहिये परंतु यदि यह माना जावे कि ये डिब्बे किसी अन्य स्तूप से निकाले जाकर सांची के स्तूप में रक्खे गये थे तो उक्त स्याही के अक्षरों के लिखे जाने का समय ई. स. पूर्व की पांचवीं शताब्दी होगा.
रंगीन स्याही
c30.s17.1
रंगीन स्याहियों में लाल स्याही मुख्य है. वह दो तरह की होती है. एक तो अलना की और दूसरी हिंगलू की, जो उसको गोंद के पानी में घोल कर बनाई जाती है. हस्तलिखित वेद के पुस्तकों में स्वरों के चिह्न, और सब पुस्तकों के पत्रों पर की दाहिनी और बाईं ओर की हाशिये की दो दो खड़ी लकीरें अलना या हिंगलू से बनी हुई होती हैं. कभी कभी अध्याय की समाप्ति का अंश, एवं ‘भगवानुवाच’, ‘ऋषिरुवाच’ आदि वाक्य तथा विरामसूचक खड़ी लकीरें लाल स्याही से बनाई जाती हैं. ज्योतिषी लोग जन्मपत्र तथा वर्षफल के लंबे लंबे खरड़ों में खड़े हाशिये, आड़ी लकीरें तथा भिन्न भिन्न प्रकार की कुंडलियां लाल स्याही से ही बनाते हैं.
c30.s17.2
सूखे हरे रंग को गोंद के पानी में घोल कर हरी, जंगाल से जंगाली और हरिताल से पीली स्याही भी लेखक लोग बनाते हैं. कभी कभी पुस्तकों के अध्याय आदि समाप्ति के अंशों में वे इन रंगीन स्याहियों का उपयोग करते और विशेष कर जैन पुस्तकों में उनसे लिखे हुए अक्षर मिलते हैं. बहुधा सब पुस्तकलेखक जिन अक्षरों या शब्दों को काटना होता उनपर हरिताल फिरा देते अथवा स्याही से उनके चारों ओर कुंडल या ऊपर खड़ी लकीरें बना दिया करते थे.
सोने और चांदी की स्याही
c30.s18.1
सोने और चांदी के बरकों को गोंद के पानी में घोट कर सुनहरी और रुपहली स्याहियां बनाई जाती हैं. इन स्याहियों से लिखने के पहिले पत्रे सफेद हों तो उन्हें काले या लाल रंग से रंग लेते हैं. फिर कलम से उनपर लिख कर अकीक या कौड़े आदि से घोटते हैं तब अक्षर चमकीले निकल आते हैं. ऐसी स्याहियों का उपयोग विशेष कर चित्रकार लोग चित्रों में करते हैं तो भी श्रीमंत लोग प्राचीन काल से उनका उपयोग पुस्तकादि लिखवाने में कराते थे जिसके उदाहरण मिल आते हैं१.
c30.s18.2
१ अजमेर के सेठ कल्याणमल ढड्ढा के पुस्तकसंग्रह में बहुत सुंदर अक्षरों में लिखा हुआ ‘कल्पसूत्र’ है जिसका पहिला पन्ना सुवर्ण की स्याही से लिखा हुआ है. यह पुस्तक १७ वीं शताब्दी का लिखा हुआ प्रतीत होता है. सुवर्ण की स्याही से पूरे लिखे हुए दो जैन पुस्तकों का सिरोही राज्य के जैनपुस्तकसंग्रहों में होना विश्वस्त रीति से सुना गया है परंतु वे मेरे देखने में नहीं आये. वि. सं. १६२२ के करीब मेरे पिता ने उदयपुर के पंडित सदाशिव से एक छोटा पन्ना सोने की स्याही से और दूसरा चांदी की स्याही से लिखवाया, वे दोनों अब तक विद्यमान हैं और रंगीन कागज़ों पर लिखे हुए हैं. सोने की स्याही से लिखी हुई फारसी की एक किताब अलवर के राज्यपुस्तकालय में है ऐसा सुना जाता है. वैसी ही फारसी की एक किताब सेठ कल्याणमल ढड्ढा के यहां गिरवी रक्खी हुई है परंतु उसपर मुहर लगी हुई होने के कारण उसका नाम मालूम नहीं किया जा सका. सेठ कल्याणमल ढड्ढा के यहाँ कई हस्तलिखित पुस्तकों के संग्रह की देशी छींट के पुट्ठे की एक पुरानी किताब है जिसमें ‘यंत्रावचूरि’ नामक पुस्तक १६ पत्रों (३८ पृष्ठ) पर चांदी की स्याही से बड़े ही सुंदर अक्षरों में लिखा हुआ है, जिसके प्रत्येक पृष्ठ के चारों तरफ के हाशिये रंगीन लकीरों से बनाये गये हैं. हाशियों पर जो इबारत लिखी है वही काली स्याही से है बाकी सब चांदी की स्याही से है. चांदी की स्याही से लिखा हुआ हिस्सा कागज़ को पहिले लाल या काला रंगने के बाद लिखा गया है. पुस्तक में संवत् नहीं है परंतु वह ई. स. की १५ वीं शताब्दी के आसपास का लिखा हुआ प्रतीत होता है. पत्रे इतने जीर्ण हो गये हैं कि हाथ देने से टूटते हैं. दो दो पृष्ठों के बीच रेशम के टुकड़े रक्खे हैं वे भी बिलकुल जीर्णशीर्ण हो गये हैं.
क़लम
c30.s19.1
विद्यार्थी लोग प्राचीन काल से ही लकड़ी के पाटों पर लकड़ी की गोल तीखे मुंह की क़लम (वर्णक) से लिखते चले आते हैं. स्याही से पुस्तकें लिखने के लिये नड (बरू) या बांस की क़लमें (लेखिनी) काम में आती हैं. अजंटा की गुफाओं में जो रंगों से लेख लिखे गये हैं वे महीन बालों की क़लमों (वर्तिका) से लिखे गये होंगे. दक्षिणी शैली के ताड़पत्रों के अक्षर कुचरने के लिये लोहे की तीखे गोल मुख की क़लम (शलाका) अब तक काम में आती है. कोई कोई ज्योतिषी जन्मपत्र और वर्षफल के खरड़ों के लंबे हाशिये तथा आड़ी लकीरें बनाने में लोहे की क़लम को अब तक काम में लाते हैं, जिसका ऊपर का भाग गोल और नीचे का स्याही के परकार जैसा होता है.
परकार
c30.s20.1
ज्योतिषी लोग जन्मपत्र और वर्षफल में भिन्न भिन्न प्रकार की कुंडलियां बनाने में लोहे के बने हुए पुराने ढंग के परकार अब तक काम में लाते हैं. प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों में कभी कभी विषय की समाप्ति आदि पर स्याही से बने कमल१ मिलते हैं वे परकारों से ही बनाये हुए हैं. वे इतने छोटे होते हैं कि उनके लिये जो परकार काम में आये होंगे वे बड़े सूक्ष्म मान के होने चाहियें.
c30.s20.2
१ मेमॉयर्स ऑफ़ दी एशियाटिक् सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जि. ५, प्लेट ३७ में ताड़पत्र पर लिखे हुए 'पंचरक्षा' नामक पुस्तक के एक पत्रे की जो प्रतिकृति छपी है उसमें दो कमल बने हुए हैं, एक १२ और दूसरा ६ पंखड़ी का. वे कमल इतने छोटे और उनकी परिधि की वृत्तरेखाएं इतनी बारीक हैं कि जिस परकार से वे बनाये गये हैं उसकी बड़ी सूक्ष्मता का अनुमान भली भांति हो सकता है.
रेखापाटी
c30.s21.1
काग़ज़ों पर लिखे जानेवाले पुस्तकों के पत्रों में पंक्तियां सीधी और समानांतर लाने के लिये लेखक लोग 'रेखापाटी' काम में लाते हैं. लकड़ी की पतली पाटी पर दोनों ओर डोरा लपेट कर डोरों की पंक्तियां समानांतर की जाती हैं. फिर एक ओर के सब डोरे एकत्र कर उनके मध्य में एक पतली तीन चार इंच लंबी लकड़ी डाल कर उसको घुमाते हैं जिससे दूसरी तरफ़ की डोरों की समानांतर पंक्तियां दृढ़ हो जाती हैं और इधर उधर हटती नहीं. कोई कोई, पाटी में लंबाई की तरफ़ के दोनों किनारों के पास, समानांतर छेद कर उनमें डोरा डालते हैं. इस प्रकार की पाटी को 'रेखापाटी' कहते हैं. कोई कोई उसे 'समासपाटी' भी कहते हैं. कितने एक जैन साधुओं के पास बड़ी सुंदर रेखापाटी देखने में आती हैं. वे काग़ज़ के मज़बूत पुट्ठे या कुट्टी की बनी हुई होती हैं और उनके दोनों ओर भिन्न अंतरवाली डोरों की समानांतर पंक्तियां पाटी के साथ रोग़न से चिपकी हुई होती हैं जो कभी हिल ही नहीं सकती. रेखापाटी पर काग़ज़ रख प्रत्येक पंक्ति पर अंगुली दबा कर चलाने से काग़ज़ की लंबाई में डोरों के निशान पड़ जाते हैं. इस प्रकार एक तरफ़ निशान हो जाने के बाद काग़ज़ को उलटा कर पहिले के निशानों के मध्य में उसी तरह निशान बना लिये जाते हैं. इससे दो पंक्तियों के बीच का अंतर दो अंशों में विभक्त हो जाता है जिनमें से ऊपर-वाले में अक्षर लिखे जाते हैं और नीचे का खाली छोड़ दिया जाता है जिससे हस्तलिखित पुस्तकों की पंक्तियां समानांतर होती हैं. ऐसे ही काग़ज़ की दाहिनी और बाईं ओर जितना हाशिया रख-ना हो उतना स्थान छोड़ कर एक एक खड़ी लकीर खींच ली जाती है जिसपर पीछे से लाल स्याही
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